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कहानी — नदी गाँव और घर — स्वप्निल श्रीवास्तव kahani nadi gaanv aur ghar swapnil srivastava

अग॰ 7, 2016

छोटे-छोटे वाक्यों को पढ़ते हुए शुरुआत में मुझे लगा कहानी कैसे कोई सन्देश देगी... फिर यह भी ख्याल रहा कि हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि स्वप्निल जो अपनी कविता के बिम्बों से हर अन्याय को उजागर करते रहते हैं, कहानी में नदी-गाँव के ज़रिये ही सही कुछ बड़ी बात अवश्य कहेंगे। भारतभूषण अग्रवाल, फिराक सम्‍मान और अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान से सम्मानित स्वप्निल श्रीवास्तव ने परिकथा में प्रकाशित 'नदी गाँव और घर' कहानी से बिलकुल अपनी कविताओं की तरह, सरकारी मशीनरी में लगी जंग की परतें उधेड़ डाली हैं। एक ज़रूरी कहानी लिखने के लिए उन्हें बधाई। 

भरत तिवारी


नदी गाँव और घर 

 स्वप्निल श्रीवास्तव


नदी हमारे घर के नजदीक थी। वह मेरे घर से साफ़ दिखाई देती थी। हर मौसम में उसकी छवि अलग-अलग होती थी। गर्मी के मौसम में वह तन्वगी हो जाती थी। जैसी कोई विरही नायिका अपनी उत्तरीय ओढ़कर चैन से सो रही हो। बारिश के दिनों में उसका रूप विकराल हो जाता था। हमें ताज्जुब होता था कि वह वही नदी है, जो गर्मियों में सहमी सकुचाई रहती थी।

जाड़े के दिनों में उसका पानी हरा दिखाई देता था। नदी में छोटी मोटी पहाड़ियां और चट्टानें थी। इन्हीं से टकराकर पानी बहता था। पानी की ध्वनियाँ बदलती रहती थी। सुबह पानी का बहाव तेज होता था। दोपहर में धारा मद्धिम हो जाती थी। शाम को पानी की कलकल ध्वनि बहुत स्पष्ट सुनाई पड़ती थी। लगता था की कोई दूर में जलतरंग बजा रहा हो। हमलोग शाम को यह संगीत धुन सुनने के लिए नदी के तट पर घंटों बैठे रहते थे। हमें बहुत शान्ति मिलाती थी।

इसी नदी जिसका नाम सुगना था, के तट पर हमारा गाँव बसा हुआ था। गाँव क्या झोंपड़ियों का एक समूह था। इन झोंपड़ियों में जरूरत भर का सामान होता था इन झोंपड़ियों में दीवारें नहीं होती थी। बस बांस के टट्टर से विभाजन कर लिया जाता था। औरतें झोंपड़ियों के भीतर सोती थी और मर्द बाहर। शाम होते ढिबरियां जला दी जाती थी। उसके बाद सियारों का हुआ-हुआ शुरू हो जाता था। सियार बहुत ढीठ होते थे वे हमारे घर तक पहुँच जाते थे। उनसे बचाव के लिए कुछ लोगो ने कुत्ते पाल रखे थे, वे रातभर घर की रखवाली करते थे।

बारिश के दिन हमारे लिए बहुत मुश्किल के दिन होते थे। जैसे सुगना में पानी बढ़ता था। हमारे दिल की धड़कने तेज होने लगती थी। हम पहले बाढ़ से निपटने की रणनीति तैयार कर लेते थे। बाढ़ का सामना हमें हर साल करना पड़ता था। जिस साल बाढ़ नहीं आती थी हमें लगता था कि कुछ न कुछ छूट गया हो।

Hindi contemporary poet Swapnil Srivastava's poetry. Swapnil, a resident of Faizabad is a well-known writer from Hindi literary world.

स्वप्निल श्रीवास्तव

510, अवधपुरी कालोनी अमानी गंज
फैजाबाद 224001
मो. 09415332326
ईमेल swapnil.sri510@gmail.com


नदी के आसपास हमारे खेत थे जिसमें धान जड़हन और रबी की फसलें होती थी। हमारे खेत बहुत उपजाऊ थे। जो कुछ भी बो दो, उससे अच्छी उपज मिल जाती थी। जैसे बाढ़ का पानी उतरता। हम लोग तरबूज और सब्जी उगाने लगते थे।

हमारे खेत के तरबूज बहुत मीठे होते थे। एक तरबूज खा लो तो पेट भर जाय। तरबूज बाहर से हरे होते थे। भीतर से उसके कलेजे सुर्ख होते थे। पिता बहुत प्यार से फसलें उगाते थे। अपनी जान तक लगा देते थे।

