वंदना राग की कहानियाँ: हिजरत के पहले - #Shabdankan
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वंदना राग की कहानियाँ: हिजरत के पहले

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वंदना राग के यहाँ  हिंदी कहानियों को साहित्य मिलता है, साहित्य की अनिवार्य ज़रुरत: वर्तमान देखती, समझती दृष्टि मिलती है। 'हिजरत के पहले' को जब आप स्त्रीलेखन से परे उठकर पढ़ना सीख लेंगे तब-ही समझ पाएंगे। उठो और हिजरत रोको।

जन्मदिन मुबारक वंदना राग!

भरत तिवारी

दादा तू तो दुनिया को बता रहा है कि अब हम आशा करते-करते थक गए हैं और अब हम अपनी किस्मत खुद लिखना चाह रहे हैं। ये गाँव, ये जंगल हमारा है।’’ बोलते-बोलते, लक्ष्मण की आवाज़ में ऐसा जुनून भर आया कि, वहाँ बैठे कुछ गाँव के बूढ़े धीरे-धीरे हिल-हिलकर रोने लगे। इसी बीच सियार भी हुँवा-हुँवा कर चिल्लाने लगे।
वंदना राग की कहानियाँ: हिजरत के पहले


हिजरत के पहले

— वंदना राग


बहुत ज़ोर की बारिश हो रही है।

धरना देने वालों की भीड़ अब तितर-बितर होने लगी है। अचानक ज़ोर से हवा चलती है और जिस तंबू के नीचे सारे धरना देने वाले बैठे हैं, वह अपनी नींव से उखड़ने लगा है।

धरना देने वालों का लीड़र बड़ी मुश्किल से चिल्ला कर कहता है।

चलो, जल्दी से चल दो, पूरे अनुशासन के साथ, बस स्टैंड की ओर।

माईक का कनेक्शन भी कहीं से टूट गया है, ऐसा लगता है, बहुत सारे लोगों को इस निर्देश का पता नहीं चल पाया है इसीलिये लोग अजीब सी अवस्था में इधर-उधर भागते हुए बचने का ठिकाना ढूँढ रहे हैं।

लुदरू ने लेकिन ठीक-ठीक सुन लिया है। वैसे भी यह शहर उसका जाना पहचाना है, जवानी के दिनों में यहीं डी-21, चैहत्तर बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में वह कई साल रहा है। भीड़ में लुदरू, लीडर लक्ष्मण को ढूँढ लेता है, जो उसके बेटे जीवन का गहरा दोस्त भी है और इशारों में भीड़ की बेतरतीबी के बंदोबस्त के बारे में पूछता है, कैसे संभाले इन्हें? लक्ष्मण चिल्ला कर कहता है

आगे-आगे चलो दादा।“ लुदरू ‘हौव’ में सिर हिलाता है।

एंकर ईनू जोशी, अपने कैमरामैन की तरफ इशारा करती है। “हिम...इस बूढ़े दादा को फोकस में लो।

कैमरामैन ने एक खाकी रंग की बरसाती से कैमरे को ढक लिया है और खुद भीग रहा है। बारिश का आलम भी गजब का होता जा रहा है एक क्षण लगता है अब जो सब कुछ भीग कर तरबतर हो चुका है तो सन्नाटा पसर जाएगा। लोग धूप का इंतजार करते बैठेगें और उसके आने पर खिलखिला उठेंगे। दूसरे ही क्षण लेकिन बारिश अपना विध्वंसी शोर फैला कर किसी प्रलय की सूचना देने लगती है और लोग अपनी जान कैसे बचानी है, इसके जहद्दम में लग जाते हैं।

प्राकृतिक आपदा से तो हम लड़ लेंगे लेकिन सत्ता दवारा बनाई आपदा का क्या करेंगे? यही सवाल इनके मन में है, इसीलिए ये लोग गाँवों से उठ कर चले आए हैं, प्रदेश की राजधानी में। सूत्र बता रहे हैं कि इनका इरादा मुख्यमंत्री के बंगले का घेराव था लेकिन अब यह संभव नहीं लगता है इसीलिए ये लोग आज ही लौट जाएंगे।

ईनू जोशी बारिश की निर्मम मारों के बावजूद खासी उत्साहित है और रिर्पोटिंग करती जा रही है। आज बड़े दिनों बाद उसे समाज के हाशिए पर खड़े लोगों पर स्टोरी करनी थी और वह जो स्क्रिप्ट तैयार करके आई थी उसमें से बहुत कुछ एयर हो जाएगा और स्टोरी सीरियस लगेगी यदि कैमरामैन ठीक से कैमरा पैन करे और लाँग शॉटस के बजाए कुछ क्लोज अप्स भी ले ले तो। लुदरू की ढीली चमड़ी झुर्रीदार गाल और भूरी आँखों का क्लोजप आईडियल शॉट है। वह लुदरू को इशारा करती है कि हाथ में पकड़ा झंडा वो दाँए कंधें के ऊपर उठा ले। लुदरू सारी आपाधापी से नर्वस तो जरूर ही हो गया है लेकिन सामने खड़ी तेजस्वी लडकी से प्रभावित भी। टी.वी. पर कवरेज के सारे मतलब समझता है वो लेकिन इस बार कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि टीवी पर दिखलाई पड़ना अच्छा है या बुरा। एक क्षण को वह लक्ष्मण की रज़ामंदी हासिल करने के ख्याल से भीड़ के बीच से फिर लक्ष्मण को ढूँढने की कोशिश करता है, और जब बारिश परदा बन सारी सूचनाओं को ढक देती है, तो ईनू जोशी की ही स्क्रिप्ट जीत जाती है और लुदरू अपना बायाँ हाथ हवा में उछाल देता है और आश्चर्य करता है कि पतली बाँस की खपच्ची में बँधा उसका पतले कपड़े का लाल झंडा कैसे थोड़ा झुका हुआ तो है लेकिन अपने बंधन से आजाद बिलकुल नहीं। यह देख उसके हल्के गुलाबी होठों पर एक पतली मुस्कान का रंग फैल जाता है। ईनू जोशी का साथी कैमरामैन उसे ही कैप्चर कर लेता है और ईनू जोशी खुश होकर देखती है कि हाफ धोतीनुमा टुकड़े के ऊपर सिर्फ एक काली बनियान और गले में गमछे के साथ, एक थका हुआ बूढ़ा आंदोलनकर्ता राजधानी में लगातार कई दिनों से हो रही बारिश के बीच भी हवा में अपना लाल झंड़ा फहराते हुए खुश ऐसे हो रहा हैं मानो यह झंड़ा तो फहराने के लिए ही बना है।

जीवन की माँ बार-बार यही पक्तियाँ उसके मन में दुहरा रही है। वह कैसे भूल गया है, इसके आगे क्या है? इतने साल के शहर के साथ ने, उसके प्रिय गीत की पक्तियाँ चुरा ली हैं। उसका दिल मसोस कर रह जाता है। वह अपनी बहू की ओर देख, जानना चाह रहा है, सब पुराना बिसरा रहे हो तुम नए लोग। सचमुच जो समंदर में बूँद की तरह बदल गया है वह तो शहरी जैसा है। तुम्हारे कपड़े, तुम्हारे रीतिरिवाज और गीत संगीत भी। फिर ये बार-बार जंगल बचाने की बात कैसे कर रहे हो? कौन से अपने आपको बचाना चाहते हो? वह दिनोंदिन और गड़बड़ाता जा रहा है। चीजें साफ नहीं हो रही हैं दिमाग में। अपनी उलझनों के बारे में बात करे तो किससे?

