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व्यंग्य ― स्वार्थ के बवंडर तले राजधानी ― डॉ अनिता यादव

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सियासी धुंधलके को हटाना ‘पायजामें में नाड़ा डालने’ जैसा नहीं हैं। न ही बापू की तरह बैठ कर चरखा चलाने सरीखा बल्कि कंजूस की गांठ से पैसा निकालने-सा जद्दोजहदी हैं।
dr anita yadav

स्वार्थ के बवंडर तले राजधानी

― डॉ अनिता यादव


पिछले दिनों आए बवंडर का देश भर में खूब स्वागत हुआ। दिल्ली को वह कम ही प्रभावित कर पाया। आखिर राजधानी आसानी से प्रभावित होनी भी नहीं चाहिए। पर आजकल दिल्ली का वातावरण न केवल गरम हैं बल्कि धूल धूसरित भी हैं। यह धूल केवल पर्यावरण तक ही सीमित रहती तो ओर बात थी। पर हालात बता रहे हैं कि यह धूल दिल्ली की सियासत पर जम  धुंधलका पैदा कर चुकी हैं। यानि दिल्ली के आसमान और जमीन एक से हो उठे हैं। इस तरह क्षितिज पर ‘धरती-आसमान मिलन’ केवल आभास नहीं रहा बल्कि दिल्ली की हकीकत हो चुका हैं। पर्यावरणीय धूल तो फिर भी आर्टिफ़िशियल बारिश से हटाई जा सकती हैं पर सियासी धुंधलके को हटाना ‘पायजामें में नाड़ा डालने’ जैसा नहीं हैं। न ही बापू की तरह बैठ कर चरखा चलाने सरीखा बल्कि कंजूस की गांठ से पैसा निकालने-सा जद्दोजहदी हैं।


राजधानी के बच्चे, बुजुर्ग और रोगी जहां सांस की सासत में फंसे हैं वहीं युवा राजनीतिक पैंतरेबाजी सीखने में व्यस्त हैं। यही युवा सड़क से संसद तक की दूरी नापते हुये चाहे आधुनिक कवि ‘धूमिल’ को याद न करे किन्तु  राजनिवास पर धरने की कवायद में बैठे मंत्रिजी को जरूर याद कर रहा हैं। आखिर जनसेवक धर्म की धुरी जो हैं। जनता पर आए संकट के बादलों को टालने के लिए ही तो धरने की कवायद करनी पड़ी। आखिर गांधीजी का हथियार आज भी काम आ ही रहा हैं। कौन कहता हैं कि गांधी प्रासंगिक नहीं रहे? ये दीगर बात हैं कि अब ये हथियार घिस–घिस कर ज्यादा पैना हो चुका हैं जिससे निशाने जमकर किए जा रहे हैं। कभी जबान की कैंची से तो कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस की तलवार से।

अगर ये कहा जाये कि राजनीति की शराब पीकर जनसेवक फिराक से भी ज्यादा संजीदा हो गए हैं तो गलत नहीं होगा। फिर इसी संजीदगी में धर्मक्षेत्र अगर कुरुक्षेत्र बन गया तो इनका क्या क़ुसूर। शराब भी पक्ष-विपक्ष दोनों ने पी हैं तो ‘आग दोनों तरफ हैं बराबर लगी हुई’। आग अगर प्रेम की होती तो बात कुछ ओर थी यह तो स्वार्थ की वाड्वाग्नि हैं जो भड़कती कहीं हैं भस्म कहीं करती हैं। राजधानी बच जाये यही प्रार्थना हैं। 

डॉ अनिता यादव
दिल्ली यूनिवर्सिटी

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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