हमारे घर के पास में पिता ने एक छोटा सा बगीचा लगाया हुआ था। जिसमें आम अमरूद और नींबू के पेड़ थे। झ्पदी पर कद्दू और लौकी की लतरें थी। उसमें खूब फल आते थे। कोई रिश्तेदार आता पिता उन्हें उपहार के रूप में फल भेंट करते थे। गरीबी से सामना कर रहे पिता हृदय से उदार थे, लेकिन उनके प्रति लोगो की उदारता दिखाई नहीं देती थी।

मां उन्हें टोकती तो कहते ... जो तुम लोगो को दोगे वह तुम्हें वापस मिलेगा। ऐसा हमारे जीवन में कभी नहीं हुआ। हम अपने दुःख का मुकाबला खुद करते थे पिता के पास लोकजीवन की बहुत सी कहावतें और मुहावरे थे। जो कभी फलित नहीं हुए, जिस दौर में वे कहावतें बनी होगी, वह दौर कब का बीत चुका था। लेकिन पिता को कौन समझाये, वे तो अपनी मर्जी के मालिक थे।

बगीचे में केले के कई पेड़ थे, उसमें बड़े-बड़े घौद निकलते थे। घौद के बोझ से केले के पेड़ झुक जाते थे। पिता बचाव के लिए थून्ही लगा देते थे ताकि केले के पदों को नुकसान न पहुंचे ... मां ने पिता से बारहा कहा की केले को पास के हाट में बेच आये। लेकिन पिता तो दानवीर थे। उसे लोगो में बाट देते थे। बहुत जोर देने पर बाजार जाते तो उसे परिचितों को सस्ते दाम में दे देते।

पिता की इस आदत से मां परेशान रहती थी। कहती ... तुम तो अपनी उम्र जी चुके हो, कुछ तो बच्चों का ख्याल तो करो।

बाढ़ नदी में नहीं हमारे जीवन में आती थी। पिता के पास वही पुराना मुहावरा था ... भगवान पर भरोसा करो, सब ठीक हो जाएगा।

पिता अच्छे मछुवारे थे। जब मन करता नदी में जाल डाल कर बैठ जाते। लेकिन यह काम अवकाश के क्षणों में करते थे। उनके झोले में मछलियाँ भरी होती थी। चेहरा खुशी से दमकता हुआ दिखाई देता था । मछलियाँ हमें दुर्दिन में मदद करती थी। जब घर में कुछ नहीं होता था, हम मछलियों से पेट भर लेते थे।

कुछ सालों बाद सुगना नदी अपने पाट बदलने लगी थी। नदियाँ अक्सर यह खेल करती रहती है। उनके सैलाब में गाँव के गाँव गायब हो जाते थे। वे केवल पटवारी के खसरा-खतौनी में बचते थे। गाँव के लोग दरबदर हो जाते थे। उनकी कोई खबर नहीं लेता था। बस जांच-पड़ताल चलती रहती थी।

दोस्तों-रिश्तेदारों ने पिता को समझाया की वह खेत-बारी बेच कर पास के कस्बे में बस जाय और कोई दुकान खोल ले। धीरे–धीरे बच्चे बड़े हो जायेंगे और परिवार को संभाल लेंगे। लेकिन पिता तो पिता थे वह किसी की बात क्यों मानते। नदी के प्रति उनकी आस्था अडिग थी। वह कहते कि नदी का पानी हमारी धमनियों में बह रहा है। उसे पीकर हम बड़े हुए है। हम नदी की पूजा करते है। गाँव के लोग छठ का त्यौहार मनाते है। इसी नदी के जल से सूरज भगवान को अर्घ देते है। नदी तो हमारी मां है। क्या मां किसी का अनिष्ट कर सकती है। यह हमारे पूर्वजों की जमीन है। इसे छोड़कर हम कहाँ जायेंगे।

पिता ने हमें बताया की जब बड़े भाई के पत्नी को बच्चा नहीं हुआ तो उन्होंने नदी की पूजा की थी। नदी मां ने बहू की गोद में यह बिटिया डाल दी थी।

हमें पता नहीं था कि पिता ने कब नदी की पूजा–अर्चना की थी। हमें मालूम था कि पिता के तर्क बहुत कमजोर है। उनका हकीकत से कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन हम उनकी अगाध आस्था का क्या करे जिसकी हमारे जीवन में कोई भूमिका नहीं थी।

जब हम उनसे पूछते कि पास के गाँव क्यों नदी की बाढ़ में बह गए तो पिता कहते कि गाँव वालों ने कोई पाप जरूर किया होगा। इसलिए वे नदी के कोप का शिकार हो गए है।

