"एक शोफिसटिकेटड डस्टबिन" ... कवितायेँ : मुकेश कुमार सिन्हा | Poems : Mukesh Kumar Sinha (hindi kavita sangrah)


कवितायेँ 

~मुकेश कुमार सिन्हा 



सिमरिया पुल 

जब भी जाता हूँ गाँव
तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से
सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु
पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से
पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से
लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह
हर बार किराये के अलावा, खोना होता है
कुछ न कुछ, इस दुखदायी यात्रा में
पर, पता नहीं क्यों,
इस पुल के ऊपर की यात्रा देती है संतुष्टि !!

माँ गंगा की कल-कल शोर मचाती धारा
और उसके ऊपर खड़ा निस्तेज, शांत, चुप
लंबा चौड़ा, भारी भरकम लोहे का पुल
पूरी तरह से हिन्दू संस्कारों से स्मित
जब भी गुजरते ऊपर से यात्री
तो, फेंकते हैं श्रद्धा से सिक्का
जो, टन्न की आवाज के साथ,
लोहे के पुल से टकराकर
पवित्र घंटी की ठसक मारता है पुल,
और फिर, गिरता है जल में छपाक !!

हर बार जब भी गुजरो इस पुल से
बहुत सी बातें आती है याद
जैसे, बिहार गौरव, प्रथम राष्ट्रपति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की, क्योंकि सेतु है
समर्पित उनके प्रति !
पर हम तो महसूसते हैं सिमरिया पुल
क्योंकि यहीं सिमरिया में जन्मे
हम सबके राष्ट्र कवि “दिनकर”
एकदम से अनुभव होता है
पुल के बाएँ से गुजर रहे हों
साइकल चलाते हुए दिनकर जी !
साथ ही, गंगा मैया की तेज जलधारा
पवित्र कलकल करती हुई आवाज के साथ
बेशक हो अधिकतम प्रदूषण
पर मन में बसता है ये निश्छल जल और पुल !!

और हाँ !! तभी सिमरिया तट पर
दिख रहा धू-धू कर जलता शव
और दूर दिल्ली में बसने वाला मैं
कहीं अंदर की कसक के साथ सोच रहा
काश! मेरा अंतिम सफर भी, ले यहीं पर विराम
जब जल रहा हो, मेरे जिस्म की अंतिम धधक
इसी पुल के नीचे कहीं
तो खड्खड़ता लोहे का सिमरिया पुल
हो तब भी ........ अविचल !!

माँ गंगा को नमन !!






गन्दी बात 

बेवकूफ लड़की !
तुम्हें कहाँ होगा याद
भूल चुके होगे तुम ‘सब’
पता नहीं कैसे कैसे
अजीब अजीब सी सौगंधों से
बांधा करती थी तुम !

हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद
और उन सौगंधों का अंत
होता था, दो शब्दो के साथ
“गंदी बात”
सिगरेट पीना?
गंदी बात
शराब को हाथ लगाना
गंदी बात
एक बार दी थी सलाह तुम्हें
परीक्षा मे चोरी की
पर, तुम्हारा था अजीब सा उत्तर
गंदी बात
यहाँ तक की “ए” सेर्टिफिकेट वाली मूवी
आती थी ‘गंदी बात’ की श्रेणी में
मत घूरों ऐसे लड़कियों को
गंदी बात
धत्त ! ऐसे स्पर्श !!
बहुत गंदी बात !!

ये लो अब, आज तो जिंदगी
है ऐसी दोराहे पर
जहां से दोनों रास्ते
है बुराई से भरे
बस एक थोड़ा कम, तो दूजा ज्यादा

बहुत दिनों तक थी
तुम्हारी ये ‘गंदी बात’, जेहन में
तभी तो एक बार
किसी अपने की बहुत सारी
नोटों की गड्डियाँ थी गिननी
हर गड्डी मे नोट थे एक या दो ज्यादा
पर तुम्हारी ‘गंदी बात’
तब तक कौंध रही थी
जब तक की गड्डीयों की गिनती
खत्म न हो गई !!

खैर छोड़ो !
गंदी बात, माय फुट
धुएँ के छल्ले उड़ाए न, दारू भी चखूँगा
जल्दी ही !!
किसी ने बताया
दारू का पैग जब हलक से उतरता था
तो मुंह बनाना पड़ता है
ताकि दिख जाये “गंदी बात”






शब्दों के हर्फ़ 

तकिये को मोड़ कर
उस पर रख लिया था सर
टेबल लैम्प की हलकी मद्धिम रौशनी
नजदीक पढने वाले चश्मे के साथ
गड़ाए था आँख
“पाखी” के सम्पादकीय पर !!

हाशिये पर हर्फ़
समझा रहे थे, प्रेम भरद्वाज
उन्हें पागल समझने के लिए
हैं हम स्वतंत्र
क्योंकि वो करते हैं दिल की बात !!

तभी अधखुली खिड़की से
दिखा रुपहला चमकीला चाँद
हाँ ठण्ड भी तो थी बहुत
लगा कहीं कम्बल तो नहीं मांग रहा !
या फिर, शायद वो ही निहार रहा था
मेरी ओर,
आखिर क्यों कम करूँ खुद की अहमियत !

