विवेक मिश्र की कहानी 'काली पहाड़ी' एक विशाल कहानी है! #BananaRepublic


आँखों के आगे छाते अंधेरे से बाहर निकलने के लिए, फ़र्श पर पड़ी पुरानी, अधजली बीड़ी को फिर से जला लिया, पर पहला कश खींचते ही खांसी का ऐसा धसका उठा कि लगा दम लेकर ही थमेगा। खाँसते-खाँसते आँखें लाल हो गईं, उसमें उनका पूरा प्रदेश, उसमें दूर-दूर तक फैले जंगल, धू-धू करके जल उठे। उस कमरे की दीवारों ने उनकी आँखों से लपटें निकलते हुए देखीं, पर कमरे की दीवारों की आँखें और कान तो थे, पर मुँह नहीं था, सो दीवारें यह सब देखकर भी खामोश ही रहीं। 

काली पहाड़ी एक विशाल कहानी है। काली पहाड़ी एक महान कहानी भी हो सकती है बशर्ते इसमें दिखाया गया सच सच न हो। कहानी को विवेक मिश्र ने ऐसा कहा है कि उसका पूरा-का-पूरा ख़ाका अक्षरों में दर्ज़ है। कहानी की एक-एक पीड़ा, हर-एक संघर्ष, सारे चरित्रों की सारी भावनाएं, और हमारे फेल होने की ललक सब इसमें है। हम कैसे सिस्टम से हाथ मिलाकर किसी को उसके ही घर से बाहर कर रहे हैं और कैसे सिस्टम की मदद कर रहे हैं कि गुनहगार वही ठहरे जिसका घर लूटा गया, और कैसे फिर उसे ही सिस्टम के साथ मिलकर अपराधी क़रार करते हुए मार दिया जाना, क़ानून बनाते हैं।  

— भरत तिवारी






Vivek Mishra Ajay Navaria Bharat Tiwari

काली पहाड़ी 

– विवेक मिश्र


सूरज के अपने समय पर डूबने और निकलने से, कहीं दिन – रात, महीने और साल भी बदलते रहे होंगे, पर धड़मौच से पंद्रह किलोमीटर दूर घने जंगलों में आदिवासी टोला जिस पहाड़ी पर छिपा बैठा था, वहाँ समय टकटकी लगाए स्वयं को देख रहा था, उसकी पथराई आँखें झपकना भूल चुकी थीं। वह पहाड़ी देश, दुनिया, यहाँ तक कि अपने समय से भी कट गई थी। वह किसी ब्लैक-होल में समाने के लिए किसी अज्ञात शक्ति से खिंची चली जा रही थी। पहाड़ी का आकार सिकुड़ता जा रहा था।

उस पर बैठे लोग किसी गर्त में डूबे जा रहे थे...

पर आश्चर्य! ऐसे भयावह समय में वे रोना, चीख़ना, चिल्लाना भूल गए थे।

...जीवन से मुक्त होने के विचार भर से उनके चेहरे खिल उठे थे। उनकी आँखों में एक चमक थी। वे एक-एक कर ऐसे अन्धे कुएँ में डूब रहे थे, जिसमें सैकड़ों सूरज मिलकर भी रोशनी का एक रेशा तक नहीं तैरा सकते थे।

विश्रान्त अनल उस पहाड़ी के चारों तरफ़ बेतहाशा भाग रहे थे। वह पेड़ों, पत्थरों, चट्टानों, छोटी-बड़ी झाड़ियों को पकड़कर उस पहाड़ी को, उस पर बैठे लोगों को बचाने की आख़िरी कोशिश कर रहे थे। पर उनके हाथ कुछ नहीं आ रहा था।

उनकी इस कोशिश ने उन्हें लहूलुहान कर दिया था।

अचानक विश्रान्त अनल के घर का दरवाज़ा किसी ने बड़ी ज़ोर से खटखटाया। इतनी ज़ोर से कि कई घन्टों से लगभग बेहोश पड़े विश्रान्त हड़बड़ा कर उठ बैठे। वह अपने भयावह सपने के टूटने पर भी उससे बाहर निकलने में बहुत कठिनाई महसूस कर रहे थे। दरवाज़ा खोलने में उनके घुटने और टखने की हड्डियाँ कई बार चटक गईं।