मां क्या हम सभी पिता की बात से बौखला जाते। मां व्यंग में कहती ... ये पूरे परिवार को नदी में डुबोकर ही दम लेंगे।

कुछ साल बाद नदी हमारे गाँव के पास आने लगी। एक साल तो खूब बारिश हुई। पूरा गाँव अपने परिवार के साथ बाँध पर जमा हो गया। हम अपने गाय–गोरू अपने साथ ले आये थे। वे हमारे अभिन्न थे। हमारे जीवन के साथी थी। उनके बिना हम खेती की कल्पना नहीं कर सकते थे। पिता उनका ख्याल रखते थे। हमने दूर से देखा हमारी झोंपड़ियां आधी पानी में डूबी हुई है।

शाम होते बाँध पर धुंआ उठाने लगता था। चौउवें डकरने लगते थे। बाँध पर न जाने कहाँ से जंगली मक्खियाँ आ जाती थी। बैल चैन से नहीं रह पाते थे। उनका हमला हम लोगो पर होता था। जहां वे काटती थी। वह जगह लाल हो जाती थी। बचाव के लिए हमने जगह-जगह धुईहर जला दिए थे। उसके धुएँ से उनका प्रकोप कम हो जाता था।

बाँध घर नहीं था। इसलिए वहां हमें नींद नहीं आती थी। हमें लगता था किसी ने हमें घर से निकाल दिया है। हम घर से बेघर हो गए है। हमारा घर पानी में डूबा हुआ है। हम उसके साथ डूबे हुए है। डूबना क्या होता है, हमने पहली बार जाना था।

हमारा गाँव माह भर बाँध पर रहा। थोड़ी–बहुत सरकारी सहायता मिली। वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी। सरकार से जो मदद मिलती उसका ज्यादा हिस्सा नेताओं की जेब में पहुँच जाता था।

हाँ बाँध पर रहकर हमने पहली बार हेलीकाफ्टर देखे थे। हेलीकाफ्टर गिद्धों की तरह उड़ते है। गिद्ध और हेलीकाफ्टर बाढ़ के दिनों में दिखाई देते है। बाढ़ में बहते हुए न जाने कहाँ से गिद्ध आ जाते थे। बाकी दिन उनके दर्शन नहीं होते थे। बताते है गिद्धों में सूंघने की अपूर्व क्षमता होती है। वे कई योजन दूर से अपना शिकार देख लेते है।

नेता इन्हीं दिनों में आखेट पर निकलते है। उनके शिकार हम जैसे मुसीबतशुदा लोग होते है। नेता लोग गिद्ध की प्रजाति के होते है। गिद्ध तो मरे हुए जानवरों के मांस खाते है लेकिन नेता जीवितों को अपना ग्रास बनाते है। उन्हें देख कर घिन आती है। ये महापात्रों की तरह बस्ती में दाखिल होते है। हमें अपना निशाना बनाते है।

आये दिन हेलीकाफ्टर आते और कुछ पैकेट बरसा कर चले जाते थे। इन पैकेटों की सामग्री घटिया दर्जे की होती थी। पूड़ी इतनी चीमड़ होती थी कि दांत टूट जाय। हम उसे पानी में भिगोकर खाते थे। जो हेलीकाफ्टर में सवार होते थे वे जमीन पर नहीं उतरते थे, बस हवाई सर्वेक्षण करके चले जाते थे ... अखबार में खबर छपती कि अमुक मंत्री ने बाढ़ का जायजा लिया। हमारी मुसीबत को जायजा लेना कहा जा रहा है। पत्रकारों की भाषा हमारा मजाक उड़ाती थी।

अखबार में बाढ़ और बाढ़ पीडितो के फोटो छापे जाते। नेताओं के बयान निकलते। किसी के चेहरे पर शिकन का नामोनिशान नहीं दिखाई देता। जैसे वे पिकनिक मनाने आये हो। उनके साथ ख़ूबसूरत महिला पत्रकार होती जिनका हमारी विपत्ति से कोई सरोकार नहीं होता। वह राजनेताओं के चक्कर लगाती रहती थी। उन्हें राजनेता अच्छी खबर लिखने लिए इनाम-इकराम देते रहते थे।

पिता को अपने डूबे हुए घर की चिंता थी। वह मां से घर का इतिहास बताते रहते थे, वे बताते कि उनके पुरखे दूर देश से आये थे। उन्हें नदी का किनारा पसंद आया और यही बस गए। पिता बताते यहाँ कभी घनघोर जंगल था। जिसमें खतरनाक जानवर रहते थे। लेकिन लोगो का नुकसान नहीं करते थे। पिता बात करते हुए अतीत में चले जाते थे। पिता कहते अब वही घर खतरे में है।

