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मनोज कुमार पांडेय की कहानी 'हँसी'

नव॰ 29, 2016

Manoj Kumar Pandey Ki Kahani 'Hansi'

साहित्य व्यवस्था की कमियों पर ऊँगली रखे तो अपना काम करे... मनोज कुमार पांडेय की कहानी 'हँसी' उस समय लिखी गयी थी जब वर्तमान सत्ता गद्दीनशीन नहीं थी, और कहानी को पढ़ने के साथ-साथ लेखक के उस वैद्य के होने का पता चलता रहता है, जिसे पता है गद्दी पर कौन बैठा है इससे व्यवस्था की बदमाशियों को कोई फर्क नहीं पड़ता... कुलजमा इतना कि काल से परे कहानी 'हँसी'  के लेखन के लिए मनोज भाई को साधुवाद और आप पाठकों से बस इतनी उम्मीद की कहानी समझेंगे... यहीं 'हँसी' का ये छोटा-सा हिस्सा पढ़लें, ये तय करने में आसानी होगी कि कहानी समझ आएगी या...




आजकल मैं सल्तनत की प्राचीन परंपरा में कुछ ऐसी चीजों के बारे में कुछ ऐसी महान खोजें कर रहा हूँ जो दुनिया में हमारी सल्तनत की बादशाहत का सबब बनेंगी। इस सिलसिले में सल्तनत के ऐयारों ने चिंतन और खोज के जो कुछ रास्ते दिखाए वे चमत्कारिक रूप से आश्चर्यजनक हैं। और हमारी सल्तनत के देशी विदेशी दुश्मनों के होश उड़ा देने के लिए काफी हैं। जैसे अब इसी खोज को ले लो कि जब तक दुनिया भर के लोग कायदे से बंदर भी नहीं बन पाए थे उस समय में हमारे यहाँ के महान मानवों की तो खैर आप बात ही छोड़िए... बंदर तक हवाई जहाज उड़ाते थे। और बहुत ही खुशी की बात है अब हमारी इनवर्सिटियाँ भी इस बात को मानने लगी हैं। यकीन न हो रहा हो महाराज तो किसी देशी यूनिवर्सिटी में जाकर देख आइए। पश्चिम के कुछ मूर्ख अज्ञानी किसी राइट बंधु का नाम लेते हैं जिसने पहले पहल उड़ने का ख्वाब देखा था... और वे कितना राँग हैं इस बात का पता उन बेवकूफों को तब चलेगा जब वह हमारी महान राजधानियों में आएँगे और हमारी इनवर्सिटियों के केंद्रीय हालों में अलाने ग्रह की खोज में फलाने श्रषि का योगदान विषय पर सेमिनार हो रहा होगा और तब वे मूर्ख वहाँ पर विमान शास्त्र के प्रणेता के रूप में ढेकाने श्रषि की तस्वीरें देखेंगे। तब उन मूर्खों के दिमाग की हवा शंट हो जाएगी और उनके दिमाग में भरे गोबर का कंडा बन जाएगा... अब तस्वीरों को ही ले लीजिए... जिस युग में उन कमजर्फों की धरती पर डायनासोर लोटते थे उस समय तक हमारे यहाँ फोटोग्राफी का आविष्कार हो चुका था पर हम क्या करें जो डायनासोरों को तस्वीरें खिचाने का कोई शौक ही नहीं था। वे कभी तस्वीरें खिंचाने हमारे पास आए ही नहीं... नहीं तो वे फिसड्डी जो आज उनकी हड्डिया और गोबर ढूँढ़कर धन्य हुए जा रहे हैं... उन बेचारों को हम डायनासोरों की असली तस्वीरें भेंट कर पाते।

तो क्या डिसाइड किया ?

E. & O. E. 
भरत तिवारी

हँसी — मनोज कुमार पांडेय

GIC Faizabad
Govt Inter College (GIC) Faizabad


हत्या, बलात्कार, डकैती अपहरण... ये सब तो अब छोटी मोटी घटनाएँ हैं जो किसी एक व्यक्ति या दो चार व्यक्तियों के खिलाफ अंजाम दे दी जाती हैं। अब तो सब कुछ सामूहिक चलता है... सामूहिक बलात्कार... सामूहिक नरसंहार... सामूहिक विस्थापन... सामूहिक आगजनी... सब कुछ सामूहिक।
व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी... व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी... क्या कहूँ देश का दुर्भाग्य कि हमें नया राष्ट्रगान मिलते मिलते रह गया...। इस गाने को अगर किसी धनुष की बजाय उसके ससुर रजनीकांत ने गाया होता तो पक्की बात है कि अब तक यह हमारा राष्ट्रीय गान बन गया होता... या फिर सचिन तेंदुल्कर, अमिताभ बच्चन, या शाहरुख खान... व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी... तब भी राष्ट्रगान न सही पर कैसा तो है यह गीत कि सुनते ही खड़े होने का मन करने लगता है। देश का दुर्भाग्य कि अच्छी चीजें हमेशा होते होते रह जाती हैं। पोलियो जाते जाते लौट आता है तो आस्कर और नोबेल मिलते मिलते रह जाता है भी नहीं कह सकते। अपन तो नॉमीनेट होकर के ही राष्ट्रीय रूप से सम्मानित महसूस करने लगते हैं। मस्त है भाई। हम नॉमीनेट तो होते हैं... पाकिस्तान, वर्मा, नेपाल और भूटान तो नॉमीनेट भी नहीं होते। हाँ बाँग्लादेश जरूर हमसे आगे निकल गया पर ये बंगाली होते ही बड़े तेज हैं। मछलियाँ खाते खाते मछलियों की ही तेजी के साथ आगे निकलना सीख जाते हैं... मछलियों की तरह ही एक चिकनी तेजी के साथ...

