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सरकारें तो उन मुल्कों में भी होती हैं जहाँ dictatorship होती है - जावेद अख्तर @Javedakhtarjadu

मार्च 17, 2016
मैं यह दिल से समझता हूँ कि इस सरकार में बड़े क़ाबिल-लोग भी मौजूद हैं जो बहुत अच्छा काम करते हैं और कर सकते हैं , उनके ऊपर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि ये 'सो कॉल्ड फ्रिंज'... जो की न सिर्फ मामूली लीडर्स हैं बल्कि एमएलए भी हैं एमपी भी हैं मिनिस्टर ऑफ़ स्टेट भी हैं और कभी-कभी मिनिस्टर भी हैं !!! - इनको क़ाबू में लें - जावेद अख्तर


जावेद अख्तर की राज्यसभा स्पीच के अंश

जावेद अख्तर साहब ने राज्यसभा में अपनी फेयरवल स्पीच में जो बातें कही हैं - वे १०० फीसदी लॉजिकल हैं (मेरी समझ में). स्पीच को पांच-सात दफा सुनने के बाद और साथ-के-साथ सोशल मीडिया पर स्पीच के चुन-चुन के पेश किये जा रहे अंशों को देखने और उसे दिखाने-की-मंशा  (व्यथित करती है) ने मुझ पर यह दबाव डाला कि आपके सामने पूरा विडिओ और जितना संभव हो सके - जावेद साहब की स्पीच शब्दों में - दोनों आपतक ले आयी जाएँ ताकि उन्होंने जो कहा वह 'हमसब' समझें  और 'हमसब' फ्रिंज एलेमेंट्स की मंशाओं का नाश कर सकें और अपनी आत्मा और आने वाली पीढ़ी के अपराधी नहीं बनें...
भरत तिवारी

जावेद अख्तर की राज्यसभा स्पीच के अंश :


— सरकारें तो उन मुल्कों में भी होती हैं जहाँ dictatorship होती है ... जहाँ sheikhdom और बाशाह्तें होती है लेकिन डेमोक्रेसी और इन हुकूमतों में फर्क क्या है? वहां सिर्फ सरकार होती है, यहाँ सरकार और opposition दोनों होती हैं 

“चमन में इत्तेफाके रंगो बू से बात बनती है तुम्ही तुम हो तो क्या तुम हो, हमी हम हैं तो क्या हम हैं”


— जो हमारे पास है उसका हम अहसान नहीं मानते - वो है हमारा संविधान, ज़रा   उठा कर देखिये - यहाँ से चलेंगे तो दूसरी डेमोक्रेसी Mediterranean cost पर मिलती है 


— यह संविधान हमें डेमोक्रेसी देता है लेकिन डेमोक्रेसी - यह याद रखिये - बगैर secularism के नहीं हो सकती। ये वो मुल्क हैं जिनमें secularism नहीं है और इसीलिए डेमोक्रेसी नहीं है। डेमोक्रेसी यह मान कर चलती है कि हर इशू पर माइनॉरिटी ओर मैजोरिटी बदलेगी।.. अगर मैजोरिटी और माइनॉरिटी की कोई ऐसी परिभाषा बना दी जाए जो परमानेंट है तो फिर डेमोक्रेसी तो उसी दिन ख़त्म हो गयी। 


— हम अगर सेकुलरिज्म की बात करें, इसे बचाने की कोशिश करें तो किसी एक वर्ग या दूसरे वर्ग पर अहसान नहीं कर रहे; हमको सेकुलरिज्म इस लिए बचाना होगा कि इसके बगैर डेमोक्रेसी ही नहीं बच सकती। 


— हमें यह सोचना होगा कि यह शक्ति, यह सिस्टम, यह कानून सब हमारे पास है... तो हम तरक्की डेवलपमेंट करना चाह रहे हैं तो कौन सा, किसका डेवलपमेंट और किसके लिए और किसकी कीमत पर। 


— डेवलपमेंट जीडीपी नहीं है डेवलपमेंट है ‘ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स’


— कोई भी पार्टी हो, वो चाहती तो यही है कि इस देश का भला हो और अगर हम ज़रा सा उठ जाएँ ...... मैं देखता हूँ कि जहाँ ये समस्याएं हैं - बेरोज़गारी की, हॉस्पिटल की, दवा की , स्कूल की, कॉलेज की, इन्फ्रास्ट्रक्चर की वहां हम अपनी एनर्जी किन चीज़ों में लगा रहे हैं? वो (एनर्जी) क्यों वेस्ट हो ?