हाऊ एक्साईटिंग, यह इन लोगों के बीच के होप का प्रतीक है। गुड वन यार...“ ईनू जोशी अपने कैमरामैन की पीठ थपथपाती है, और कैमरामैन ईनू की नादानी पर हँस देता है, और सोचता है, अभी नई है इसीलिए इस तरह के ऐंगल की कल्पना कर रही है, कुछ दिनों में समझ जाएगी कि यह बूढ़ा कोई होप-वोप का प्रतीक नहीं, वह तो नासमझी में सब कुछ कर रहा है, या थोड़ी बेवकूफी में, या फिर पैसों का लालच खींच लाया है, इसे यहाँ पर। हर पार्टी देती है ऐसे लोगों को पैसे और ईनू जोशी इतनी भी कच्ची नहीं कि यह पाइंट नहीं समझे। खैर! वह फटाफट अपना कैमरा समेट गाड़ी में बैठता है और ढेर सारा पानी लुदरू पर उछालते हुए गाड़ी फर्राटा भरने लगती है। लुदरू धैर्य से अपने गीले गमछे से अपना मुँह पोंछता है और गाड़ी के पीछे-पीछे छोटे कदमों से दौड़ने लगता है। गाड़ी के पीछे इसलिए क्योकि यही सड़क बस स्टैंड की ओर जाती है, जहाँ से उसे, दूसरे गाँव वालों के साथ बस पकड़ गाँव लौट जाना है। जैसे ही वह दौड़ने लगता है, वह देखता है उसके बाकी सारे साथी एक कतार में उसके पीछे चलने लगते हैं। वह आश्वस्त हो जाता है और लक्ष्मण और जीवन की बातें उसके सामने बार-बार कौंधने लगती हैं। “हम यदि ईमानदार बने रहें, तो दादा, हमें अपना हक ज़रूर मिलेगा।’“ अब एक बार वह फिर मुस्कराता है, सामने जाती ईनू जोशी की गाड़ी के पीछे दौड़ती तमाम गाड़ियों को देख, “और तुम समझते हो कि हम मूर्ख हैं?


गाँव के सब लोग अगले दिन रात को गाँव के सबसे बड़े पेड़ के नीचे इक्टठा होते हैं। वैसे गाँव में बिजली आ चुकी है, लेकिन अभी नहीं है। चिमनी, लालटेन, टार्च और साल, सागौन, महुआ, आम, चिरौंजी के घने पेड़ों के सायों के बीच एक गाँव के सत्तर स्त्री-पुरुष किशोर, बच्चे सायों के भीतर सायों की तरह कभी छिपते, कभी उगते दिखलाई पड़ते हैं। कुछ लोग पड़ोस के कस्बे में गए थे, वे बताने लगते है, सबको जल्दी-जल्दी, हवा में कौन-कौनसी गर्म खबरें हैं। लुदरू भी बैठा है एक कोने में बीड़ी पीता हुआ। बीड़ी की मीठी तीखी गंध, हवा में फैल रही है। चाँदनी रात नहीं होने के बावजूद आधा कटा चाँद, मैं कम नहीं हूँ, ऐसी घोषणा कर रहा है। लुदरू अपनी बीड़ी खत्म कर, उसे फेंक मिट्टी में गाड़ देता है। हालाँकि बारिशों के दिन हैं, फिर भी वह शहर में रहने के दौरान यह सीख चुका है कि एक छोटी-सी चिंगारी कैसे जंगल में आग लगा सकती है। पहले कोई बात नहीं थी, लेकिन अब यही जमा थाती है गाँववालों की। यही कुछ एकड़ में फैले साल, सागौन, महुआ और चिरौंजी के पेड़ जिन्हे बचाना हर गाँव वाले के धर्म में शामिल हो गया है। प्रधान भी लक्ष्मण और जीवन की सारी बातों को घर-घर फैलाने के बाद यही दोहराता है, “पेड़ों के आसपास ही हमलोगों के बड़ादेव हैं। कोई भी गलत काम वहाँ नहीं होना चाहिए, जंगल की रक्षा हमारा धर्म है, वर्ना बड़ादेव नाराज़ हो जाएगा।“ हालाँकि गलत काम की परिभाषा गाँव में बदल गई है और लुदरू ने आज से पैंतालिस साल पहले का गाँव देखा है और फिर आज का देख रहा है पिछले दस सालों से। इस फर्क को चुभन की हद तक महसूस करता है वह। जब से सरकारी नौकरी से बाहर हुआ और गाँव लौट आया है तब से। लेकिन वह लक्ष्मण और जीवन जैसे गाँव के लड़कों की बातों में बिलकुल टाँग नहीं अड़ाता है। आजके पढ़े-लिखे लड़के हैं, उससे तो बेहतर ही जानते होंगे। गाँव वाले बात कर रहे हैं, पड़ोसी गाँव दुश्मन गाँव हो चुका है। नेता, मंत्री लोग, उन्हें हथियारों से लैस कर रहे हैं। अब अपने गाँव की सुरक्षा के लिए हथियार जमा करने होंगे। अब गाँव बचाना है तो पड़ोसी गाँव, समाज वालों से भी लड़ना ही होगा। वे लक्ष्मण की ओर आशा से देखते हैं। गाँव की रक्षा बुरा काम नहीं है। बड़ादेव का आशीष ही मिलेगा इससे।

लुदरू जाने क्यों सब सुन-सुन कर थक जाता है। वह धीरे से ज़मीन पर रेंग कर चलते अपने दस महीने के सबसे छोटे पोते को गोद में खींच लेता है। पोता टुकर-टुकर उसकी आँखों में ताकता है और फिर अपने खेल के बीच में रोक दिए जाने पर रोने लगता है। लुदरू ठठा कर हँस पड़ता है। उसके पास बैठे लोग भी हँस पड़ते है। दूर बैठा जीवन यह देख थोड़ा चिढ़ जाता है। वह लोगों से सूचनाएँ लेने में व्यस्त है। वह स्ट्रेटेजी बनाने में व्यस्त है। यह गंभीर समय है, और लुदरू पोते के संग चुहल करता हुआ इस समय को कमतर बना रहा है। यह ठीक नहीं है। वह दूर से आँखों का कड़ा इशारा करता है। लुदरू को अपने बेटे का यूँ घुड़कना बिलकुल अच्छा नहीं लगता है, फिर भी वह कुछ कहता नहीं। वह अपने बेटे का सम्मान करता है तभी तो रिटायर होने के पाँच साल पहले ही वह अपनी सरकारी नौकरी छोड़ गाँव चला आया था।

सबकुछ कितना अचानक हुआ था।

एक दिन सुबह-सुबह जीवन और लक्ष्मण उसके कमरे पर पहुँचे थे। उसने घबराते हुए चाय बनाई थी।

अचानक कैसे?