व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी... इस महान गीत को सुनने के बाद अनायास ही कोलावरी डी के प्रति मेरे मन में एक गहरा सम्मान पैदा हो गया। मैं सहज ज्ञान से संपन्न हो गया कि कोलावरी डी निश्चित रूप से सोनिया दी, ममता दी, जयललिता दी आदि आदि से बहुत ऊपर की चीज हैं। कुछ कुछ हिलेरी क्लिंटन दी की तरह - इसीलिए वह दी की बजाय डी हो गई हैं। पूरा अंतरराष्ट्रीय मामला लगता है। मैं अपनी इस गुस्ताखी के लिए शुरू में ही आपसे माफी माँगता चलता हूँ कि आपसे महान महिमामयी अंग्रेजी की बजाय गँवारों की किसी भदेस भाषा में बात करने जा रहा हूँ। इसी भदेस भाषा में रहते हुए मुझे कोलावरी डी की तलाश भी करनी है और माया की तरह अबूझ पर महिमामयी कोलावरी डी के चरणकमलों में लट्टू भी होना है। मैं जानता हूँ कि मेरी सारी समस्याओं का समाधान अब सिर्फ और सिर्फ कोलावरी डी के पास ही बचा है।

पूरा का पूरा देश एक भयानक तांत्रिक अनुष्ठान में बदल गया है। जय हो निर्मल बाबा... आशा बाबा... रामदेव बाबा... मोदी बाबा... आशा बाबा... चिदंबरम बाबा... अरिंदम बाबा... फरिंदम बाबा...। इतने नए नए तरह के बाबा सामने आ गए हैं कि पहचानना मुश्किल होता है... कि आखिर ये सब है क्या? हमसे पहले के लोगों ने ये समस्या कभी नहीं झेली होगी

समस्याएँ बहुत हैं... कितनी गिनाऊँ! जैसे यही कि आजकल मुझे जरा भी नींद नहीं आती। मैं सोने में अक्षम हो गया हूँ। मैंने नींद की दवाएँ खाकर देखा... दारू के नशे में धुत होकर देखा, और तरह तरह के नशे आजमाए पर नींद नहीं आई तो नहीं आई। उसके बदले में जो कुछ आया वह तो और भी बचैन कर देनेवाला था... रगों से नमी की एक एक बूँद तक निचोड़ लेनेवाला। नींद और जागरण के बीच एक लंबे रेगिस्तान जैसा कुछ। न नींद न जागरण... ये सबसे भयानक होता है... इससे होता यह है कि न तो मैं दुनिया भर की त्रासद घटनाओं से थोड़े समय के लिए ही सही मुक्त हो पाता हूँ और न ही उनमें मेरा कोई हस्तक्षेप बनता है। बस जो कुछ भी आँखों के सामने घटता है उसे ऐसे ही बिना किसी प्रतिक्रिया के देखते रहना... पूरे जीवन भर... आखिरी साँस तक। और घटनाएँ उनका कोई अंत नहीं... पता नहीं कहाँ कहाँ की तिलिस्मी घटनाएँ मेरे आसपास घटती रहती हैं... थ्री डी सिनेमा की शक्ल में। हत्या, बलात्कार, डकैती अपहरण... ये सब तो अब छोटी मोटी घटनाएँ हैं जो किसी एक व्यक्ति या दो चार व्यक्तियों के खिलाफ अंजाम दे दी जाती हैं। अब तो सब कुछ सामूहिक चलता है... सामूहिक बलात्कार... सामूहिक नरसंहार... सामूहिक विस्थापन... सामूहिक आगजनी... सब कुछ सामूहिक। क्या कहा... आं... सामूहिक प्रतिरोध... जी मैंने उसे काफी खोजा पर बाद में थक हार कर बैठ गया। दरअसल मैं उसे अपने ही भीतर खोज रहा था... पर बाद में... खैर... तो माईबाप इतनी सारी सामूहिक घटनाएँ खून और आँसू की शराब से लबालब मुझे चारों तरफ फैली नजर आती हैं और उसमें मैं डूबने लगता हूँ। बाहर आने आने को होता हूँ कि सिर पर कोई नई चोट पड़ती है और फिर एक नए सिरे से वही डूबना उतराना। और यह सब हमारे तुम्हारे जैसे दिखनेवाले लोग ही कुछ इस अंदाज में संपन्न करते नजर आते हैं जैसे कोई वीभत्स तांत्रिक अनुष्ठान कर रहे हों। पूरा का पूरा देश एक भयानक तांत्रिक अनुष्ठान में बदल गया है। जय हो निर्मल बाबा... आशा बाबा... रामदेव बाबा... मोदी बाबा... आशा बाबा... चिदंबरम बाबा... अरिंदम बाबा... फरिंदम बाबा...। इतने नए नए तरह के बाबा सामने आ गए हैं कि पहचानना मुश्किल होता है... कि आखिर ये सब है क्या? हमसे पहले के लोगों ने ये समस्या कभी नहीं झेली होगी... व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी...

दरअसल मैं इस काबिल ही नहीं हूँ कि मुझे कोई रोजगार मिले। होता तो सैकड़ों परीक्षाओं में बैठा... किसी न किसी में तो पास हो ही जाता। नहीं हुआ तो इसका क्या मतलब है? यही न कि काबिलियत ही नहीं है... होती तो क्या सल्तनत में बैठे लोग क्या चूतिया हैं जो मुझे लेते ही नहीं...

खून, लार और आँसू और मल से भरे इस महासागर से मैं निकलना चाहता हूँ पर मैं ये भी जानता हूँ कि यह जानकर भी शायद ही आपको मुझसे कोई सहानुभूति हो कि मुझे तैरना नहीं आता... ज्यादा से ज्यादा आपके मुँह से च्च च्च की आवाज निकलेगी पर आप मुझे उस तरह से भी नहीं पुकारोगे जैसे अपने प्यारे कुत्ते को पुकारते हो जिसका नाम आपने डॉलर या रूबल रखा होता है। व्हाई दिस कोलावरी कोलावरी डी... ये अंग्रेजी भी न बहुत ही पवित्र भाषा है भाई साहब। हम अगर नहाए नहीं रहते हैं और इस पवित्र भाषा का कोई शब्द कान में पड़ जाता है तो इतना पवित्र और ताजा महसूस करने लगते हैं जैसे बिसलेरी से नहा लिया हो। पर भाई साहब प्लीज... देखिए मैने आपको अंग्रेजी में प्लीज भी कहा और अगर आपको मेरी बात पसंद न आए तो अभी से ही अंग्रेजी में सॉरी भी बोल देता हूँ ... बस आप मेरी ये छोटी सी बकबक सुन लीजिए। इस बात के लिए तो मैं आपका अभी से एहसानमंद हुआ जाता हूँ कि आप मेरी बात मेरी फटीचर भाषा में ही सुनेंगे... वैसे मैं अंग्रेजी भी सीख रहा हूँ सो जल्दी ही आप चाहेंगे तो मैं आपको यही सब बातें अंग्रेजी में भी सुनाने लायक हो जाऊँगा।

