6 लघु प्रेम कथाएं — गौरव सक्सेना अदीब | #लप्रेक


6 लघु प्रेम कथाएं — गौरव सक्सेना

तकिये में एक दिल होता है

— गौरव सक्सेना "अदीब"

सो गए तुम
"नहीं तो जाग रहा हूँ, क्यों?”
क्यों जाग रहे हो वैसे।
"सोच रहा हूँ”
क्या सोच रहे हो?
"यही की लोग तकिये पे नाम क्यों लिखते हैं?”
अच्छा जी ये ख्याल कहाँ से आया है आपको?
"हम्म!! कल तुम बहुत याद आयीं अमृता।"
तो?
"तो क्या सोच रहा हूँ तकिये पर तुम्हारा नाम लिख लूँ"
तुम्हें कढ़ाई आती है?
"नहीं आती, उँगलियों से लिख लूँगा"
पागल हो तुम।
"अच्छा सुनो, तुम नहीं लिखोगी क्या?”
जाओ तुम, मुझे कपड़े सुखाने हैं।
"सुनो!! तकिये का कवर न बदलना।"



हर गली सड़क से जोड़ देती है

"इतनी तेज़-तेज़ क्यों चल रही हो?
मेरे साथ-साथ चलो न मुझसे इतनी तेज़ नहीं चला जा रहा है। तुमने तो कहा आधे घण्टे रुकोगी। सुनो भी न।"
ओफ्फो! तुमसे चुप नहीं रहा जाता दो पल को।
"तो तुम बोलती क्यों नहीं हो, चुप हो जाऊँगा।"
थोड़ा तेज़ चलो, गलियों से निकलो, सड़क तक आओ, सब कहूँगी।
"अच्छा तो तुम्हें सँकरी सोंच की तरह, सँकरी गलियों पर भी ग़ुस्सा आता है।"
पहली बात सोच होता है, सोंच नहीं और अगर साथ-साथ दूर जाना है तो चौड़ी सड़क तक जल्दी पहुँचना होगा।
"कभी-कभी तुम्हारे अंदर काफ्का और कामू क्यों जाग जाते हैं"



नाराज़गी प्रेम का सबसे प्यारा हिस्सा है

तुम ये ज़रा-ज़रा सी बात पे मुँह क्यों फुला लेते हो? आधा टाइम तो इसके पिचकने का इंतज़ार करना पड़ता हैं। इंतज़ार करते हो तो आने पर बोलते क्यों नहीं हो? अच्छा बोलो, हुआ क्या है?
"कुछ भी नहीं, नाराज़ होना तुम्हें अपने पास बुलाने का तरीका है, बस"
आइटम हो यार।
"बनाया किसने बोलो"
चाय पिओगे या कोल्डड्रिंक, बोलो ।



हम शायर तो नहीं

तुम केवल प्रेम कवितायें क्यों लिखते हो?
"शायद तुमने ढंग से पढ़ी नहीं होंगी।"
नहीं कई बार पढ़ी हैं।
"तो तुमने परतें नहीं खोली होंगी"
कविता लिखते हो या प्याज लिखते हो कि परतें खोलें।
तुमने चुनाव पे नहीं लिखा, हिंदुत्व पे नहीं लिखा?
"अरे यार बीफ-कमल-मोदी-हिंदुत्व ये पाँच साल की कहानी है, ये जब ख़त्म होगा तो कविता होगी और प्रेम होगा। मैं आने वाले दिनों के लिए लिख रहा हूँ।"
तुम अवसरवादी हो।
"हूँ तो, प्रेम का अवसर तो नहीं छोड़ सकता।"



आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या

"किस टाइम फ्री हो जाओगी?"
क्यों? बताया तो था तुम्हें।
"दोबारा बोल दोगी तो दुबला जाओगी क्या?"
मुझे पता है तुम आज ऑफिस नहीं गए।
"तुम सब कैसे जान लेती हो।"
चार साल हुए तुमको, ऑफिस में होते तो सड़ रहे होते, घर पर हो सो किलोल सूझ रही है तुमको।
"अच्छा सुनो गर्मी बहुत है, आने की जल्दी मत करना, पानी साथ लाना, शाम को गोलगप्पे खाने चलेंगे।"
गोलगप्पे तुमने तो पिज़्ज़ा कहा था।
"यार सैलरी नहीं आयी है अभी"
छोड़ो, घर पे कुछ बना लेंगे, गर्मी बहुत है बाहर का नहीं खायेंगे।



रेड फैमिली कन्फ्यूज़न

आज शॉपिंग जाना है, साथ चलोगे।
"कहाँ, सरोजनी नगर या अट्टा? लेना क्या है?"
कुछ ख़ास नहीं पर कुछ जँच गया तो ले लूँगी। तुम आगे कुछ बोलना मत, बस।
"तुमने पीला दुपट्टा कईं नहीं लिया वैसे, ये कौन सी आदत है, पीला दिखाने पर नीला माँगती हो, नीले पर लाल, लाल मिलता है तो वो वाला लाल नहीं होता जो तुमको चाहिए ........"
चलो यहाँ से...... इसीलिए तुम्हारे साथ नहीं आती हूँ।
"अरे कहा तो तुमने था"
ग़लती की थी बस।
अच्छा सुनो, मंडे बंक मारें क्या?



गौरव सक्सेना "अदीब" 
संपर्क: बी-279 कोठारी इंटरनेशनल स्कूल
सेक्टर 50 नॉएडा 201301
मोबाईल: 9313008669
ईमेल: com.gaurava@gmail.com

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
जयश्री रॉय और प्रमोद राय को 'राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान' 2020-21
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
हिन्दी कहानी 'अज़ाब' - विजयश्री तनवीर | Vijayshree Tanveer - Hindi Story - Azab
गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvelous Poems
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
कहानी कैसे लिखें — कहानी के तत्व — रोहिणी अग्रवाल
हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं | भाषा, समय, संवेदनाओं की हिंदी कविताएँ | शब्दांकन