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Film Review: फ़िल्म 'डियर जिंदगी' जीने की तलाश है

नव॰ 27, 2016

डियर जिंदगी

रवींद्र त्रिपाठी


डियर जिंदगी निर्देशक: गौरी शिंदे
डियर जिंदगी कलाकार: शाहरूख खान, आलिया भट्ट, कुणाल कपूर, अली जाफर, इरा दुबे, आदित्य रॉय कपूर, अंगद बेदी

Dear Zindagi movie cast: Alia Bhatt, Shah Rukh Khan, Yashwasini Dayama, Ira Dubey, Kunal Kapoor, Ali Zafar, Angad Bedi

Dear Zindagi movie director: Gauri Shinde

क्या निर्देशक गौरी शिंदे ब्राजीली कथाकार पॉलो कोएलो से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं? ये सवाल `डियर जिंदगी’ को देखने के बाद सहज भी मन में उभरता है। इस फिल्म में कहानी से अधिक फसलफा है। वैसे ही जैसे कोएलो के उपन्यासों में घटनाएं या कहानी कम और `जिंदगी को कैसे जिएं’ वाली बात अधिक अहमियत रखती है। वैसे कोएलो का उल्लेख फिल्म में नही है। हां, अमेरिकी उपन्यासकार विलियम फॉकनर का जरूर है। फॉकनर की एक उक्ति है कि `अतीत कभी मरता नहीं, दरअसल अतीत होता ही नहीं’। संक्षेप में कहें तो `डियर जिंदगी’ इसी उक्ति का विस्तार है। गौरी शिंदे इस फिल्म के माध्यम से कहना ये चाहती हैं कि आपका बचपन आपके वर्तमान पर हावी हो सकता है और आप जिंदगी को भरपूर तभी जी सकते हैं कि जब किसी चीज को अपने पर हावी न होने दें। ये भी बता देना जरूरी है कि `डियर जिंदगी’ उन लोगों को ज्यादा पसंद नहीं आएगी जो सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते हैं। पर ये किसी तरह की कला-फिल्म भी नहीं है। ये उस किताब की तरह है जो मानसिक उद्वेलन में फंसे शख्स को सहज होने के तरीके बताती है।


आलिया भट्ट ने इसमें कायरा उर्फ कोको नाम की लड़की की भूमिका निभाई है। कायरा एक सिनेमेटोग्राफर है और एड फिल्में शूट करती रहती है। उसकी जिंदगी की तमन्ना ये है कि वो किसी फीचर फिल्म को शूट करे। यानी अपनी क्रिएटिव पर्सनालिटी चाहती है। कायरा का अपनी रोमांटिक जिंदगी भी है लेकिन कोई स्थाई बॉयफ्रेंड नहीं है। पहले उसकी जिंदगी में सिड (अंगद बेदी) आता है और फिर रगु या राघवेंद्र (कुणाल कपूर)। पर रगु कुछ दिनों के बाद अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड से शादी कर लेता है। अब कायरा क्या करे? हालात ऐसे बनते हैं कि वह अपनी माता पिता के पास गोवा लौट जाती है। न चाहते हुए भी। और वहां भी स्थितियां ऐसी बनती हैं वह अपने माता-पिता के साथ सहज नहीं हो पाती है। ऐसे में उसकी जिंदगी में आता है जहांगीर खान उर्फ जग (शाहरूख खान) जो मनोवैज्ञानिक है। कायरा उसके पास थेरेपी लेने जाती है। इस थेरेपी से क्या वो अपनी जजबाती धुरी फिर से पा सकती है? `डियर जिंदगी’ जजबाती धुरी को पाने के प्रयास की कहानी है।


फिल्म में एक जगह जग यानी शाहरूख खान कहते हैं कुछ वजहों से हमारा इमोशनल सिस्टम गड़बड़ा जाता है। एक मनोवैज्ञानिक सलाहकार के रूप में वे कायरा को इमोशनल सिस्टम को ठीक करने में लगे है। `डियर जिंदगी’ के प्रमोशन के दौरान उनका ये वक्तव्य आया था कि इस फिल्म में उनकी भूमिका एक कैमियो की है। लेकिन फिल्म को देखने के बाद ये सही नहीं लगता है। ये ठीक है कि वे मध्यांतर के ठीक पहले इस फिल्म में आते हैं लेकिन आखिर तक बने रहते हैं। एक जमाने में राज कुमार मध्यांतर के बाद फिल्मों में आते थे और छा जाते थे। शाहरूख उस तरह छाते तो नहीं लेकिन उनका किरदार अहम है और पूरी फिल्म कायरा और जग की बातचीत पर टिकी है। वे एक ऐसे मनोवैज्ञानिक यानी साइकियाट्रिस्ट की भूमिका में हैं जो वक्त पड़ने पर बच्चों की साइकिलें भी ठीक करता है। उनके चरित्र में हास्य का पुट भी है। साथ ही जग का चरित्र ये भी रेखांकित करता है कि बीमारियां सिर्फ शारीरिक नहीं होतीं बल्कि मानसिक भी होती हैं। हालांकि समाज में ये पूर्वग्रह है दिमाग का इलाज छुपाने की चीज है। `डियर जिंदगी’ इस पूर्वग्रह को खत्म करने की बात करती है। यानी आप जिस सहजता के लिए डॉक्टर से पास डायबिटीज का इलाज कराने जाते है इसी तरह किसी साइकिय़ाट्रिस्ट के पास अपनी मानसिक समस्या के समाधान के लिए जा सकते हैं।

फिल्म के आखिरी दृश्य में ये दिखाया गया है कि कायरा गोवा के इतिहास में दर्ज एक ऐसी महिला पर फिल्म बनाती है जो शुरू में पुरुष का वेश धरके युद्ध करती है। बाद में ये राज खुलता है पर उसके बाद भी वो लड़ना नहीं छोड़ती मगर औरत होकर ही युद्ध के मैदान में जाती है। निर्देशक गौरी कहना ये चाहती हैं कि एक औरत को भी अपनी जिंदगी में कई बार वेश बदलके युद्ध करना पड़ता है। इससे उसकी लड़ाई दोहरी हो जाती है। कायरा यानी आलिया भट्ट भी `डियर जिंदगी’ में दोहरी लड़ाई लड़ती है। पर वह जीतती तभी है जब अपने भीतर के दोहरेपन को खत्म कर देती है।

फिल्म में अली जाफर भी हैं जो पाकिस्तानी मूल के कलाकार है। ये अच्छी बात है कि उनके पाकिस्तानी होने का विवाद नहीं उठा। जाफर का किरदार छोटा है और एक गायक का है। फिल्म का संगीत काम चलाऊ है और गाने भी ऐसे नहीं हैं जो छा जाएं। अगर गौरी शिंदे के इधर ध्यान दिया होता तो फिल्म का फसलफा ज्यादा लोगों तक पहुंचता। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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