कविता - रघुवंश मणि | Poem - Raghuvansh Mani



कविता (Poem)

रघुवंश मणि 


रघुवंशमणि कवि, आलोचक एवं अनुवादक। जन्म: 30.06.1964, लखनऊ। पिता: आचार्य राममणि त्रिपाठी। शिक्षा: एम.ए. अंग्रेजी, शोधकार्य: डब्लू. बी. यीट्स की कविताओं पर। व्यवसाय: अध्यापन। पता: 365, इस्माईलगंज, अमानीगंज, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत फोन: 0945285074

         


कंक्रीट में गुलाब


साफ धुली ठण्डी फर्श पर
उससे भी कठोर कंक्रीट का गमला
जिसमें भूमि का भ्रम पैदा करती थोड़ी सी मिट्टी
जंगल का भ्रम पैदा करती हरी पत्तियाँ और टहनी
उसकी चोटी पर एक गुलाब
घर के बाहर है गुलाब
मगर सड़क की असुरक्षा में नहीं
हवाओं के विरुध्द जीवन बीमा है चहारदीवारी
पशुओं के विरुध्द जी. पी. एफ. है गेट
थोड़ी सी खाद मिलती है मंहगाई भत्ते की तरह
हल्का सा पानी ओवरटाइम की तरह
जरूरत के मुताबिक
इसी के लिए बनाया गया है दो कमरे का फ्लैट
एक में सोते हैं बच्चे
दूसरे में पति-पत्नी
दिन में जो हो जाता है ड्राइंगरूम
इसी गुलाब की खातिर
पति रोज भीड़ चीरता जाता है आफिस
पत्नी करती है दिन भर काम
बच्चों को भेजा जाता है स्कूल
पति, पत्नी और बच्चे के बीच उगा
यह गुलाब चमकता है
आफिस से लौटे थके पति की मुस्कान में
बोर हुई पत्नी की औपचारिकताओं में
किताबों में दबे बच्चे की अस्वाभाविक हँसी में
हफ्ते में सण्डे की तरह है यह गुलाब
दीवारों पर टंगे इच्छाओं के चित्र की तरह
थकान के बाद साथ चाय पीते मित्र की तरह
समय निकाल कर देखे गये मैटिनी शो जैसा
गर्मी में बच्चे की एक आइसक्रीम की तरह
मित्रों के सामने मुस्काता है
अतिथि के सामने खिसियाता है
अफसर के आगे बिछ जाता है
तेज हवा चलने पर
मगर थोड़ा सा हिलता है
पुलिस के डण्डे की तरह है यह
हमारे और पागल कर देने वाली वानस्पतिक गंध के बीच
जो जंगलों की सघनता में ही जनमती है
जिसकी एक छाया भर नहीं है यह
हमारे और इन्द्रधनुषी रंगों के बीच
किसी शासनादेश की तरह टंकित है
धरती की सोंधी प्रफुल्लित बरसाती महक के
विस्तार के चारो ओर काँटेदार
बाड़े की तरह
एक डायवर्जन भर है
कंक्रीट में उगा
लगभग कंक्रीट सा
यह गुलाब


कुदाल

एक बार फिर वही सवाल
कि क्या हो इस कुदाल का
शब्दों से भर गया हूँ कुछ इस कदर
कि किसी शोक प्रस्ताव की तरह
मौन रहूँ कुछ क्षण
इस मौन के अन्तस्थल से उभरती है 
एक साफ और ठोस आकृति
जो बार-बार उभरती रही है 
जब बैठता रहा हूँ
किसी अनुकूलित विचारस्थली में
पड़ी रही है एक कुदाल
मेरे मस्तिष्क के अंधेरों में 
बाहर सब कुछ चमकदार है
धूल रहित व्यवस्थित इतना
कि मैं हो जाता हूँ उथल-पुथल 
कि क्या करूँ मैं इस कुदाल का
जो गड़ती है मेरे दिमाग में इस कदर
कि अकेला पड़ जाता है दर्द
यह शायद समायोजन की समस्या हो 
जिसका सम्बंध है व्यक्तित्व विकास से 
जिसके लोहे पर लगी है गीली मिट्टी खेत की
और पसीने की गंध
उसकी बेंट पर
कैसे रखूं इस कुदाल को 
विकसित मस्तिष्क की जटिल बहसों में
जिसकी अत्याधुनिक तकनीक से
हमारे सुसभ्य प्रयासों के बाद भी
रह-रह कर उभरते हैं 
जटिल तारों में उलझे 
हमारे कुटिल शास्त्रार्थ
संगणक की अगणित माइक्रोचिप्स से 
उभरकर प्रदीप्त होती लिजलिजी इच्छाएँ
और बाजार के जालजंजाल में प्रतियोगी सी
आत्मघाती अहम्मन्यताएँ
कोई अलंकरण नहीं है कुदाल
पर यहाँ लगेगी किसी जादुई कल्पना जैसी
हालांकि यह कोई यंत्र तक नहीं 
एक निखालिस हथियार भर है अप्रासंगिक
जो नहीं मुख्यधारा की परिभाषा तक में
जिन्हे हाशिये पर ढकेल रहा है समय
उन्हें विस्मृत करके ही न बनें हमारी स्मृतियाँ
ऐसी निरपेक्ष चेतना पर
उस मोंगफली के छिलके
जिसे मैने नानी जैसी बुढ़िया से खरीदे थे
और जिसने राजस्थानी में कुछ कहा था
और मैं मात्र इतना ही समझ सका
कि बेटा सर्दी बहुत तेज है
तेज ठंडक में कोई चला रहा है कुदाल
आती है कोन गोड़ने की आवाज
जिनमें से उभरती हैं
दर्द के समंदर में डूबी हजार ऑंखें
और लम्बी निरीह चुप्पियाँ





प्रक्रिया

आप कैसे हैं मैने पूछा था
तुमने कहा था कैसे हैं आप
इसी तरह हमने बातें शुरू की थी
जो कि एक कर्मकाण्डी प्रारम्भ था शब्दों को
व्यर्थ की ध्वनियों में बदलने का 
आप इसे एकालाप न कहें तो आपका मन
और मन भर गरू बातों के बाद भी
मैं नहीं जान पाया आपका मन और आप मेरा
संभवत: ऐसी कोई आकांक्षा भी न थी
मैंने अपनी हाँकी और तुमने अपनी
हाँकने को ड्राइंगरूम जो था सुसज्जित
उन पति, पत्नी और बच्चों के बारे में 
जिनसे हमारा कोई सम्बन्ध बनता था
या नहीं भी बनता था तो क्या
जोर-शोर से हमने चर्चाएँ की
पुस्तकें पढ़ीं और फिल्में देखीं जागकर
बड़े लोगों के बारे में बातें की उत्साहपूर्वक
अखबार हम पढ़ते रहे नियमित
पहले हम रेडियो सुनने के आदी थे 
बाद में हमें दूरदर्शन का नशा हुआ
कवि, राजनेता, कलाकार और दार्शनिक
डकैत, दलाल, भ्रष्ट और उच्चके सामान्यत:
हमारी बातों में समरस आते रहे लगातार
नाश्ते के साथ चाय, पान और सिगरेट
हमें इण्टलेक्चुवल सिद्ध करने को कम न थे
व्यर्थ और क्षुद्र लोगों के परिवेश में
हम अपने समय में रहे समूचे के समूचे
पत्नियों के द्वारा धुली शर्ट की कालर खड़ी किये
ऑंखों में समय की उदासी का गर्व लिए
वैसे तुम एक सीधे-सादे आदमी थे
मैं भी एक साधारण सा व्यक्ति लगता था
और अनजाने में ही हम धूर्त होते चले गये

००००००००००००००००

ये पढ़ी हैं आपने?

मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
Hindi Story: कोई रिश्ता ना होगा तब — नीलिमा शर्मा की कहानी
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
मन्नू भंडारी की कहानी — 'रानी माँ का चबूतरा' | Manu Bhandari Short Story in Hindi - 'Rani Maa ka Chabutra'
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा
फ्रैंक हुजूर की इरोटिका 'सोहो: जिस्‍म से रूह का सफर' ⋙ऑनलाइन बुकिंग⋘