— आये दिन कुछ ऐसी बात सुनने को आती है जो न सुनते तो अच्छा था! अभी दो-तीन दिन पहले एक साहब हैं जिन्हें यह ख़याल हो गया है कि वो नेशनल लीडर हैं... हालांकि हकीक़त ये है कि वो हिन्दुस्तान के एक स्टेट आन्ध्रा के एक शहर हैदराबाद के मुहल्ले के लीडर हैं। उन्होंने ये कहा कि वो भारत माता की जय नहीं कहेंगे... इसलिए कि संविधान उन्हें नहीं कहता ! संविधान तो उन्हें शेरवानी पहनने को भी नहीं कहता टोपी लगाने को भी नहीं कहता। मैं यह जानने में इंटरेस्टेड नहीं हूँ - कि भारतमाता की जय कहना मेरा कर्तव्य है या नहीं है... ये मैं जानना भी नहीं चाहता... इसलिए कि ये मेरा कर्तव्य नहीं अधिकार है - और मैं कहता हूँ - भारतमाता की जय ... ये कौन लोग हैं ? मैं इस बात को और उनके इस ख़याल को जीतने सख्त वर्ड मुमकिन हैं उनमें condemn करता हूँ... और मैं इतनी ही सख्ती से एक और नारे को condemn करता हूँ - जो अक्सर हिंदुस्तान के शहरों में बोला जाता है - "मुसलमान के दो स्थान कब्रिस्तान या पाकिस्तान" ! 


— अब हम रुक नहीं सकते, वक़्त रुकता नहीं है, या तो हम आगे जायेंगे या पीछे जायेंगे... हमें फ़ैसला करना है - हम इस दो-राहे पर हैं… अक्लमंद वो है जो तजुर्बे से सीखे लेकिन उससे ज्यादा अक्लमंद वो है जो दूसरे के तजुर्बे से सीखे .......... 


— देख लीजिये - जिन मुल्कों में धर्म का बड़ा बोलबाला है, जिन मुल्कों में यह यकीन है कि गुजरा हुआ ज़माना बड़ा अच्छा था, जिन मुल्कों में यह ख़याल है कि जो हम कह रहे हैं वही ठीक है -

"सब तेरे सिवा काफ़िर इसका मतलब क्या
सर फिरा दे इन्सान का ऐसा ख़ब्त-ए-मज़हब क्या "


— जिन मुल्कों में ये ख़ब्त है - वो कहाँ गए हैं? जहाँ बात पर जुबान कटती है, जहाँ आप एक लफ्ज़ बोल दें जो धर्म के ख़िलाफ़ हो, मजहब के ख़िलाफ़ हो तो फांसी दे दी जाती है - वो मुल्क हमारी मिसाल बननी चाहिये या वो जहाँ हर तरह की आज़ादी है - जहाँ 'लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ जीसस क्राइस्ट' भी बन सकता है? कौन से मुल्क सही हैं ? कहाँ इंसान आराम से है ? कहाँ ज़िन्दगी बेहतर है ? 


— ये दो-राहा है, आजकल जिसे हम फ्रिंज कहते हैं वो फ्रिंज दिन-ब-दिन बड़ी होती जा रही है - और उसकी ज़रूरत नहीं है। मैं यह दिल से समझता हूँ कि इस सरकार में बड़े क़ाबिल-लोग भी मौजूद हैं जो बहुत अच्छा काम करते हैं और कर सकते हैं , उनके ऊपर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि ये 'सो कॉल्ड फ्रिंज'... जो की न सिर्फ मामूली लीडर्स हैं बल्कि एमएलए भी हैं एमपी भी हैं मिनिस्टर ऑफ़ स्टेट भी हैं और कभी-कभी मिनिस्टर भी हैं !!! -  इनको क़ाबू में लें। 


— Opposition को भी सोचना चाहिए और सरकार को भी कि जहाँ काम हो, ये एडजोर्नमेंट हमें आगे नहीं ले जायेंगे और ये पोलोराइजेशन भी हमें आगे नहीं ले जायेगा।


— एक ऐसा हिन्दुस्तान बने - जो बन सकता है बहुत मुश्किल नहीं है बहुत आसान है - जहाँ हर सर पे छत हो, जहाँ इस तन पर कपड़ा हो, जहाँ पेट में रोटी हो जहाँ हर-एक के पास दवा हो , इलाज हो, स्कूल हो, सड़कें हों, बिजली हो, पुल हो... हो सकता है 

ज़रा-सा बस अगले इलेक्शन की परवाह बंद कर दें आदमी तो... सबकुछ हो जायेगा।

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