बस आप सुनते समय यह समझिएगा कि मेरी गँवार भाषा में यह मेरी आखिरी बकबक है। आपने वह कहावत तो सुनी होगी न कि बुझने से पहले दिया एक बार जलते रहने की आखिरी कोशिश में एक बार जगमगा सा उठता है। बस मेरी इस बकबक को कुछ वैसा ही समझ लीजिए आप। दरअसल मैं अपनी भाषा में मरना नहीं चाहता। आप भी नहीं चाहते होंगे। जो लोग आत्महत्या करते हैं वे भी नहीं चाहते। बस पल पल की मौत से आजिज आकर एक बार की मौत चुन लेते हैं... या शायद उनका भरोसा पुनर्जन्म में होता हो और वे शायद यह सोचकर मर जाते हों कि कोई जरूरी है कि अगले जनम में भी इनसान ही बनना पड़े।

आप कहेंगे कि यह तो एक साधारण सी पूछताछ थी... इसकी वजह से डाउन हो जाने की बात आपकी समझ में नहीं आई। तो इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि आप का ऐसी किसी पूछताछ से आज तक सामना ही नहीं हुआ... पर इसकी संभावना बहुत ही कम है। मुझे तो लगता है कि या तो आप मक्कार हैं या फिर बुरा मत मानिएगा... आप मुझसे भी ज्यादा डरपोक हैं। अरे साहब सल्तनत तो ये भी नहीं चाहती कि कोई समुंदर के पानी से भी नमक बनाए। नहीं आप गलत समझे... सल्तनत नमक खाने के खिलाफ नहीं है... वह तो बस इतना चाहती है कि लोग सल्तनत का नमक खाएँ और सल्तनत के प्रति वफादार रहें। 

नहीं, मैं मजाक बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ। आपको मेरी स्थिति मजाक करने की दिख रही है! या मैं चेहरे से ही आपको मजाकिया या विदूषक लगता हूँ? जबकि मुझे तो याद ही नहीं है कि मैं पिछली बार खुद कब हँसा था... कब रोया था ये तो और भी याद नहीं है। भला मेरी स्थितियों में कोई कैसे हँस सकता है? ज्यादा से ज्यादा आदमी मुँह चियार सकता है कि देखो मैं हँस रहा हूँ। देखो मैं कितना खुश हूँ। मैं आजकल चौबीसों घंटे यही करता हूँ। वैसे भी मेरे पास इसके अलावा और कोई रोजगार नहीं है। अजी अच्छा है कि नहीं है। होता तो काम करना पड़ता। सुबह से लेकर शाम तक जुटे रहना पड़ता। अच्छा है कि नहीं है... मस्तराम मस्ती में, आग लगे बस्ती में... बहुत अच्छा है। दरअसल मैं इस काबिल ही नहीं हूँ कि मुझे कोई रोजगार मिले। होता तो सैकड़ों परीक्षाओं में बैठा... किसी न किसी में तो पास हो ही जाता। नहीं हुआ तो इसका क्या मतलब है? यही न कि काबिलियत ही नहीं है... होती तो क्या सल्तनत में बैठे लोग क्या चूतिया हैं जो मुझे लेते ही नहीं...

पर सवाल सिर्फ काबिलियत का नहीं है... कुछ दूसरा भी मामला है। मैं काबिलियत का सवाल तो अब उठाता ही नहीं हूँ... आप जरा भी मत डरिए... मैं तो सवाल उठाना ही भूल चुका हूँ। पर मेरा एक और भाई था। उसने कहा कि सुल्तान या उसके कारिंदे कौन होते हैं उसकी काबिलियत पर सवाल उठानेवाले... और मैं तो आज तक मानता हूँ कि मेरा भाई बहुत काबिल आदमी था। सुल्तान जैसी शख्सियत और उसकी महान ताकतवर सल्तनत पर जो शख्स सवाल उठाने की जुर्रत कर सके वह भला नाकाबिल कैसे हो सकता है? सुल्तानी फौज में होता और सुल्तान आदेश देते तो दुनिया जीत लाता... रेगिस्तान में नदियाँ बहा देता और केसर की खेती करता... हवा से पेट्रोल बना देता... पर नहीं... सल्तनत के कारिंदों ने कहा कि वो काबिल ही नहीं है। बस... मेरा भाई अपनी काबिलियत साबित करने के लिए जंगलों में कूद गया और उसने सल्तनत के हजारों काबिल कारिंदों को धुआँ धुआँ कर दिया... और उनकी गुंडई हाफ कर दी।

सलतनत का एक निजाम कहता है कि उसे मार गिराया गया। हफ्ते भर उसका कटा हुआ सिर राजधानी की एक चौक पर टँगा रहा। मैं भी देखने गया था। सिर तो वैसा ही था पर कौन जाने नकली रहा हो। सल्तनत में ऐयारों की कमी थोड़े ही है। और अगर वो असली था तो वो कौन है जो अभी भी सल्तनत के खिलाफ मशाल थामे खड़ा है!

मैंने कभी मशाल नहीं थामी। मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ती। मैं बचपन से ही डरपोक हूँ, डर जाता हूँ। अभी भी डर जाता हूँ। आप जोर से चिल्लाएँगे भी तो मेरा पेशाब निकल जाएगा। ये अलग बात है कि मैं तब भी हँसता ही रहूँगा... मतलब कि मुँह चियारे रहूँगा। ये काम मैं बखूबी सीख गया हूँ। यहाँ तक कि एक बार तो सुल्तान के एक कारिंदे तक ने मुझसे कहा था कि मेरी हँसी सल्तनत के कल्याणकारी होने का विज्ञापन हो सकती है। दरअसल मेरे दाँत बहुत खूबसूरत हैं। साफ... चमकते हुए। पहले नहीं थे। जब मैं छोटा था तो मेरे यहाँ खूब गन्ना बोया जाता था।... पर दादा खाने न देते, सब बाजार चला जाता था... जी आप ही लोगों की खिदमत में... तो मैं क्या करता कि रात में कथरी में मुँह छुपाए छुपाए गुड़ चुराकर खाता और खाते खाते सो जाता। कभी पकड़ा नहीं गया... बस एक बार ततैयों ने पकड़ लिया था। कहते हैं कि मुई ततैयों को रात में दिखता ही नहीं... अरे दिखता कैसे नहीं! कोई मुझसे पूछे... साला पूरे थोबड़े का कबाड़ा हो गया था। तब से मैं बचपन भर ततैयों से बहुत डरता था... अब नहीं डरता। अब तो कई बार जब कुछ भी खाने को नहीं मिलता तो ततैयों का छत्ता बहुत काम आता है। बस माचिस की एक तीली या फिर एक कंडी आग... और भुनी हुई ततैयों का वो कुरमुरा स्वाद...। बस कहीं से थोड़ा नमक मिर्च मिल जाए बस... और नमक का क्या है... वो तो अभी भी शरीर से चूता रहता है।

