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कठुआ और उन्नाव रेप केस पर राजनीति — विजय विद्रोही | #VijayVidrohi

अप्रैल 13, 2018


यू.पी. में योगी सरकार एंटी रोमियो स्क्वायड लेकर आई थी, रेप और महिलाओं के साथ छेडख़ानी को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन खुद की पार्टी के एक विधायक पर रेप का आरोप लगा तो सारे नियम-कानून व कायदे भूल गई। डी.जी. पुलिस विधायक को माननीय विधायक जी कह रहे हैं और माननीय विधायक जी टी.वी. कैमरों के आगे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है। — विजय विद्रोही

कठुआ और उन्नाव रेप केस पर राजनीति

सत्ता में रहते हुए संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाली सरकार कानूनों की अवहेलना नहीं कर सकती

विजय विद्रोही


कठुआ और उन्नाव में बलात्कार की दो घटनाएं भारतीय राजनीति के उस शर्मनाक चेहरे को सामने ला रही हैं, जो अभी तक बापरदा रहा है। जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ सामूहिक रेप होता है। यहां तक कि मरी हुई बच्ची से भी एक पुलिस वाला रेप करता है और पूरा मामला हिन्दू-मुस्लिम हो जाता है।

हद तो यह है कि वकीलों ने चार्जशीट तक दाखिल होने में रोड़े अटकाए। यू.पी. के उन्नाव में एक राजपूत भाजपा विधायक पर एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप लगता है। पूरा पुलिस प्रशासन मानो लगता है विधायक के बचाव में उतर आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट तक को पूछना पड़ रहा है कि आखिर यू.पी. सरकार आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को कब गिरफ्तार करेगी। रेप की ये दोनों घटनाएं बताती हैं कि राजनीतिक नेता और सत्ता के दबाव में प्रशासन किस तरह संवेदनहीन हो गया है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब रेप पर राजनीति हो रही हो।

आपको याद होगी राजस्थान की साथिन भंवरी देवी के साथ हुए सामूहिक रेप की कहानी, जो 90 के दशक में हुई  थी। भंवरी देवी राज्य सरकार के महिला एवं बाल कल्याण विभाग से साथिन के रूप में जुड़ी थी और उस पर बाल विवाह की पूर्व सूचना प्रशासन को देने की जिम्मेदारी थी। उसने गांव के प्रभावशाली गुर्जरों के यहां बाल विवाह होने की सूचना दी तो उसके साथ गैंगरेप हुआ। तब भी भाजपा गुर्जरों के बड़े नेता राजेश पायलट पर आरोपी गुर्जरों के समर्थन का आरोप लगाती रही थी। गौरतलब है कि भंवरी देवी रेप केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और काम-काजी महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ सख्त गाइडलाइंस केन्द्र को जारी करनी पड़ीं। हैरानी की बात है कि भंवरी देवी रेप केस के सभी आरोपी अदालत से बरी हो गए थे और अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि चाचा-भतीजा मिलकर रेप नहीं कर सकते और ऊंची जाति का आदमी छोटी जाति की महिला के साथ रेप करके अपनी जात खराब नहीं कर सकता।



यदि सी.बी.आई. इस केस को 10 दिनों बाद हाथ में लेती है तो क्या तब तक आरोपी की गिरफ्तारी  नहीं होगी... तब तक विधायक सबूतों को मिटाने की कोशिश करने के लिए आजाद होंगे? — विजय विद्रोही

कुछ ऐसा ही तर्क उन्नाव रेप केस में भी भाजपा नेता दे रहे हैं, लेकिन बड़ी बात है कि 2012 में दिल्ली में निर्भया रेप केस के बाद जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी की सिफारिशों को पूरी संवेदनशीलता के साथ लागू करने का संकल्प पूरे देश की राज्य सरकारों ने लिया था। इस पृष्ठभूमि में उन्नाव और कठुआ की घटनाओं को देखने पर सिर नीचे झुक जाता है। यू.पी. में योगी सरकार एंटी रोमियो स्क्वायड लेकर आई थी, रेप और महिलाओं के साथ छेडख़ानी को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन खुद की पार्टी के एक विधायक पर रेप का आरोप लगा तो सारे नियम-कानून व कायदे भूल गई। डी.जी. पुलिस विधायक को माननीय विधायक जी कह रहे हैं और माननीय विधायक जी टी.वी. कैमरों के आगे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है। हो सकता है कि ऐसा ही हो रहा हो लेकिन सत्ता में रहते हुए संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाली सरकार कानूनों की अवहेलना नहीं कर सकती।



जब साफ तौर पर कानून कहता है कि रेप का आरोप लगने पर पुलिस को एफ.आई.आर. लगानी है तो लगानी चाहिए थी। जब कानून कहता है कि आरोपी से पूछताछ और गिरफ्तारी होनी चाहिए तो कम-से-कम पूछताछ तो होनी चाहिए थी। जब कानून कहता है कि नाबालिग से रेप पर पोक्सो लगता है तो यह धारा पहले ही लग जानी चाहिए थी। ये सब तब तक नहीं हुआ तब तक मीडिया में हल्ला नहीं मचा और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान नहीं लिया। ऐसा होने पर एफ.आई.आर. दर्ज तो हुई  लेकिन पुलिस से छीनकर केस सी.बी.आई. को भेज दिया और तकनीकी आड़ में विधायक की गिरफ्तारी नहीं होने दी।


अगर कोई आगे बढ़ रहा है और हाशिए से मुख्यधारा में आ रहा है तो इसका मतलब उस समुदाय की 8 साल की बच्ची से बलात्कार और उसकी हत्या करना नहीं है। — विजय विद्रोही

सवाल उठता है कि ...