बाहर गर्मियों की दोपहर का भयावह सन्नाटा था।

दरवाज़े के खुलते ही कमरे के भीतर का भभका बाहर चलती लू से जा मिला। विश्रांत अनल की लगभग झपकना भूल चुकी लाल आँखें अपने आस-पास किसी अनिष्ट को तलाश रही थीं, पर बाहर कोई नहीं था। दरवाज़े के सामने एक पुराना लिफ़ाफ़ा पड़ा था, जिस पर उनका नाम लिखा था। उन्होंने उसे उठाकर दरवाज़ा बन्द कर लिया। वह लिफ़ाफ़ा खोलना चाहते थे, पर उनके हाथ लगातार कांप रहे थे। उनकी आँखें किसी चीज़ पर ठहर नहीं रही थीं। उन्हें हर चीज किसी चकरी की तरह लगातार घूमती हुई लग रही थी।

वह जिस पहाड़ी को बचाने के लिए अपने सपने में भागे जा रहे थे, दरअसल वह पहाड़ी, उसपर बैठे लोग, वह सब कुछ इस तरह अनायास ही उनके सामने आया था कि वह अभी तक विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि वह स्वयं उस पहाड़ी पर थे और अब वहाँ से लौटकर अपने कमरे में आ गए थे।

बेशक राजनीतिक पार्टिओं ने विचारधाराओं का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया हो, बेशक आज क्रान्ति न हो सके, पर विश्रान्त अनल जैसे लोगों की वज़ह से विचारधाराएं ज़िन्दा रहती हैं। वह उन लोगों में से हैं जो क्रान्ति के बीज बोते हैं, परिवर्तन का बिगुल फूँकते हैं। 

अभी भी वह पहाड़ी — जो उनके कस्बे पनरबा से अट्ठारह किलोमीटर दूर बसे गाँव धड़मौच से लगभग पंद्रह मील दूर टेढ़े-मेढ़े, कच्चे, दुर्गम रास्तों से गुज़रने के बाद मिलने वाले घने जंगलों के बीच — अकेली खड़ी थी, जहाँ पैदल ही पहुँचा जा सकता था, उन्हें अपनी ओर खींच रही थी। वह जानते थे कि उस पहाड़ी तक का रास्ता वही तय कर सकता था जो जंगलों की, पेड़ों की, जानवरों की, वहाँ के हवा-पानी और मिट्टी की मूक भाषा को, संकेतों और चिन्हों को पढ़ और समझ सकता हो। जो लाखों मील दूर चमकते सूरज की पृथ्वी पर पड़ती किरणों और घने जंगलों में पेड़ों के तनों पर रेंगती चींटियों की क़तारों के सम्बन्ध को पहचानता हो।

Vivek Mishra Ajay Navaria Bharat Tiwari


विश्रान्त अनल का उस पहाड़ी पर पहुँचना, उस जगह के तिलिस्म को समझना और यह विश्वास कर पाना कि यह पहाड़ी उन्हीं के प्रदेश में, उनके जिले के बीचों-बीच, उनके कस्बे से कुछ मील की दूरी पर है, लगभग वैसा ही था, जैसे किसी खगोलशास्त्री के लिए पृथ्वी जैसा ही कोई ग्रह अपनी ही आकाश गंगा में खोज निकालना। आदिवासियों के लिए लम्बे समय से काम करते हुए भी वह यह नहीं जान पाए थे कि उनके कैम्प से इतनी कम दूरी पर घने जंगलों के बीच एक आदिवासी टोले के लोग अपने अस्तित्व की आख़िरी लड़ाई लड़ रहे हैं। …… और इस लड़ाई में वे ठीक-ठीक यह भी नहीं जानते कि उनका शत्रु कौन है।…पर वे लगातार लड़ रहे थे और अब यह लड़ाई सिर्फ़ उनके अपने लिए नहीं थी, बल्कि उन जंगलों के लिए, उस तिलिस्मी दुनिया के लिए थी, जिसे उन्होंने सदियों से लगातार बदलती बाहरी दुनिया से बचा के रखा था। आज जब चारों तरफ़ से एक साथ उनकी इस दुनिया पर, उनके जंगलों पर हमला हो रहा था तब उनके राज्य की सरकारें जंगलों को नीलाम करने की योजनाएं बना रही थीं। हर बार सत्ता में आए मंत्रियों के चेहरों की चमक पुराने मंत्रियों के चेहरों की चमक से कुछ ज्यादा ही होती थी। पर काली पहाड़ी के टोले के लोग मंत्रियों के चेहरों की चमक और धड़मौच के पास के जंगलों के बीच अन्धकार में डूबी, सालों से रोशनी का इन्तज़ार करती उस पहाड़ी का अन्तर संबंध अभी तक नहीं समझ पाए थे, पर शायद विश्रान्त अनल इस संबंध को थोड़ा बहुत समझ गए थे। वह आदिवासियों की मदद करते-करते ऐसी कुछ बाते जान गए थे जो उन्हें नहीं जाननी चाहिए थीं। आज वह जिस गहरे संकट से घिरे खड़े थे उसकी धमक तो उन्हें पिछले कई दिनों से अपने जीवन में सुनाई दे रही थी पर वह शायद धीरे-धीरे इसके आदि हो चले थे।

