पाँच कवितायेँ - दीप्ति श्री ‘पाठक’ 5 Poems: Deepti Shree 'Pathak' [Hindi-Kavita]


दीप्ति श्री 'पाठक' वर्तमान में 'हिंदी विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय', वाराणसी में हिंदी पत्रकारिता 'स्नातकोत्तर' की छात्रा हैं।
उनकी ईमेल आईडी deeptishree87@gmail.com है।


__________________________एक
विडंबना
एक पन्ना पलटती हूँ,
विहंगम दृष्टि में,
जिसकी हर पंक्तियाँ हैं श्वेत,
फिर भी समझती हूँ,
और समझती है संवेदना,
और पढ़ती हूँ मृत्यु !


और दूसरा पन्ना पलटती हूँ,
जिसकी हर पंक्ति में
उकेरी गयी हैं,
स्वार्थ कि मोतियाँ,
उम्मीद कि धुँधली गाथा,
लक्ष्य ढूँढते इरादे,
परिभाषा ढूँढता प्रेम,
आदमी ढूँढते हुए रिश्ते,
कान्धा ढूँढती लाश,
कहीं रोटी ढूँढती भूख,
कहीं भूख ढूँढती रोटियाँ,


सब हैं इस पन्ने पर,
लेकिन,
वेदना के घेरे में,
ऐसे कैद हैं हर शब्द,
कि मैं बार-बार
ढूँढती हूँ इसमें जीवन....!




__________________________दो
छत-विछत
एक दरीचा,
जिसे बंद करती हूँ मैं
बार बार,
लगता है टूट सा गया है,
कोने में,
किनारे किनारे,
और मैं,
कभी हांथों से,
कभी परदे से,
और कभी अखबार से,
आढ़ती हूँ,
रौशनी, हवा,
आदमी और उम्मीद,
जो आते हैं
मेरे आँगन में,
लिप्सा और लालसा,
के परिधान ओढ़े !


होता है अँधेरा,
छाता है सन्नाटा, निर्वात,
और होती हूँ दूर
आदमी से,
लेकिन भाता है मन को,
आजकल सफ़र
आदमी से अकेले तक का !



__________________________तीन
तुम्हारी कैद में....
तुम्हारी कैद में महफूज़ हूँ मैं,
जरा सी भी रिहाई से,
ज़िन्दगी बिखरती है
ख्वाबों की तरह,


गुस्से में, खीज में,
और कभी जिद में,
तुम्हारे सलाखों को
लांघने लगती हूँ,
और फिर हर बार
लौट आती हूँ,
तुम्हारे ही पहलू में,
तुम्हारी ही कैद में,


जहाँ नहीं है-
मन की जलन,
रिश्तों में सेंध,
प्रतिशोध की ज्वाला,
द्वन्द-प्रतिद्वन्द्व,
छल, द्वेष,


जहाँ है
मेरे लिए-
एक अलग पृथ्वी,
मेरी एक
अपनी अनोखी दुनिया,


तुम्हारी कैद में कैद,
एक मुट्ठी जमीन
और दफ़न आसमान में,
मिलता है-
सुख, दुःख,
प्रेम, निराशा,
रंग, और पानी,
वीराना और बाज़ार,
सावन, सूखा,
बसंत, बहार,
कशमकश की लौ में
मन की शान्ति,
संवेदना के चाक,
जीवन का सार,


और सच कहूँ,
तुम्हारी कैद में महफूज़ हूँ मैं,
जरा सी भी रिहाई से,
ज़िन्दगी बिखरती है
ख्वाबों की तरह..!




__________________________चार
तलाश में...
सूरज की ढलती रौशनी के संग,
हर शाम कुछ उम्मीदें दफ़न होती है,
और
अंगड़ाइयां लेने लगती है
कुछ इरादों का सुबह,
एक तरफ न पाने का दुःख समेटे,
और दूसरी तरफ,
गुंजाइशों पर इतराती
मेरी भंगिमाएँ,
अजीब से भावनाओं के कारोबार में,
उलझी होती हूँ
हर गोधुली बेला,
मुझे जाना कहाँ है,
मैं उदास, हतास,
उल्लास के बीच,
किम्कर्तव्यविमूढ़,
कभी मन के इस किनारे,
कभी मन के उस किनारे ,
पूछती हूँ 'स्वयं से,
मुझे जाना कहाँ है..?



__________________________पांच
कुछ भूख से छटपटाते,
कुछ धूप से झुलसते,
कुछ ठण्ड से अकड़ते,
कुछ महंगाई से मरते,
और कुछ
विश्वास के खो जाने से ।


और मैं
छटपटाती हूँ, झुलसती हूँ,
अकड़ती हूँ, और मरती हूँ,
इन्हें देखकर,
क्या आप भी मरते हैं थोडा बहुत...???????


दीप्ति श्री ‘पाठक’

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1 टिप्पणियाँ

  1. आपके सभी कविताओं से जो उत्कृष्ट भाव दीप्तिमान हो रहे हैं, ये कोई साधारण रचनात्मकता नही ! निश्चय ही हिंदी जगत व वर्तमान समाज के लिए आपकी रचनाएँ सार्थक एवं विशेष महत्व रखती है. आपके इस उत्कृष्ट कार्य के लिए आपको ढेर साड़ी बधाई. साथ ही बधाई शब्दांकन परिवार को जिन्होंने आपके शब्दों को प्रकाशित कर हम सभी पाठक वर्ग को आपके सोंच से जुड़ने का सुअवसर प्रदान किया है.

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