जयश्री रॉय की कहानी — इक्क टका तेरी चाकरी वे माहिया... - #Shabdankan
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जयश्री रॉय की कहानी — इक्क टका तेरी चाकरी वे माहिया...

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प्यार, अभिलाषा, जुनून, ज़मीन, रोमांच, प्रकृति जयश्री रॉय की कहानी 'इक्क ट्का तेरी चाकरी वे माहिया...' इन सब को जोड़ती-तोड़ती और मरोड़ती कहानी है...लेकिन बड़ी बात यह है कि ये सब दर्द के उस साए में होता है जो हमारी परछाई का हिस्सा है. और कहानी की गति अपने युवा कथाकार की तरह सम्हली हुई तेज है. — भरत तिवारी





सतनाम उसे बार-बार टहोका लगाता है, फुसफुसा कर कहता है, अबे उठ, गाँजा चढ़ा रखी है क्या! मगर कश्मीरा कुनमुना कर करवट बदल लेता है। अभी वो बादशाह है, किसी की चाकरी नहीं करेगा! पाँच नदियों के पानी से सींची अपनी हरी-भरी जमीन पर शान से खड़ा है — दिल वालों का पंजाब! उसका पंजाब! उसकी सोंधी, अलबेली महक से लबरेज! आग की लपटों में धधकती गोबर से बनी देवी लोहड़ी की मूरत, तिल, गुड़, मिसरी, रेवड़ी की बरसात के साथ सबका नाचना-गाना — “कंडा कंडा नी लकडियो कंडा सी, इस कंडे दे नाल कलीरा सी, जुग जीवे नी भाबों तेरा वीरा सी… ” फिर सरसों का साग, मक्के की रोटी की दावत, मूली, मूँगफली, गुड, गज्जक के साथ... कंपकंपाती शीत ऋतु के लंबे, ठिठुरे दिनों के बाद गर्म, चमकीले दिनों की शुरुआत का मीठा वादा...

इक्क टका तेरी चाकरी वे माहिया...

—  जयश्री रॉय



पेड़ के घने झुड़मुटों के बीच से अचानक आसमान का वह टुकड़ा किसी जादू की तश्तरी की तरह झप से निकला था — चमचमाता नीला, चाँद-तारों से भरा हुआ! चारों तरफ यकायक उजाला फैल गया था। कश्मीरा आँख चौड़ा कर देखता रहा था, घुप्प अंधेरे की अभ्यस्त आँखें चौधिया गई थीं। जाने कितने दिन हो गए थे रोशनी देखे! स्याही के अंतहीन ताल में ऊभ-चुभ रहे थे सबके सब। रोशनी बस जुगनू की तरह यहाँ-वहाँ टीमकटी हुई।


घुटने में चोट लगी है। लंगड़ा कर चलता है वह। उसके रह-रह कर कसक उठते तेज दर्द के बीच यकायक सिबो की चुनरी याद आई थी — बसंती, गोटों से जड़ी, साथ ही उसका आधे चाँद-सा माथा, दो जुड़ी हुई भौंहों के बीच की छोटी बिंदी, नीली तितली-सी शरीर आँखें... छाती में फांस-सा पड़ गया था। छत पर उसे ही लहरा कर तो वह इशारे से कहती थी उसे, आज सरसों की झील में, आज गन्ने के पश्चिम वाले गड्ढे में... अपनी लाल कुर्ती को गले तक सरका कर राज हंसिनी की तरह बीच खेत खड़ी वो निडर लड़की! शाम की ललछौह धूप में सीने पर जगमगाते दो पूरन मासी के भरे-पूरे चाँद लिए... प्यार के जो सबूत वो शरारत में मांगता था, उसके प्रेम में दीवानी सिबो बेझिझक देती थी! ऐसे कि वह खुद घबरा जाता था। बढ़ कर उसे ढाँपता था — पागल हुई है!... सोचते हुये उसकी बांह की ऐंठती मछलियों में घुंघरू की रुनझुन-सी भरती जाती है, शराब उतरती है नसों में, भींगते हैं रोएँ, तर हो आता है वह — आह!

जबड़ों के बीच सनसना कर उठते बवंडर को दबाते हुये वह सोचने की कोशिश करता है — कितना दूर है ये सब, किसी पिछले जनम की बात-सा लगता है। बीच के जंगल, नदियां, पहाड़ अपने ओर-छोर गुमा कर अनायास पसरते गए थे आँखों के आगे। काही जंगल का हरहराता रेगिस्तान, चाकू की फाल-सी खाल उधेड़ती हवा... उस पर फिर से घबराहट का दौरा-सा पड़ गया था, ओस भीगी रात में हथेलियों में पसीना भर आया था एकदम से, माथे से चुआ था टप-टप — वो हमेशा के लिए खो जाएगा इस बीहड़ में! सिबो, तुझे पता भी ना चलेगा, तेरा सिरा किस बीहड़ में दफन हो गया, हड्डी-चमड़ी खा गई इस परदेश की जालिम बर्फानी हवा... रोना मेरे लिए, भूला मत देना हरजाइयों की तरह! बाईस साल का गबरू जवान कश्मीरा रात की ओट में छुप-छुप कर रोता है। जब से गाँव छूटा है, बीबीजी की दुलार भरी छांव, कश्मीरा बच्चा बन गया है। बात-बात पर रोता है। ठीक जैसे पहली बार स्कूल जाने पर रोया था! तब तो एक तसल्ली होती थी, जब स्कूल की छत की छांव सीढ़ियों की आखिरी पायदान को छू लेगी, बीबीजी आएगी उसे लेने। वह कोरस में पहारे का रट्टा मारते हुये बार-बार सीढ़ियों की ओर देखता रहता था। जिस बीबीजी का रास्ता वह दिन भर देखता था, उसके आने पर फिर वह रास्ते भर उसे ही पीटता जाता था — बोल, फिर मुझे छोड़ कर जाएगी? बीबीजी बिना कुछ कहे चुपचाप उसकी मार खाती थी। घर जा कर उसके हाथ-पाँव धुलाती थी, रोटी खिलाती थी। पीतल की बड़ी परात में मलमल से ढँकी गूँथी हुई आटे की लोई, मलाई की झिल्ली पड़ी ईलायची वाली चाय... आँखों में आँसू के साथ मुंह में नमकीन परौंठे का स्वाद जागता है, पेट की भूखी अंतरियाँ मरोड़ उठती हैं — बीबी! मुझे एक बार घर ले चल, अब तुझे कभी नहीं सताऊँगा...

अबकी उसकी घुटी हुई हिचकियाँ सतनाम के कानों तक पहुँचती है, वह अपने होंठों पर उंगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा करता है। अपने में गुम अब तक वह अपने आसपास से बेखबर बैठा था, अब ध्यान गया था, सामने ढलान की तरफ झाड़ियाँ हिल रही हैं, कुछ अजीब-सी आवाज़ आ रही है। कश्मीरा अपनी सिसकी रोकने के लिए अपना गला दबोच लेता है। उनके आगे-आगे चलता एजेंट एकदम से झाड़ियों में छलांग लगा कर गायब हो जाता है! वे सब के सब अंधेरे में आँखें फाड़-फाड़ कर देखने की कोशिश में एक जगह खड़े रह जाते हैं। नीचे, दूर ढलान में तेज रोशनी की लकीरें इधर-उधर चकराती दिखती है, साथ ही कुछ लोगों के बोलने की अष्टपष्ट-सी आवाज़ें, किसी कुत्ते की भौंक। वे दम साधे खड़े रहते हैं, आसपास बेतरतीव बिखरे चट्टानों की तरह निश्चल! जाने कितनी देर।

यहाँ पाईन और ओक के ऊंचे, दैत्याकार पेड़ आकाश को छू रहे हैं। इतने सघन की एक टुकड़ा आकाश नहीं दिख रहा। जैसे महीन बुनी दुशाला! चारों तरफ स्याह अंधेरा और पत्थर-सा अडोल सन्नाटा। दूर-दूर तक। बीच में बस रह-रह कर जंगली बिल्ली जैसी इस डाल, उस डाल गुर्राती फिर रही हवा और रैवेन की कर्कश चीख...

सबकी जुबान तालू से जा चिपकी है। डर कतार बंधी चींटियों की तरह नसों में धीरे-धीरे चल रहा है। आँखों की पुतलियाँ फैली हुई हैं। अब! अब वे पकड़े जाएँगे, अब धकेल दिये जाएँगे किसी दम घोंटू कैद में! फिर वही मार, जिल्लत और भूख-प्यास...

सुनहरी लपट में धधकते सिबो का गुलमोहरी चेहरा वो देखता रह गया था। कब वो कौवे-सी कर्कश लड़की एक सुन्दर राजहंसिनी में तब्दील हो गई, उसे हैरत हुई थी। सिबो ने उसे देख कर भी नहीं देखा था। वही मिजाज, वही तेवर...

रशिया का बार्डर पार करते हुये वे पकड़े गए थे। दस दिन तक एक किले जैसे जेल में बंद रखे गए थे। खाने के लिए बस बंद गोभी का ठंडा सूप और बेस्वाद ब्रैड के मोटे टुकड़े। जिस काजल की-सी कोठरी में वे रखे गए थे उस में दिन के समय भी रात-जैसा अंधकार छाया रहता था। हर सुबह चार बजे के करीब एक सिपाही आ कर जो सामने मिलता था उसे पकड़ कर ले जाता था और उससे जेल के गंदे लैट्रिन धुलवाता था, नालियाँ साफ करवाता था।

इससे बचने के लिए उस छोटी-सी कोठरी में सारे लड़के टोकरी में बंद केंकड़ों की तरह खींचते-धकेलते एक-दूसरे के पीछे छिपने की कोशिश करते रहते। मगर होता वही जो हर दिन होता था — कोई ना कोई बंदा सिपाही के हाथ पड़ जाता और फिर उसकी दुर्गति होती। कश्मीरा भी एक बार फंसा था। उस दिन उसे लगा था, उल्टी के साथ अपनी अंतरियाँ भी नाली में उलट आयेगा।

इस बीच कोई उनसे किसी तरह की पूछताछ नहीं करता था। यह हालत और भी बुरी थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था ये रुसी आखिर क्या करने वाले थे उनके साथ। सुनी हुई तरह-तरह की कहानियाँ और भी डरा रही थी उन्हें। कोई कह रहा था, ये अक्सर गैर कानूनी ढंग से आने वाले विदेशियों को गोली मार कर जेल के अहाते में गाड़ देते हैं। जमीन में दबी लाशें इनकी सब्जी की फसल के लिए खाद का काम करती हैं। तभी तो इनके बंद गोभी फूट बॉल की तरह बड़े-बड़े होते हैं! रोज पीते हैं ये बंद गोभी का सूप! सुन कर सब भीतर ही भीतर काँपते रहते। जेल के अहाते में सब ने देखी थी बंद गोभी की क्यारियाँ! अब आते-जाते क्यारियों में उगे बड़ी-बड़ी बंद गोभी उन्हें कैदियों की मुंडियों जैसी लगतीं!


आठ-दस दिन की लंबी प्रतीक्षा के बाद आखिर एक दिन एक लाल चेहरे वाला रूसी हाथ में डंडा ले कर कमरे में आया था और चीख-चीख कर कुछ बोला था। उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ा था। वे बस भय से एक कोने में सिकुड़े-सिमटे उसकी तरफ टुकुर-टुकुर देखते रहे थे। कोई जवाब ना पा कर अब वो रूसी चिल्लाया था — सोनिया गांधी? राजीव गांधी? उस विदेशी के मुंह से सोनिया गांधी, राजीव गांधी का नाम सुन कर सबकी जान में जान आई थी। लगा था, बच गए। अबकी बार सब उत्साह से भर कर कोरस में बोले थे — यस! यस! मगर उनका जवाब सुनते ही जाने क्या हुआ था, रूसी भालू की तरह गुस्से से भुनभुनाते हुये उन पर डंडा ले कर पिल पड़ा था और देर तक भयंकर पिटाई करने के बाद उन्हें अधमरा कर बोर्डर के बाहर फिंकवा गया था। बाद में अपने फटे होंठ से खून पोंछते हुये सतनाम ने बोला था, यार गल्त बोल गया। राज कपूर, नर्गिस का नाम लेना था। ये रूसी उनके बड़े फैन होते हैं!

उस हादसे के बाद वे डरे हुये जानवर-से चौकन्ने रहते हैं हर समय। एक-एक कदम सावधानी से रखते हैं, इधर-उधर देखते हुये। एजेंट पंछी या किसी जानवर की आवाज में इशारा करते ही वे सब इधर-उधर छिप जाते हैं, घंटों बिना हिले-डुले एक जगह भूखे-प्यासे पड़े रहते हैं। रात-दिन निरंतर भीतर बने रहने वाले इस अनाम डर ने जैसे उनका खून सोख लिया है। जब वे इस सफर में निकले थे, उनके भीतर उम्मीद और हौसला था। साथ सबके देखे हुये सपनों की गठरी और उन्हें पूरे करने का इरादा। और अब… इन कुछ ही दिनों की भूख, मार और रात-दिन के डर ने उनकी आँखों के सितारे बुझा दिये थे। वे बस हाँका पड़े जंगल के भयभीत पशुओं की तरह भाग रहे थे। जाने किस तरफ! दिशाएँ गडमड हो गई थीं।

अपने वतन में हर दिशा, हर रास्ता अपना हुआ करता था। अब तो पैर के नीचे की जमीन भी पराई है! एक नए किस्म के डर ने, एहसास ने उन्हें इन दिनों जकड़ लिया है। इससे वे पहले वाकिफ नहीं थे। निरंतर भागते-दौड़ते कश्मीरा को बस इतना याद है कि जब वे गाँव से चले थे, नया चाँद हँसुली भर था, आज जो दिखा तो लगभग गोल। देश में चाँद लेटा-सा दिखता था, इधर जैसे खड़ा हो! इसी से उसने अनुमान लगाया था, वे पूरब से काफी दूर पश्चिम की ओर निकल आए हैं। इससे पहले जब भी उसने या दल के किसी ने एजेंट से कुछ पूछने की कोशिश की है, एजेंट ने भद्दी गाली दे कर उसे चुप करा दिया है।

शुरू-शुरू में कश्मीरा का खून खौल उठता था। एक बार विरोध करने पर उन लोगों ने उसे बुरी तरह पीटा था। किसी ने उसकी मदद नहीं की थी। आँखों में खौफ लिए चुपचाप उसे पिटते हुये देखते रहे थे। मदद करते भी तो कैसे! इस परदेश में वे हर तरह से मजबूर थे। ये विदेशी एजेंट जानवरों की तरह खतरनाक और बेरहम थे। बात-बात पर टूट पड़ते थे। मुंह में हमेशा गाली। हिन्दुस्तानी एजेन्टों ने जिस दिन से उन्हें इन विदेशी एजेन्टों के हवाले किया था, उनका बुरा वक्त शुरू हो गया था। जुबान ना समझने की त्रासदी कितनी विकट हो सकती है, अब जा कर समझा था।

पिछले जाने कितने दिनों से वे इस अंधकार के अतल समुद्र में लगातार डूबे हुये थे। वे यानि उनके सोलह लोगों का दल और दो एजेंट। हिंदुस्तान से सड़क के रास्ते से हो कर वे सब गैर कानूनी ढंग से जर्मनी जा रहे थे। इस काम में पैसा ले कर कुछ एजेंट उनकी मदद कर रहे थे। कई दिन हुये वे सब पंजाब से निकले थे। कश्मीरा नेपाल के बार्डर पर दल के बाकि लोगों से पहली बार मिला था। बस उसके पड़ोस का जग्गा और सतनाम पहले से उसके साथ था। कभी किसी गोदाम में, कभी मालगाड़ी के दमघोंटू डब्बों में तो कभी जहाज के कंटेनर में... मन ऐसे अकबकाता था कि लगता था जान निकल जाएगी। अधिकतर यात्रा रातों को, दिन ढलने के बाद...

इन्हीं यात्राओं के दौरान भूख और ऊब से जन्मी ऊंघ और टूटती-जुड़ती नींद के बीच कश्मीरा बार-बार अपने गाँव, रिश्तों की सुरक्षा और जमीन की ओर लौटता, सबका वही बुद्धू, नाकारा सिरा बन कर...

लोहड़ी के कितने दिन पहले से उनका मुहल्ला-मुहल्ला फेरा शुरू होता था! तब सिबो उससे गज भर लंबी हुआ करती थी। इसलिए खूब रौब भी गाँठती थी। लंबी और सींक जैसी पतली। गले की लम्बी डंठल पर हांडी जैसा सर, मोटी-मोटी काजल लिसरी आँखें! मैदे-सा सफ़ेद रंग! आगे-आगे नाक सिनकती शुतुरमुर्ग-सी चलती थी। जैसे कहाँ की महारानी। बात-बात पर गाली। वो भी माँ-बहनों वाली! सब चिढ़ाते थे उसे — काली जुबान तेरी सिबो, तुझे जोगी चुरा ले जाएगा, बेच देगा अरब के बाज़ार में! सेख ऊंट गाड़ी खींचवाएगा फिर! सिबो बेपरवाह खुरदरी आवाज में ‘सुंदरी-मुन्दरी’ का नाम ले कर ‘दुल्ला-भट्टी’ गाती, साथ वह और बच्चों के साथ कोरस में चिल्लाता — ‘हो’। अपनी फ्रॉक को कमर तक उठा कर सिबो झोली बनाती और उसमें तिल, मूँगफली, मिसरी, फुलिया, गज्जक बटोरती, और अधिक के लिए गृहस्थों से गला चढ़ा कर झगड़ती। ना मिलने पर अक्सर उसे ही गृहस्थों पर कुत्ते-सा छोड़ दिया जाता। सिबो अपनी बांस फटी आवाज में चिल्लाती — ओय सिरा, फोड़ इनकी मटकी, डाल तंदूर पर पानी... मगर कश्मीरा अपना राख़ मला मुंह और गले में रस्सी का फंदा लिए अकबकाया-सा खड़ा रह जाता। बाद में लौटते हुये सारे बच्चे उसे चिढ़ाते, सिबो उसके बाल खींचती — डरपोक कहीं का! जनानी है तू! उन दिनों उसके बाल कंधे तक लंबे हुआ करते थे। बीबीजी ने कोई मन्नत मांग रखी थी।

सतनाम उसे बार-बार टहोका लगाता है, फुसफुसा कर कहता है, अबे उठ, गाँजा चढ़ा रखी है क्या! मगर कश्मीरा कुनमुना कर करवट बदल लेता है। अभी वो बादशाह है, किसी की चाकरी नहीं करेगा! पाँच नदियों के पानी से सींची अपनी हरी-भरी जमीन पर शान से खड़ा है — दिल वालों का पंजाब! उसका पंजाब! उसकी सोंधी, अलबेली महक से लबरेज! आग की लपटों में धधकती गोबर से बनी देवी लोहड़ी की मूरत, तिल, गुड़, मिसरी, रेवड़ी की बरसात के साथ सबका नाचना-गाना — “कंडा कंडा नी लकडियो कंडा सी, इस कंडे दे नाल कलीरा सी, जुग जीवे नी भाबों तेरा वीरा सी… ” फिर सरसों का साग, मक्के की रोटी की दावत, मूली, मूँगफली, गुड, गज्जक के साथ... कंपकंपाती शीत ऋतु के लंबे, ठिठुरे दिनों के बाद गर्म, चमकीले दिनों की शुरुआत का मीठा वादा... बीबीजी जलती आग के चारों तरफ दूध, पानी उड़ेल कर सूरज भगवान को प्रणाम करती, हाड़ कँपाती ठंड में ऊष्मा का वरदान मांगती। कहती थीं, आज से सूरज भगवान उत्तरायण को जाएँगे।

तब कश्मीरा को लगता था, उत्तरायण कोई देश होगा, सूरज भगवान का जगमग-जगमग देश! सूरज के देश में कितनी रोशनी होगी! वहाँ कभी अंधेरा नहीं होता होगा! रोशनी के उस देश में वह भी जाना चाहता था। अपने ऊपर किसी मोटे कंबल-से पसरे अंधकार को देखते हुये उसने अपनी आँखें मूँद ली थी। भीतर भी उतना ही घना अंधकार! काजल काली रात, इस छोर से उस छोर तक पसरी हुई। जैसे ज़मीन में गहरे दफन किसी ताबूत में बन्द कर दिया गया हो! उसकी साँसे चढ़ती जातीं — उफने चनाव के हरहराते जल-सा। उसके कान बजते हैं — कोई दीवाना बारिश की आधी रात टूटते-बहते किनारे पर खड़ा विरहा गाता — हर जमाने में मुहब्बत का हासिल, वही चढ़ता दरिया, कच्चा घड़ा है, सोहनी सुन, री सोहनी सुन... दूर धुयें से कजलायी दो आँखें दीये की बुझती लौ-सी काँपती हैं — रोशनी की तलाश में वह किस अंधेरे के देश में चला आया — जहां तक नज़र जाये, ठंडी, अंधी गुफा में लटके हुये भय के स्याह चमगादड़ और उनकी निरंतर फरफराहट... डर का एक गोला उसके गले में फिर सनसना कर उठता है जिसे वो किसी तरह घुटकता है। आँखों की कोर जल उठती है, वो उन्हें भींचता है — बीबी! चेहरा डबडबाता है जल भरे मेघ-सा...

कितनों ने समझाया था! मामा ने — पुत्तर! ऐसे भी कोई जाता है! जाना हो तो सलीके से जाओ, कनूनी ढंग से। पंजाब के लाखों मुंडे आज दुनिया भर में फैले हैं। अपनी मेहनत और लगन से नाम, दौलत कमाई है। वो चिढ़ गया था — दूसरों का मैं नहीं जानता मगर हम जैसों का क्या? गरीब, अनपढ़... सुन कर मामाजी चुप रह गए थे। बीबी की मिन्नतें याद आती हैं, आते हुये बार-बार पीछे से टोकना, पुत्तरजी तुस्सी ना जाओ! घुटनों का दर्द लिए गाँव के दरवाजे तक चलती आई थी, घर में इतना तो है कि हम दो जनों का गुजारा हो जाय। विदेश में कहाँ भटकता फिरेगा कश्मीरा! तू मेरा इकलौता है... अंत तक वह खीज ही गया था, डपट कर बीबी को वापस भेजा था — बस दो जून की रोटी मिल गई तो हो गया? बीबी, मुझे भी ढेर सारी दौलत कमानी है, दुनिया देखनी है... उस दिन उसकी आँखें दौलत की चमक से चुंधियाई हुई थीं। जाते हुये उसने मुड़ कर एक बार नहीं देखा था, पीछे क्या-क्या छूट रहा है! बीबीजी जाने कब लौट गई थी, दुपट्टे से अपनी आँखें पोंछते हुये। वह अपनी उमंग में बेखबर बढ़ता गया था, इस अंधकार की तरफ! जिंदगी की कीमत पर अशर्फियां मोल लेने… हिसाब-किताब में हमेशा कमजोर था! इस बार तो हर सवाल गलत कर गया! माटसाब कहा करते थे — तेरा कुझ नी हो सकदा जिंदगी इच कश्मीरा! सच ही कहते थे!

तब यही लगता था कि गाँव में क्या बचा है उसके लिए। सारे जवान मर्द तो विदेश चले गए थे। पीछे रह गए थे बच्चे, बूढ़े और जनानियाँ। खेती-बाड़ी के काम बिहारी मजदूरों के भरोसे चल रहा था। बड़ी-बड़ी कोठियों वाला गाँव भूतैला लगता, शाम होते-होते हर तरफ सन्नाटा सायं-सायं कर उठता। तीज-त्योहारों में उदास आँखें, इंतजार करते बुजुर्ग, वेवक्त सयाने बनते जाते बच्चे! ऊब गया था कश्मीरा। गरीबी में पैदा हुआ था और गरीबी में ही अब तक जी रहा था। ना मन का खाना, ना मन का ओढ़ना-पहनना। हर बात के लिए मोहताज।

उसके आसपास के जाने कितने एक-एक कर विदेश चले गए और कुछ ही सालों में अमीर बन कर लौटे। उनके पास विदेशों की कैसी-कैसी कहानियाँ हुआ करती थीं! सुन कर उसे लगता था, कोई परियों का देश होगा जहां हर तरफ खुशहाली और सुख-चैन होता होगा।


इंपोर्टेड स्काच की बोतल खोल कर उसके दोस्त वहाँ की रंगीन जिंदगी की कहानियाँ सुनाया करते, दारू, मुर्गा और गोरी... समझ लो जन्नत है! पंजाबी मुंडे की तो खूब क्रेज है गोरियों के बीच। बस डिस्को में जा और किसी को पटा ले। फिर तो लाइफ सेट है समझ। यानि शादी? वो हैरान हो कर पूछता। दोस्त कंधे उचकाते — अब जो कह ले। वहाँ रहने-कमाने के लिए लाइसेन्स तो चाहिए ना। सुन कर उसका मुंह उतर जाता — ना भई! गोरी लाया तो बीबी घर बाहर करेगी। सुन कर वे हँसते — तो फिर झूठ वाली शादी कर ले — पेपर मैरिज! वो क्या होता है? वो बुद्धू की तरह फिर पूछता। “अरे यार! पेपर मैरिज यानि... दिखावे की शादी, सिर्फ कागज पर। वहाँ की जरूरतमंद लड़कियां पैसे ले कर ऐसी शादी करती हैं। फिर विदेश में रहने-कमाने का हक मिल जाता है। रहने-कमाने के लिए... मगर इन्हें पटाना इतना आसान होता है क्या? कश्मीरा के सवाल खत्म नहीं होते — उनकी जुबान तो नहीं आती, फिर? जवाब में सब ठठा कर हँसते — एक जुबान सबको आती है मूरख! बस वो बोलना आना चाहिए... बस मर्द बन!

सुन कर वह अपने दोस्तों की किस्मत पर रश्क से भर उठता — उसे भी चाहिए यह सब! कोई नई गाड़ी खरीद रहा तो कोई गाँव का दरवाजा बना रहा, गुरुद्वारे में लंगर खिला रहा। गुरमीत ने तो तीन साल में खेत के बीचोबीच पाँच कमरों की कोठी खड़ी कर ली! संगमरमर की सीढ़ियाँ दूर से चमकती दिखाई देतीं। पूरा ताज महल लगता! जिसके निखट्टू बड़े भाई के लिए कोई अपनी बेटी देने को तैयार ना हुआ, उसके छोटे भाई के लिए दरवाजे पर लड़की वालों की भीड़ लग गई। सब पैसे का खेल है। पैसा है तो इज्जत है, गाँव में पूछ है।

हरमिंदर पैसा भेजता तो हर महीने उसके घर दारू, मुर्गे की पार्टी होती, तंदूर सुलगता। आस-पड़ोस के यार-दोस्त नशे की मस्ती में टुन्न हो कर नाचते हुये हरमिंदर को विडियो कॉल कर बार-बार उसकी तस्वीर को चूमते, उसका बूढ़ा बाप हाथ उठा कर ज़ोर-ज़ोर से उसे असीसता — ओय जिंदा रह पुत्तर! जिंदा रह! बाद में हरमिंदर ने लौट कर उसे एक बार पी कर रोते हुये बताया था, यहाँ सब समझते हैं वे वहाँ मजे में है मगर अपनी क्या हालत है हम ही जानते हैं। चाइनिज रेस्तरा में बड़ी-बड़ी भट्टियों के बीच घंटों काम करना पड़ता है। कई बार लगता है, गर्मी और तनाव से दिमाग फट जाएगा। एक हाथ से भारी वॉक उठा कर फ्राइड राइस भूनते हुये हाथ सुन्न पड़ गया है, खड़े रह-रह कर पैरों में वेरिकोस वेन का प्रोब्लेम हो गया है, रस्सी जैसी गांठ पड़ी, तनी नसें... इन बेरहम गोरों के देश में जीने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता. दर-दर भटकने, जिसकी-तिसकी चाकरी करने से ले कर बूढ़ी मेमो को खुश करने तक... इन विदेशों की रंगिनियों के पीछे की असली कहानी का पता काश यहाँ के लोगों को होता!

मगर कश्मीरा ने तब इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था। वह तो किसी तरह विदेश जाना चाहता था। औरों की तरह नशा करके वहाँ खत्म नहीं होना चाहता था। उसके साथ का वीरा, जोगी ड्रग्स ले कर एड़ियाँ रगड़ते हुये मर गया। बड़ी दर्दनाक मौत मिली उन्हें। आखिरी दिनों में ड्रग्स के लिए पैसे जुटाने के लिए अपनी माँ की जान ली, भाई पर चाकू चलाया, चोरियाँ की, जमीन-जायदाद बेचे... उनकी हालत देख कर कश्मीरा बहुत डर गया था। लगा था, वहाँ रहा तो उसे भी नशे की लत लग जाएगी।

स्कूल के दिनों में उस पर भी जाल फेंका गया था। कुछ दिन के लिए वह उस में फंसा भी था। स्कूल के बाहर चाट-पकौड़े के ठेले लगाने वाले बच्चों में नशे की पुड़ियाँ बांटते और जैसे ही उन्हें इसकी लत लगती, उनसे पैसा वसूलना शुरू कर देते। फिर ड्रग के लिए बच्चे जुर्म की दुनिया में दाखिला हो जाते। वे इसके लिए पहले घर में छोटी-मोटी चोरियाँ करते फिर बाहर अपराध शुरू होता।

पुराने खंडहरों में बिखरे खाली बोतलों, सीरिंज के बीच लड़के दुनिया-जहान से बेखबर अपनी सुई से छलनी बाहें लिए पड़े रहते। जोगियों-अघोरियों का डेरा लगता उनका आस्ताना। उनकी पीली, चढ़ी हुई आँखों में तितलियों के उड़ते जत्थे होते, नीले-गुलाबी बादल होते। पीठ बन गए पेट में मरी हुई भूख और दुबली बाँहों की रस्सी-सी ऐठी नसों में जहर की नीली नदी! गलियों में चलते-फिरते लाश की तरह लगते जवान लड़के। गड्ढे में धँसी आँखों में बस सन्नाटा और खोयापन होता। वे पूरी दुनिया से कट कर जाने किस दुनिया में जा बसते थे। गाँव के हर दूसरे-तीसरे घर की यही कहानी थी। नशे के चक्कर में कश्मीरा का स्कूल छूटा था, मगर गोल्डी की मौत ने जैसे उसे झिंझोड़ कर जगा दिया था।

गोल्डी उसका बचपन का दोस्त था। वह बेतरह डर गया था। कंकाल बनी गोल्डी की लाश खंडहर में पड़ी थी। जब तक गोल्डी की अंधी माँ ने गाँव वालों की मदद से उसे खोज निकाला था, उसकी सड़ी लाश आवारा कुत्ते आधा खा चुके थे। गोल्डी की माँ नाक पर दुपट्टा धर कर बोलती रही थी — ये कौन है? ये मेरा गोल्डी नहीं हो सकता। कोई जानवर मरा है। कितनी बदबू आ रही है! उस दिन कश्मीरा को गोल्डी की लाश में अपना हश्र दिख गया था। बाद में उसके मामा जी आ कर उसे बिहार ले गए थे। वहाँ उनका एक छोटा-सा ढाबा था। वहाँ दो साल रह कर वह अपने पिताजी के देहांत होने के बाद अपने गाँव लौट कर आया था। इधर-उधर छोटे-मोटे काम करते हुये दिन गुजारता रहा था।

और फिर एक दिन इसी लोहड़ी में उसे सिबो मिली थी, कई साल बाद। बच्चों के साथ लोहड़ी से पहले घर-घर ‘दुल्ला भट्टी’ गाते हुये कमर तक अपनी फ्रॉक उठा कर रेबड़ियाँ इकट्ठा करते हुये उसके पिता ने उसे देख लिया था और बांस की कन्नी से पीटते हुये घर ले गया था। उसके बाद उसने सिबो को नहीं देखा था। किसी ने बताया था, उसका स्कूल भी छुड़ा दिया गया है।

सुनहरी लपट में धधकते सिबो का गुलमोहरी चेहरा वो देखता रह गया था। कब वो कौवे-सी कर्कश लड़की एक सुन्दर राजहंसिनी में तब्दील हो गई, उसे हैरत हुई थी। सिबो ने उसे देख कर भी नहीं देखा था। वही मिजाज, वही तेवर...

उस रात लोहड़ी की आग बुझते-बुझते वो अपने भीतर एक नई आग ले कर घर लौटा। बीबी ने बेटे की चढ़ी हुई गुड़हल जैसी आँखें देखी तो सहम गई — किधर गया था पुत्तर, कैसी हवा छू गई! कश्मीरा दीवानगी भरी हंसी हंसा था, है एक चुड़ैल बीबी... सुन कर बीबी को काठ मार गया, उसे इसी बात का डर था। अपने बेटे की जवानी पर उसकी आँखें सहमती रहती थी। बार-बार नून-राय, मिर्ची से नजर उतारती। कहते हैं, माँ की नजर सबसे ज्यादा बच्चों को लगती है। कैसा ऊंचा-लंबा कद निकला है, कैसी चौड़ी छाती! दूध दूहते, चारा काटते हुये बांह की मछलियाँ धड़-धड़ ऊपर-नीचे चढ़ती हैं, खाली हाथों से गन्ने की मजबूत लाठियां तोड़ कर दो टुकड़े कर देता है! गाँव-घर वाले कहते, पचास-पचास कोस में कोई ऐसा मर्द नहीं निकला। गुरुदासपुर वाली! तूने रतन जना है, रतन! सुन कर बीबी फुली नहीं समाती, बार-बार पहाड़ों वाली के आगे मत्था टेकती — बस अपनी किरपा बनाए रखना माता रानी!

मन ही मन गाँव-घर के फेरे लेते हुये कश्मीरा की आँखें जाने फिर कब झपक गई थी। नींद लगी होगी कुछ देर। पिछले कई दिनों से उन्हें ना ठीक से सोने मिला था ना आराम। अधिकतर समय खाना भी नहीं। लगातार सफर। कई बार बिना रुके घंटों। जग्गा ने कंधे से पकड़ कर हिलाया तो चौंक कर जागा — यूं बिना हिले-डुले चुपचाप सो गया तो किसी दिन मर जाएगा इन जंगलों में कश्मीरा! खून जम जाता है ठंड में, हाइपोथर्मिया! पता है? चल एजेंट वापस लौट आया है। कश्मीरा को नींद की खुमारी में ठीक से समझ नहीं आ रहा था कि वो कहाँ है। अभी उसके चारों तरफ सरसों का सुनहरा दरिया लहरा रहा था, सूरजमुखी की फसल झूम रही थी और अब ये कुहासे में लिपटा घुप्प अंधेरा... नशे की-सी हालत में वह चुपचाप गडमड सायों के पीछे चलता रहा था। जब आगे चलता एजेंट इशारे से उन्हें रुकने के लिए कहता, वे सब रूक जाते और जब तक एजेंट ना कहता, अपनी जगह से हिलते भी नहीं। कई बार देर तक वे लंबी, भीगी घासों में पेट के बल लेटे रहे। गरम कपड़ों के अंदर भी तेज चलती बर्फानी हवा जैसे चाकू की तरह उनकी खाल उधेड़े दे रही थी। हाथ-पैर पानी की तरह ठंडे, गीले-गीले महसूस हो रहे थे। पंजों के आगे उँगलियाँ शून्य। गिर गए हों जैसे। कान की लवे बेतरह दुखते हुये। नाक से निरंतर पानी बह रहा था।

उनके एजेंट ने उन्हें समझाया था, रात के तीसरे पहर तक वे फ़्रांस का बार्डर पार कर जाएँगे। फिर जर्मनी! जैसे-जैसे वे पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ते जा रहे हैं, सुबह का उजाला जल्दी फैल रहा है। इन दिनों तो ऐसा लग रहा था जैसे रात का अंधेरा पूरी तरह छा ही नहीं रहा। आकाश फीकी स्याही-सा देर रात तक दिखता है। चार बजते-बजते फिर सुबह की रोशनी फैलने लगती है। वैसे घने जंगलों के बीच दिन के समय भी अंधेरा-सा छाया रहता है और अपनी इस यात्रा के दौरान अधिकतर वे घने जंगलों या किसी गोदाम, पुरानी इमारत में छिपते रहे थे। उन्हें ठंड पड़ने से पहले किसी भी तरह जर्मनी पहुँचना था वरना वे बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं। एक बार बर्फ गिरनी शुरू हो गई तो इन घने बीहड़, पहाड़ और नदियों को पार करना नामुमकिन हो जाएगा। भूटान की सीमा पर आगे के लिए हरा सिग्नल ना पाने की वजह से वे हफ्ते भर तक पहले ही फंसे रह गए थे।

वे कुछ दिन बहुत बुरे बीते थे। बस्तियों से दूर किसी जंगली इलाके में एक वर्षों से बंद पड़े गोदाम में उन्हें बंद करके रखा गया था। आसपास चरवाहे अपनी मवेशियों को चराने के लिए आते थे इसलिए उन्हें कोठरी से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। किसी तरह की आवाज करने की भी नहीं। सारा दिन वे बड़े-बड़े खाली पीपों और जूट के बोरों के बीच भूखे-प्यासे पड़े रहते थे। आसपास कहीं कोई जानवर मरा था शायद। दुर्गंध से उनका बुरा हाल था। उसी कोठरी के एक तरफ अखबार या कोई भी कागज, पत्ते बिछा कर वे शौच करते और पीपों में पेशाब। कई दिन हो गए थे उनके नहाये या मुंह धोये। सब भीगे जानवर-से बसा रहे थे। सर और कपड़ों पर जूयें पड़ गई थी।


देर रात उनके एजेंट आ कर उन्हें पानी और सूखे ब्रेड खाने के लिए देते थे। कुछ मांगने या शिकायत करने पर गंदी गाली और मार। उनके काबू में आते ही ये एजेंट जल्लाद-से हो गए थे। चुपचाप उनकी धौंस सहने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं था। कुछ ही दिनों की भूख-प्यास और डर में सबके वजन घट कर आधा हो गया था।

बस भारत से नेपाल तक की यात्रा आसान रही। वीसा की भी जरुरत नहीं, पासपोर्ट ही काफी। असल मुश्किल शुरू हुई नेपाल से तिब्बत तक की सिल्क रूट यात्रा में। रास्ते में नजारे जीतने खूबसूरत थे, दुश्वारियां उतनी ज्यादा। नाथुला पास से यडोंग तक एक तरह से वे रेंगते हुये पहुंचे। यडोंग से गंगटोक, सिक्किम के बीच पास की भी जरूरत नहीं पड़ी। जाने एजेन्टों ने कैसी जुगत भिड़ाई थी वरना विदेशी सैलानियों को चंगु झील से आगे जाने की इजाजत नहीं थी। नेपाल से किसी टूर ऑपरेटर की मदद से पास का बंदोबस्त किया गया था। तिब्बत में घुसने के लिए ग्रुप पर्मिट की भी व्यवस्था की गई थी। यह इक्कीस दिनों के लिए जारी किया जाता है। ग्रुप पर्मिट के होने से चाइनिज वीसा की जरूरत नहीं पड़ती थी। वैसे बताया गया था, जिंजियांग छोड़ने के लिए चाइनिज वीसा चाहिए होता है। टूर ऑपरेटरों ने चाइनिज बोलने वाले गाइडों का बंदोबस्त किया था। इससे बहुत सहूलियत हो गई थी। ये गाइड हमेशा गुस्से में होते थे, मगर मजे की बात ये थी कि जब ये आग बबूला हो कर गंदी-गंदी गालियां देते थे, तब भी यही लगता था, वे मुस्करा रहे हैं। बंद गोभी जैसे गोल-गोल चेहरे पर मिची-मिची आँखें और बातों में ‘ची-चू’ की ध्वनि उन्हें खुश मिजाज दर्शाते।

यात्रा के शुरू-शुरू के दिनों में वे बार-बार पूछते, और कितनी दूर जाना है? जर्मनी कब आयेगा? उनके सवालों पर एक बार एक एजेंट ने मोंटी को कस कर थप्पड़ मारा था — भैंण का... अभी से जर्मनी-जर्मनी! 5785 किलोमीटर! 3595 मील! पचास किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से बिना रुके दौड़ा तो भी 115 घंटे लगेंगे, समझ गया? सुन कर आगे से किसी की यह सवाल करने की हिम्मत नहीं हुई थी। उसके बाद शिगाट्से से हाँफते-धौंकते उनका दल ल्हासा तक ‘फ्रीडम हाइवे’ के जरिये पहुंचे थे। इस बीच उन्हें जाने कैसी-कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। खास कर खाने-पीने को ले कर।

पहली बार याक के दूध से बने चीज खा कर कश्मीरा को उल्टी आ गई थी। अजीब बदबू-सी थी उस में। मोमो, नूडुल, बालेप-ब्रैड आदि तो वे खा लेते थे मगर थुकपा यानि सब्जी, नूडुल और मीट से बना शोरबा खाना, वह भी चाप सटीक से, उनके लिए आसान नहीं था। शाफाले यानि मीट और बंद गोभी के साथ ब्रैड खाना भी उतना ही मुश्किल था मगर सारा दिन भूखा-प्यासा रहने के बाद उन्हें जब थोड़ा-सा खाना मिलता था, वे इंकार नहीं कर पाते थे।

याक का मीट पहली बार खा कर बंदूक सिंह बीमार पड़ गया था। उसे शायद फूड पायजन हो गया था। मीट खराब था। कई दिनों तक उल्टी करते हुये उसे तेज बुखार के साथ यात्रा करनी पड़ी थी। गैर कानूनी ढंग से विदेश में होने की वजह से उसे किसी डॉक्टर से दिखाया नहीं जा सकता था। सुना था, एक बार जर्मनी में जब कोई अपने छिप कर रह रहे बीमार दोस्त के बदले खुद डॉक्टर के पास जा कर दवाई लेने की कोशिश की थी, डॉक्टर ने बीमारी के लक्षण सुन कर उसे ही सुई लगा दी थी! इसलिए डॉक्टर के पास जाने का सवाल नहीं था। आखिर जब बंदूक की हालत बहुत बुरी हो गई थी और वह किसी भी तरह आगे चल नहीं पा रहा था, एक चरवाहे की झोंपड़ी में उसे छोड़ दिया गया था।

उसे उस गैर मुल्क में इस हालत में छोड़ कर आते हुये उन सब का दिल भर आया था। आते हुये बंदूक उन्हें जाने किन नजरों से देख रहा था। बुदबुदा कर किसी तरह कहा था — यारों, मुझे छोड़ कर जा रहे हो! देख लेना, मैं नहीं बचूँगा। कश्मीरा ने किसी तरह डरते हुये एजेन्टों से पूछा था — इसे कुछ हो गया तो? एक एजेंट ने लापरवाही से कहा था, मर गया तो किसी खाई में लाश फेंक देंगे। कभी किसी को नहीं मिलेगी। बच गया तो दूसरे दल के साथ आ जाएगा। सुन कर सब सकते में आ गए थे। उस समय एक ट्रक में उन्हें मवेशियों के साथ ठूँसा जा रहा था। उसी तरह उन्हें आगे की कई दिनों की लंबी यात्रा करनी थी।

 जी 219 हाइ वे पकड़ कर वे जिंजियांग से बार्डर टाउन काशगर पहुंचे थे। फिर आईशा बीबी इलाके से होते हुये कजाकिस्तान। आईशा बीबी और चोंग काफ्का के बीच की सड़क सीधी है और कई बार लगता था एकदम आसमान से जा कर मिली है। इन कुछ दिनों में उन लोगों ने इतने तरह के लोग देखे थे, इतनी बोलियाँ सुनी थी और इतने तरह और स्वाद के खाना खाये थे कि उंगली पर गिनना मुश्किल। मोंटी कहता — ले, मुझे तो लगता था दुनिया जालंधर से शुरू हो कर भटिंडा पर खत्म होती है! ये तो इतनी बडडी है! गुरमीत हैरानी से पूछता — मगर जालंधर से ले कर भटिंडा तक ही क्यों? तो जवाब परमीत ने दिया था — क्योंकि जालंधर इसके बाप का घर और भटिंडा इसके मामू का। सुन कर गुरमीत इतनी तकलीफ में भी हंस कर लोट गया था। उसके लोटने से खांचे में भरी मुर्गियाँ एक साथ शोर मचाने लगी थी। फिर एक दलाल ने गाड़ी रुकवा सामने की सीट से उतर कर उसे कई लातें मारी थी — बहुत हंसी आ रही है? पकड़ेगी कजाकिस्तान की पुलिस तो मार डंडे के पैंट गीली हो जाएगी!

इसके बाद कितने देश, कैसी-कैसी सरहदें और कितनी सारी मुश्किलें! उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अजरबैजान… इनके आगे पूरबी यूरोप — जॉर्जिया, टर्की, रशिया का कुछ हिस्सा। अजरबैजान से जार्जिया जाते हुये बीच में लगोदेखी जगह की खूबसूरती ने सफर की थकान कम कर दी थी। मोंटी ने कहा था, मेरे लिए दुनिया यही खत्म होती है यार! तुम सब चलो, मैं यही बस लूँगा।

सुन कर जाने क्यों कश्मीरा को याद आया था, सीबो का माहिया गाना —

जे उठ चल्लियों चाकरी, चाकरी वे माहिया,
सान्नू वी लै चल्लीं नाल वे,
...इक्क ट्का तेरी चाकरी, चाकरी वे माहिया,
लख्ख टके दा मेरा सूत वे...

जिस सूत को सादा समझा था, वो सचमुच बहुत कीमती निकली, यूं जान उलझ कर रह गई उस में... कश्मीरा आजकल गिरह-गिरह वही सुलझाने की कोशिश में रहता है मगर और-और उलझता जाता है। बहुत महीन, बहुत गझीन है कुछ! आँखों से नहीं दिखता मगर रूह तक को बांध लेता है, कुछ ऐसे...

आते वक्त सिबों से मिलने की हिम्मत जुटा नहीं पाया था। जानता था, वो खड़ी रही होगी सूरज डूबने तक कनाल के किनारे। अक्सर वही मिलते थे दोनों। जब तक सूरज का लाल गोला उनकी परछाइयाँ समेट कर पश्चिम में डूब नहीं जाता था। फिर वे एक जिस्म हो जाते थे, बिना परछाइयों वाला...

पिछली बार सिबो ने अपना रिश्ता चलने की बात बताई तो वह गुस्से में उठ आया था — ठीक तो है सिबो! तू अपने माँ-बाप की इकलौती है, तेरे लिए अच्छा ही चाहेंगे तेरे घर वाले। और मैं ठहरा अनपढ़ जाट, मवेशियों की देख-भाल करने वाला... ”सुन तो! कहाँ चला...” सिबो उसके पीछे-पीछे दूर तक आई थी — “तू जानता है, मुझे तेरे सिवा...” “जानता हूँ!” कश्मीरा ने बीच में ही उसकी बात काट दी थी — “मगर इस दुनिया को तो बाकी सब कुछ चाहिए ना! अब लौटूँगा तो तेरे काबिल बन कर वरना...” उसकी बात सुन सिबो रोने लगी थी मगर वह रूका नहीं था।

घर आ कर सीधे सरपंच से अपनी जमीन की बात की थी और रुपये ले कर एजेंट के पास पहुंचा था — मुझे जैसे भी हो बार्डर पार करवा दो पाजी! इसके कुछ दिन बाद वह मुंह अंधेरे नेपाल की ओर निकल गया था, जग्गा, सतनाम के साथ!

आज शायद उनका सफर अपने अंजाम तक पहुंचे। वे 450 किलोमीटर लंबे फ़्रांस, जर्मनी के बार्डर पर खड़े हैं, शायद schengen — शेंगेन गाँव के आसपास कहीं। जाने कितने युद्ध और संधियों के बीच इस बार्डर की रेखाएँ बनी, बिगड़ीं और मिटीं! अब जो सामने है वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद तय हुआ। घने पेड़ों के बीच से झाँकते खेत-खलिहान, सड़कें और लाल टाइल्स वाले घर... सब कुछ कहानियों में सुने परियों के देश-सा! उतना ही सुंदर, साफ-सुथरे। जैसे ट्रे पर सजे हो! सफ़ेद धूप में चमचमाते हुये! सब मंत्रमुग्ध-से देखते रह गए थे।

एजेंट ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में बताया था, उन्हें अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ेगा। सुबह होने से पहले तीन बजे के करीब उन्हें बार्डर पार करना होगा। यहाँ सुरक्षा प्रबंध बहुत चाक-चौबन्ध होता है। मगर उन्हें खतरा मोल लेना ही पड़ेगा। और कोई चारा नहीं। बेहद सावधान रहने की जरूरत है। बार्डर के दूसरी तरफ उन्हें दो टर्की एजेंट ट्रक से किसी गाँव के बाहर तक छोड़ आएंगे। उसके बाद उनकी ज़िम्मेदारी खत्म।