उनके आज के हालात को जानने से पहले यदि उनकी बात थोड़ा-सा समय को पीछे खिसका कर करें तो हम देखेंगे कि वह हमेशा से आदिवासियों के मुद्दों को लेकर गंभीर तो थे पर जैसे आज वह दिखाई देते हैं वैसे सनकी और जुनूनी नहीं थे, पर यह बात भी पक्की है कि वह अपने कॉलेज के दिनों से ही अपनी धुन के पक्के आदमी थे। मज़बूत कदकाठी और साँवले रंग के, साफ और पारदर्शी आँखों वाले विश्रान्त अनल के बारे में उनके समाज शास्त्र के प्रोफेसर तिवारी हमेशा कहा करते थे कि उनके व्यक्तित्व में झूठ और अन्याय को भस्म कर डालने की शक्ति है। बेशक राजनीतिक पार्टिओं ने विचारधाराओं का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया हो, बेशक आज क्रान्ति न हो सके, पर विश्रान्त अनल जैसे लोगों की वज़ह से विचारधाराएं ज़िन्दा रहती हैं। वह उन लोगों में से हैं जो क्रान्ति के बीज बोते हैं, परिवर्तन का बिगुल फूँकते हैं। शायद प्रोफेसर तिवारी की इन बातों पर कुछ हद तक विश्रान्त को भी भरोसा हो चला था। वे विचारधाराओं को किताबों से निकाल कर अपने जीवन के रास्तों पर धरने लगे थे। उन्हें बरतने लगे थे, जीने लगे थे। उन दिनों अकसर विश्रान्त अनल विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बैठकर विश्वभर की तमाम समाजशास्त्रीय अवधारणायों के हवाले से भारतीय आदिवासियों की समस्याओं का हल ढूँढते, शोध पत्र तैयार करते, अपने सहपाठियों से खासी बहस लड़ा लिया करते थे और जब भी वह ऐसी बहसें करते तो लगता मानो उनका बिलकुल अपना, बेहद निजी बहुत कुछ स्टेक पर है और उसे बचाने के लिए वह यह अन्तिम और निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। कुछ लोग उनके इस रूप को देख सहम जाते, कुछ उनसे किनारा कर लेते और कुछ उनके जज़्बे की दाद देते, पर विश्रान्त की बातों में दबी चिन्गारियाँ जल्दी ही उन्हें डराने लगतीं और वे मौका मिलते ही वहाँ से खिसक लेते।

बस समझिए कि एक दिन ऐसी ही एक बहस ने उनका रास्ता अपने सहपाठियों से अलग कर दिया बल्कि कहना होगा कि उनका पूरा जीवन ही बदल कर रख दिया। उन दिनों वह मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एम.एस.डब्लू) के आखिरी वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। उन्हीं दिनों उनके राज्य की राजधानी कहे जाने वाले शहर के एक एन.जी.ओ., जो आदिवासियों पर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फ़िल्म बना रहा था और इसके लिए उसे अमेरिका की एक कंपनी से लाखों अमरीकी डालर का फंड मिल रहा था, के विशेषज्ञों का एक दल, कुछ अमेरिकी परिवेक्षकों के साथ आदिवासी इलाकों का दौरा करने तथा फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर शोध करने के लिए उनके जिले में आया था। उस दल में कुछ सपाट और लम्बे चेहरे वाले अमेरिकन भी थे। विश्रान्त को पहली नज़र में ही वे अमेरिकन किसी बड़ी रियल-स्टेट कम्पनी के एजेंट और दल के भारतीय विशेषज्ञ किसी लोकल कम्पनी के सेल्समैन की तरह लगे थे, जो लगातार उन अमेरिकनों के सामने आदिवासियों के बारे में अपने ज्ञान की भोंडी नुमाइश कर रहे थे। विश्रान्त को भी इस दौरे में, इस दल के साथ रहना था और वह औपचारिक परिचय के समय से ही इन सब विशेषज्ञों के बीच, बहुत असहज महसूस कर रहे थे। अपने मन से तो शायद वह इस दल के साथ कभी न जाते, पर वह अपने समाज-शास्त्र के प्रोफेसर तिवारी का आदेश टाल नहीं पाए थे और फिर उनके मन में भी कहीं न कहीं ऐसी कोई उम्मीद थी कि इस फ़िल्म के बनने से देश और दुनिया के लोगों को जंगलों की हक़ीकत का पता लगेगा, सरकारी तन्त्र के झूठे दावों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पोल खुलेगी और इस सबसे आदिवासियों का कुछ भला हो सकेगा।



