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भक्तिकाव्य की पेचीदगियां — रवीन्द्र त्रिपाठी #समीक्षा

मई 11, 2017

भक्ति काव्य में कई आवाजें हैं और इनको सुनना आलोचक का काम है 

पांच भक्त कवि —  मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

पांच भक्त कवि —  मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

समीक्षा — रवीन्द्र त्रिपाठी


भक्तिकाव्य की पेचीदगियां

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह हिंदी के उन आलोचकों में से हैं जिन्होंने मध्यकालीन भक्ति कविता से लेकर आधुनिक साहित्य का गहन अध्ययन किया है। हालांकि उनके सक्रिय जीवन के बीस वर्ष शिक्षक आंदोलन से संबधित रहे और देश तथा दिल्ली के विश्वविद्यालयी शिक्षक ट्रेड यूनियन को उन्होंने अपने वक्त में बेहद प्रभावशाली बनाया। और इसी कारण वे बीस बरस ऐसे भी रहे जिसमें आधुनिक हिंदी आलोचना को नुकसान भी हुआ। ये मूल्य निर्णय देना कठिन है कि कौन-सा काम ज्यादा जरूरी था — शिक्षक आंदोलन या हिंदी आलोचना? पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर वे बीस बरस उन्होंने आलोचना को पूरी तरह दिए होते तो वह और अधिक समृद्ध होती।
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह
उनकी नई किताब `पांच भक्त कवि’ (प्रकाशक — भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीच्यूशनल एरिया, लोदी रोड नई दिल्ली-3, मूल्य — 350 रुपए) कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और मीरा की काव्य मीमांसा है। पुस्तक की तीन महत्त्वपूर्ण विशेषताएं हैं—



  1. एक तो इसमें  पांचों भक्त-कवियों की पर लिखी गई  अन्य पूर्ववर्ती   आलोचनाओं का संक्षिप्त वृंतात है जिससे पाठक को ये पता चल जाता है इस कवि पर हिंदी के किस वरिष्ठ आलोचक ने क्या और कौन सी अहम स्थापनाएं की हैं। इस लिहाज से जो पाठक पांचों भक्ति कवियों को पहली बार जानने का प्रयास कर रहे हैं उनके लिए ये पुस्तक एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका है। ऐसे पाठकों में छात्र भी हो सकते हैं और मध्यकालीन कविता के प्रेमी भी।  

  2. पुस्तक की दूसरी विशेषता है कि ये बेहद सहज और संप्रेषणीय भाषा में लिखी गई है और कई सैद्धांतिक प्रत्ययों को भी सरलता से पेश करती है। 

  3. और  तीसरी विशेषता ये है कि इसमें कुछ नई और मौलिक स्थापनाएं भी हैं जो इन कवियों के अध्ययन की नई दिशाओं की तरफ भी ले जाती है। 

भक्तिकालीन हिंदी कविता को नई निगाह से देखने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी


बड़े कवि का कोई मूल्याकंन कभी खत्म नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। अच्छी कविता के अर्थ और आशय धीरे धीरे खुलते हैं।
वैसे भी  अच्छे कवियों या साहित्यकारों के बारे में कोई व्याख्या आखिरी  नहीं होती है। इसलिए रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और राम विलास शर्मा जैसे दिग्गजों या अन्य महत्त्वपूर्ण  आलोचकों के विश्लेषण के बावजूद भक्तिकालीन हिंदी कविता को नई निगाह से देखने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। वक्त के साथ साहित्य और समाज के बारे में नवीन दृष्टिकोण आते रहते हैं और अध्ययन, मनन और मूल्यांकन को प्रभावित करते रहते हैं। मिसाल के लिए जब कबीर पर गंभीर आलोचना-कर्म शुरू हुआ तो उस समय दलित विमर्श नहीं उभरा था। अब जब दलित विमर्श समकालीन बौद्धिक प्रक्रिया का एक अनिवार्य पहलू बन चुका है तो कबीर पर नई अंतर्दृष्टियां विकसित हो रही है। इसलिए किसी बड़े कवि का कोई मूल्याकंन कभी खत्म नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। अच्छी कविता के अर्थ और आशय धीरे धीरे खुलते हैं। शताब्दियों या सहस्राब्दियों तक ये सिलसिला चलता रहता है। महाभारत और रामायण के प्रसंग में ये बात तो आम आदमी भी महसूस करता है।

कबीर की कौन-सी रचना प्रामाणिक और कौन प्रक्षिप्त – इस पर भी विद्वानों में कई राय हैं। होनी भी चाहिए और अकादमिक आलोचना का कर्तव्य बनता है कि वह प्राणामिक रचना  या रचनाओं को सामने लाए। 