मां कुढ़कर कहती ... बस एक नांव लो और घर को लादकर ले आओ ... या वही घर में अपनी नांव बाँधकर घर की देखभाल करो।

पिता रात में अचानक उठाकर बडबडाने लगते थे। कभी वे सन्निपात में आ जाते थे। यहाँ हमारे खाने के लाले पड़े थे और उन्हें पानी में डूबे हुए घर की सुध आ रही थी। पिता की इस हरकत पर मां हमारा माथा चाटती थी। हर दिन यही चकचक होती रहती थी। हमारा चैन से सोना मुहाल था। पिता की आँख में डूबता हुआ घर था और हमारे दिमाग में यह सवाल कि कैसे हम आने वाली बाढ़ से निपट सके।

हमें बाँध पर आये हुए एक सप्ताह हो चुके थे। जीवन पटरी पर आ रहा था। आदमी कुछ दिनों बाद अपनी विपत्तियों को कबूल लेता है। उसी के अनुसार जिन्दगी चलती रहती है। हमारे सामने फिलहाल कोई विकल्प नहीं था। जब तक बाढ़ ख़त्म नहीं हो जाती तब तक हमें इसी बाँध पर दिन गुजारने थे।

रात हो चुकी थी। लोग सोने के लिए बिस्तर पर लेटे ही थे। तभी स्थानीय विधायक का चमचा सहदेव आ पहुंचा। उसके हाथ में नोटों की गड्डी थी। हवा में नोट फडफड़ा रहे थे। नोट की गड्डी उसके हाथ में देखकर लोगो की आँख में चमक आ गई। उसने बाँध के लोगो को जमा किया और सबके हाथ में १००-२०० के नोट थमा दिए। उसने हम लोगो को ताकीद की, कि कल बाढ़ और आपदा मंत्री शिव चरण आ रहे है। उनका खुले दिल से स्वागत होना चाहिए। कोई शिकायत गड़बडी नहीं होनी चाहिए।

उसने यह बात सहज ढंग से नहीं कही थी। उसकी आवाज में धमकी थी। लोग जानते थे कि आधे से ज्यादा रकम उसने अपनी जेब में रख ली होगी। लोगो ने कहा – जो मिलता है वह जेब में रख लो ... भागते भूत की लंगोटी भली।

हमारे भीतर विरोध का साहस ख़त्म हो चुका था। हम हर स्थिति को स्वीकार कर लेते थे। नेता मंत्री हमें बाट कर राज कर रहे थे। यह कला उन्होंने अंग्रेजों से सीखी थी। अंग्रेज बाहर से आये थे। उनका हमें लूटना लाजिमी था। लेकिन नेता लोग तो हमारे देश के है। हमारे लोग हमें बाहर के लोगो से ज्यादा लूट रहे है।

सुबह-सुबह बाँध पर चहल–पहल थी। चारों और चूने का छिड़काव किया गया था, स्टेज को फूलों से सजाया गया था। पास में फूलों का ढेर था। ये सुन्दर फूल मंत्री जी की कुत्सित गर्दन में डाले जायेंगे। फिर उनकी जयजयकार होगी। लोग गला फाड़ कर उनकी जय बोलेंगे।

इस तरह के तमाशे हमारे लिए नये नहीं थे। इन्हें देखते–देखते हमारी आँखे पथरा गयी थी। हमारे अन्दर घृणा का प्रबल भाव था। हम उसे व्यक्त नहीं कर सकते थे। विरोध के लिए समूह चाहिए। यहाँ लोग बटे हुए थे। पिता बताते थे की आजादी के ठीक बाद विधायक मंत्री पैदल हमारे गाँव आते थे। वे किसी के घर बैठ कर हमारी समस्याएं सुनते थे, उनके और मतदाता के बीच दूरी नहीं थी।

अब वक्त बदल चुका है। आजादी की लड़ाई से निकले नेता अप्रासंगिक हो चुके है। राजनीति माफियों के कब्जे में आ चुकी है। एक ज़माने में राजनीति मिशन थी अब धंधा बन चुकी है।

अचानक हूटर बजाते हुए कारों के काफिलों की गरज सुनाई दी। सबसे पहले पुलिस की गाड़ी थी। उसके बाद मंत्री जी की महँगी गाड़ी। गाड़ी के ऊपर फूल लदे हुए थे। मंत्री जी वजनी थे। मुश्किल से चल पा रहे थे। उनकी एक बाह कलेक्टर ने थामी थी और दूसरी पुलिस कप्तान के हिस्से में थी ... इन दोनों अधिकारियों को ऐसा करते हुए कोई शर्म नहीं आ रही थी। उलटे उनका चेहरा दमक रहा था। यह काम तो मंत्री जी के चमचे कर सकते थे। लेकिन वे यह गौरव खुद लेना चाहते थे।