शायद ऐसी ही किसी उम्मीद से बंधे विश्रान्त उस दल के साथ एक एयर कंडीसन्ड बस में सवार होकर इलाके के दौरे पर चल दिए थे। दरअसल विशेषज्ञों के इस दल के साथ जाना तो उनके समाजशास्त्र के प्रोफेसर तिवारी को ही था पर एन मौके पर वह इसके लिए समय नहीं निकाल पाए थे। प्रोफेसर तिवारी खुद भी उस एन.जी.ओ की सलाहकार समिति के वरिष्ठ सदस्य थे और उसी के खर्चे पर कई विदेश यात्राएं कर चुके थे। अब यह उनके लिए कर्ज़ उतारने का समय था। उन्हें विश्रान्त अनल की आदिवासियों के बारे में अर्जित जानकारी पर पूरा भरोसा था और इसीलिए वह उन्हें उस दल के साथ भेज कर निश्चिन्त हो गए थे। पर वह यह नहीं जानते थे कि विश्रान्त को उस दल के साथ भेज कर वह बहुत बड़ी आफ़त मोल ले रहे हैं। वह अपनी ही कही हुई बात भी भूल गए थे कि विश्रान्त के व्यक्तित्व में झूठ और अन्याय को भस्म कर देने की शक्ति है। उन्हें ठीक से इस बात का भी अंदाज़ा नहीं था कि विश्रान्त ने, किताबों से बाहर की दुनिया में सचमुच ही, सच को अपना अमोघ शस्त्र बना लिया है, या कहें कि समझ लिया है। खैर अब तो विश्रान्त अनल दल के साथ अपनी यात्रा पर निकल चुके थे और घने जंगलों के बीच से गुज़रते हुए तथाकथित शहरी विकास से दूर वन के लगभग अनछुए अंचल की ओर बढ़ रहे थे। बस में कोई अंग्रेजी धुन धीरे-धीरे बज रही थी। विश्रान्त के आगे वाली सीट पर जंगल की वनस्पति और आदिवासियों के खान-पान के तरीकों के विशेषज्ञ डा. घंकोत्रा बैठे थे। वह अपने बगल की सीट पर बैठे अमेरिकन को अपने मोबाइल में से आदिवासियों के नृत्य की विडिओ क्लिपिंग दिखा रहे थे। उनकी बगल की सीट पर बैठा पैनी नाकवाला अमेरिकन बड़े कौतूहल से क्लिप देख रहा था। तभी वह बड़ी ज़ोर चीखा, ‘ओ माय गाड, व्हाट दे आर अप टू’। डा घंकोत्रा उसकी प्रतिक्रिया देखकर और भी उत्साहित हो गए उन्होंने कहा, ‘ यू वेट अ मिनट, आइ विल शो यू द रियल स्टफ’ और उन्होंने दूसरी वीडियो क्लिप अपने मोबाईल पर प्ले कर दी। डा. घंकोत्रा के साथ बैठे अमेरिकन का चेहरा लाल हो गया उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वह पहले से दूने उत्साह से चीखा, ‘याल! कम हीयर, यू जस्ट सी दिस’ बस में आगे की सीट पर बैठा दूसरा अमेरिकन जिसकी उम्र उन सब में सबसे कम रही होगी, अपनी सीट से उठकर डा. घंकोत्रा की सीट के पास आकर खड़ा हो गया। अब वह भी मोबाईल पर चलती क्लिप को घूर रहा था। उसने थोड़े आश्चर्य के भाव चेहरे पर लाते हुए कहा, ‘रीयली वी आर गोइंग टू एक्स्प्लोर आल दिस, ओन दिस ट्रिप’ डा. घंकोत्रा आँखें नचाते हुए बोले, ‘दिस इस नथिंग, वी हेव मच मोर फ़ोर यू, यू जस्ट वेट एन्ड वॉच’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उसे दिखाने के लिए मोबाइल थोड़ा ऊपर उठा दिया। अब मोबाइल पर चलती विडियो क्लिप विश्रान्त को भी दिखाई दे रही थी। क्लिप में एक नग्न आदिवासी महिला एक बंद कोठरी