कबीर पर चर्चा के क्रम में मुरली बाबू ने देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक `दर्शनशास्त्र के स्रोत’ का एक प्रसंग उद्धृत किया है जो `मैत्री’ या  `मैत्रायणी उपनिषद’ का अंश है। अनुवाद  सुशीला डोभाल का है और उक्त उपनिषद का ये अंश इस तरह का है —

`कुछ लोग ऐसे हैं जो निरंतर मौजमस्ती करते हैं, निरंतर प्रवास करते हैं, निरंतर दान मांगते रहते हैं, निरंतर हस्तशिल्प पर निर्वाह करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे लोग भी  हैं जो नगरों में भिखारी हैं, जो अपात्रों के लिए बलिकर्म करते हैं, जो शूद्रों के शिष्य हैं और जो शूद्र होते हुए भी अपने विशेष प्रकार के शास्त्रों के ज्ञाता है। और इतना ही नहीं, ऐसे लोग भी हैं जो धूर्त हैं, जो अपने बालों का जूड़ा बनाते हैं, नर्तक हैं, भाड़े के टट्टू हैं, धार्मिक भिक्षु हैं, अभिनेता हैं, राजसेवा से निष्कासित हैं, इत्यादि। और इतना ही नहीं, ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि धन के बदले हम यक्षों, राक्षसों, भूतों, भूतदलों, प्रेतों, सर्पों और पिशाचों आदि के दुष्प्रभावों को दूर करते हैं। औऱ कुछ अन्य भी हैं जो मिथ्या रूप से लाल वस्त्र, कुंडल एवं कपाल धारण करते हैं। और इतना ही नहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें वेदों में आस्था रखनेवालों को पीड़ित करने में बड़ा आनंद मिलता है। वे छलपूर्ण तर्कों, मिथ्या और कुतर्कपूर्ण उदाहरणों द्वारा आस्थावानों के भ्रमित करना चाहते हैं। ऐसे लोगों की संगति नहीं करनी चाहिए। सच्ची बात ये है कि ऐसे प्राणी स्पष्ट रूप से दस्यु हैं, स्वर्ग के अयोग्य हैं। क्योकि कहा गया है कि आत्मा का नकार करनेवाले सिद्धांत के मायाजाल के कारण, मिथ्या तुलनाओं एवं प्रमाणों  के कारण विचलित हुआ संसार यह नहीं देखता कि ज्ञान और अज्ञान में क्या भेद है?’

मैं मैत्री या मैत्रायनी उपवनिषद के बारे में ज्यादा नहीं जानता है। लेकिन मुरली बाबू ने जिस उद्धरण को उद्धृत किया है उसे विश्लेषित किया जाना चाहिए। पता नहीं इस उपनिषद का रचनाकाल क्या है? पर जब का भी लिखा हुआ हो कुछ चीजें साफ प्रकट होती हैं


  1. इसके रचनाकार के मन में नर्तकों और अभिनताओं के लिए विशेष सम्मान नहीं है। कलाकारों के लिए भी नहीं।

  2. इसके रचनाकाल में शूद्र खास तरह के शास्त्र रच रहे थे और उन शास्त्रों के प्रति आस्था रखने वाले भी समाज में मौजूद थे। वे शास्त्र कौन थे? इनका अनुसंधान किया जाना चाहिए।

  3. उपनिषद वेदों के बाद की रचनाएं हैं इसलिए वे वेदांत कहे जाते हैं। स्वाभाविक हैं कि वे वेद सम्मत समाज बनाने की वकालत करें। लेकिन जो मुख्य उपनिषदों में सामाजिक टिप्पणियां नहीं के बराबर हैं। पर मैत्री या मैत्रायणी जैसे उपनिषद कब लिए गए, इसमें दूसरे धर्मों और कलाकारों के प्रति जो नजरिया विकसित हुआ उनपर भी चर्चा होनी चाहिए। 

अब मांडूक्य, केन या कठ जैसे उपनिषदों के अलावा हमारा ध्यान अन्य उपनिषदों की तरफ भी जाना चाहिए तभी हम वेद प्रधान समाज के उत्तर काल को बेहतर  ढंग से समझ सकते हैं और जान सकते हैं कि तत्कालीन समाज में किस तरह की बहसें थीं। हालांकि वेद विरोधी धार्मिक आंदोलनों की संख्या कम से कम पचास थी।  उनके में से कितने के शेष या अवशेष अभी मौजूद हैं? इन आंदोलनों का परिपाक कैसे हुआ?