राजनेताओं का नहीं नौकरशाहों का भी तेजी से पतन हुआ है। उनकी आत्मा मर चुकी है। नौकरशाह राजनेताओं को लूट का रास्ता बताते है। और फिर इस काम में हिस्सेदार होते है।

मंत्री जी मुश्किल से हाईस्कूल पास थे। कई लोग यह भी कहते है कि उनकी डिग्री फर्जी है। सियासत में डिग्री-विग्री का कोई महत्व नहीं होता। बस नेता को करामाती होना चाहिए। मंत्री जी में गुण भरपूर था।

बाँध पर दर्जनों गाड़ियां खड़ी थीं। मंत्री जी अकेले नहीं चलते थे। उनके साथ काफिला चलता था। उनके काफिलों को देख कर बहुत डर लगता था। जैसे वे कही लूटपाट करने जा रहे हो। पुलिस के साथ मंत्री के गनर होते थे। वे उनके आगे-पीछे कवायद करते रहते थे। मुझे यह बात समझ में नहीं आती थी। जन प्रतिनिधियों को आखिर किससे खतरा था। बाद में यह रहस्य समझ में आया कि ये मंत्री विधायक आपराधिक दुनिया से आते है। उनके हजार दुश्मन होते हैं।

मंत्री जी ने स्टेज पर चढ़ने के पहले बाढ़–पीड़ितों की अस्थायी बस्ती का मुआयना किया। थोड़ा दुखी हुए कहा – आप लोगो का दुःख देखा नहीं जाता। क्यों कलेक्टर साहब आप कुछ देखते नहीं है, बस ऐ. सी. में पड़े रहते है। आपको हफ़्ते में एक दिन इस बस्ती में जरूर आना चाहिए ... आप मुआयना करके अपनी रिपोर्ट हमें भेजिए ताकि मैं बजट पास करवा सकूँ। वैसे भी मेरे पास आपकी बहुत शिकायतें है। मंत्री जी बात सुन कर कलेक्टर साहब थोड़ा हिले। फिर सामान्य हो गए। फिर सर ... सर ... कहने लगे।

यह सब नाटक का एक हिस्सा था। जिसे लोग सच समझ रहे थे।

मंत्री जी स्टेज पर चढ़े। उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया गया था। जयकार के नारों से आसमान का कलेजा फट गया था। मंत्री जी उठे। माइक को यह देखने के लिए खटखटाया की आवाज ठीक है कि नहीं। माइक दुरुस्त था। ख़ट ख़ट की आवाज दूर तक गयी। वे आश्वस्त हो चुके थे।

उन्होंने बोलना शुरू किया ... भाइयों और बहनों मैं जानता हूँ कि बड़ी मुसीबत में है। मैं आप लोगों का दर्द समझता हूँ। लेकिन मैं एक वादा करके जा रहा हूँ कि आने वाले सालों में मैं इस बाँध को ऊंचा करवा दूंगा। बाँध के पास में एक बस्ती बनवा दूंगा। जिससे आप लोगों को कोई दिक्कत न हो ...

मंत्री जी के इस तकरीर को सुनकर लोगो के बीच खुशी की लहर दौड़ गयी। लोगो को लगा उनका यह सपना सच हो जाएगा। इस तरह के सपने देखते हुए कई दशक बीत चुके थे।

उपदेश देने के बाद मंत्री जी एक क्षण नहीं रुके। सर्किट हाउस पहुंचते हुए शाम हो जायेगी। यह उनके अनुष्ठान का समय था। उनका प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तगण लालायित थे। उनके सुस्वाद भोजन के लिए कई मुर्गे हलाल किये जा चुके थे। मछलियों के व्यंजन तैयार किये जा रहे थे। जिले का प्रशासन पलक-पावडे बिछाए खडा था। सब उनकी कृपा के भूखे थे। कई लोग उनकी चरण-धूलि अपने मस्तक पर लगा रहे थे। मंत्री जी किंचित थक गए थे। वे घड़ियाल की तरह डबल बेड पर पसरे थे। उनका शरीर काठ के बोरे की तरह था। थोड़ी देर बाद उनकी नाक से सीटी की आवाज दिखाई देने लगी। यह आवाज बहुत अश्लील थी। जहां भी समय मिलता मंत्री जी सोने का मौक़ा नहीं गंवाते थे। विधान सभा में ठाट से सोते थे।

बाँध खाली–खाली लग रहा था। लोग जिस रफ़्तार से आये थे उसी रफ़्तार से चले गए। बाँध पर प्लास्टिक के डिब्बे थैलियाँ बिखरी हुई थी। उसे गाय-बैल चाभ रहे थे। मंत्री जी के शब्द लोगो के जेहन में गूँज रहे थे। उनकी अलग-अलग व्याख्या की जा रही थी। मेरे हिसाब से न बाँध बनाना था न घर। बस मंत्री जी भाषण झाड कर चम्पत हो गए थे। मैंने कहीं पढ़ा था। जब हजार दुष्ट मरते है तब एक नेता जन्म लेता है। लेकिन बाढ़ बस्ती के कुछ लोगो के मन में यह भाव था कि मंत्री जी कुछ न कुछ जरूर करेंगे ...