में एक दीए की हल्की-सी रोशनी में बिना किसी संगीत के थिरक रही थी। कोठरी में दो आदमी खाकी शर्ट पहने हुए बैठे थे। उनकी पीठ कैमरे की तरफ थी। उनमें से एक के हाथ में टार्च थी जिसे वह महिला के शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर डाल रहा था। महिला का चेहरा अंधेरे में डूबा था। ज़मीन पर रखे दिए की रोशनी महिला के चेहरे पर नहीं पड़ रही थी पर अंधेरे में भी उसके चेहरे पर लाल आँखें रह रहकर चमक जाती थीं। पहले से ही दल के साथ बहुत असहज महसूस करते विश्रान्त ने डा. घंकोत्रा से लगभग चीखते हुए कहा, ‘प्लीज बंद करिए इसे’ पर डा. घंकोत्रा का ध्यान उस क्लिप से ज्यादा यॉल के चेहरे की भाव-भंगिमाओं पर था। उसका चेहरा देखकर दल के दो-एक भारतीय सदस्य भी उठकर डा. घंकोत्रा की सीट के पास आ गए थे। अब वहाँ बक़ायदे पूरा मजमा लग गया था। तभी डा. घंकोत्रा ने कुछ ऐसे अंदाज़ में एक घोषणा की जैसे वह वहाँ उपस्थित सभी लोगों को बोनस बाँटने वाले हों। उन्होंने कहा, ‘ऐसे नहीं, जिसे भी देखना हो अपने मोबाइल का ब्लू टूथ आन कर लो मैं अभी इस कलेक्शन की बेस्ट क्लिप आपको ट्रान्सफर करता हूँ। फिर यहाँ से आगे नेटवर्क नहीं मिलेगा। लोगों ने फटाफट अपने मोबाईल निकाल लिए, जो शर्म या झिझक में ऐसा नहीं कर सके वे दूसरों के मोबाईल स्क्रीनों को मुँह खोले ऐसे देखने लगे जैसे आसमान से अमृत की वर्षा होने वाली हो और वे उसकी एक-एक बूँद स्वाद ले ले कर चाट लेने को तत्पर हों। डा. घंकोत्रा मोबाईल से विडियो क्लिप ट्रान्सफर करने लगे। कुछ लोग अपने मोबाईल हाथ में लिए आँखें फाड़े वीडियो क्लिप के उनके मोबाईल पर रिसीव होने का इन्तज़ार करने लगे और कुछ मुस्कुराते हुए शीशे से बाहर देखने लगे। तभी एक्सीलरेटर की तेज़ आवाज़ के साथ बस रोड से उतर गई। सभी ने घबराकर ड्राइवर की ओर देखा। जब बस में बैठा विशेषज्ञ दल ब्लू टुथ के माध्यम से अपने मोबाईल स्क्रीनों पर अमृत वर्षा का इन्तज़ार कर रहा था तभी विश्रान्त जिन पर किसी का ध्यान नहीं था अपनी सीट से उठकर ड्राइवर की सीट के पास जा पहुँचे थे और जब उनके कहने पर भी ड्राईवर ने बस नहीं रोकी तो उन्होंने उसकी बाँह उमेठ कर गाड़ी के स्टेरिंग को मोड़ कर उसे सड़क से नीचे उतार दिया था। बस घर्र-घर्र की आवाज़ के साथ बन्द हो गई थी। ड्राईवर कुछ कर पाता इससे पहले ही विश्रान्त ने बस की चाबी निकाल ली थी और वह आगे के दरवाज़े से कूद कर नीचे उतर गए थे। दल के सदस्यों के चेहरों पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, उनके चेहरों को देखकर लगता था कि उन सभी का रक्तचाप अचानक ही बढ़ गया था। यॉल जो उम्र में सबसे छोटा था ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा था, ‘व्हाट द हेल इज़ दिस, मैन, हू आर यू?’ डा घंकोत्रा ने मौके की नज़ाकत को भाँपते हुए अपना मोबाईल अपने पेन्ट की चोर जेब में छुपा लिया था।

