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अलका सरावगी साहित्यिक कसौटियों पर खरी हैं | Alka Saraogi's Novel 'Jankidas Tejpal Mansion' getting popular

मई 22, 2015

Alka Saraogi, Kolkata, Novel, Rajkamal कोलकाता में जानकीदास तेजपाल मैनशन पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य-प्रेमियों की उमड़ी भीड़

कोलकाता में 'जानकीदास तेजपाल मैनशन' पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य-प्रेमियों की उमड़ी भीड़ - 

विमर्शों के इस दौर में जब साहित्य खॉंचों में विभाजित हो गया है, उनमें विमर्श अधिक है और साहित्य कम। ऐसी स्थिति में अलका सरावगी का साहित्य बहुत राहत लेकर आया है। बढ़ते वैश्विक गाँव के परिप्रेक्ष्य में यदि हम साहित्य के दो पैमाने- पठनीयता व विश्वसनीयता मानें तो इन दोनों कसौटियों पर अलका की विलक्षण पकड़ है अतः इस उपन्यास को मैं उच्च कोटि के साहित्य के दर्जे में रखूँगी।’ उपरोक्त बातें पूर्व राज्यसभा सदस्य व कोलकाता विश्व विद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. चन्द्रा पाण्डेय ने स्टारमार्क, क्वेस्ट मॉल, कोलकाता में अलका सरावगी के नए उपन्यास ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ पर आयोजित परिचर्चा (18 मई 2015) में कही। 

राजकमल प्रकाशन समूह व स्टारमार्क के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस परिचर्चा के सूत्रधार राजश्री शुक्ला ने कहा, “अलका सरावगी का यह उपन्यास बेहतरीन है। पठनीय व रोचक है। इसका विषयवस्तु गंभीर व प्रासंगिक है। विकास के रेल को चलाए जाने के क्रम में इमारतें ढहाई जाती हैं। यह उपन्यास ढहाए जाने के प्रतिरोध को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ के बारे में बताते हुए लेखिका अलका सरावगी का कहना है, “समय के एक ऐसे दौर को लिखना; जो अभी जारी है, चक्रव्यूह में लड़ते हुए लिखना है। न नक्सलवाद चुका है, न वियतनाम, न तिकड़मों का तंत्र, न मैनशनों को ढहाना। समय की नब्ज़ लेखक के हाथ के नीचे धड़क रही हैं।” 

अपने पात्रों को संबोधित करते हुए अलका जी कहती हैं, “जानकीदास तेजपाल मैनशन’ का इंजीनियर आज़ादी के बाद पहले-पहल जवान हुई अपनी पीढ़ी के मोहभंग और क्षोभ का अपने चारों तरफ़ विस्फोट देखता है- कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में भी, और अमेरिका जाने पर वियतनाम विरोधी आंदोलन में भी, मगर वह एक तरह से इन सबके बाहर है। उसे अपने परिवार और समाज के मापदंडों पर सफल होना है। यह तो जब वह लौटकर ख़ुद को एक ढहती हुई दुनिया में पाता है, तो विस्थापन को रोकने की लड़ाई में लग जाता है। विडंबना यह है कि उसके लड़ने के साधन और तरीक़े इसी तंत्र के आज़माए हुए तरीक़े हैं। बाज़ार से लड़ते हुए वह बाज़ार का ही हिस्सा बनकर रह जाता है और उसे पता भी नहीं चलता कि वह कुछ और बन गया है।

इस उपन्यास की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए लेखिका पुनः कहती हैं, “उपन्यास लिखते हुए नक्सलवादी आंदोलन की उपज और उसके कारणों की फिर से समझ पैदा हुई। हालांकि ‘कोई बात नहीं’ उपन्यास के जतीन दा और जीवन चांडाल भी नक्सली चरित्र ही थे, मगर उनकी परिणति क्रांति की विफलता से टूटे हुए लोगों की थी। ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ में दिखता है कि बहुत से लोगों की रोमैंटिक क्रांतिकारिता बाद में ‘सफल’ होने की दौड़ में बदल गई और बाज़ार ने उन्हें निगल लिया। अब उनके पास दो तरह की कहानियाँ थीं अपने बच्चों को सुनाने के लिए--किसी मल्टीनेशनल कंपनी में फिलहाल ‘ऊँचा पोस्ट’ और कभी जान पर खेल कर आधी रात को लाल रंग से शहर की दीवारों पर पोस्टर रंगने की। बाजार सबके लिए मूल्यबोध के सरकते-दरकते पैमाने बनाता गया है। बाजार ही साधन और साध्य बन गया है इस देश में- चाहे वह पुराने नक्सलवादी रहे हों या फिर फॉरेन रिटर्न्ड इंजीनियर।”

गौरतलब है कि करीब बीस बरस पहले अलका सरावगी का पहला उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाइपास’ आया। बीच के अंतराल में तीन और उपन्यास ‘शेष कादंबरी’, ‘कोई बात नहीं’, और ‘एक ब्रेक के बाद’ आए। और अब उनका नया उपन्यास ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ राजकमल से प्रकाशित होकर आया है। 

इस परिचर्चा में राजकमल प्रकाशन के निदेशक अलिंद महेश्वरी, प्रो. मंजू रानी सिंह, कवि राजेश्वर वशिष्ठ, कवि राज्यवर्धन, कवि व उपन्यासकार विमलेश त्रिपाठी सहित सैकड़ों साहित्य-प्रेमी उपस्थित थे। 
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