बाढ़ का पानी उतर रहा था लेकिन जमीन अभी गीली थी। सगुना नदी दूर चली गयी थी। हमारे झोंपड़ियों के ध्वंश दिखाई दे रहे थे। छप्पर उड़ चुके थे। कंकाल मौजूद थे। जहां-जहां तक नदी का पानी पहुंचा था वहां-वहां जानवरों की हड्डियां बिखरी हुई थी। उसे गिद्ध नोच रहे थे। बाँध से बड़ा गिद्ध उड़ कर जा चुका था।

घर-गिरस्ती का सामान बहुत थोड़ा था। इतना कम कि घर के सदस्य उसे आसानी से ढो सकते थे। हमने अपना सामान गायब हुए घर के पास रख दिया। हमें भूख लगी थी। मां चूल्हा चेताने में लग गयी। योजना बनी कि जमींदार के कठ बॉस से कुछ बांस ले लिए जाय और जंगल से सरपट इकट्ठे कर लिए जाय। थून्ही के लिए जंगल से लकड़ी मिल ही जायेगी। इन सब को मिलाकर छप्पर बन जाएगा।

पिता को झोपड़ी बनाने में महारत हासिल थी। वर्षों से वे यह काम करते आ रहे है। वे हर साल घर बनाते और हर साल घर डूब जाता। इस प्रक्रिया में वे तनिक नहीं थकते थे। मगन होकर काम करते थे। उनकी यह जिजीविषा हमारे लिए आदरणीय थी। हमें घर बनाने का हुनर नहीं आता था। बस हम पिता के साथ लगे रहते थे।

दो तीन दिन में झोपड़ी तैयार हो गयी। पिता ने चैन की सांस ली। वे बसखट बिछा कर बैठ गए। बहुत दिन बाद हम अपनी जमीन पर थे ... बहुत दिन बाद हमें भोजन का स्वाद मिला।

एक दिन घूमते हुए जमींदार साहब आये। पिता उन्हें देख कर खड़े हो गए। उन्होंने झोपड़ी का मुआयना किया। मैं देख रहा था। उनकी नजर झोपड़ी पर कम बहन की जवान होती देह पर ज्यादा थी। उनकी आँखों में शैतानी चमक थी। पिता तो इस बात से गदगद थे कि बाबू साहब आये हुए है। वे हमारी खोज-खबर ले रहे थे। मां ने उनके इस इरादे को ताड़ लिया था। उसे इशारे से घर के अन्दर कर दिया था।

जमींदार साहब बोले ... किशन तुम्हें हर साल बाढ़ का कहर झेलना पड़ता है। ऐसा क्यों नहीं करते कि बांस का जंगल काट कर वही अपना घर बना लो। वही रह कर मेरी हलवाही करना। बच्चों को मैं किसी-किसी काम पर लगा दूंगा ... कोई जल्दी नहीं है। सोच–विचार कर बताना ... मैं तो परिवार के भले की बात कर रहा हूँ।

यह कहकर जमींदार चले गए। पिता उनके इस प्रस्ताव पर डगमगा गए। हम लोगो से इस बात की चर्चा की। हम लोगो ने साफ़ इनकार कर दिया। हम भेडिये के मांद में घर नहीं बनाना चाहते थे। हम उनकी मंसा जान चुके थे। एक बार उनके चंगुल में फंस गए तो उससे निकलना कठिन हो जाएगा। इलाके में उनके दुश्चरित्र की चर्चा आम थी। वे इसी तरह कमजोर लोगो को अपने जाल में फंसाते थे। हमारी हैसियत नहीं थी कि हम उनसे पंगा ले सके। हम सीधे–साधे लोग थे। अपनी जिन्दगी अपने ढंग से गुजार रहे थे। भले ही हम गरीब रहे हो लेकिन कभी अपनी इज्जत का सौदा नहीं कर सकते थे।

बहरहाल हमारी जिन्दगी पटरी पर आने लगी। लेकिन कुछ दिनों के लिए बेघर होने का दंश जो हमने झेला था, उसके प्रति छाया हमारा पीछा कर रही थी ... हमें सामान्य होने में कुछ दिन लग जाते थे। बाढ़ के बाद हम नयी सृष्टि रचाते थे।