आखिर सोचना ही है तो
क्यों न सोचें की
चाँद ही बन जाए हमदम !! हर दम !!
फिर टिमटिमाते तारों से भरा
ये काला आकाश
और उसमे एकमात्र प्यारा सा चाँद
जैसे छींट वाला कम्बल ओढ़े
निहार रही थी “तुम”
उफ़ !! ये ‘शब्दों के हर्फ़’ क्या न करवाए !






डस्ट बिन 

मेरे घर के कोने में पड़ा
नीले रंग का प्लास्टिक का
सुन्दर सा बाल्टीनुमा डस्टबिन
है उसमे लीवर-सा सिस्टम
ताकि उसको पैर से दबाते ही
लपलपाते घड़ियाल के मुंह के तरह
खुल जाता है ढक्कन !!
सुविधाजनक डस्टबिन
समेट लेता है हर तरह का कूड़ा
जूठन/धूल/कागज़/और भी
सब कुछ /  बहुत कुछ
बाहर से दिखता है सलीकेदार
नहीं फैलने देता दुर्गन्ध
नहीं बढ़ने देता रोग के कीटाणु
है अहम्, मेरे घर का डस्टबिन
आखिर हैं हम सफाई पसंद लोग !!

अगर मैं खुद को करूँ कम्पेयर
तो पाता हूँ, मैं भी हूँ
एक शोफिसटिकेटड डस्टबिन
सहेजे रहता हूँ गंदगी अन्दर
तन की गंदगी
मन की गंदगी, हर तरह से
गुस्सा/इर्ष्या/जलन/दुश्मनी
हर तरह का दुर्गुण/अवगुण
है, अहंकार का ढक्कन भी
पर, हाँ, बाहर से टिप-टॉप
एक प्यारा सा मस्तमौला इंसान
अन्दर पड़ी सारी दुर्भावनाएं
फ़रमनटेट करती है
और अधिक कंडेंसड  हो जाती है
और फिर, गलती से या अचानक
दिखा ही देती है मेरा अन्तःरूप !!

साफ़ हो जाता है डस्टबिन
एक फिक्स आवर्ती समय पर
पर मेरे अन्दर के
दुर्गुण के लेयर्स
सहेजे हुए परत दर परत
हो रहा है संग्रहित !!

काश ! स्वभावजन्य कमजोरियों से
हुई दुर्गुणों के अपच को
शब्दों के पश्चाताप से रोगमुक्त कर
सादगी भरी स्वीकारोक्ति की डूबकी लगा
साफ़ स्वच्छ छवि के साथ
एक बार फिर से हो पाता प्रतिष्ठित

एक काश, ही तो कहना होगा
प्रियोडीकली !!
और मेरे सर के ऊपर का आसमान
पूर्ववत रहेगा सुन्दर
सम्मोहक नीला !!

मुकेश कुमार सिन्हा
जन्म : 4 सितम्बर 1971 (बेगुसराय, बिहार)
शिक्षा : बी.एस.सी. (गणित) (बैद्यनाथधाम, झारखण्ड)
मोबाइल: +91-9971379996
निवास: लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली 110023
वर्तमान: सम्प्रति कृषि व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली के साथ सम्बद्ध
संग्रह : हमिंग बर्ड (सभी ई-स्टोर पर उपलब्ध)






मित्रता का गणितीय सिद्धांत 

शांत सौम्य निश्छल
थी उम्रदराज
बस थोड़ी होंगी उम्र में बड़ी
यानि संभावनाएं....
मित्रता के साथ
थी, मिलने वाली सलाह की
उम्मीद तो रहती ही है
पर ये उम्मीद हुई भी पूरी
कभी मिली सलाह
कभी की उन्होने खिंचाई
कुछ साहित्यक त्रुटियाँ भी बताई
हमने भी सीखा व सराहा !

एक बार, अनायास ही हुआ उजागर
उनके व्यक्तित्व का नया अनबूझा सा पन्ना
नितांत वैयक्तिक उपलब्धियों की लालसा में
चतुराई से किया हुआ
जोड़, घटाव, गुणा भाग का
एक अलग गणित
संबंधो के धरातल पर
क्योंकि वो गढ़ रही थी
रिश्तों के नए प्रमेय
जो था नए संबंधो पर आधारित!
तभी तो “दो सामानांतर रखाओं को
जब त्रियक रेखा काटे तो
होते हैं, एकांतर कोण बराबर”
इसी सिधान्त पर समझा रहीं थी
ढूंढ रही थी, मेरी गलतियाँ
ताकि, दिख पाये, सब बराबर
आजमाए गए गणितीय सूत्र
ताकि सिद्ध हो पाये कि
रिश्तों के प्रमेय
का गढ़ना है उचित !!

माफ करो यार !!
ऐसी मित्रता को दूर से सलाम
एक गणितीय सिद्धान्त और है
“समानान्तर रेखाएँ
मिलती हैं अनंत पर जाकर”
तो एक स्पेसिफिक स्पेस
बना लिया है मैंने
हर समय के लिए
बी हॅप्पी न ................!!


००००००००००००००००

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