नाथपंथ और कबीर का रिश्ता क्या था — इस पर कई तरह के विचार हैं और कबीर साहित्य के विद्वानों में इसे लेकर  मतभेद है। इस पुस्तक से इस  बारे में विचार वैभिन्य का परिचय भी मिलता है। पर इस बारे में भी कोई स्थायी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मुरली बाबू ने खुद कुमार गंधर्व के कबीर गायन के बारे में वसंत पोतदार की इन पंक्तियों को उद्धृत किया है — `नाथपंथियों की निर्गुण शैली बिल्कुल अलग है। घने जंगलों में धूनी जलाकार वे रम जाते थे। समाज से उनका खास संबंध नहीं होता था। उनका जीवन, उनकी दुनिया ही निराली। वह उनकी गायकी से दृश्यमान होती है — इसका कुमार जी को बोध हुआ। जीवन भर के उनके असीम विश्वास में से उनके स्वर उत्पन्न होते हैं — यह कुमार जी ने ताड़ लिया और उन स्वरों पर उन्होंने प्रभुत्व कायम किया। सिर्फ निर्गुण स्वर ही नहीं निर्गुण जीवन के दिगंबरत्व, औदासीन्य और फक्कड़पन से तादात्म्य पाने में  वे सफल हो गए।‘

क्या नाथपंथ और कबीर के रिश्ते पर नए परिप्रेक्ष्य में बात नहीं होनी चाहिए? कबीर नाथपंथी थे या नहीं, थे तो कितने प्रतिशत थे — ये सब अकादमिक सवाल बन जाते हैं। अगर कुमार गंधर्व और नाथपंथी योगियों के संगीत  की तरफ हमारा ध्यान जाता है तो क्या इस पक्ष की भी अनदेखी की सकती है कि परवर्ती नाथपंथियों ने भी कबीर को अपने तरीके से सिरजा। क्या जो नाथपंथी घने जंगलों में कबीर गाते थे उनके स्वरों के माध्यम से भी उनके अपने कबीर की रचना नहीं हो रही थी?

हिंदी की अकादमिक आलोचना ने कबीर-साहित्य का गहन अध्ययन किया है इसमें संदेह नहीं। विदेशी अध्येताओं ने भी कबीर और उनकी वाणी का विद्वतापूर्ण अध्ययन  किया है इसमें भी दो राय नहीं। पर इस पक्ष की ओर हमारा, यानी आलोचक समाज का, ध्यान जाना चाहिए कि कबीर को सिर्फ अकादमिक संदर्भ में नहीं समझा जा सकता है। कई कबीर हैं और सबके के सब अपने ढंग से प्रामाणिक (या अप्रामाणिक) हैं। कबीरपंथियों  और नाथपंथियों के भी अपने अपने कबीर हैं। कबीर को ईश्वर मानने वाले भी हैं।  कबीर की कौन-सी रचना प्रामाणिक और कौन प्रक्षिप्त – इस पर भी विद्वानों में कई राय हैं। होनी भी चाहिए और अकादमिक आलोचना का कर्तव्य बनता है कि वह प्राणामिक रचना  या रचनाओं को सामने लाए। आखिर अध्ययन-अध्यापन  की भी एक संरचना होती है। हालांकि इसी का प्रतिपक्ष ये भी है कि कबीर रचित कई पद लोकरचित भी हैं (ये बात कुछ हद तक अन्य भक्त कवियों  के बारे में सही है, विशेषकर मीरा के बारे में।) इसलिए प्रामाणिक कबीर भी एक मिथक है (प्रामाणिक मीरा भी)।  आज भी हम कबीर का अद्ययन करते हुए अपने अपने कबीर की निर्मिति करते हैं। चाहे अकादमिक विद्वान हों या कबीर-भक्त-सब कबीर की अपनी मूर्ति बनाते हैं। ये कोई उलटबांसी या अंतरविरोधी वक्तव्य नहीं है। लोकरचित और व्यक्तिरचित – इन दोनों के मेल में कई गुत्थियां होती हैं जिनको समझना और समझाना एक अनंत प्रक्रिया में चले जाना है। एक गुत्थी को सुलझाइए तो दूसरी सामने आती है और दूसरी तो सुलझाइए तो तीसरी और ये सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। और इसका आनंद भी है।