बाढ़ के बाद खेती का कारोबार शुरू हो जाता था। बाढ़ के पानी के उतरने के बाद जमीन दिखाई देती थी। यह जमीन बहुत जरखेज होती थी। कुछ भी बो दो। उसके लिए खाद पानी की जरूरत नहीं होती थी। नदी तो हमारे करीब ही थी।

हम ज्यादातर सब्जियां उगाते। तरबूज के लिए जमीन तैयार करते। हम कोशिश करते की सब्जी की फसल जल्दी तैयार हो जाए ताकि उसके अच्छे दाम मिल जाय। जो कुछ बचा हुआ पैसा हमारे पास होता। वह इन्हीं दुर्दिनो में ख़त्म हो जाता, उधार अलग से चढ़ जाता।

हर साल बाढ़ के दुःख बढ़ते रहते थे। उसमें कोई कमी नहीं आती थी। हम बड़े हो रहे थे। हमने सोचना शुरू कर दिया था कि हमें इस मुसीबत से निजात मिलनी चाहिए। लेकिन पिता नदी और घर को छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्हें अपने पूर्वज याद आते थे, जिन्होंने इसी नदी के तट से अपना जीवन आरम्भ किया था। हम दुनिया की कठिन पहेली हल कर सकते थे लेकिन उन्हें समझाना हमारे बूते की बात नहीं थी।

वह उन्नीस सौ नब्बे की बात थी। बाढ़ के पानी का चढ़ना शुरू हो गया था। पानी की अपनी गति होती है। कभी नदी का पानी धीरे–धीरे चढ़ता कभी एकाएक बाढ़ आ जाती। जैसा मैंने आप को बताया – नदी मेरे घर के समीप आ रही थी। यह खतरा कई सालो से बढ़ता जा रहा था। नदी अचानक पाट बदलती थी और कई गाँव उसके चपेट में आ जाते थे। गाँवों का वजूद मिट जाता था। सगुना नदी ने पिछले कई सालों में कई गाँवों की बलि ले ली थी।

सगुना पहाडी नदी थी। उसमें अचानक पानी की आमद होती थी। नदी का पानी बढ़ता जा रहा था। हमने जरूरी सामान पैक कर लिए थे। पिता ने मुझे कुछ जरूरी सामान के लिए पास के कस्बे में भेजा था। । मां मना कर रही थी। ऐसे समय में घर छोड़ कर जाना ठीक नहीं है। पिता ने कहा – जाने दो अभी कहाँ आफत आ रही है। बाँध पर सामान महंगे मिलेंगे। हमें नोचने वाले गिद्धों की कमी नहीं है। बाँध में हमारे आने के पहले महाजन अपनी दुकानें सजाकर बैठ जाते है।

पिता गलत नहीं कह रहे थे। लेकिन मेरे शहर जाने का जो वक्त चुना था वह ठीक नहीं था। फिर भी मैं भरे मन से बाजार गया। मैं मुड़-मुड़ कर अपने पीछे छूटते हुए घर और नदी को देखता जा रहा था। मन उद्विग्न था।

जैसे कस्बे में पहुंचा मेरे एक दोस्त ने कहा ... अभी तो तुम्हारे यहाँ बाढ़ नहीं आयी होगी ?

- यार इस बारिश के मौसम में कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है गाँव लौटूँ और घर पानी में डूब गया हो ...

इस मौसम में मन में अच्छे विचार नहीं आते थे। मन आशंकाओं से घिरा हुआ रहता था। मैंने महाजन को सामान की लिस्ट दी और कहा ... सेठ जी जल्दी सामान दे दीजिये।

जब कस्बे में आता था, सामान खरीदने के बाद चाय जरूर पीता था। कुछ लोगो से मिलना–जुलना होता था। लेकिन इस बार कस्बे में रुकने की तबियत नहीं हुई। मेरे प्राण घर में अटके हुए थे। मैं जल्दी रास्ता तय करना चाहता था, इसलिए मैंने अपनी गति तेज कर दी थी।

जैसे सड़क से उतर कर गाँव की पगडंडी पकड़ने चाही – देखा नदी हाहाकार कर रही है। यह तो जल प्रलय का दृश्य था। मेरा दिल बैठ सा गया। मैं घर के लोगो के बारे में सोचने लगा। कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गयी ? हम लोग कई सालो से बाढ़ का कहर झेल रहे है इसलिए पानी की प्रकृति के बारे में ज्ञान तो था ही। लेकिन जब तक परिवार से नहीं मिल लेता। चैन नहीं मिलेगा।