कुछ लोग बस से उतरकर विश्रान्त को मानवाधिकार, विदेशी मदद और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आदिवासियों के जीवन को करीब से देखने की उत्सुकता में बढ़ते पर्यटन उद्योग आदि से जुड़ी कुछ बातें समझा रहे थे। पर विश्रान्त के कानों में जैसे कई सायरन एक साथ बज रहे थे। उन तक कोई आवाज़ नहीं पहुँच रही थी। वह अचानक उन्हें समझाने की कोशिश करती भीड़ से छिटक कर दूर हो गए थे। वह अब सड़क के बीचों बीच खड़े होकर ज़ोर ज़ोर से आसमान की ओर देखकर बड़बड़ा रहे थे। वह मानो पूरे विश्व की सभ्यताओं को संबोधित कर रहे थे।

वह कह रहे थे, ‘तुम लोगों के दिमाग़ में इतनी सीधी और मामूली-सी बात क्यों नहीं घुसती कि आदिवासी भी हमारी-तुम्हारी तरह हाड़-मांस के इंसान हैं। उन्हें भी सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और भूख-प्यास का एहसास है। तुम्हारे लिए वे भले ही किसी गिनती में न आते हों, पर वे भी इसी धरती पर रहने वाले हमारी ही प्रजाति के जीव हैं, दे आर होमोसेपियन्स टू,……वे किसी अभ्यारण, किसी राष्ट्रीय उद्यान, किसी चिड़िया घर में सुरक्षित बसा दिए जाने वाले जानवर नहीं हैं’ विश्रान्त अनल की आँखें चौड़ी हो गई थीं। बोलते हुए उनका गला सूख गया था। आवाज़ फटने लगी थी। लोग उनके इस दुस्साहस पर आश्चर्यचकित थे। जो कुछ भी वह कह रहे थे वह वहाँ खड़े उनकी बातें सुन रहे लोगों के लिए नया नहीं था। पर इस तरह किसी ने कभी सरेआम इन बातों को ज़ुबान पर लाने की हिम्मत नहीं की थी।



विश्रान्त अनल अभी भी बोले जा रहे थे, ‘इस जंगल के हज़ारों रहस्य इन आदिवासियों के सीने में दफ़न हैं, ये जंगल इनकी बदौलत आज तक बचे हुए हैं। लौट जाओ यहाँ से। ये सब बिकाऊ नहीं है’ उनकी आवाज़ बोलते-बोलते दरकने लगी थी। वह अपनी फटी हुई आवाज़ में चिल्ला रहे थे, ‘मैं तुम सबकी तरह इन जंगलों का दलाल नहीं हूँ।’ विश्रान्त की आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था।

बस के ड्राइवर और कुछ स्थानीय लोगों से बाद में पता चला था कि दल के सभी सदस्य विश्रान्त को सड़क पर उसी तरह बड़बड़ाता छोड़कर आगे बढ़ गए थे। बस के आगे बढ़ते ही उन्होंने अपने अचानक विश्रान्त की बातों से खराब हुए मूड को ठीक करने के लिए दोपहर में ही कोई बहुत महंगी स्काच की बोतल खोल ली थी। जंगल में दूर तक बस के धुएं और स्कॉच की मिलीजुली गंध फैलती चली गई थी। उस दिन आदिवासियों पर बनने वाली फिल्म की रिसर्च टीम पर विश्रान्त अनल की बातों का कितना असर हुआ यह तो किसी तरह भी पता नहीं चल पाया, पर उस घटना का विश्रान्त के जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ा था। उनको यूनिवर्सिटी से मिलने वाली स्कॉलरशिप अचानक बंद हो गई थी और हफ्ते भर के भीतर उनसे हॉस्टल भी खाली करा लिया गया था। इसके बाद जैसा कि होना लगभग तय था विश्रान्त अनल को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी थी। साथ ही व्यवस्था परिवर्तन और क्रान्ति की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मित्र भी बड़ी सफाई से अपने कैरियर को बचाते हुए उनसे कट लिए थे। उन्हें विश्रान्त से दूर रहने की सलाह भी उन्हीं प्रोफेसर तिवारी ने ही दी थी, जिन्होंने कभी कहा था कि विश्रान्त के व्यक्तित्व में झूठ और अन्याय को भस्म कर डालने की शक्ति है।

