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शिक्षक का अपमान, देश के कमजोर होने का प्रमाण है — दीपक भास्कर #TeachersDay

सित॰ 5, 2016

एक ऐड-हॉक शिक्षक परमानेंट होने के लिए सालों दर साल अनेकों दरवाजे खटखटाता रहता है क्यूंकि "अब परमानेंट शिक्षक बनते नहीं, बल्कि बनाये जाते हैं"। आपको पता होना चाहिए की अब शिक्षक को समाज बदलने का काम नहीं, "नागरिक" का निर्माण नहीं बल्कि सरकार की गलत नीतियों को तर्कपूर्ण ढंग से सही साबित करने काम दिया जाता है। 
शिक्षक का अपमान, देश के कमजोर होने का प्रमाण है — दीपक भास्कर #TeachersDay

शिक्षक का अपमान, देश के कमजोर होने का प्रमाण है

— दीपक भास्कर






दीपक भास्कर

deepakbhaskar85@gmail.com
शिक्षक किसी भी देश की रीढ़ होते हैं। जब शिक्षक अपमान सह रहा हो तो आप समझिये की देश बुरे दौर से गुजर रहा है। मैं आपके उस विश्वविद्यालय के  शिक्षक की बात कर रहा हूँ जहाँ पर आप अपने बच्चों का दाखिला हर हालत में चाहते हैं। जिस विश्व-विद्यालय के अंतिम कट-ऑफ तक का आप इंतजार कर रहे होते हैं। जिस विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आप अपने बच्चों को दिन-रात बारहवीं की परीक्षा में बेहतर करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। आप ये जानते हैं की यह विश्वविद्यालय इस देश के उन बेहतरीन विश्वविद्यालयों में शुमार हैं, जहाँ देश के हर कोने से छात्र आकर पढ़ना चाहते हैं। ये विश्वविद्यालय विश्व-पटल पर अपनी छाप छोड़ता रहा है। क्या आप ये नहीं मानेंगे की विश्वविद्यालय किसी भवन (बिल्डिंग) का नाम नहीं बल्कि वहाँ के छात्र और शिक्षक का संगम होता है। कोई भी विश्वविद्यालय, शिक्षकों की रात-दिन की मेहनत से बनता है और ये विश्वविद्यालय भी उसी कठिन मेहनत और त्याग परिणाम है। सरकारें तो भवन बनाती हैं, विश्व-विद्यालय तो शिक्षक बनाते हैं। आपके बच्चे आपसे बहुत कुछ ना बताते हों, लेकिन शिक्षक से वो हर राज बताते हैं जिसे सुनकर ये समाज उसे किसी "ऑनर-किलिंग" में मार देना उचित समझता है, उसे घर से निकाल देना न्यायोचित मानता है। लेकिन शिक्षक सब कुछ सुनते हैं, समझते हैं, उससे वही करवाते हैं जो सही है, उसे तर्कपूर्ण दिशा में ले जाते हैं। आपके लिए वो आपके बच्चे होते हैं, परन्तु शिक्षक के लिए छात्र इस देश की वो पीढ़ी हैं जिसके कंधे पर इस देश का भार आना है। आपके लिए वो किसी धर्म, जाति, लिंग या क्षेत्र का हो सकता है लेकिन शिक्षक के लिए छात्र एक "नागरिक" होता है।

आप अपने बच्चों को जब देर रात पढ़ते देखते हैं तो आपको उसकी सेहत बिगड़ जाने की चिंता होती है और आप शिक्षक को अधिक होमवर्क देने के लिए कोस रहे होते हैं। लेकिन शायद आप कभी ये जानना जरूरी नहीं समझते की जब आपका बच्चा देर रात पढ़ रहा होता है तो उसी समय शिक्षक भी जाग कर पढ़ रहा होता है, नई-नई चीजें खोज रहा होता है, अगले दिन के लेक्चर की तैयारी कर रहा होता है। शिक्षक के दो कमरे वाले घर में एक कमरा आपके बच्चों को पढ़ाने वाली किताबों से भरा होता है। घर में सब उनकी इस परेशानी को झेल रहे होते हैं और शिक्षक घर वालों के ताने सुन रहा होता है। शिक्षक की आँखे नींद से लाल होती हैं, फिर भी वो सुबह सुबह छात्र से पहले, कॉलेज के क्लासरूम में इंतजार कर रहा होता है। वो इसे इस देश की सेवा मानकर करते हैं और आप इसे महज कुछ रुपयों में तौल देते हैं।




कभी शिक्षक का बैग खोलकर देखिएगा, उसमें आपके बच्चों के टेस्ट-पेपर, असेसमेंट-पेपर मिलेंगे। आप कभी एक शिक्षक की जिन्दगी में झांकिए तो आपको पता चल जाएगा की क्यूँ आप अपने बच्चों को शिक्षक बनने की प्रेरणा नहीं देते? क्यूँ आपके बच्चे भी शिक्षक नहीं बनना चाहते? क्यूंकि वो शिक्षक की जिन्दगी को बेहतर समझते हैं। वो ये जिन्दगी बिलकुल नहीं चाहते, हम भी नहीं चाहते की आपके बच्चों को ये जीवन मिले। लेकिन आप सोचिये की क्या होगा, जब सब ऐसा ही सोचने लगेंगे। विश्वविद्यालय तो महज कागज के टुकड़े पर डिग्री छाप कर देने वाली संस्था का नाम रह जायेगा।

आप कितनी आसानी से ये कह देते हैं की आपको क्वालिटी एजुकेशन चाहिए। कभी आपने सोचा है की वो क्वालिटी एजुकेशन कैसे आएगा? एक-एक क्लास में एक-एक सौ बच्चे होते हैं। एक शिक्षक अपने क्लास के सारे बच्चों का नाम तक नहीं जान पाता। ऐसी एक क्लास नहीं होती बल्कि वो ऐसी ही चार-चार क्लास एक दिन में पढ़ा रहा होता है। चार अलग-अलग पेपर की तैयारी के लिए आपके शिक्षक के पास वक्त कहाँ से आ पायेगा? कहाँ से आएगा क्वालिटी-एजुकेशन? आपका शिक्षक थक गया है और आप ये समझिए की अगर आपका शिक्षक थका हुआ है तो आपका देश किसी भी सूरत में तरक्की नहीं कर सकता। चाणक्य ने कहा था की अगर किसी देश में शिक्षक का अपमान हो तो आप समझ लें की आपके राष्ट्र पर बड़ा खतरा आने वाला है। आप कभी एक बेहतर राष्ट्र नहीं बन पाएंगे। आप जिस अमेरिका जैसा अपने देश को बनाना चाहते हैं, कभी उस देश की शिक्षा-व्यवस्था भी देखिये। उनके क्लासरूम में एक शिक्षक पर दस छात्र होते हैं। उनके यहाँ शिक्षक, उस देश के सबसे बड़े ओहदे वाले पद होते हैं। हमारे नजर में तो शिक्षक "बेचारे" हैं। सारी नैतिकता की उम्मीद शिक्षक से कर ली जाती है लेकिन कभी उनकी जिन्दगी में झांका तक नहीं जाता, उनके दर्द को समझा नहीं जाता। आपके बच्चे लाखों की गाड़ियों में आते हैं और आपका शिक्षक "मेट्रो स्टेशन" से "इ-रिक्शा" में दस रूपये बचा रहा होता है। आपके शिक्षक, हर बेहतर विश्वविद्यालय प्रवेश-परीक्षा में उत्तीर्ण होकर पढ़ने वाले छात्र हैं , सालों देकर पी एच डी करने वाले छात्र होते हैं। उसके बाद, सालों दर साल ये ऐड-हॉक शिक्षक होते हैं, जिनकी नौकरियां भी किसी के दया का पात्र होती हैं। इन्हें हर वक्त डरा कर रखा जाता है। नौकरी से हटाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती। सोचिये जिस राष्ट्र का शिक्षक डरा हुआ हो, वो राष्ट्र कितना शक्तिशाली हो पायेगा? आप शक्तिशाली राष्ट्र "नाभिकीय (न्यूक्लीयर) बॉम्ब" बनाने से नहीं होते बल्कि "शक्तिशाली-शिक्षक" पाने से होते हैं। एक महिला शिक्षक प्रेग्नेंट होती हैं लेकिन इन्हें घंटों तक खड़े होकर क्लास में पढ़ाना होता है। आप ऐसे समय में, अपने घर की औरतों का कितना ख्याल रखते हैं और रखना भी चाहिए। आपके बच्चों को भी, कई बार इन पर दया आती है। सब बस दया ही कर पाते हैं। सरकार महिलाओं का सम्मान भी होर्डिंग्स पर लिख लिख करती ही रहती है। एक ऐड-हॉक महिला शिक्षक अपने छोटे बच्चे को घर पर छोड़ कर आती है, जब उसके पास उसकी माँ को होना चाहिए तब वो "शिक्षक-माँ" आपके बच्चों का भविष्य तैयार कर रही होती है। जिस समय आप हर तरह की सुरक्षा चाहते हैं, उसी समय में आपके ऐड-हॉक शिक्षक का भोजन तक सुरक्षित नहीं होता, मूलभूत सुरक्षा तक नहीं होती। परमानेंट शिक्षक के पास सिर्फ नौकरी सुरक्षित होती है लेकिन जीवन नहीं। जीवन संदर्भ में "ऐड-हॉक और परमानेंट" का कोई अंतर नहीं है। एक पचास साल की शिक्षक को भी कॉलेज में तीन मंजिल की सीढियाँ रोज कई बार चढ़नी होती हैं, क्लासरूम में कुर्सी तक नहीं होती। चौक के डस्ट से उनकी हालत ख़राब रहती है। आप इतने अपमान के बाद, शायद ही कुछ करने लायक बचें। पर ये फिर भी इस देश के निर्माण में जुटे रहते हैं। ये क्लास में स्वतंत्रता, समानता, न्याय और अधिकार जैसे सिद्धांत पढ़ाते हैं और असल जिन्दगी में इन सब सिद्धांतों को रोज चकनाचूर होते हुए देखते हैं। सोचिये की जिनको महज अपने अधिकार मांगने की वजह से नौकरी से निकाल दिया जाये वो भला किस कन्विक्शन के साथ इन सिद्धांतों को आपके बच्चों को पढ़ा पायेगा। एक ऐड-हॉक शिक्षक परमानेंट होने के लिए सालों दर साल अनेकों दरवाजे खटखटाता रहता है क्यूंकि "अब परमानेंट शिक्षक बनते नहीं, बल्कि बनाये जाते हैं"। आपको पता होना चाहिए की अब शिक्षक को समाज बदलने का काम नहीं, "नागरिक" का निर्माण नहीं बल्कि सरकार की गलत नीतियों को तर्कपूर्ण ढंग से सही साबित करने काम दिया जाता है। तो क्या हम ऐसा करने लगें? मानने लगें सरकार की हर बात। कहने लगें की सरकार सब सही कर रही है। छोड़ दें आपके बच्चों में तर्क और वैज्ञानिक सोच भरना। आप तो ऐसा नहीं चाहते होंगे। अगर आप भी ऐसा ही चाहते हैं तो फिर सब ठीक ही हो रहा है। आप समझिये की आपका विश्वविद्यालय जैसा होगा वैसा ही आपका देश भी होगा। आपका शिक्षक थक गया है और आपका देश थक रहा है, टूट रहा है। अगर आप ऐसा नहीं चाहते तो जाइये शिक्षकों के साथ, उनके साथ सरकार की दानवीय नीतियों के खिलाफ, अपने बच्चों के भविष्य के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ लड़िये।


दीपक भास्कर, जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में पीएचडी स्कॉलर हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘दौलत राम कॉलेज’ में राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है. इनके लेख विभिन्न विषयों पर विभिन्न स्थानों पर प्रकाशित होते रहते हैं. इन्होने 'सबलोग' के लिए रंगभेद, जासमीन क्रांति, असहिष्णुता पर लिखा, यूथ की आवाज में रूबी राय टोपर स्कैम, युवाओं की आत्महत्या, बाढ़ की समस्या और राज्य की संकल्पना पर लेख प्रकाशित हुए हैं. फॉरवर्ड प्रेस में इनके ‘मैं दलित हूँ आपकी गाय नहीं’ हजारों लोगों ने पसंद किया. इनका विशेष रुचि सामाजिक मुद्दों के राजनैतिक पक्ष को समझने में है.

जेएनयू से शब्दांकन स्तंभकार आशिमा  blossomashima@gmail.com


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टिप्पणियां

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'मृत्युंजय योद्धा को नमन और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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