वे दोनों कुछ देर चुप ही बने रहे थे, फिर उसके अपने लड़के ने नहीं, अपने लड़के जैसे लड़के ने बहुत रूआँसी आवाज़ में कहा था, “दादा अन्नाय की भी हद होती है अब और नहीं सहा जाता, कुछ बड़ी योजनाओं को अंजाम देना है। हमारा गाँव भी सरकार के निशाने पर आ गया है। उन्होंने हमारें गाँव को नक्शे में लाल रंग से रंग दिया है, अब अपने पास कोई चारा नहीं। जितने हाथ होंगे उतना गाँव मजबूत होगा, तुम्हें अब, जल्द ही हमारे साथ चलना होगा।

लुदरू फक्क से रह गया था। जिस सरकार की नौकरी वह पिछले पैंतीस साल से कर रहा था, जिसकी वजह से उसने अपने इस बेटे को शहर में पढ़ाया लिखाया था, वह इस सरकार के खिलाफ बात कर रहा था और न सिर्फ बात कर रहा था, बल्कि उसे भी अपने साथ खिलाफत करने को कह रहा था। दोनों लड़के लुदरू को इसी आवाक स्थिति में छोड़ आए थे। लुदरू कोई राजनैतिक समझ वाला आदमी तो था नहीं इसीलिए बहुत बातों को जानने की जिद नहीं की उसने। हाँ इतना जरूर समझ गया था यदि लक्ष्मण और जीवन ने कोई बात कही है तो उसमें दम होगा ही। दोनों कभी हल्की और नाजायज़ बात नहीं करते थे।

साहब से जब, उसने जाने की अपनी तजवीज पेश की थी, तो साहब चौंक गए थे।

क्योंऽऽ लुदरू? तुम तो रिटायर होने के बाद अपने लड़के को अपनी नौकरी दिलवाने की बात कर रहे थे। अचानक फिर, यह सब छोड़ कर जाने की बातें क्यों?

साहब“ उसने मुलायम लेकिन जिद भरी आवाज़ में कहा था “लडके-बच्चे गाँव में ही रहना चाहते हैं कोई नहीं आना चाहता यहाँ।

लेकिन तुम्हारा लड़का तो, ग्रेजुएट है, शहर में पढ़ा है, वह गाँव में कहाँ नौकरी ढूँढेगा लुदरू?“ साहब ने आत्मीय भाव से पूछा था।

पता नहीं साहब, शायद वहीं खेती वगैरह कुछ करे, क्या जाने?

बात हवा में लटक सी गई थी क्योंकि लुदरू खुद बेहद अवस्थित था और सचमुच जान नहीं पा रहा था कि साहब को वह कौन से तर्क दे, अपने लौट जाने के और बेटे के वहीं गाँव में बस जाने के। उसके बाद से रिजाईन करने की झंझटें, पेंशन के कागजों का झमेला, सर्विस रिकार्ड को जुटाना सब अचानक मत्थे पड़ गया था उसके। लेकिन जाने क्या बात थी कि इसके बावजूद उसके अंदर गाँव लौट जाने की जिद बढ़ती जा रही थी। उसने इतने सालों में बहुत सारे साहबों के साथ काम किया था, सबका बंगला आफिस से अटैच्ड रहा था लेकिन कभी किसी साहब या उनके परिवार से इतना जुड़ाव महसूस नहीं किया था। इस बार लेकिन बात और थी। साहब और मेडम बहुत मानने लगे थे उसे और उसके बेटे की नौकरी पक्की है, ऐसा आश्वस्त भी कर चुके थे। उन्हें इस तरह छोड़ कर जाना उसे अच्छा नहीं लगा था। फिर भी लुदरू लौटा था, अपने गाँव। पैतीस सालों की नौकरी के दौरान बहुत बार घर वालों ने वापिस बुलाने की कोशिश की थी लेकिन कभी नहीं सुना उसने। इस बार लेकिन जाने कैसी पुकार थी, जो दिल को मथती जा रही थी और उसे जाने की ठोस सी जिद लग गई थी। साहब के अंतिम शब्द इन दस सालों में कई बार गूँजे उसके कानों में,

अच्छा लुदरू, ठीक से रहना। कभी यहाँ आना तो मिलना ज़रूर और कोई मदद लगे तो फोन करना, तुम हमारे परिवार के सदस्य की तरह हो।

‘हौव’ लुदरू रास्ते भर याद करता, सिर हिलाता लौटा था, लेकिन इन दस सालों में कभी साहब से मिलने नहीं गया था। फोन तक नहीं कर पाया उन्हें। जाने क्या बात थी? झिझक, शर्म या फिर अलग ढंग से साहब की नजरों में चढ़ जाने का डर।

नजरों में आना, अच्छी बात नहीं, हमें अपनी पहचान खूब होशियारी से छिपाकर रखनी होगी

हौव-हौव“ सब गाँव वाले जीवन की बात का समर्थन कर रहे हैं। वह सबको आगे की योजना समझा रहा है। तभी कुछ नए लोग दौड़े चले आते हैं और हाँफते हुए बताने लगते हैं।

टी.वी. पर दादा दिखा।“ वे लुदुरू की ओर इशारा करते हैं। “पड़ोस वाले गाँव में दादा का खूब मज़ाक बन रहा है। सब कह रहे हैं डोकरा सब कर-कराके आ गया, तो अब टी.वी. में बड़ी-बड़ी फोटू बन रहा है।

इसपे गाँव के चार-पाँच पढ़े लिखे, लड़के-लड़कियों को उत्सुकता ने घेर लिया, “कौन चैनल पर था, कौन चैनल?

कोई ‘आभा न्यूज’ करके था, और कोई ईनू जोशी करके, दादा को लीडर जैसा दिखा रही थी।

हाऽऽहाऽऽ“ इसपे इतने गंभीर माहौल में भी सब हँस पड़े। इसपे लुदरू ने लक्ष्मण की ओर जहरीली आँखों से ताका। जब उससे टी.वी. पर आने के बारे में राय विचार करना चाहा था तो कहाँ था लक्ष्मण? भीड़ में कहीं खो गया था और आज सबके साथ वह भी लुदरू पर हँस रहा है। लक्ष्मण ने लुदरू का मूड ताड़ लिया और प्यार से दादा को पास बिठाते बोला, “तू हमारा चेहरा है दादा। सोच कित्ती उमिर हुई तेरी, सत्तर बरस का डोकरा होने वाला है। कब से देख रहा है हमारे गाँव को लेकिन क्या आज भी हालात बदले हमारे? दादा तू तो दुनिया को बता रहा है कि अब हम आशा करते-करते थक गए हैं और अब हम अपनी किस्मत खुद लिखना चाह रहे हैं। ये गाँव, ये जंगल हमारा है।“ बोलते-बोलते, लक्ष्मण की आवाज़ में ऐसा जुनून भर आया कि, वहाँ बैठे कुछ गाँव के बूढ़े धीरे-धीरे हिल-हिलकर रोने लगे। इसी बीच सियार भी हुँवा-हुँवा कर चिल्लाने लगे।