भक्ति आंदोलन के अध्येताओं में पुरुषों की प्रधानता रही है। विशेषकर भारतीय अध्येताओं में। ये  अपने में कोई आरोप नही हैं। पर ये भी गौर करने की बात है कि अगर मीरा का अध्ययन महिला अध्येता करें तो क्या नई अंतर्दृष्टियां विकसित होंगी? हिंदी में मीरा साहित्य की कोई गंभीर महिला अध्येता है इसकी मुझे जानकारी नहीं। मीरा साहित्य के हिंदी में जो अध्येया हैं वे मुख्यत: पुरुष हैं। अंग्रेजी में कुमकुम सांगरी ने अवश्य मीरा का एक ऐसा अध्ययन किया है जिसके बारे में काफी लोग जानते हैं। वैसे पूछा जा सकता है कि क्या मीरा-साहित्य के पुरुष अध्येताओं ने उनके प्रति सम्मान नही दिखाया और क्या इन पुरुष आलोचकों का विश्लेषण मीरा के साथ न्याय नहीं करता। अवश्य करता है और पुरुष अध्येताओं ने मीरा के प्रति पर्याप्त सम्मान भी दिखाया है। अन्य आलोचकों के अलावा माधव हाड़ा की किताब `पंचरंग चोला पहर सखी री’ तो इसका नवीनतम प्रमाण है। लेकिन हमारा ध्यान इस तरफ भी जाना चाहिए कि पूरी दुनिया में जेंडर-डिस्कोर्स यानी लैंगिक विमर्श भी बढ़ रहा है महिला दृष्टिकोण को जानना या उसकी मांग करना   आलोचना पद्धति के लोकतांत्रिक विस्तार की आकांक्षा से भी जुडा  है। कई देशों की तरह भारत में मध्यकाल कई  समूहों (जातियों) और स्त्रियों के आत्म (अग्रेजी का `सेल्फ’) के दमन का कालखंड रहा है। मीरा के भक्तिकाव्य में स्त्रियों के  वैयक्तिक आत्मदमन और व्यवस्था द्वारा नियोजित `आत्म-दमन’ के विरुद्ध आवाज है। मीरा के आत्म को दबाने की कोशिश उनके परिवार द्वारा भी हुई और उस सामाजिक व्यवस्था द्वारा भी जो इस समय प्रचलित थी। इसलिए मीरा का काव्य वैयक्तिक और सामूहिक— दोनों ही तरह के आत्मदमन, का प्रतिकार भी है। मीरा जब कहती हैं—

माई सांवरे रंग राची/ साज सिंगार बांध पग घुंघरू, लोकलाज तज नाची/ गयां कुमत लयां साधां संगत स्याम प्रीत सग सांची। ‘ तो उसमें आत्म के विनाश का वैयक्तिक और सामूहिक निषेध भी है।  ये समझने की बात है कि कबीर, तुलसी, जायसी, सूर जैसे भक्त कवियों की तरह मीरा इस संसार को मिथ्या और माया नहीं मानतीं। मनोविज्ञान से प्राप्त अंतरदृष्टियां भी मीरा काव्य को और गहरे में समझने में हमारी मदद कर सकती हैं।

जाहिर है भक्ति काव्य में कई आवाजें हैं और इनको सुनना आलोचक का काम है। पर ये इतना आसान नहीं है क्योंकि ये आवाजों का ये समुच्चय जटिल विधान में बुना हुआ है। इसलिए भक्तिकाव्य के विश्लेषण की चुनौतियां बनी रही हैं।

वक्त और स्थान की कमी की वजह यहां तुलसी, जायसी औऱ सूरदास कुछ भी बात नहीं हो सकी। बेहतर होगा कि पाठक इस पुस्तक को पढ़ें और अपनी निजी राय बनाएं। आखिर में इतना जरूर जोड़ना चाहूंगा कि भक्ति काव्य को समझने की एक दृष्टि `लोक बनाम शास्त्र’ के द्वंद्व वाली भी रही है। पर ये दृष्टि अपर्याप्त इसलिए हैं कि शास्त्र संबंधी जो परिभाषा हमारे अकादमिक विद्वानों मे है वह भी समस्या मूलक है। क्या शास्त्र वही है जो संस्कृत में लिखा गया है? काल, संवेदना की गहराई और जन भावना ने भक्तिकालीन कवियों की रचनाओं को भी शास्त्र बना दिया है। कम से कम `रामचरित मानस’ और `पद्मावत’— दोनों काव्यग्रंथ के अलावा शास्त्र भी हैं। अकादमिक विदवानों को शास्त्र संबंधी अपनी धारणा भी बदल लेनी चाहिए। खासकर मध्यकालीन कविता को समझने के लिए।



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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