प्रेमा झा की कविता : प्रद्युम्न की माँ | #Pradyuman #Poem


प्रेमा झा की कविता : प्रद्युम्न की माँ

गुड़गाँव के एक स्कूल में सात साल के प्रद्युम्न की हत्या बड़ी बेरहमी से बाथरूम में कर दी गई...


प्रेमा झा की 'प्रद्युम्न की माँ' को पढ़ते समय, पहले मैं पाठक हुआ, फिर एक बार संपादक भी हुआ, फिर दोनों में गड्डमड्ड की स्थित आयी और उससे निकल कर, मैं कविता को माँ बनकर पढ़ने लगा. उसके बाद यह कविता कई दफ़ा माँ बनकर ही पढ़ी...पुरुष होने का खामियाजा, कविता में माँ की पीड़ा पढ़ते, देखते, समझते हुए भी महसूस नहीं पाया, बारबार. और अब पता है नहीं महसूस पाने के बावजूद दोबारा माँ बन ही पढूंगा, कारण न पूछिए, प्रेमा की प्रद्युम्न की माँ पढ़िए. 
भरत तिवारी

प्रद्युम्न की माँ

 — प्रेमा झा

शब्द नहीं बचा की
उसके दुःख पर कुछ कह सकूँ
छोटे से बच्चे का शव
खून से सना कपड़ा
माँ, सुनो न!
ये क्या है?
मैंने क्या किया था?
टीचर ने मारा है क्या
क्या चॉकलेट चुराई थी?
तुमने कहा था टिफ़िन खाकर आना
तो रात को खीर बना दोगी!

माँ बेटे को स्कूल भेजकर कल के यूनिफॉर्म पर
इस्त्री कर रही है!
फ़ोन बजता है
सात साल के प्रद्युम्न का शरीर खून में डूबा
कपड़े में उसका पार्थिव शरीर अब लिपटा है
‘क्या-क्या??’
छोटे से बच्चे के शर्ट-पैंट
मूंह-नाक सब खून से लथपथ है
किसी ने बड़ी बेरहमी से उसकी
चाकू मारकर हत्या कर दी है।

            मेरा लल्ला आतंकवादी तो नहीं था
            उसने कश्मीर से सेब भी नहीं चुराई थी
            क्या उसने डाका डाला था!
            तुमनें मेरी आँचल का रेप कर डाला
            किसने मारा लल्ला को मेरे??

क्या स्कूल सीरिया में था
कि था इजरायल में
मेरे बच्चे का कसूर क्या था
उसने तुमसे छीना क्या था
रोहिंग्या मुसलमान ही बना देते
हम भाग जाते न अपने बेटे को लेकर
वहाँ ताहिरा बेग़म गर्भस्थ शिशु को
कोख में लिए भाग रही थी
यहाँ मेरे लल्ला का गला रेता जा रहा था
दुनिया शिशुखोर हो गई है
बर्मा से शवों की बू आ रही है
चील-कौवे भी रो रहे हैं!




            ऐ धरती माँ
            सुनो न...सुनती क्यों नहीं!
            तेरा दिल कितना पत्थर हो गया रे!
            तू हिल न
            सुनो, फट जाओ न धरती माँ
            चुप क्यों हो?
            तुम इतना बड़ा कलेजा कैसे रखती हो??
                                 
देखो न, औरत की जात हूँ
आंसूओं का क्या करूँ?
कलेजे की कुहकती आवाज़ मेरे गर्भाशय को चोट मार रही है
माहवारी के खून से डरने लगी हूँ
क्योंकि हत्या, बलात्कार और बेटे प्रद्युम्न की रोती आवाज़ सुनाई देती है
माँ की गोद सूनी हो गई है
मेरा आँचल फट गया रे!
दुनिया सीरिया हुई है
सब देश और सब सीमाओं पर
गली-मोहल्ले, चौराहों पर
स्कूलों में, मैदानों में
सड़क पर, स्टेशन पर
बच्चे की जान को खतरा है!

            सुनो मेरी सरकार, ये कैसा लोकतंत्र है रे!
            ये माँ किस देश की है?
            तुमको आधार कार्ड दिखाऊँ क्या
            मैं भारत की औरत हूँ
            मेरे बच्चे का खून हो गया है
            उसका गुनाह बता दो
            तुम्हारे पांव पड़ती हूँ मातहत
            लेकिन, हो सके तो मरे बच्चे को लौटा दो

चीत्कारें चारो ओर मची थी
तभी पहली माँ ने दूसरी माँ से कहा
मैं आठ माह के गर्भ से हूँ
और नवें महीनें अगर मेरा शिशु इस दुनिया में आ सका तो
उस धरती का मुझे पता नहीं जहाँ वो जिन्दा रह सकेगा
दूसरी ने कहा, “मैं नि:संतान होने की आदि हूँ
क्योंकि मेरा बच्चा जब आठ-नौ साल का होगा
मार दिया जाएगा
तभी तीसरी माँ जोर-जोर से रोने लगती है
और
कहती है,
“माँ सीरिया की नहीं
माँ इजरायल की नहीं
माँ म्यांमार की नहीं
माँ कश्मीरी या मुसलमान नहीं होती
अंग्रेजी या दलित नहीं होती
माँ तो केवल माँ होती है बस!”
माँ रोहित की,
माँ गोलू* की
माँ प्रद्युम्न की
आज दुनिया की सब माँओं से अपील है
कि कह दो इस दुनिया को
दूध की कोई जात नहीं होती
और
खून का एक रंग केवल लाल है
वो तेरा लाल भी था
और
मेरा भी!
क्योंकि हर माँ प्रद्युम्न की माँ है
और
हर बेटा प्रद्युम्न है।

 *गोलू हत्याकांड: वर्ष २००१ के सितम्बर माह में ही बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के आठ साल के गोलू की भी हत्या बड़ी निर्ममता से अपहरणकर्ताओं द्वारा स्कूल जाने के क्रम में कर दी गई थी!



००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — 'पगला गई है भागवती!...'
असल में तो ये एक साहित्यिक विवाह है  - भूमिका द्विवेदी अश्क | Bhumika Dwivedi Ashk - Interview
Harvard, Columbia, Yale, Stanford, Tufts and other US university student & alumni STATEMENT ON POLICE BRUTALITY ON UNIVERSITY CAMPUSES
काले साहब - उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानियाँ | Upendranath Ashk Ki Kahaniyan
तू तौ वहां रह्यौ ऐ, कहानी सुनाय सकै जामिआ की — अशोक चक्रधर | #जामिया
रंगीन होते ख़्वाब — रीता दास राम की कहानी | Reeta Das Ram ki Kahani
होली: सतरंगी उत्सव — ओशो | Happy Holi with #Osho
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
अट नहीं रही है — सूर्यकांत त्रिपाठी निराला Happy Holi
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy