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बीजेपी के लिये खतरे की घंटी — पुण्य प्रसून बाजपेयी @ppbajpai

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विपक्ष के जुड़ते तार तले, संघर्ष के उस पैमाने से समझा जा सकता है, जो पहली बार बिना पॉलिटिकेल फंड राजनीतिक संघर्ष कर रही है

— पुण्य प्रसून बाजपेयी 


चौथे—बरस के जश्न तले चुनावी—बरस में बढ़ते कदम
परसेप्शन बदल रहा है तो फिर चेहरा-संगठन कहां मायने रखेगा

बीते चार—बरस में कॉरपोरेट समेत जितने रास्तों से राजनीतिक दलों की फंडिंग हुई उसका 89 फिसदी बीजेपी के खाते में गया


चौथे—बरस का जश्न आंकड़ों में गुजरा। तो क्या परसेप्शन खत्म और सफल बताने के लिये आंकड़ों के जरिए दावे। कमोबेश हर मंत्री ने दावे पेश किये कि देश में कितना काम हुआ। देश भर के अखबारों में विज्ञापन के जरिए कमोबेश हर क्षेत्र में चार—बरस के दौर में सफलता के आंकड़े। तो क्या मोदी सरकार चौथे—बरस में डिफेन्सिव है। यानी जो आक्रामकता 2013 में 15 अगस्त के दिन, बाकायदा तब के पीएम मनमोहन सिंह के लालकिले के प्राचीर से देश के नाम संबोधन के खत्म होते ही, गुजरात में लालकिले का मॉडल बना कर, सीएम मोदी ने भाषण देने के साथ शुरु किया, वह पहली बार 2018 में थमा है। तो क्या अब मोदी सरकार के सामने वाकई अपने कामकाज की सफलता बताने का वक्त आ गया है। कह सकते हैं, चुनावी वर्ष शुरु हो गया तो फिर पांच—बरस के कामकाज का कच्छा-चिट्टा तो रखना ही होगा।


गवर्नेंस का सवाल हो या किसी नीति या किसी पॉलिसी या किसी भी नारे का और उसकी एवज में जो भी कहा गया, उसे बहुसंख्यक तबके ने सही माना।
पर चौथे—बरस ने राजनीति की उस परिभाषा को बदलना शुरु किया है जिस पारंपरिक राजनीति को बीते चार—बरस में बहलते हुये देश ने देखा। दरअसल मोदी के दौर ने उस दीवार को ढहा दिया जो जनता और राजनीतिक वर्ग को अलग करती थी। सत्ता किसी की भी रहे पर राजनीतिक तबके में एक ईमानदारी रहती थी कि दूसरे पर आंच ना आये। और इस दीवार के गिरने ने उस जनता को ताकत जरूर दी जो अभी तक हर नेता से डरती थी। और मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया और भोगा जहां वह ईमानदार की छवि अपने साथ समेटे रही।

जिस सोशल इंजीनियरिंग के आसरे एनडीए के गठबंधन को विस्तार मिला, अब चुनावी—बरस में वही सोशल इंजीनियरिंग यूपीए में शिफ्ट हो रही है

तो फिर गवर्नेंस का सवाल हो या किसी नीति या किसी पॉलिसी या किसी भी नारे का और उसकी एवज में जो भी कहा गया, उसे बहुसंख्यक तबके ने सही माना। क्योंकि निशाने पर वह राजनीति थी। जिससे आम लोग अरसे से परेशान थे।
 क्या मोदी सरकार चौथे-बरस में डिफेन्सिव है

  • लकीर किस महीनता से खिंची गई इसका एहसास इससे भी हो सकता है कि नोटबंदी ने राजनीतिक दलों की फंडिंग के साम्राज्य को ढहा दिया। 
  • सत्ता के इशारे पर संवैधानिक संस्थाओं ने विपक्ष की राजनीति को डरा दिया। 
  • बीते चार—बरस में कॉरपोरेट समेत जितने रास्तों से राजनीतिक दलों की फंडिंग हुई उसका 89 फिसदी बीजेपी के खाते में गया। 
  • जितनी भी राजनीतिक फाइलें सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स या किसी भी संवैधानिक संस्था के तहत खुली संयोग से उस कतार में बीजेपी के किसी नेता का नाम जिला स्तर तक भी ना आया। 
  • देश में सड़क पर न्याय करने के एलान के साथ कानून को ताक पर रखकर भीड़तंत्र जहां-जहां सामने आया संयोग से उनमें भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई कानून करते हुये नजर नहीं आया। 
  • ये भी पहली बार नजर आया कि कोई मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के नेता-मंत्री के खिलाफ दर्ज कानूनी मामलों को ही खत्म नहीं करा रहा है बल्कि अपने खिलाफ दर्ज मामलों में भी खुद को ही माफी दे रहा है और सबकुछ ऐलानिया हो रहा है। 



आडवाणी का चेहरा और वाजपेयी के पीएम बनने के दौर को नये तरीके से संघ ने मोदी को लेकर जो प्रयोग किया उसकी उम्र पूरी हो गई है
तो चौथे—बरस ने दो तरह के परिवर्तन दिखाने शुरु किये। पहला, जनता का परसेप्शन मोदी सरकार की ताकत को आंकड़ों में देखने लगा। यानी सत्ता जादुई आंकड़े 272 पर ही टिकी है। और कर्नाटक के जादुई आंकड़े के करीब पहुंचकर भी जब कुमारस्वामी सरीखे आठ मामलों के आरोपी को भी लगने लगा कि बीजेपी के साथ खड़ा होना भविष्य की राजनीति को खत्म करना होगा। तो फिर झटके में नया परसेप्शन भी बनने लगा कि अब बीजेपी के साथ खड़ी पार्टियों में असंतोष उभरेगा। ये सिर्फ चन्द्रबाबू नायडू या चन्द्रशेखर राव के अलग होने या शिवसेना के विद्रोही मूड भर से नहीं समझा जा सकता। न ही नीतीश कुमार का चौथे—बरस नोटबंदी को लेकर सवाल खड़ा करने से उभरता है। बल्कि विपक्ष के जुड़ते तार तले संघर्ष के उस पैमाने से समझा जा सकता है जो पहली बार बिना पॉलिटिकेल फंड राजनीतिक संघर्ष कर रही है। तो दूसरा परिवर्तन टूटते परसेप्शन के बीच आंकड़ों का सहारा लेकर अपनी सफलता दिखाने का है।


 पूंजी पर टिकी सियासत जब कर्नाटक में हार गई या हाँफती दिखी तो नया सवाल ये भी पैदा हुआ कि क्या वाकई संघर्ष करने के माद्दे का आक्सीजन विपक्ष की राजनीति को मिल गया। 
यानी बीजेपी के पास मोदी सरीखा चेहरा है जिसकी कोई काट विपक्ष के किसी नेता में नहीं है। फिर भी सफलता के लिये आंकड़े बताये जा रहे है। बीजेपी के पास सबसे बड़ा संगठन है: दस करोड़ सदस्य पार। और बूथ से लेकर पन्ना प्रमुख तक के हालात। तो भी मंत्री—दर—मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष “उज्जवला योजना” से लेकर मुद्दा योजना के आंकड़ों में अपनी सफलता के चार—बरस गिना रहे है तो संकेत साफ है। परसेप्शन बदल रहा है। और यही से बीजेपी के लिये खतरे की घंटी है —

क्योंकि मोदी सत्ता ने विपक्ष के उस राजनीतिक वर्ग के खिलाफ तो मुहिम चलायी जो फंडिंग के आसरे राजनीति नये सिरे से खड़ा कर सकता है। पर मोदी सत्ता ने अपने ही उस परसेप्शन को बदल दिया जहां बिना पूंजी या बिना फंडिंग उसकी राजनीति पाक साफ दिखायी दे। और पूंजी पर टिकी सियासत जब कर्नाटक में हार गई या हाँफती दिखी तो नया सवाल ये भी पैदा हुआ कि क्या वाकई संघर्ष करने के माद्दे का आक्सीजन विपक्ष की राजनीति को मिल गया। या फिर बीजेपी के भीतर भी चुनावी—बरस में सवाल उठेंगे। क्योंकि संगठन हो, या फंडिंग, या फिर चेहरा...  वह मायने तभी रखता है जन परसेप्शन अनुकूल हो। क्योंकि 2012-13 के दौर को भी याद कर लें तो मनमोहन सरकार के खिलाफ बनते परसेप्शन ने नरेन्द्र मोदी को जन्म दिया। फिर 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर परसेप्शन खत्म हुआ तो बिना चेहरे ही हालात पलट गये। यानी चाहे अनचाहे चौथे—बरस ने यह संदेश भी दे दिया कि जिस सोशल इंजीनियरिंग के आसरे एनडीए के गठबंधन को विस्तार मिला, अब चुनावी—बरस में वही सोशल इंजीनियरिंग यूपीए में शिफ्ट हो रही है। और हिन्दुत्व के एजेंडे पर बीजेपी लौटेगी तो फिर परसेप्शन हिन्दुत्व का बनेगा न कि संगठन या चेहरे का। तो क्या आडवाणी का चेहरा और वाजपेयी के पीएम बनने के दौर को नये तरीके से संघ ने मोदी को लेकर जो प्रयोग किया उसकी उम्र पूरी हो गई है या फिर बीजेपी फिर आडवाणी युग यानी मंडल-कमंडल के दौर को नये तरीके से जीने को तैयार हो रही है। तो इंतजार कीजिये क्योंकि चौथे—बरस के संकेत साफ है :

2019 में या तो कांग्रेस एकदम बदले हुये रुप में नजर आयेगी जहाँ उसका संघर्ष उसे मथ रहा है। या फिर बीजेपी सियासत के ककहरे को नये तरीके से ढाल देगी।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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