ऐसा लगा, बुरी शक्तियाँ, गाँव में मंडराने को तैयार बैठी हैं। कुछ लोग अपने छोटे बच्चों को गोदी में दबाए झटपट अपनी झोपड़ियों की ओर चल दिए। बाद में बच गए सिर्फ दस लोग। जिला मुख्यालय के स्कूल की कक्षा ग्यारहवीं में पढ़ने वाली तीन लड़कियाँ, जिला मुख्यालय के कालेज में पढ़ने वाले चार लड़के, लक्ष्मण, जीवन और लुदरू। लड़के-लड़कियों ने आसपास से लकड़ियाँ बीन कर एक छोटी सी आग लगाई और उसके चारों तरफ बैठ गए। अब आसपास जानवर हुए भी, तो इतने नज़दीक नहीं आ पाएँगे। सबके चेहरों पर रोशनी की लपट, उर्जा बन नाच रही थी।

ऐसा लग रहा था कोई रहस्मय रीत के मंत्र पढ़े जा रहे हों।

लक्ष्मण ने फुसफसाती आवाज़ में कहा,

कल चलना है..., ट्रेनिंग कैंप में, कमांडर आ रहे हैं।

चारों ओर एक सजीली कंपन फैल गई। सब उत्साह से भर गए। समझ गए, कहाँ और क्यों जाना है। इसके बाद वे सब बहुत आराम से हँसते गाते अपने-अपने घर चले जाते हैं, सिर्फ लुदरू चुपचाप बैठा, लक्ष्मण का मुँह ताकता रहा। सोचता रहा, सारे काम अकेले करने का भूत सवार हो जैसे लक्ष्मण को। गंभीर आदमी है। ईमानदार भी। उसके लड़के जैसा, लेकिन इसका अपना सगा कोई नहीं। माँ-बाप, एक दिन जंगल में ही खत्म हो गए। लोग कहते हैं बाघ खा गया। कोई भाई-बहन नहीं इसको न ही कोई घरवाली या बाल-बच्चे हैं। कहो की, घर बसा लो, तो कहता है, सारा गाँव मेरा घर है और हमारा हक मेरी जिम्मेदारी। लेकिन, उसका बेटा जीवन तो शादी-शुदा है। तीन बच्चों का बाप है। सब जानते हैं गाँव और हक के अलावा वे भी जीवन की ही जिम्मेदारी हैं। बड़ादेव ने उन सबकी किस्मत लिख दी है, फिर भी जाने क्यों लक्ष्मण सबकी किस्मत दुबारा लिखना चाहता है। वह भी अपने ढंग से। आजकल बड़ा नेता बनता जा रहा है। लेकिन नेतीगिरी के चक्कर में किसका भला हुआ है, आखिर। अरे धरना देना-वेना तक सब ठीक है। देख चुका है लुदरू बहुत शहर में। लोग उसके साहब को भी आवेदन, शिकायत सब देने आते थे। ट्राईबल विभाग के डायरेक्टर थे साहब। सबकी समस्या हल करने की कोशिश तो करते ही थे। उसने खुद अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना है। आखिर सरकारी आदमी भी तो उसी हाड़-माँस का बना है, जिससे वो बने हैं। इसीलिए सब समझता है लुदरू, आदमी हर जगह दो ही किस्म के होते हैं, अच्छे और बुरे। मन ही मन खुद से बात करता है लुदरू कई बार। लेकिन एक बार बीच जंगल में पता नहीं कैसे लुदरू के मन की आवाज़ जीवन को सुनाई पड़ जाती है।

नहीं...नहीं...नहीं।“ जीवन जब आवाज तेज करता है तो लुदरू डर जाता है। सच्चाई की इतनी गर्मी है उसकी आवाज में कि चारों ओर ताप फैल जाता है। आज बारिश नहीं बरसी है। लगता है, अब सूखे दिन आ गए। अब बड़े काम करने के दिन आ गए। लुदरू और जीवन अपने गाँव से दस किलोमीटर दूर, पैदल ही पैदल चलते जा रहे हैं, जब बातों ही बातों में, जीवन पिता से बहस करने लगता है। “किनकी बात करता है तू दादा?“ जिनके लिए तेरे मन में इतना मोह है वे सब हमारे दुश्मन हैं। इतने साल शहर में रहने से, तू भोंथरा हो गया है। अंधा और बहरा भी, उनके और हमारे बीच फर्क दिखाई नहीं देता तुझे? हमारी कोई हस्ति नहीं उनका नज़रों में।

जंगल के बीच, जीवन की आँखें बाघ जैसी दिखलाई पड़ती हैं चमकती हुई, लक्ष्य पर केंद्रित। इतनी बेधती की लुदरू फिर डर जाता है। वह हाथ में पकड़े अपने लंबे बाँस को जमीन पर गहरे धँसा देता है। वह पिता है जीवन का, जीवन नहीं है उसका पिता। बच्चे को अपने से बुद्वि में बड़ा मान सम्मान देने का मतलब यह नहीं कि अब बच्चा उसे डराने लगे। बहुत हो गया, यह सब। लुदरू की आँखे भूरे काँच सी चमकती हैं। वो अपलक जीवन की काली आँखों का मुकाबला कर रही हैं। उसी दम, लुदरू को टी.वी. वाली लड़की याद आती है, वही ईनू जोशी, जो अभी कैमरा लेके सामने खड़ी हो जाए, तो बराबर फैसला हो जाए, कौन बाप और कौन बेटा। मन में हँसी की गुदगुदी रेंगते हुए ऊपर तक आती है और लुदरू को अपनी हरी, ताज़ा आवाज़ सुनाई देती है, ‘चल बेटा जल्दी कदम बढ़ा, घर पहुँचकर, बहस निपटाएगें, शांति से, यही पुराने लोग सिखाते आए हैं।’

लुदरू धीमे से पिता वाला हाथ अपने बच्चे के कंधे पर रख देता है। लुदरू की हथेली जल जाए ऐसी गर्मी अभी भी है वहाँ। वह झट से अपना हाथ हटा लेता है। बच्चे के शरीर को उसकी हथेली का स्पर्श भी स्वीकार्य नहीं। वह ठीक ही समझता है क्योंकि अपने पढ़े-लिखे मन में बाप की अपढ़, घुसपैठ से जीवन अब चिढ़ने लगा है। बहुत हुआ, दादा का बात-बात पर समझाने लगना। अच्छा हुआ, शहर से उसका काम छुड़ा लाए वे लोग, वर्ना किसी दिन, कोटवार की तरह दादा भी हमलोगों के निशाने पर होता। कोटवार के बारे में अफवाह फैली थी कि वह पड़ोस के गाँव वालों से मिला हुआ है और सरकार की मुखबिरी कर रहा है।

दूर से कुछ टार्चें भुक-भुका रही हैं। अंधेरे के बावजूद चीजों को साफ देखने का पाठ पढ़ा है, जीवन और उसके साथियों ने। साफ-साफ, टार्च वाले हाथ, बड़े-बड़े बोरे पकड़ाते हैं, लुदरू और जीवन को। लुदरू इन दस सालों में अच्छी तरह समझ चुका है, बातें अब बातों की तरह नहीं होती, आपस में बात करने के लिये भी संकेत हैं, कोड हैं। बोरों को अपनी-अपनी पीठ पर लाद बाप बेटे चल पड़ते हैं, अपने गाँव की ओर। रात गहरा कुँआ बनती जा रही है। लेकिन वे बेखौफ चलते चले जाते हैं तेज़ी से। सारी आशंकाओं को हराते, मन और असबाब से मजबूत। कल जिला मुख्यालय जाना है, जीवन को। काडरों की मीटींग है। लुदरू, जीवन की तिक्तता के बावजूद मन ही मन गर्व से भर जाता है याद कर। कमांडर कितना मानते हैं जीवन को। लक्ष्मण से भी ज़्यादा।

इरावती नदी, चित्रकोट फाल्स“ उसके साहब कहा करते थे, “बहुत सुन्दर है न लुदरू?