कश्मीरा, जग्गा और सतनाम को लेने बर्लिन से जितेंदर आने वाला है। उसके जीजाजी के होटल ‘महाराजा’ में उन्हें ब्लैक में फिलहाल नौकरी करनी पड़ेगी। हर तरह के काम। खाने, रहने का तो बंदोबस्त हो जाएगा मगर अभी कोई तनख्वाह नहीं। आगे की आगे देखी जाएगी।

कश्मीरा अपने दल के साथ सारा दिन लंबी, सूखी घास के लहराते दरिया में डूब कर भविष्य के सुनहरे सपने देखता है। आज खाना नहीं, पानी नही, कोई बात नहीं! वो खुश है, बहुत खुश है। उसके सपने पूरे होने जा रहे। अब गाँव वाले उसे निकम्मा नहीं कहेंगे, बीबी को उस पर नाज होगा। और सिबो...? वो आँखें मूँदे सिबो का खुशी से झिलमिल करता चेहरा देखता है। सिबो बस साल भर मेरा इंतजार कर लेना। फिर बस हम होंगे और हमारी दुनिया। ये डर, पहरे — कुछ नहीं! घर लौटते वक्त वह सिबो के लिए ढेर-से तोहफे ले जाएगा। कपड़े जैसे मेमें पहनती हैं। मन ही मन वह खरीददारी करता है — धूप का चश्मा, टोपी, छ्तरी...

यहाँ का आसमान कितना नीला है! कांच-सा चमचमाता! धूप एकदम सफ़ेद। हवा हल्की और सूखी। जिस्म पर रेशम के फूलों-सी फिरती! हर तरफ जंगल का ताजा कच्चा हरा रंग और उसके बीच बादामी, भूरे और लाल-कत्थई रंगों के आकाश छूते पेड़। देखते हुये कश्मीरा जाने कब सो गया था — एक गहरी सुकून वाली नींद! आश्वस्ति और आराम मिलते ही नींद आँखों में टूट कर आई थी। नीली-हरी चमकदार तितली और रंग-बिरंगे फूलो की अनगिन क्यारियों वाली नींद! वो नींद जिस में सपने भी दबे पाँव आते हैं… कितने दिनों बाद तो सचमुच सोया था कश्मीरा, अपनी मंजिल से कुछ कदमों की दूरी पर, मीठी नींद के सरहाने पर सर रख कर बेखबर!

जाने रात का क्या बजा था जब सतनाम ने उसे हल्के से हिलाते हुये उठाया था — कश्मीरा उठ! अब चलना होगा... कश्मीरा ने आँख मलते हुये देखा था, चारों तरफ अंधेरा है। मगर झुरमुटों के पार चमकता हुआ आकाश। कहीं चाँद होगा, पश्चिम की ओर दूर तक उतरा हुआ। जाने वह कितनी देर सोता रहा। उठते ही दूर जर्मनी के गाँव की रोशनियां दिखी थी। पीले सितारों की कतार, रोशनी के जलते-बुझते मीनार, बिल बोर्ड्स...

अब उसने धीरे-धीरे तेज होती हवा को महसूसा था। एजेंट ने फुसफुसा कर कहा था, कभी भी बारिश शुरू हो सकती है, हमें चलना होगा। उसके दल के सोलह लोग दबे पाँव ढलान की ओर उतरने लगे थे। डरे और चौकन्ने! कश्मीरा सब से पीछे था। घुटने के जख्म की वजह से जल्दी चलने में उसे परेशानी हो रही थी। एजेंट बार-बार जल्दी चलने की ताकीद कर रहा था। लगभग 50 मिनट सावधानी से चलते हुये वे पहाड़ी के नीचे उतर आए थे। सामने एक छोटा-सा पहाड़ी नाला बह रहा था। बादलों के पीछे छिपते चाँद की हल्की चाँदनी में नाले का पानी रह-रह कर चमक रहा था। एजेंट ने दबी आवाज में कहा था, नाले के उस तरफ जर्मनी है। यहाँ का फेंस कई जगह से चौड़ी है। उन्हें नाला पार कर फेंस के उस तरफ जाना होगा। उन सब ने चुपचाप सहमति में सर हिलाया था और नाले में उतर पड़े थे। नाले में पानी गहरा नहीं, मगर धार तेज थी। ठंड भी। उनके उतरते ही अचानक बारिश शुरू हो गई थी। पहले हल्की फिर तेज। फिसलन भरे पत्थरों की वजह से कश्मीरा को आगे बढ़ने में दिक्कत हो रही थी। सतनाम बार-बार उसके लिए रुक रहा था। एजेंट इशारे से जल्दी चलने के लिए कह रहा था। इस बीच बारिश काफी तेज हो गई थी। थोड़ी ही देर में पूरा माहौल बदल गया था। उन्हें देखने में भी तकलीफ हो रही थी मगर टॉर्च एहतियातन नहीं जला रहे थे।


और फिर लंगड़ा कर चलते हुये कश्मीरा फिसल कर तेज छ्पाके के साथ पत्थरों पर गिरा था। इसके साथ ही अंधेरे में कई टॉर्च की तेज रोशनी एक साथ जल उठी थी। कुत्ते भी भौंकने लगे थे। कहीं पास ही। एकदम से बारिश में स्तब्ध भीगता जंगल भारी बूटों की धमक से भर गया था। जंगल के स्याह दीवार के पार से दो चापर तेज रोशनी फेंकता हुआ किसी जादू की तश्तरी की तरह निकल आया था।

सब कुछ इस आकस्मिकता से घटा था कि सब कुछ देर के लिए भौंचक-से रह गए थे और फिर हाँका पड़े जंगल के जानवरों की तरह इधर-उधर भागने लगे थे। कश्मीरा गले तक पानी में डूबा एक ही जगह अवश खड़ा रह गया था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था, आसपास क्या घट रहा है। डर और ठंड की अधिकता में वह थर-थर काँप रहा था। सतनाम एक-दो बार उसे उठाने की कोशिश कर अंधेरे में जाने किस तरफ भाग खड़ा हुआ था। कुत्ते भौंकते हुये बहुत करीब आ गए थे। मेगा फोन से लगातार कुछ घोषणा की जा रही थी। कश्मीरा ने चमकती बिजली की रोशनी में तीन-चार परछाइयों को फेंस के उस तरफ कूदते हुये देखा था। देखते ही पूरी ताकत लगा कर उसने पानी से निकल कर फेंस की तरफ भागने की कोशिश की थी और इसके साथ ही एक गोली सनसनाती हुई आ कर उसके गले में लगी थी। वह बिना कोई आवाज किए त्योरा कर गिरा था। पानी में एक तेज छ्पाके की आवाज भौंकते हुये कुत्तों की आवाज में दब गई थी। ऊपर चकराते चापर की तेज रोशनी के वृत्त में फ़्रांस के बार्डर सेक्यूरिटी अफसरों ने हिंसक उल्लास और घृणा के साथ देखा था — एक बीस-बाईस साल का लड़का रक्त के लाल कुंड में डूबा पड़ा अपनी खुली हुई विस्फारित आँखों से बार्डर की ओर देख रहा है। उसके आसपास चश्मा, टोपी, छतरी के साथ कुछ सपने बिखरे पड़े हैं... ये किसी ने नहीं देखा!


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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