पर इसके बाद कई बार हल्की सी खुमारी और पोर पोर में मीठी सी जलन पैदा हो जाती है। बदले में मैं गंगा गोमती जो भी सामने होती है उसमें कूद जाता हूँ। डूब जाता हूँ और कई कई दिनों तक डूबा रहता हूँ। पर कुछ तो है इस दुनिया में जो बार बार मुझे खींच लाता है... बाहर आने के बाद फिर से हँसना पड़ता है... वही मुँह चियारनेवाली विज्ञापनी हँसी... वही क्लोज अप मुस्कान... लाइफबॉय है जहाँ, तंदुरुस्ती है वहाँ।

तंदुरुस्ती देखकर धोखा मत खाइए जनाब। मैं ऐसा ही हूँ... पता नहीं ये क्या है कि मैं कमबख्त ऐसा ही रहता हूँ कि आप साहब लोगों को लगे कि खा खा के सड़िंयाया हुआ हूँ। हाँ... हाँ साँड़ों की भी खूब कही आपने। पूरी सल्तनत का ट्रैफिक कंट्रोल उन्हीं के हाथों में है। साँड़ न होते तो हम जैसे कितनों को रोजगार मिल जाता... पर साँड़ भला होते कैसे नहीं? साँड़ों की तो पार्टी भी बन गई है जो खुलेआम कहती है कि साँड़ों की जान इनसानों की जान से ज्यादा कीमती है। इनसान भले ही कुत्ते की मौत मार दिया जाय पर कोई साँड़ों की पूँछ का एक बाल भी नहीं उखाड़ सकता। जो भी ऐसा करने की हिम्मत करेगा, साँड़ों की पार्टी उसे जड़ मूल सहित उखाड़ डालेगी। साँड़ पार्टी का महान नारा है... सारे जहाँ से अच्छा साँड़िस्तान हमारा।

इंसानों की कोई कायदे की पार्टी नहीं है... और तरह तरह के जानवरों की तमाम पार्टियाँ हैं। एक और पार्टी है जिसमें मेरा भाई गया है पर उसके लिए हथियार चाहिए... उसे चलाना आना चाहिए... और आप जानते हैं कि मुझे हथियारों से बड़ा डर लगता है। और आजकल तो मैं हमेशा ही डरा रहता हूँ... कि पता नहीं कब कौन सी चीज हथियार बन जाए या बना दी जाए। अब देखिए न आप... वो लालवाला ड्रम जिसमें गैस भरी जाती है... लोग कुछ भी कहें पर उससे रोटियों पर सफेदी आना कितना आसान हो गया है... आँखें बच गई हैं धुआँ धुआँ होने से... उसी को फोड़ दिया... लोगों को मारने के लिए बना दिया हथियार... बाबा रे बाबा। पानी बिना एक दिन जीवन नहीं... पानी को बना दिया हथियार...। बिजली से रोशनी नहीं हथियार बनाया... लोगों को बिजली का तार छुवा छुवा कर मारा। ईंटें बेघर को घर देने के लिए नहीं... उसका सर कुचलने के काम आईं। साले जहर के गोले... नरक के मल... नाराज मत होइए हुजूर... प्लीज... आप खुद ही सोचिए... उन कीड़ों को इनसान कैसे कहूँ... जो सिर्फ जहर ही हगते हैं और जहर ही खाते हैं...? अरे इतना तो पेड़ों और पत्थरों तक को पता होता है कि पानी जीवन है... हथियार नहीं।

आप मेरी मानिए तो वे लोग इस धरती के वासी हो ही नहीं सकते। जरूर वे हमको तबाह करने के लिए किसी और ग्रह से आए हैं... और हमारे लिए साँसों की तरह जरूरी सारी चीजों को हथियारों में बदल दे रहे हैं। आदमी तक को हथियार में बदल दिया। आप को ही लीजिए... (मैं जानता हूँ कि आप मुझसे हाथ मिलाएँगे नहीं पर ऐसे ही कुछ सपोज दैट टाइप...) आप मुझसे हाथ मिलाने के लिए आगे आओगे और मैं डर जाऊँगा कि कहीं आप हथियार तो नहीं हो... भला कैसे पहचान हो कि कौन हथियार है और कौन नहीं। मैंने भी अपने लिए एक हथियार की खोज की है... हमेशा हँसते रहने की... मेरा मतलब है कि मुँह चियारे रहने की। बड़े बड़े इसके शिकार हो जाते हैं और मैं बच जाता हूँ। सल्तनत के कारिंदे समझते हैं कि मैं हँस रहा हूँ जबकि मैं भीतर ही भीतर रोता रहता हूँ... अब मैं खुलेआम कभी नहीं रोता।

पिछली बार... हालाँकि अपनी तरफ से मैं छिपकर रो रहा था... पानी में डुबकियाँ लगा रहा था और रो रहा था। आँसू और पानी एक दूसरे में मिलते जा रहे थे... फिर भी मैं पकड़ लिया गया। शायद पानी की किसी प्रयोगशाला में जाँच होती हो... या सल्तनत के ऐयारों को ऐसे ही जादू के जोर से पता चल जाता हो कि कौन विद्रोह कर रहा है... जो भी हो... मैं पकड़ लिया गया। सल्तनत के कारिंदे मुझे अपने अधिकारी के पास ले गए। अधिकारी बहुत दयावान दिखने की कोशिश कर रहा था पर मैं उसके झाँसे में नहीं आया। उसने मुझसे पूछा... क्या बात है बेटा... तुम रो क्यों रहे थे? मैंने कहा, मैं रो नहीं रहा था... मैं तो हँस रहा था। तो क्या हमारे कारिंदे झूठ कहते हैं, वो मुस्कराया। ऐसी मुस्कान की मेरी रीढ़ तक काँप गई। मैंने कहा, नहीं हुजूर मैं तो हँस रहा था... मैं तो जोर जोर से हँस रहा था... आप कहें तो मैं दुबारा हँसकर दिखा सकता हूँ। ...तो फिर दरिया में खारापन कहाँ से आया, अधिकारी जी ने पूछा। अब मैं क्या कहूँ हुजूर, मैंने कहा, हो सकता है कि हँसते हँसते ही आँसू निकल आए हों... ये आँसू भी न बहुत वाहियात चीज हैं साहब... पर मैं आपसे शर्त लगा सकता हूँ कि ये खुशी के आँसू रहे होंगे। चुप रहो गंदी नाली के कीड़े... आइंदा से दरिया में मत नहाना... दरिया का पानी खारा होता है। लोगों ने इसी से नमक बनाना शुरू कर दिया तो! सल्तनत नहीं चाहती कि कोई अपने आप से नमक बनाए। मैंने कहा, जीहाँहुजूर जीहाँहुजूर। और दरिया में क्यों नहाते हो... प्रदूषण फैलाते हो? सल्तनत की कंपनियाँ उसमें शीशा, लोहा, चमड़ा और तरह तरह की टिकाऊ प्राणवर्धक चीजें मिलाकर दरिया के पानी को उपजाऊ बनाती हैं... और तुम उसमें नहाकर उसको गंदा करते हो... मैं पहले से ही डाउन था... और डाउन हो गया।