हौव साहब।“ लुदरू सोचता था, उसके साहब क्यों उससे इस तरह की बातें करते हैं? उसके यहाँ की नदियों, झरनों और जंगलों की बात, उसके यहाँ, के रीतिरिवाजों की बात, उसके यहाँ के सरल जीवन की बात। उसे खुश करने के लिए क्या? कम्प्यूटर पर बैठे, बैठे इन जगहों की तस्वीरें देखा करते हैं। वैसे, साहब को उसे खुश करके क्या मिलेगा? वह तो है एक छोटी हैसियत का आदमी। एक चपरासी। उसे बंगले पर दी गई कई पार्टियों का ध्यान आता है। वहाँ आए साहब लोग भी हक और लड़ाई की बात किया करते थे, ठीक उसके जीवन की तरह। उस समय लुदरू को इतनी समझदारी नही थीं कि दोनों लड़ाईयों का फर्क समझ पाता। इसीलिए बँगले के दूसरे चपरासियों की तरह वह भी महसूस करता कि उसके साहब अलग किस्म के हैं। हमेशा, भीड़ में अकेले पड़ जाते हैं। साहब दिल्ली के थे, और बार-बार सैद्धांतिक लड़ाई की बात करते थे। एक बार की पार्टी में तो बहुत बहस छिड़ गई थी और पुलिस के बड़े साहब, बहुत पीने के बाद बच्चों की तरह रोने लगे थे, फिर झम्म से उठ खड़े हुए थे और चिल्ला कर उसके साहब से बोले थे।

आप जैसे सैद्धांतिक सर्पोटरों की वजह से ही उनका मन बढ़ा हुआ है। इस देश का तथाकथित इेंटलेजेंशिया ही उन्हें बढ़ावा देता है। आपको मालूम है मौत क्या होती है? उसका डर क्या होता है? मार दिये जाने का ख्याल क्या होता है? एक बार बच चुका हूँ बाल-बाल, माईंस बाद में फटे, कार उनसे बचकर पहले गुज़र गई। शायद भाग्य था मेरा, लेकिन हर बार भाग्य मेरे साथ होगा...उसकी क्या गारंटी है? बताईए? नौकरी करता हूँ, देश की, कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है मेरी किसी से...।“ उसके बाद दोनों साहबों की दोस्ती टूट गई थी। मैडम ने सबके जाने के बाद साहब को समझाया था।

तुम क्यों पड़ते हो ऐसी बहसों में?

क्यों कि मैं दूसरे के पक्ष को भी देख पाता हूँ।

हाँ“ मैडम ने मायूस आवाज़ में कहा

समझती हूँ लेकिन क्या हत्या के बदले हत्या जरूरी है? मौत के बदले मौत? कितने बेकसूरों की जान जाती चली जा रही है? ये कैसी लड़ाई है?

मैडम की आवाज सुन लुदरू का भी दिल भर गया था, उसे बहुत सारे पुलिस लाईन के लोग याद गए थे जो ठीक उसी की हैसियत के थे, लेकिन यूँही मार दिए गए, क्योंकि वे ड्यूटी पर थे।

उसने कमरे में आने के बाद जीवन को फोन पर यह सब बताया था।

सबकुछ बहुत ठीक नहीं है जीवन”

सब हत्यारे हैं बाबा उन्होंने हमारे बहुत आदमियों को यूँही मारा है।“ मोबाईल के उस पार से आती जीवन की आवाज़ इतनी ठंडी और बर्फ जैसी थी कि, लुदरू वहीं जम गया था और तब चेता था, जब लक्ष्मण की आग जैसी आवाज ने उसे न सिर्फ जगा दिया था, बल्कि कुछ देर को जला भी दिया था, “बदला तो लेगें ही हमदादा।

तो क्या जीवन ने अपना फोन स्पीकर पर रख दिया था? और अपने सभी साथियों को उसकी बात सुना रहा था? तभी बाप बेटे के बीच लक्ष्मण आ गया था। तो क्या उसकी नादान घरेलू बातचीत के अंदर भी लड़ाई के संदेश ढूँढने लगे हैं, ये लड़के? क्या हक की लड़ाई, आदमी से उसके भीतर की सरलता भी चूस लेगी? और क्या उनकी लड़ाई, बदले में घट कर, रह जाएगी?

उस दिन पहली बार थोड़ी आशंका मन में आई थी, उसके। जीवन और लक्ष्मण का इतना अधिक साथ होना, कहीं जीवन का काल तो नहीं बन जाएगा। मन में बुरा ख्याल आया था इसीलिए लुदरू ने साहब को छुट्टी की दरख्वास्त दी थी, और पहली गाड़ी पकड़ गांव चला गया था। वहां बारी-बारी ग्राम देवता, ग्राम देवी और कुल देवता पर मुर्गे की बलि चढ़ाई थी। फिर बड़ादेव के स्थान पर बहुत देर माथा टेक कर बैठा रहा था, मन ही मन बुदबुदाता हुआ, एक ही लड़का है मेरा, रक्षा करना महादेव। वहीं आशंका में डूबे-डूबे उसे याद आया कैसे लड़के की माँ बहुत पहले मर गई थी, पेट दर्द के मारे और वह उसे जिला मुख्यालय के सरकारी अस्पताल तक भी नहीं ले जाया पाया था। तभी से जंगल उसे कम प्रिय लगने लगे थे। लगता था भाग जाए यहाँ से और फिर वाकई बीस साल की उम्र में वह भाग गया था भीतर बहुत सारा गुस्सा दबाए। क्यों उसके गांव में कोई डाक्टर नही था? क्यों गुनिया कुछ नहीं कर पाया था? अपने छोटे बच्चे को उसने जिला मुख्यालय में अपनी बहन के पास छोड़ दिया था। गाँव के स्कूल से भी चिढ़ गया था वह। इसीलिए वहीं शहर में बुआ के पास पढ़ा-लिखा जीवन। वहीं लक्ष्मण से दोस्ती गाढ़ी हुईं। शायद बेटे को अपने से दूर कर अच्छा नहीं किया उसने। बिचारा अकेला पड़ गया, इसीलिए दूसरी बातों में फँसता गया। लड़के की हक की बातों से कोई उज्र नहीं उसे लेकिन लड़के की जान की फिक्र तो है ही। क्या होगा देव, बताओ। लेकिन फिर लुदरू को लगा भगवान बोल रहे हैं तेरा बेटा बड़े काम करने आया है, धरती पर, देख कितना होशियार और पढ़ा लिखा है वह, करने दे उसे जो चाहे। उसने अचकचा कर सिर उठा कर देखा था, छोटे चबूतरे पर विराजमान भगवान, मुस्कुरा रहे थे मानो उसकी चुटकी ले रहे हों तेरे कमजोर बाप दिल में यही बातें गूंज रही थी न? जा तूने मेरे मुँह से बुलवाली। बिन माँ का बच्चा इतना बुद्धिमान और आग से भरा कैसे बन गया? हे महादेव सब मेरी बहन और उसके आदमी का किया कराया है, उन्हें भी अपने आशीर्वाद से भर देना। उन्होंने ही मेरे लड़के को इतना काबिल बनाया। वह यूँ बड़ादेव के स्थान पर आत्मविश्वास और गर्व से भर गया था। सही रास्ते ही चल रहा है उसका जीवन।