इस सबसे विश्रान्त के जीवन में एक और बदलाव आया था, पर उसकी पड़ताल में गहरे उतरने पर मुझे डर है कि कहानी दूसरी दिशा में मुड़ जाएगी और एक गम्भीर कहानी में बिना वज़ह रोमांस का तड़का लगाने का आरोप मुझपर लगेगा, पर यहाँ इतना तो बताना ही पड़ेगा कि हुआ यह भी था कि विश्रान्त के साथ ही एम.एस. .डब्लू कर रही मीता, जो उनके लिए नियमित घर का बना खाना लेकर आती थीं, ने अचानक ही उनसे मिलना बंद कर दिया था और कुछ महीने बाद ही परीक्षाएं समाप्त होते ही मीता की शादी उनके प्रदेश की राज्य प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत एक ऐसे अधिकारी से हो गई थी, जिसके पिता ने उसकी नियुक्ति के लिए सात लाख रुपए रिश्वत दी थी, जिसे उसने शादी के समय मीता के पिता से ब्याज समेत वसूल कर लिया था।

चाँद हसिए की तरह आसमान में झूल रहा था, पर उसकी रोशनी में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह इस अंधेरे में उन्हें रास्ता दिखा सके। हाँ, वह किसी हारी और बिकी हुई पार्टी का चुनाव चिन्ह अभी भी बना रह सकता था।

अब मीता अपने पति के साथ प्रदेश की राजधानी के एक पॉश कहे जाने वाले इलाके में एक भव्य कोठी में रहती थी और उसके पति ने उसे एक पुराना एन.जी.ओ खरीदकर दे दिया था, जिसे प्रदेश और केन्द्र सरकार की कई संस्थाओं से नियमित तथा कुछ विदेशी संस्थाओं से कभी-कभी आर्थिक अनुदान मिलता था। मीता इस गैरसरकारी सामाजिक संस्था की डायरेक्टर थी, पर संस्था के वित्तीय मामले उसके पति ही देखते थे।

इस बीच मीता ने ‘बाज़ार और आदिवासी समाज’ नाम की पुस्तक भी लिखी थी, जिसका लोकार्पण राज्य के समाज एवं परिवार कल्याण मंत्री ने किया था। उसी समारोह में मंत्री जी ने मीता की संस्था द्वारा आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को कार्यान्वित करने के लिए मीता की संस्था आदिवासी उत्थान समिति के नाम पर सरकारी ज़मीन देने की घोषणा भी कर दी थी।

…और हाँ लोकार्पण के समय मीता की पुस्तक का जो भाग पढ़ा गया था उसमें वैसी ही कुछ बातें कही गई थी जो अक्सर विश्रान्त अपने सहपाठियों से बहस करते हुए कहा करते थे। यह बात मीता के साथ पढ़ने वाले उन मित्रों ने आपस में डिस्कस की थी, जो मीता की पुस्तक के लोकार्पण समारोह में शामिल हुए थे। पर यह सारी बातें विश्रान्त तक पहुँची थीं की नहीं यह कोई नहीं जनता था। क्योंकि विश्रान्त अनल का कॉलेज छोड़ने के बाद सभी से संपर्क टूट गया था।

पुराने साथियों में से अगर कोई उनके साथ था तो वह थे, हरिधर। हरिधर का जन्म एक आदिवासी परिवार में ही हुआ था। जंगल और जीवन उनके लिए दो अलग-अलग चीज़े नहीं थीं। वह विश्रान्त के विचारों और आदिवासियों के प्रति उनके सरोकारों की क़द्र करते थे। विश्रान्त ने हरिधर और दो-एक स्थानीय आदिवासी समाज के लोगों के साथ मिलकर अपनी एक संस्था बना ली थी, जिसका नाम उन्होंने ‘विप्लव’ रखा था।