आप कहेंगे कि यह तो एक साधारण सी पूछताछ थी... इसकी वजह से डाउन हो जाने की बात आपकी समझ में नहीं आई। तो इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि आप का ऐसी किसी पूछताछ से आज तक सामना ही नहीं हुआ... पर इसकी संभावना बहुत ही कम है। मुझे तो लगता है कि या तो आप मक्कार हैं या फिर बुरा मत मानिएगा... आप मुझसे भी ज्यादा डरपोक हैं। अरे साहब सल्तनत तो ये भी नहीं चाहती कि कोई समुंदर के पानी से भी नमक बनाए। नहीं आप गलत समझे... सल्तनत नमक खाने के खिलाफ नहीं है... वह तो बस इतना चाहती है कि लोग सल्तनत का नमक खाएँ और सल्तनत के प्रति वफादार रहें। बाकी पूछताछ... अजी पुरखों तक की हड्डियों में कँपकँपी दौड़ जाती है। मैं मानता हूँ कि मैं डरपोक हूँ पर उतना भी नहीं जितना कि डरपोक होने का भ्रम बना कर रखता हूँ। ...पर बचपन से ऐसा थोड़े ही था मैं... बचपन में तो मैंने बहुत कबड्डी खेली है। विपक्षी खिलाड़ियों को ऐसा घेरता था मैं कि वे चारों खाने चित्त हो जाते थे। उनके पाले में पहुँचता तो खिलाड़ियों में भगदड़ मच जाती। पर अब मैं खिलाड़ी कहाँ रहा... अब तो मैं कबाड़ी हो गया हूँ। लेल्लो कबाड़... लेल्लो कबाड़... मैं खुद ही तो हूँ कबाड़... लेल्लो कबाड़... कोई मुझे खरीदता ही नहीं... जबकि कबाड़ के धंधे में कितना फायदा है इसे सल्तनत तक जानती है। वह कबाड़ का धंधा फले फूले इसके लिए हर संभव स्थितियाँ तैयार करती है। इसके बावजूद जब कबाड़ का धंधा मंदा पड़ने लगता हैं तो वह अच्छे खासे अजीम तरीन शहरों को कबाड़ में बदल देती है। अपने सबसे सुंदर जंगलों को जंगलों के कबाड़ में बदल देती है। अपने सबसे मेहनती इंसानों को इंसानों के कबाड़ में बदल देती है। इससे सल्तनत का एक साथ कई स्तरों पर विकास होता है। जैसे शहरों का उदाहरण लें तो... एक, शहरों के लोग भागकर जंगलों में जाते हैं और जंगल में मंगल करते हैं। दो, शहर की जगह बाँध वाँध बनाकर बिजली उजली बनाई जाती है और नहर वहर निकाली जाती है... इससे लोगों को रोजगार मिलता है। इसका तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह होता है कि इससे कबाड़ के धंधे को अंतरराष्ट्रीयता मिलती है। यानी कि बाँध वगैरह बनाने के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर का कबाड़ यहाँ आता है और यहाँ का कबाड़ चाहे वह जिस कोटि का कबाड़ हो नई जगहों पर पहुँचता हैं और वहाँ भी कबाड़ के धंधे को गति मिलती है। बाद में जरूरत और माँग के हिसाब से बहुत सारा कबाड़ बिजली उजली से चलनेवाली नई फैक्टरियों में पहुँचता है... वहाँ इससे तमाम अन्य चीजों के साथ साथ तलवार, त्रिशूल, बंदूक और खंजर जैसे अनेक दिव्यास्त्र भी बनाए जाते हैं... जो जनता को एक चौथे स्तर पर रोजगार देते हैं। इन हथियारों के सहारे रोजगारप्राप्त लोग बेरोजगारों, विधर्मियों और बिना किसी काम के धरती पर बोझ बने लोगों को खत्म करते हैं। बाद में सुल्तान बेरोजगारों, विधर्मियों और बिना किसी काम के धरती पर बोझ बने लोगों की मदद के लिए अपने खजाने खोल देते हैं... और दुनिया को हमारे सुल्तान की उदारता देखने का मौका मिलता है। और तब कुछ विदेशी कबाड़ियों द्वारा रोजगारप्राप्त लोग दीन दुखियारों और विधर्मियों की सेवा में जुट जाते हैं... इस तरह से सल्तनत में सेवाभाव को बढ़ावा मिलता है।

हुजूर आप चाहें तो मै कम से कम दस दिन और दस रात तक इस श्रृंखला को ऐसे ही आगे बढ़ा सकता हूँ। आप भी बढ़ा सकते हैं पर आप सोचते ही नहीं। सोचने का ठेका तो आजकल मैंने ले रखा है। वो क्या है न कि मेरे पास आजकल कोई काम तो है नहीं... तो कहीं सल्तनत मुझे कोढ़िया कलंदर न घोषित कर दे इसलिए आजकल मैं घोषित तौर पर चिंतन मनन में लगा हुआ हूँ। आजकल मैं सल्तनत की प्राचीन परंपरा में कुछ ऐसी चीजों के बारे में कुछ ऐसी महान खोजें कर रहा हूँ जो दुनिया में हमारी सल्तनत की बादशाहत का सबब बनेंगी। इस सिलसिले में सल्तनत के ऐयारों ने चिंतन और खोज के जो कुछ रास्ते दिखाए वे चमत्कारिक रूप से आश्चर्यजनक हैं। और हमारी सल्तनत के देशी विदेशी दुश्मनों के होश उड़ा देने के लिए काफी हैं। जैसे अब इसी खोज को ले लो कि जब तक दुनिया भर के लोग कायदे से बंदर भी नहीं बन पाए थे उस समय में हमारे यहाँ के महान मानवों की तो खैर आप बात ही छोड़िए... बंदर तक हवाई जहाज उड़ाते थे। और बहुत ही खुशी की बात है अब हमारी इनवर्सिटियाँ भी इस बात को मानने लगी हैं। यकीन न हो रहा हो महाराज तो किसी देशी यूनिवर्सिटी में जाकर देख आइए। पश्चिम के कुछ मूर्ख अज्ञानी किसी राइट बंधु का नाम लेते हैं जिसने पहले पहल उड़ने का ख्वाब देखा था... और वे कितना राँग हैं इस बात का पता उन बेवकूफों को तब चलेगा जब वह हमारी महान राजधानियों में आएँगे और हमारी इनवर्सिटियों के केंद्रीय हालों में अलाने ग्रह की खोज में फलाने श्रषि का योगदान विषय पर सेमिनार हो रहा होगा और तब वे मूर्ख वहाँ पर विमान शास्त्र के प्रणेता के रूप में ढेकाने श्रषि की तस्वीरें देखेंगे। तब उन मूर्खों के दिमाग की हवा शंट हो जाएगी और उनके दिमाग में भरे गोबर का कंडा बन जाएगा... अब तस्वीरों को ही ले लीजिए... जिस युग में उन कमजर्फों की धरती पर डायनासोर लोटते थे उस समय तक हमारे यहाँ फोटोग्राफी का आविष्कार हो चुका था पर हम क्या करें जो डायनासोरों को तस्वीरें खिचाने का कोई शौक ही नहीं था। वे कभी तस्वीरें खिंचाने हमारे पास आए ही नहीं... नहीं तो वे फिसड्डी जो आज उनकी हड्डिया और गोबर ढूँढ़कर धन्य हुए जा रहे हैं... उन बेचारों को हम डायनासोरों की असली तस्वीरें भेंट कर पाते।