घर पहुँचकर उसने जीवन की औरत को देखा था। अपने पहले बच्चे को दूध पिलाते, सुलाते हुए। उसने चुपचाप अपनी चटाई बिछाई और बेटे की झोपड़ी की छत को ताकने लगा। उसके बेटे की ही बनाई झोपड़ी है यह, वह तो कब का इसे छोड़ भाग गया था। यहाँ रहेगा तो उसे बेटे के नियम भी मानने होगें और उसमें बुराई भी क्या है। बड़ा काम कर रहा है उसका बेटा।

ऐ बाई, जीवन की माँ एक गीत गाती थी, तुमलोग आज की लड़कियां उसे सीखे की नही?

कौन गीत दादा?“ जीवन की औरत ने मीठे स्वरों में पूछा। दादा परदेसी हो गया है। गाँव और जंगल की बहुत बातों से कट गया है। बहुत कुछ बदल रहा है, लेकिन फिर भी सबकुछ कहाँ बदला यहाँ? रीतरिवाज थोड़ा-थोड़ा खान-पान थोड़ा-थोड़ा, रहन सहन थोड़ा-थोड़ा, पर रोज दिन जीना और कितना कठिन हो गया है? बदलाव समंदर में बूँद जैसा है। हमेशा लगता है उनकी बात कोई तो सुनेगा, लेकिन हमेशा धोखा ही मिला है। इसीलिए तो वह अपने पति जीवन से इतना प्रेम करती है। जीवन बहादुर आदमी है। पूरा योद्धा है। जीवन के घर छोड़ते वक्त, जब वह उसकी ओर देखती है, तो जीवन यही कहता है, मन ही मन में, ज़ोर से कभी नहीं, हम अपने बेटे के लिए लड़ाई मोल लिए हैं, इसका भविष्य सुन्दर बनाएंगे। वह तब भी समझ जाती है। जीवन के मन की सब बातें समझ जाती है, अब वह। उसकी लड़ाई में वह भी पूरी भागीदार है। दादा चुप बैठ गया है। बहू भी चुप बैठी है। वह जीवन की आशा भरी बातों को याद कर रही है। लुदरू अपने लड़के जीवन की माँ की आँखों को याद कर रहा है, उसके गीत, उसके मन में बज रहे हैं।

‘डोंगा चे डोंगी, डोंगा चे डोंगी, आनबे दादा रे, ऐ दादा रे।

‘कौनो नी घाटे, कौनो नी घाटे,

ऐ बाई रे, ऐ बाई रे?

‘पुआली घाटे, पुआली घाटे,

ऐ दादा रे, ...ऐ दादा रे...।’


उसके आगे क्या था? लुदरू परेशां हो रहा है। जीवन की माँ बार-बार यही पक्तियाँ उसके मन में दुहरा रही है। वह कैसे भूल गया है, इसके आगे क्या है? इतने साल के शहर के साथ ने, उसके प्रिय गीत की पक्तियाँ चुरा ली हैं। उसका दिल मसोस कर रह जाता है। वह अपनी बहू की ओर देख, जानना चाह रहा है, सब पुराना बिसरा रहे हो तुम नए लोग। सचमुच जो समंदर में बूँद की तरह बदल गया है वह तो शहरी जैसा है। तुम्हारे कपड़े, तुम्हारे रीतिरिवाज और गीत संगीत भी। फिर ये बार-बार जंगल बचाने की बात कैसे कर रहे हो? कौन से अपने आपको बचाना चाहते हो? वह दिनोंदिन और गड़बड़ाता जा रहा है। चीजें साफ नहीं हो रही हैं दिमाग में। अपनी उलझनों के बारे में बात करे तो किससे?

जब जीवन रात को घर लौटा था तो लुदरू ने उसके तने हुए चेहरे से जान लिया था कि उसके मन के सवालों का जवाब उसे यहाँ नही मिल पाएगा। इन बच्चों का जीवन नए तरीके का हो चुका है, उसे भंग करने का उसे अधिकार नहीं। वह कुछ दिन और रूक जाता है। बच्चों से अपनी बात साझा करने को।

वह बच्चों को बताता है कैसे शहर में उसे अखबारों से तरह-तरह की खबरें मिलती रहीं। उसके गाँव की भी और उन लोगों की, जिन्होंने इधर सरकारी लोगों और ठिकानों पर हमले किए थे। जब किसी बड़ी वारदात की खबर आती, घर में साहब-मैडम, टी.वी. खोलकर बैठ जाते और कई बार जब जंगल से लाशों के ढेर बरामद होते, मैडम देखती और रोने लगतीं। साहब तनाव से भर टी.वी. बंद कर देते। तब मैडम साहब से सवाल करतीं।

क्या अब भी तुम्हें यही लगता है कि गलती सरकार की है?

साहब हाथ मलते रह जाते, कहना चाहते ‘नहीं’ फिर भी जाने कैसा मोह पाले हैं, जीवन जैसे लोगों से कि कह देते हैं ‘हाँ’ और सिर झुका लेते हैं शर्मिंदगी से, मानो चारों ओर एक कटघरा है और आज वे भी खड़े हो गए हैं उसमें। निर्दोष लोगों की मौत चाहे वे किसी भी पक्ष के हों, कैसे जायज़ मान ली जाए?

तो चले क्यों नही जाते, यह नौकरी छोड वहीं जंगल में?

यह एक प्रोबेलम है जान, तुम समझने की कोशिश करो, युगों के शोषण से उपजी।

झूठ...युगों पहले यह सब कुछ नहीं था...झूठ, झूठ“ मैडम ज़ोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद करती हुई चिल्लाती है,

प्रोबेलम का हल बंदूक से होता है क्याऽऽ?

