सौंदर्य के प्रतिमान - जनसत्ता


सौंदर्य के प्रतिमान

जनसत्ता 

पिछले हफ्ते राज्यसभा में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा छब्बीस फीसद से बढ़ा कर उनचास फीसद करने के लिए पेश किए गए विधेयक पर चर्चा ने उस वक्त दिलचस्प मोड़ ले लिया, जब जनता दल (एकी) के शरद यादव ने सुंदरता को लेकर हमारे समाज में व्याप्त एक खास पूर्वग्रह की आलोचना शुरू की। उनकी बात को केवल इसलिए हल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए कि वह मूल विषय से हट कर थी। यादव ने कहा कि हम गोरे रंग को बहुत तवज्जो देते हैं और उसे खूबसूरती का पर्याय मान बैठे हैं; यह धारणा न केवल गलत है बल्कि अधिकतर लोगों के प्रति अन्यायपूर्ण भी है। उन्होंने जहां कृष्ण का उदाहरण दिया, वहीं दक्षिण की स्त्रियों का जिक्र किया, जिनके नृत्य मोहक होते हैं। राकांपा के देवीप्रसाद त्रिपाठी ने उनके तर्क के समर्थन में कालिदास का एक श्लोक भी उद्धृत किया। कुछ लोगों को यह चर्चा अटपटी लग सकती है। पर यह कोई देह-चर्चा नहीं थी। 


दरअसल, शरद यादव जिस बात की तरफ ध्यान खींचना चाहते थे वह यह कि गोरे रंग को हमने अनावश्यक महत्त्व दिया हुआ है, सांवला होने को हीन बना दिया है। इस मानसिकता से उबरने की जरूरत है। यों सारी दुनिया में ऐसी धारणा किसी न किसी हद तक प्रचलित है, पर अपने देश में यह कहीं ज्यादा गहराई से जड़ें जमाए हुए है। अधिकतर भारतीय पुरुषों और स्त्रियों के सांवले होने के बावजूद ऐसा क्यों हुआ, यह अध्ययन का विषय है। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया इसे चार सौ वर्षों की गोरी प्रभुता का फल मानते थे; वे यह भी कहते थे कि खूबसूरती के बारे में गलत धारणाओं के कारण बहुत सारी तकलीफ और पीड़ा पैदा होती है, करोड़ों स्त्री-पुरुषों के अवचेतन में अन्याय या पक्षपात भरे व्यवहार के बीज पड़ते हैं। गांधी का भी खयाल इसी तरह का था। अपनी किताब ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में वे काले रंग के जुलू लोगों की कद-काठी ही नहीं, नाक-नक्श की भी तारीफ करते हैं और कहते हैं कि उनकी सुंदरता को हम तभी देख पाएंगे जब काले रंग के प्रति हीनता और तिरस्कार के भाव से मुक्त हों। समस्या यह है कि बाजार और विज्ञापन दिन-रात गोरेपन की ललक बढ़ाने में जुटे रहते हैं। संभावित वर-पक्ष की तरफ से दिए गए हर विज्ञापन में गोरी लड़की की चाहत नजर आती है।

गोरेपन को सुंदरता और पसंदगी के अलावा सफलता से भी जोड़ कर देखा जाता है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि भारत में गोरा बनाने का दावा करने वाले प्रसाधनों की जबर्दस्त मांग रही है। पिछले साल इनका कारोबार चालीस करोड़ डॉलर तक पहुंच गया, जो कि कोका कोला या चाय की बिक्री के आंकड़े से ज्यादा है। यह कारोबार सालाना अठारह फीसद की दर से बढ़ रहा है। इससे एक तरफ क्रीम निर्माता कंपनियों की चांदी हो रही है, और दूसरी तरफ करोड़ों स्त्री-पुरुष ऐसी चीज पर पैसा बहा रहे हैं जिससे कुछ हासिल नहीं होना है। इससे उनकी और दूसरों की मिथ्या धारणाओं को ही बल मिलता है। पर गोरेपन के महिमा-बखान के खिलाफ आवाज भी उठ रही है। वर्ष 2009 में कुछ महिलाओं ने ‘डार्क इज ब्यूटीफुल’ नामक समूह की स्थापना की, जिससे चार साल बाद अभिनेत्री नंदिता दास भी जुड़ गर्इं। भारत बहुत विविधाओं का देश है। जहां हमें विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द के अभियान चलाने की जरूरत है, वहीं चमड़ी के रंग को लेकर रूढ़ हो गए प्रतिमान को बदलने की भी।

शरद यादव की विवादित टिप्पणी पर जनसत्ता में आज छपा संपादकीय

nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

2 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (20-03-2015) को "शब्दों की तलवार" (चर्चा - 1923) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. गोरा-काला मानसिक सोच भर है ....गोरे हमें इतने ही अच्छे लगते तो आज भी हम अग्रेजों के गुलामी से मुक्त नहीं हो पाते ..
    बहुत बढ़िया चिंतन ..

    जवाब देंहटाएं

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
मन्नू भंडारी की कहानी — 'रानी माँ का चबूतरा' | Manu Bhandari Short Story in Hindi - 'Rani Maa ka Chabutra'
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — 'पगला गई है भागवती!...'
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
Hindi Story: कोई रिश्ता ना होगा तब — नीलिमा शर्मा की कहानी
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
NDTV Khabar खबर