तस्वीरें हमारा बहुत ही खास आविष्कार हैं... इसे हमारे प्राचीन काल के तस्वीरानिकों ने संभव बनाया था। इसीलिए पूरी दुनिया में ज्यादा से ज्यादा मूर्तियाँ भर मिलती हैं पर हमारे यहाँ मूर्तियाँ तो खैर हैं ही (दुनिया में ऐसा भला क्या है जो यहाँ नहीं है... सब यहीं से तो गया है) तस्वीर खींचनेवाले यंत्र की खोज भी हमारे यहाँ के प्राचीन तस्वीरानिकों ने बहुत पहले ही कर ली थी। मूर्तिकला के कम से कम एक कल्प दो मन्वंतर पहले। मतलब कि कम से कम एक करोड़ साल पहले। तब हमारा चंद्रलोक वगैरह से व्यापार चलता था और क्षीरसागर से पूरे ब्रह्मांड को दूध सप्लाई किया जाता था। ...न न भाई साहब... तब तक सिर्फ हमारा ही देश था... बाकी देशों में तो अमीबा और पैरामीशियम लोटते थे।

मैं जानता हूँ कि आप को लग रहा होगा कि मैं कुछ ज्यादा ही दूर की हाँक रहा हूँ और अतीतपूजक हो रहा हूँ... पर साहब दुनिया में ही नहीं अखिल ब्रह्मांड में ऐसा अतीत हो भी तो किसी के पास... हि...हि...ही...ही... करना पड़ता है सरकार। सब करता हूँ। आजकल सल्तनत के कारिंदे मुझसे बहुत खुश हैं... अब मेरे भाई के लिए भी मुझे परेशान नहीं किया जाता। बंद कमरे में मुझे थोड़ा बहुत हँस लेने की भी छूट मिल गई है और अगर रोशनदान भी बंद कर लूँ तो रो भी सकता हूँ। ये अलग बात है कि मैं रोता नहीं। अरे न जाने कब के और कितने आँसू इकट्ठा हैं... खिड़की, दरवाजे, रोशनदान सब बंद करके रोने लगूँ और कमरे में बाढ़ आ जाय तो... आप तो जानते ही हैं कि मैं कितना डरपोक हूँ... और फिर मुझे सल्तनत की भी तो फिक्र है। बाढ़ आने के बाद दरवाजे खिड़कियाँ टूट भी तो सकते हैं... बाढ़ की पहुँच सल्तनत तक भी तो जा सकती है! क्या हुआ...! अरे सल्तनत को मेरी फिक्र नहीं है तो क्या हुआ... मुझे तो सल्तनत की फिक्र है।

फिक्र तो मुझे अपने भाई और उसके परिवार की भी है। मैंने बरसों से उनमें से किसी का चेहरा भी नहीं देखा है। उनमें से किसी से मेरा मिलना भी हो तो पता नहीं मैं उन्हें पहचान भी पाऊँ या नहीं। दरअसल मुझे तो यह भी पता नहीं कि मैं उन्हें पहचानना भी चाहता हूँ कि नहीं। मैं तो शायद उनके बारे में सोचना भी नहीं चाहता। एक बार मेरा भाई मेरे सपने में आया था, मैं उसके हाल पर दुखी होना चाहता था... चार आँसू बहाना चाहता था कि उसने मुझे डाँट दिया और बोला कि मैं अपनी फिकर करूँ। उसने मुझे अपने साथ चलने के लिए ललकारा पर मुझे उसके साथ जाने की बजाय उसके हाल पर रोना ज्यादा सुखद लगा। मैं इतना रोया कि आँसुओं में डूबने डूबने को हो आया... वो दिन है और आज का दिन, फिर मैं सोया ही नहीं। मुझे पता है कि मेरा भाई मेरी नींद के बाहर मेरा इंतजार कर रहा है। मैं उसकी पकड़ में आने से डरता हूँ इसीलिए सोने से भी डरता हूँ।

और न सोना शुरुआती दौर में भले ही कठिन लगता हो पर इतना कठिन है नहीं। शुरुआती कुछ दिनों तक दिक्कत होती है जब लगता है कि किसी ने आँखों में ढेर सारी मिर्च झोंक दी हो... आँखे सूज आती हैं और खून की तरल लाल हो जाती हैं... पर जल्दी ही आँखें इस जलन को सहने लायक हो जाती हैं... फिर जलन धीरे धीरे गायब हो जाती है और इसी तरह से एक दिन आँखों की ललाई भी गायब हो जाती है। ये सब पूरी... एक पूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। आप तो जानते ही हैं कि इस दुनिया में सब कुछ एक प्रक्रिया के तहत ही चल रहा है। प्रक्रिया तोड़ने का मतलब है विद्रोह करना... और आप तो जानते ही हैं कि मैं बहुत डरपोक हूँ... विद्रोह तो कर ही नहीं सकता।

पर मेरी मुश्किल दूसरी ही है... जान ही ले लेनेवाली। इधर मेरे ऊपर एक साथ दो बलाओं ने धावा बोल दिया है। मेरे भाई ने इधर जागती आँखों में पहुँच जाने का रास्ता भी खोज निकाला है। वह कहता है कि मैं भले ही उसे अकेला छोड़ दूँ पर वह मुझे अकेला नहीं छोड़ सकता। और इसी के साथ साथ मेरा सोने का मन करने लगा है। जागते जागते आँखें कुछ इस तरह से जलने लगती हैं जैसे कि दुनिया कि सारी मिर्चें मेरी ही आँखों में झोंक दी गई हों... मैं सोने के लिए पगलाया घूमता रहता हूँ पर नींद नहीं आती तो नहीं आती। इससे भी भयानक तमाम बातें हो रही हैं मेरे साथ आजकल। जैसे कई बार मैं अकारण ही रोने लगता हूँ। हालाँकि इससे आँखों की भयानक जलन थोड़ी देर के लिए शांत हो जाती है पर मैं सल्तनत की निगाहों में संदिग्ध हो गया हूँ। जैसे इतना कुछ कम था कि आजकल मेरा हँसना भी बढ़ गया है। अरे वो मुँह चियारनेवाली हँसी नहीं... एकदम असलीवाली हँसी... और एक बार हँसी आई तो बहुत देर तक उसे रोक पाना मेरे लिए असंभव हो जाता है। कितने बड़े धोखे में था मैं अब तक... मैं सोचता था कि मैंने अपनी सारी भावनाओं को हमेशा के लिए दफन कर दिया है और इसलिए अब मुझे कोई खतरा नहीं है।  





हुजूऊऊऊजू...जू...जूर... अरे हुजूर... अरे आप... मुझे फाँसी ही दे दी जाय हुजूर कि मैं इतनी देर से आपको पहचान नहीं पाया। कम से कम एक दो लात ही मारिए हुजूर... नहीं तो मेरी गिल्टी फीलिंग बढ़ती ही जाएगी। हुजूर मैं तो धन्य हुआ आज आपके दर्शन पाके। हुजूर जरा अपना पाँव मेरी तरफ उठाएँ तो मैं आपकी चरणरज ले लूँ। बहुत दिनों से आपके दर्शन करना चाह रहा था और आज आप मिले भी तो पहचान नहीं पाया। नहीं हुजूर इतनी जल्दी मत जाइए छोड़कर... दो बातें हुजूर को हुजूर जान कर कह लूँ तो बड़ा सुख मिले।

हाँ तो हुजूर मैं कह रहा था कि मुझे तो सल्तनत की हमेशा ही फिक्र लगी रहती है। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से सल्तनत पर कोई आँच आए। पर मेरे चाहने से हुआ है क्या कुछ आज तक! बल्कि होता ही वही है जो कि मैं चाहता हूँ कि न हो - तो हुजूर आपके सामने सच कैसे बोलूँ... पर झूठ कहूँ तो मुझे तो लगता है कि सल्तनत की तो अल्तनत फल्तनत होके रहेगी। थोड़ी ही सही पर उसकी एंटी पेंटी की पू तो रोज ही होती रहती है। और हुजूर यहीं पर एक झूठ और बोलता चलूँ तो - मुझे तो लगता है कि आप सल्तनत के लोग मुझसे भी ज्यादा डरे हुए हो। मैं बहुत ही डरपोक सही पर अकेले निकल तो आता हूँ पर आपके सारे सामूहिक बलात्कारों और नरसंहारों के बाद भी आपकी तो हुजूर अकेले निकलने में पेशाब ही निकल जाती है। और कई बार तो आप सैकड़ों वर्दीधारी गुलामों से घिरे होने के बावजूद डर के मारे मूतने लगते हैं।

देखिए... बुरा मत मानिए हुजूर। आप तो हमारे हँसने से डर जाते हैं रोने से डर जाते हैं। अकेले होने से डर जाते हैं और एक होने से तो खैर आपको जाड़े की बारिश में पेड़ पर बैठे किस्से वाले बंदर की तरह कँपकँपी छूटने लगती है। बंदापरवर आप तो मेरे साँस लेने से निकली हुई हवा से भी डर जाते हैं। फिर भी ये तो आपकी उदारता ही है जो आप हमें अभी तक साँस लेने दे रहे हैं। इसके बावजूद कि हम एहसानफरामोश लोग अभी भी पर्यावरण को गंदा ही किए जा रहे हैं - टनों कार्बन डाइ ऑक्साइड निकाल कर।

हुजूर जान बख्शिएगा पर एक छोटा सा सवाल ऐसे ही मन में आ गया है बाकी आप तो जानते ही हैं कि सवाल उठाना हमें कितना बड़ा बवाल लगता है। तो हुजूर अगर आपकी शान में गुस्ताखी न हो रही हो तो पूछूँ - साँस लेने के बाद आप सरकार लोग तो कार्बन डाइ ऑक्साइड नहीं ही छोड़ते होंगे न? आपकी नाक से तो शुद्ध प्राणवर्धक महकती हुई ऑक्सीजन ही निकलती होगी? और इस पर तो मैं अरबों खरबों की शर्त लगाने के लिए तैयार हूँ कि आप की नाक से कभी नाक तो नहीं ही आती होगी - आप सेंट मूतते होंगे और महकौआ साबुन हगते होंगे... नहीं तो भला हुजूर इतने कमअक्ल थोड़े ही होंगे कि अपने लिए पचास पचास लाख एक शौचालय बनवाने भर में खर्च कर दें।

न माईबाप मैं हँस नहीं रहा हूँ। मैं एकदम आप ही की तरह से गंभीर होने की कोशिश कर रहा हूँ पर क्या करूँ हुजूर कितना भी चाहूँ कि आप जैसा गंभीर दिखूँ पर दिख ही नहीं पाता हूँ। साला चेहरा ही ऐसा है... कभी रोता दिखता हूँ, कभी हँसता दिखता हूँ... और तो और कभी कभी गुस्से में भी दिखने लगता हूँ... बस आपकी तरह गंभीर ही नहीं दिख पाता कभी। बहुत कोशिश की कि भले ही माँ मर जाय फिर भी आपकी तरह गंभीर ही बना रहूँ पर साला हमारा हमारे ही चेहरे पर कोई वश नहीं... और आप लोग... अजी इसीलिए तो आप लोग बाप लोग हैं।