इसके बाद साहब पूरी तरह हार कर, सोफे में धँस जाते हैं।

मैडम और साहब में भी जंगल को लेकर झगड़ा होता है, पता नहीं साहब मैडम की बात मान क्यों नहीं लेते?“ लुदरू अपनी इस बात को जब बताता है तो लक्ष्मण दाँत पीसते हुए बोला था, “कमज़ोर दगाबाज़ औरत।

उसी दिन लुदरू का मन लक्ष्मण से पूरी तरह उतर गया था। जो मैडम लुदरू का इतना मान करती हैं, उसके लिए ऐसे शब्दऽऽ वह भी लुदरू के सामने। वह तमक कर उठा था, और पैदल ही गाँव पार कर, उसी दम जिला मुख्यालय की बस पकड़ चला गया था। यह अलग बात है कि किसी ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की थी।

रास्ते में उसे बंगाली औरतें मिली थी, नारायणपुर वाली, बाँस के खिलौने बेचने जा रही थीं, शहर की ओर। चकर-चकर बँगला में बात कर रही थीं। ये भी यहाँ आ कर बसाए गए और यहीं घुल मिल गए। बाहरी होकर भी ये बाहरी नहीं रहे तो जंगल और बाहर वालों में फर्क कहाँ से बढ़ता जा रहा है? और यह लक्ष्मण? कह नही पाया लुदरू जीवन को, लेकिन शहर जाकर फोन कर देगा, सावधान रहे जीवन लक्ष्मण से। आजकल सिर्फ गाली निकलती है, उसके मुँह से। किसी में कोई अच्छाई नहीं दिखती उसे। लुदरू के लिए भी नफरत भरती जा रही है, लक्ष्मण की आँखों में। दिखाई दे रहा है लुदरू को।

लेकिन यह बात भी अब पुरानी पड़ गई, लुदरू ने भुला दी, वह खुद ही, सोच समझकर चला आया था गाँव? अपने बच्चे के हिस्से का बोझ ढोने? वापस आने के बाद उसने ज़्यादातर यही किया है। अब यह उसकी आदत बन चुका है।

अक्सर उसका काम बोझ को एक खास मुकाम तक पहुँचना होता है। वह जानता है बोझ भरे भारी बोरों में क्या है, लेकिन कभी पूछता नहीं। उसने क्यों और कैसे जैसे सवालों से अपना नाता तोड़ लिया है। अब तो वह अपने बेटे का साया बन चलना चाहता है, जब तक खुद मर नहीं जाए, तब तक। बचपन में जिस कलेजे के टुकड़े को अपने से अलग कर, बहन के घर छोड़ दिया था, अब उसकी देख भाल करने का जी करता है। अनोखे प्रायश्चित से भरा वह, गलत समझे जाने के बावजूद, बेटे पर गुस्सा आने के बावजूद उसका साथ नही छोड़ता है।

वह देखता है कि आजकल कुछ बातों को लेकर लक्ष्मण और लुदरू के बीच तनाव होने लगा है। लुदरू अपने बेटे को अलग ले जाकर समझाता है, “लक्ष्मण नेता बनना चाहता है, जीवन, बनने दे उसे, उसके लक्षण ठीक नही लगते,। कभी पता किया है, पड़ोस के गाँव में कितना गुस्सा है उसको लेकर...? लोग उस पर भी इलज़ाम लगाते हैं, ज़ोर जबर्दस्ती का, हर तरह की...।

जीवन चुप है, मतलब सब जानता है, लक्ष्मण भी उसी रास्ते चलने की कोशिश कर रहा है, जिस रास्ते सरकारी कर्मचारी चलते हैं, और जिनके खिलाफ वे सब लामबंध हुए हैं।

जब दोनों बाप-बेटे चुपचाप मंत्रणा कर रहे हैं, तभी लक्ष्मण उन दोनों के बीच टपक कर कहता है, लुदरू को मर जाने का श्राप देती नज़रों से घूरते हुए, “जीवन, दादा नेताम बाबू से मिला था, उन्होंने ही दादा को मेरे खिलाफ भड़काया है, तू जानता है न, हमारी लड़ाई को कमज़ोर करने की ये सब साजिशें हैं, लोग तुझे और मुझे अलग करना चाहते हैं, याद है कमांडर भी हमें यही बताते हैं, अफवाह, दुश्मन का अस्त्र है। हमें उसकी चालाकी से बचना होगा।

नही-नहीं।“ लुदरू निराशा से धरती की ओर ताकता है। बाप और बेटे के बीच बारीक रेखा खिंच चुकी है।

नेताम बाबू कोटवार है, तो क्या मेरा साथी हो जाएगा? मुझे बुद्धु समझते हो क्या? मैं उससे बात नहीं करता, कभी नहीं। जीवन-मेरी बात पर भरोसा करो। मुझे तो ये बात बोली है ईनू जोशी।

ईनू जोशी?“ जीवन और लक्ष्मण चौंक जाते हैं।

हाँ, वही टी.वी. वाली, जिला मुख्यालय में मिल गई थी, पहचान गई और जानकारी मांगने लगी। उसीने बताया,

लेकिन कैसी जानकारी...माँग रही थी वह?

कुछ उड़ती खबर थी उसको, अपने गाँव के कुछ लोगों के बारे में। पड़ोसी गाँव आई थी, कोई स्टोरी कर रही है। उन्हीं लोगों ने उसे बताया है।

लक्ष्मण चौकन्ना हो जाता है।

और कैसी जानकारी दी दादा तूने?“ जीवन की आवाज़ वही बर्फ वाली ठंडी है।

क्या आज ही के दिन, अभी हाल खिंची बारीक रेखा और चौड़ी हो जाएगी और धरती फट जाएगी? इतना अविश्वास, उसका अपना बेटा कर कैसे पा रहा उसपे?

कोई जानकारी नहीं दिए बेटा, बस जानकारी दिए अपने खाना-पीना और नाच गाने की। चींटी की चटनी खाना चाहती है वह, किसी चैनेल पर दिखाया गया था, बोल रही थी।

लक्ष्मण का इन मलाईदार बातों से कोई लगाव नहीं, वह सोच में डूब जाता है। क्या हवा में बातें इतनी बढ़ गई हैं कि टी.वी. वालों को पता लग जा रहा है। कहीं ये ईनू जोशी भी सरकारी मुखबिर तो नहीं? अब देख कर तय करना होगा कि ईनू जोशी उनका किसी प्रकार का नुकसान करने की काबलियत तो नहीं रखती। आज ही जिला मुख्यालय जा, उससे भेंट करनी होगी। पता लगाना होगा। बाकी काडरों को भी सावधान करना होगा।

आज हाट-बाज़ार का दिन है। अब हर सीजन में सबकुछ मिलता है, खाना पीना, कपड़ा लत्ता सब, साड़ी ब्लाऊज से पैंट शर्ट तक। बड़े मज़े का हाट है। रंगीन और ज़ायकेदार।

बड़ी मुश्किल से हाट के रंगीन ढेरों के बीच दोनों मित्र, ईनू जोशी को खोज पाते हैं। खोज कर फिर देखते हैं। एकदम शहरी लड़की है। जोश से भरी। कुछ नया करना चाहती है। अपने कैमरामैन से बात कर रही है, “कुछ जंगल शॉटस् से शुरू करते है, फिर, इस रंगीले बाजार के शॉटस्, फिर इन औरतों के गिलट के जेवरों, इनकी पोशाकों पर और फिर इन भेाले भाले आदमियों के शॉटस भी। भोले-भाले आदमियो की शक्ल लक्ष्मण और जीवन से मिलती है, बस वे गलत जगह, गलत समय पर हैं। जाने- अनजाने में वे अब कैमरे की भीड़ का हिस्सा हो गए हैं।“ गंभीर क्षणों के बीच ईनू जोशी, गंभीर कमेंटरी कर रही है। सब दम साधे सुन रहे हैं। हमेशा की तरह बड़ी मेहनत से उसने स्क्रिप्ट तैयार की है। पिछली स्टोरी के कंटीनूयेशन में यह स्टोरी है।