जहां मैं खड़ा था, वहां से बाढ़ मील भर दूर था। इस बीच बारिश शुरू हो गयी थी। मैं भीगता हुआ बाँध की और भाग रहा था। बारिश इतनी तेज थी की मुझे अपना चश्मा उतारना पडा। तेज बारिश से आगे की तरफ का रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था।

यह जान कर जान में जान आयी कि पूरा परिवार सुरक्षित बाँध पर पहुँच गया था। मां ने हकबकाकर मुझे गले लगा लिया था। उसके आँख में आंसू थे। उसने रोते हुए कहा – बबुआ इस बाढ़ में घर और खेत नदी के पाट में आ गए। अब हम बाढ़ के बाद कहाँ जायेंगे ?

यह कोई दुखद सूचना नहीं हमारे विस्थापन की शुरुआत थी। मेरे भीतर गहरी पीड़ा थी, जिसे मैं अपने अन्दर छिपा रहा था। अचानक बेघर हो जाने का दुःख मैं अपने इलाके के लोगो के चेहरों पर पढ़ चुका था। लेकिन अनुभव पहली बार हो रहा था। मैं परिवार में भाई बहनों से बड़ा था। घर का सारा दारोमदार मेरे ऊपर था।

पिता ऐसी स्थिति में एकदम चुप हो जाते थे लेकिन उनका चेहरा और आँखे बोलती थी। वे लुटे हुए मुसाफिर की तरह लग रहे थे । जिसके पास कुछ भी नहीं बचा था। जीवन की यात्रा स्थगित नहीं होती। पाथेय न हो तो भी चलना पड़ता है।

हमें इस बाँध पर एक महीना रहना है। इस बीच हमें अपने ठिकाने के बारे में सोचना है। घर तो चला गया है। उसे नदी निगल गयी है। इस एक माह में बाँध को रंगमंच बनाना है। मंत्री विधायक और दलालों का आना–जाना शुरू हो जाएगा। बाढ़ के नाम पर सरकार से इमदाद मिलेगी। और लोग इस ग्रांट को लूटना शुरू कर देंगे। इस लूट में किसी का हस्तक्षेप नहीं होगा। सबको बराबर का हिस्सा दे दिया जाएगा। हम देखते रहेंगे। कोई विरोध नहीं करेंगे। कोई हमारी थाली से रोटी छीन लेगा हम उफ़ नहीं करेंगे।

हमें रात भर नींद नहीं आयी। मुझे डूबते हुए घर की तमाम बाते याद आ रही थी। बचपन के खेल याद आ रहे थे। जब तरबूज की फसल तैयार हो जाती थी। हम झोपड़ी बना कर वहां रहते थे । चांदनी रात में चाँद नदी में उतर आता था। नदी के बहने की आवाज में एक संगीत था। चांदनी रात में नदी के तट पर हिरन कुलांचे भरते थे। दूर की बँसवारी में मोर बोलते थे। मां ने बताया था की बाढ़ के दिनों में बहन चारपाई से उतरकर पानी में बहने लगी थी। मां पानी में कूद पडी थी। बहन के पेट के भीतर पानी भर गया था। मां ने उसे किसी तरह बचाया था। मां ने यह किस्सा बाढ़ के ख़त्म हो जाने के बाद बताया था।

जब मैंने मां से पूछा उसने ऐसा क्यों किया तो मां ने कहा ... हर चीज को बताने और जानने का समय होता है – उस समय हम लोग खुद विपत्तियों से घिरे हुए थे। इसलिए मैंने इस दुःख को छिपा लिया था।

पिता को कहाँ नींद आ रही होगी। वह अपने आप में गुम हो गए थे। जरूर उनके ख्यालों में बार बार नदी घर और गाँव आता–जाता होगा। उन्होंने हम से ज्यादा जीवन नदी के पनाह में बिता दिया था।

रोज हम लोग सोचते - इसके बाद कहाँ जायेंगे। कैसे यह जीवन चलेगा। हमारे भीतर बेजमीन होने का महादुख था।

एक दिन सुबह–सुबह पिता ने कहा ... बेटा मैं भले ही दुनिया के किसी कोने में मरूं लेकिन तुम लोग मेरा दाह–संस्कार सगुना नदी के किनारे करना। तभी मुझे मुक्ति मिलेगी ...

यह सुन कर मेरे सिवा सब लोग सन्न थे। मैं जानता था – नदी कहीं और नहीं पिता के भीतर बहती थी ...

स्वप्निल श्रीवास्तव

५१०—अवधपुरी कालोनी । अमानीगंज
फैजाबाद – २२४००१
मोबाइल –०९४१५३३२३२६

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