पर सरकार कुछ तो गड़बड़ है आपके साथ भी। सरकार बुरा मत मानिएगा और ये जरूर मेरी आँखों की खराबी ही होगी कि मुझे आपके सपाट चेहरे के पीछे से हमेशा डर सा झाँकता दिखाई देता है। बाकी और भाव हँसी ओर खुशी या दुख और शोक जैसी चीजें तो आप कबके भूल गए हैं। भला सुल्तानी चेहरों पर ये सब कुछ शोभा देता है? हुजूर बहुत ही शानदार काम करते हैं जो चश्मा लगाए रहते हैं। उससे डर छुप जाता है आपका। पर सरकार... आजकल तो तरह तरह के आपरेशन हैं। नहीं नहीं हुजूर जो आपरेशन आप जंगलों में चला रखे हैं मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ। या आप जो नदी पहाड़ जंगल आदि का आपरेशन पर आपरेशन किए जा रहे हैं मैं उनकी बात भी नहीं कर रहा हूँ... मैं तो बस कह रहा था कि आजकल तो रोबोट भी आ गए हैं तो हुजूर अगर बुरा न मानें तो अपने चेहरे पर एक रोबोट का चेहरा फिट करवा लीजिए। साला सारा डर ही खत्म। बस लगवाने के पहले जरा अच्छे से जाँच परख करवा लीजिएगा क्योंकि सारा लोहा सोना तो उसी इलाके से आता है जहाँ आपके दुश्मन साले खतरनाक वाहियात लोग बसते हैं। जहाँ हजारों की सुरक्षा में भी जाते हुए हुजूर की गाँड़ फटने लगती है। साले जंगली रहेंगे नंगे और लड़ेंगे हुजूर से। हिम्मत तो देखो हुजूर सालों की।

पर हुजूर आप भी न...! आप आखिर इतना डरते ही क्यों हैं उनसे? आपके पास तो लाखों की संख्या में सैनिक हैं - आपकी पलकों के इशारे पर अपनी माँ बहन तक को रौंद डालने वाले करोड़ों गुलाम हैं। आपकी सुरक्षा के लिए किले और बंकर हैं, तोप और मिसाइलें है। दुनिया को जब तक मन करे तब तक बार बार तहस नहस करने वाले बम है। कभी जरूरत पड़ ही जाने पर भागकर दुनिया के किसी भी कोने में छुप जाने के लिए उड़नतश्तरियाँ हैं। समय के सारे बड़े बड़े चरक और च्यवन आपके साथ हैं। भगवान इंद्र का वज्र आपके साथ हैं। उनकी उत्तेजक अप्सराएँ आपके साथ हैं... शंकर का त्रिशूल तो खैर आप ही की कृपा से विधर्मियों के नाश के लिए जब तब बँटता ही रहता है... तो हुजूर आपको तो बम बम रहना चाहिए...

तब भी पता नहीं ऐसी कौन ही बात है कि आप नंगों... भूखों और बिखमंगों तक से डर जाते हैं। हुजूर कुछ तो शरम कीजिए। आपके इस डर पर मुझे बहुत हँसी आती है। अब तक मैंने अपनी हँसी सिर्फ हुजूर के खयाल से रोक रखी है कि मैं हँसूँगा और हुजूर बिना मतलब के डर जाएँगे... पर सरकार बुरा मत मानिएगा अगर अब मैं हँस ही पड़ूँ - आपके पास तो इस नाचीज सी हँसी के शोर को दबाने के लिए भी तरह तरह के बम हैं। एक बम दगा दीजिएगा... मेरी हँसी की आवाज दब ही जाएगी। आखिर आपके बम वम कब काम आएँगे।

तो हँस ही लेता हूँ एक बार। हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा...हा... हुजूर डर रहे हैं... हुजूर डर रहे हैं... डर के मारे मर रहे हैं... हुजूर मरो मत मैं हँसना बंद कर रहा हूँ... हुजूर हँसी बंद नहीं हो रही है... हुजूर और लोग भी हँस रहे हैं... हँसी संक्रामक हो रही है... हुजूर ये बहुत दिन की रुकी हुई हँसी है... अब थम ही नहीं रही है। हुजूर सदियों की हँसी है ये... हुजूर करोड़ों की हँसी है... हुजूर माईबाप भागो सरकार... अरे भागो सुल्तान... अरे भाग बे सुल्तान... बहुत हँसी आ रही है... सदियों की हँसी आ रही है... करोड़ों की हँसी आ रही है... करोड़ों को हँसी आ रही है... हँसी की बाढ़ ही आ रही है सरकार... बचो...

सरकार बहुत मजा आ रिया है हमको हँसने में। मन कर रहा है इतना हँसूँ इतना हँसूँ कि हँसते हँसते पागल हो जाऊँ... या सरकार को ही पागल कर दूँ... हुजूर माईबाप भाग ही लो अब... अभी तो हँसी के पीछे और भी जाने कितनी चीजें आ रही हैं। आपके उपग्रह और राडार बेकार ही हैं क्या हुजूर जो उन्हें करोड़ों की पागल हँसी की आवाज ही नहीं आ रही है... याकि इस हँसी के शोर से उनके कान के पर्दे फट गए है... तब तो आप गए ही सरकार... अब टिपुरे की तब... अरे अभी तो पीछे पीछे अचरज आ रहा है... दुख आ रहा है... सदियों की भूख आ रही है... करोड़ों की प्यास आ रही है... डर और मर सरकार ... देख न बे हँसते गाते... आश्चर्य करते शोक मनाते लोग आ रहे हैं। चश्मा उतार कर देखो सरकार करोड़ों का गुस्सा आ रहा है... करोड़ों शरीरों की पूरी ताकत आ रही है... देख सुल्तान देख... देख... देख बे देख... मेरे लोग आ रहे हैं... मेरा भाई आ रहा है... मेरी बहनें आ रही हैं... हाँ हाँ वही...



मनोज कुमार पांडेय

मनोज कुमार पांडेय

7 अक्टूबर 1977 को इलाहाबाद के एक गाँव सिसवाँ में जन्म। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में परास्नातक।

कहानियों की दो किताबें ‘शहतूत’ और ‘पानी’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। तीसरी किताब ‘खजाना’ जनवरी -17 में प्रकाश्य। कई किताबों का संपादन। देश की अनेक नाट्य संस्थाओं द्वारा कई कहानियों का मंचन। कई कहानियों पर फिल्में भी। अनेक कहानियों का उर्दू, पंजाबी, गुजराती आदि भाषाओं में अनुवाद। कई विश्वविद्यालयों में कहानियों पर शोध। दैनिक अखबार ‘जनसंदेश टाइम्स’ में साल भर नियमित रूप से साप्ताहिक स्तंभ लेखन।  कहानी के साथ साथ आलोचना, कविता, संस्मरण आदि कई अन्य विधाओं में भी रचनात्मक रूप से सक्रिय।

कहानियों के लिए प्रबोध मजुमदार स्मृति सम्मान (2006), विजय वर्मा स्मृति सम्मान (2010), मीरा स्मृति पुरस्कार (2011), भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार (2015), स्पंदन कृति सम्मान (2015)।

फोन : 08275409685
ई-मेल : chanduksaath@gmail.com


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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