आईए आज आपको, ले चलते हैं, दण्डकारण्य...यह दण्डकारण्य है...रामायण, के युग का दण्डकारण्य। यहीं राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के वर्ष बिताए और फिर तभी से उस कहावत की शुरूआत हुई, कि जो निर्वासित है, यह उनका घर है। इसके कई मतलब हमलोग अपने-अपने ढंग से लगा सकते हैं। लेकिन देखिए यहां सबकुछ कितना सुन्दर है, यहाँ की लोक कला, नृत्य और लोग। लेकिन फिर भी क्यों हो रहा है, यहाँ इस तरह का डिसटर्बेंस? क्या बाहर के लोग, आकर यहाँ का देवत्व खत्म कर दे रहें हैं या चारों ओर कोई गलतफहमी फैली है...? जब हमने गाँव वालों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। कईबार वे गुस्से में दिखे तो कई बार डरे हुए भी।

ईनू जोशी, सुन्दर, गुड़िया-सी ईनू जोशी, सुंदरता से कठोर सचों को पेश करती है। देश भर में लोग उसके चैनल को गंभीरता से देख रहे हैं और पक्ष-विपक्ष में अपने तर्क रख रहे हैं।

जीवन और लक्ष्मण, बहुत दिनों बाद खुलकर हँसते हैं और खूब सारी महुआ खरीदते हैं। गाँव तक वापस पहुँचते-पहुँचते वे जकड़ देने वाले नशे में भर जाते हैं। जीवन सोए हुए दादा को जगाकर कहता है, “दादा तुम ठीक कह रहे थे ईनू जोशी को तुम कुछ नहीं बताए, वो हमको नहीं पहचानी, खोजबीन में लगी जरूर है, लेकिन कुछ ज्यादा जानती नहीं। पता चला कल, लौट जा रही है। अब सब ठीक है।

यह सुन लुदरू का दिल दुख से फट जाता है, वह उसी फटे दुख से पूछता है, “तुम क्या सोचे थे, हम तुम्हारी पहचान दूसरों को बता देगें क्या कभी?

हम नहीं लेकिन लक्ष्मण बोला था, डोकरा तो सरकारी आदमी है, पता नही कब सरकार से मिल जाए।

अगर मिलना ही होता तो क्या हम नौकरी छोड़ तुम्हारे पास चले आते?

न, न...“ कर लक्ष्मण और जीवन वहीं झोपड़ी के बाहर गोबर से पुती ज़मीन पर सोने लगे।

यह सोने से पहले ही हुआ होगा। वर्ना नींद में बोले शब्द तो कम ही समझ में आते हैं।

यह जो लुदरू ने सुना था, “शनिवार को राजधानी से कई बड़े अफसर आ रहे हैं, जंगलवालों की समस्या सुनने, तभी याद है न बीस किलोमीटर दूर से ही धरती को बाँध देना है।

लुदरू को बिलकुल समझ में नहीं आता है कि दोनों में से कौन यह बोल कर सोया है। सोने से पहले किसके रहे हैं, ये अंतिम शब्द? लुदरू मानना नही चाहता कि जीवन ने कहे हैं ये शब्द। लुदरू और उसके जीवन का संबंध, क्या आज यहीं समाप्त हो गया? क्या लुदरू वाकई, अब इनके बीच का नहीं रहा? कोई और हो गया है? क्या उसके खून में मिलावट आ गई है? जो उसे ये सारी बातें, सुन बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा है। ऐसा क्यों लग रहा है जैसे उसे उसका जीवन उचाटता के आकाश में धकेल दे रहा हैं? जहाँ सिर्फ खालीपन है, कहीं आदमी नहीं, जन नहीं, रिश्ता नहीं, बस सब खाली-खाली।

सोचते-सोचते उसकी आँख झपकने लगती है। वह अपने ऊबड़-खाबड़ सपने में अपने साहब जैसे कुछ साहबों को देखता है। ईनू जोशी जैसी गुड़िया को देखता है। अपने गाँव की दरिद्रता और कमतरी को देखता है। आस पास के सन्नाटे को देखता है और उसीके बीच, सच्चे जज़्बे से भरे अपने लड़के जीवन को देखता है, दादा तू चिन्ता मत कर, मैं बदलाव लाऊँगा। वह और गहरी नींद में भटकता है, तभी गाँव की किसी औरत की चीत्कार सुनाई देती है, और वह चौंक कर उठ जाता है। यह सपना नहीं है, यह सिनेमा नही है, यहाँ ईनू जोशी का चैनल भी नहीं है। यह औरत जो गहरी पीड़ा से भरकर रो रही है, यह तो दरअसल जीवन की माँ है, जो जीवन के पैदा होने के कुछ ही साल बाद मर गई थी। उसीके मरने के बाद तो वह भागा था यहाँ से दूर, आज वह फिर आवाज़ दे रही है, आज फिर भागना होगा, लगता है। सोचते-सोचते, वह झोपड़ी के अंदर जाता है अपने गमछे को गले में लपेटता है, अपनी लंबी बाँस की लाठी को हाथ में पकड़ता है और झोपड़ी से बाहर निकलने को होता है, तो उसे कोने में टँगा, वह लाल झण्डा दिख जाता है जिसे ऊँचा उठाकर उसने टी वी कैमरे में पोज़ किया था, जिसके लिए और जिसके पीछे से झाँकते मुस्कुराते अपने बेटे के लिये, वह सबकुछ छोड़ कर यहाँ चला आया था। वह झंडे को एक हाथ में उठाए, बड़ादेव के जंगल के पास दौड़ने लगता है। गाँव से बीस किलोमीटर दूर। जिला मुख्यालय जाने वाली कच्ची सड़क पर।

गाँव के सब लोग सोए रहते हैं। लुदरू दौड़ा चला जाता है। हां, रास्ते में उसी के गाँव का पटेल अपनी मोटर साईकल पर जिला मुख्यालय की ओर जाता दिखाई पड़ता है। आज बहुत सरकारी अफसर आ रहे हैं, उन्हीं की अगुवाई में जा रहा है शायद। वह लुदरू को कच्चा रास्ता पकड़ते देख पूछता है, “कहाँ दादा?

लुदरू शान से मुस्कुराते हुए अपना झण्डा लहराता है और पटेल को वहीं हतप्रभ छोड़ आगे बढ़ जाता है।

अंधियाला मिटने को है। भोर होने को है। ऐन भोर होने के साथ-साथ ही दण्डकारण्य की पवित्र पावन भूमि पर एक साथ शहादत के कई धमाके होते हैं।

बँधी हुई धरती खुल जाती है। चारों ओर दरारें पड़ जाती हैं।

एक लाल झंडा हवा में उछलकर कहीं खो जाता है।

किसी के हताहत होने की कोई अफवाह नहीं उड़ती।

फिर थोड़ी देर बाद अशोभन शांति पसर जाती है।

कोई अफसोस नहीं करता है।


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