अगर सी.बी.आई. केस लेने से इन्कार कर देती है तो...
सवाल उठता है कि यदि सी.बी.आई. इस केस को 10 दिनों बाद हाथ में लेती है तो क्या तब तक आरोपी की गिरफ्तारी  नहीं होगी... तब तक विधायक सबूतों को मिटाने की कोशिश करने के लिए आजाद होंगे? तब तक रसूख का इस्तेमाल कर केस को दबाने की गुंजाइश निकालने के लिए स्वतंत्र होंगे?

सवाल उठता है कि अगर यही आरोप किसी आम आदमी पर लगा होता तब भी क्या योगी सरकार की पुलिस इसी तरह के गिरफ्तार नहीं करने के तर्क देती?
कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ बलात्कार इलाके से बकरवाल समुदाय के लोगों को खदेडऩे के लिए किया गया। ऐसा आरोप अगर सच है तो  यह सच में शर्मनाक है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह खबर पढ़ कर हैरानी-परेशानी होती है कि रेप का मामला हिन्दू-मुस्लिम हो गया है और सरकार दो सिखों को सरकारी वकील बना रही है। — विजय विद्रोही

कहा जा रहा है कि 

जम्मू में गुर्जर और बकरवाल की कुल आबादी 11 प्रतिशत से ज्यादा है और रेप के कथित आरोपी हिन्दू सेवा समिति या हिन्दू जागरण मंच से जुड़े हैं।
कहा जा रहा है कि बलात्कारियों के पक्ष में हुई रैली में भाजपा के मंत्री और विधायक तक शामिल हुए
कहा जा रहा है कि ऐसी समिति और मंच को बकरवाल-गुर्जरों की बढ़ती आबादी से जम्मू की डैमोग्राफी में बदलाव की चिन्ता थी।
कहा जा रहा है कि इन दोनों को वन अधिकारों के तहत कुछ सहूलियतें मिली हैं। इनमें वन क्षेत्र में  खेती करना और लघु वन उपज के इस्तेमाल की छूट शामिल है।



दूसरे समुदायों को लगता है कि गुर्जर और बकरवाल दूध का धंधा करके संपन्न होते जा रहे हैं और जनसंख्या के हिसाब से भी, और सियासी रूप से चुनावी राजनीति में भी शक्तिशाली होते जा रहे हैं। अगर पहला हिस्सा यानी संपन्न होने वाली बात सच भी है तो भी अन्य समुदायों को जलन की बजाय इसे प्रतिस्पर्धा की तरह ही लेना चाहिए था। अगर कोई आगे बढ़ रहा है और हाशिए से मुख्यधारा में आ रहा है तो इसका मतलब उस समुदाय की 8 साल की बच्ची से बलात्कार और उसकी हत्या करना नहीं है। राजनीति का जवाब राजनीति से दिया जाता है और सभ्य समाज में न तो रेप के लिए जगह है और न ही हिंसा के लिए। और अगर यह गुर्जरों-बकरवालों को सबक सिखाने के लिए एक षड्यंत्र के रूप में किया गया है तो इससे ज्यादा शर्मनाक हरकत कोई हो ही नहीं सकती।

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना ठीक है कि हाथ में तिरंगा लेकर रेप करने का समर्थन करने वाले ही तिरंगे का अपमान कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रह सकतीं। उन्हें देखना ही होगा कि पूरे मामले की गहराई से जांच हो और आरोपियों को सख्त से सख्त सजा मिले। भारत में तो कसाब जैसे आतंकवादी को भी वकील दिया गया था लेकिन कठुआ की रेप पीड़िता का मुकद्दमा लड़ रही वकील को केस से हट जाने की धमकी दी जा रही है। कम से कम महबूबा मुफ्ती इस बात की व्यवस्था तो कर ही सकती हैं कि महिला वकील जान की परवाह किए बगैर अदालत में आ-जा सके। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह खबर पढ़ कर हैरानी-परेशानी होती है कि रेप का मामला हिन्दू-मुस्लिम हो गया है और सरकार दो सिखों को सरकारी वकील बना रही है। कल को यह नहीं कहा जाए कि जज ईसाई होना चाहिए। भाजपा को भी समझना चाहिए कि उसके नेता रेप के आरोपियों की रैली में जाकर जनता के बीच क्या संदेश दे रहे हैं और अंत में सारा खमियाजा मोदी जी को ही उठाना पड़ सकता है। काबा किस मुंह से जाओगे गालिब शर्म तक तुमको नहीं आती।

(ये लेखक के अपने विचार हैं। साभार नवोदय टाइम्स)
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