विश्रान्त की यह संस्था हरिधर जैसे पढ़े-लिखे लोगों के लिए घनघोर अंधेरे में एक टिमटिमाता दीया थी, जिसकी तरफ़ स्थानीय आदिवासी बड़ी उम्मीद से देखते थे। यह संस्था बिना किसी सरकारी मदद के स्थानीय लोगों के सहयोग से काम करती थी। सीमित साधनों में किसी तरह घिसट-घिसट कर चलती संस्था के कामों में विश्रान्त रात-दिन का अन्तर भूल गए थे। वह इसके कामों में ऐसे उलझे रहते थे कि उनका परिवार, रिश्तेदार, कैरियर, सबकुछ बहुत पीछे छूटता चला गया था। वह अपनी धुन में आगे बढ़े जा रहे थे और इसी धुन में कब उनकी दाड़ी के बाल सफ़ेद हो गए, कब वह तीस से चालीस के हो गए उन्हें पता ही नहीं चला था। अब उन्हें लोग एक क्षेत्रीय लेखक, एक समाज सेवी और एक जुझारू एक्टीविस्ट के रूप में जानते थे, जो आदिवासियों के हित के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता था।

पर आज उस काली पहाड़ी के नीम अंधेरे ने तो जैसे विश्रान्त के जीवन की बची-खुची रोशनी भी सोख ली थी। उस काली पहाड़ी के तिलिस्म में वह इस तरह कभी न जा फंसे होते अगर उनकी कहानी का एक पुराना चरित्र न लौट आया होता, वह चेहरा जिसे उन्होंने छ: महीने पहले एक झोंपड़े में तड़पते हुए देखा था आज उनके कस्बे पनरबा के बस अड्डे पर सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए लगे विशालकाय होर्डिंग पर चिपका मुस्करा रहा था। विश्रान्त उसे देखते ही पहचान गए थे। उन्हें याद आ गया था कि उस विज्ञापन में मुस्कुराता हुआ आदिवासी, जिसका नाम रानोला लिखा था, वह रानोला नहीं, बिन्ना है और वह पनरबा के पास के ही गाँव धड़मौच का रहने वाला है। पर विज्ञापन में मुस्कराते बिन्ना में और उस नीली पड़ी देह में कितना फर्क था, जिसे विश्रान्त ने हरिधर के साथ बिन्ना के ही झोपड़े में जाकर देखा था। बिन्ना का टप्पर या झोपड़ा धड़मौच गाँव के उस छोर पर था जहाँ, कस्बे  का डाक्टर तो क्या पुलिस की हथियार बन्द गाड़ियाँ तक आने में हौल खाया करती थीं। उसके झोपड़े के साथ आठ-दस ऐसे ही छेउले की सूखी लकड़ियों की टट्टियों पर हाथ से बने बड़े-बड़े खप्परों वाले झोपड़े और भी थे। एक साथ खड़े झोपड़ों ने जैसे जंगल और गाँव के बीच मीलों लम्बी एक आभासीय त्रियक रेखा खींच दी थी। स्थानीय प्रशासन और आदिवासियों के बीच लम्बे समय से चल रहे संघर्ष के चलते उस समय कुछ ऐसी घटनाएं हुई थीं कि इस रेखा को पार करना किसी का जंगल के तिलिस्म में खो जाना लगने लगा था। सरकारी रिकार्ड में लगे नक्शों में इसके आगे के हरे-भरे जंगलों को लाल स्याही से रंग दिया गया था। पृथ्वी का चक्कर काटते सेटेलाईट से लिए गए चित्रों के माध्यम से उन जंगलों के बीच से बहने वाले नदी-नालों, वहाँ की पहाड़ियों, विभिन्न प्रकार के पेड़ों, यहाँ तक कि उसमें पाए जाने वाले जानवरों की पूरी जानकारी, उन सबकी सही गिनती के साथ प्रशासन के पास उपलब्ध थी, पर उनके रिकार्ड में लगे, लाल-हरे रंग में बंटे नक्शों में ये झोपड़े, इनमें साँस लेते इंसान कहीं नहीं थे।

बिन्ना उन दिनों बहुत बीमार था पर उसके चेहरे पर बीमारी की पीड़ा से ज्यादा उस लांछन का दर्द था, जो उसके टोले के लोगों ने ही उसपर लगाया था। उनका आरोप था कि वह प्रशासन के उन अधिकारियों से जा मिला है, जिन्होंने आदिवासियों को सरकार से मिलने वाली मदद-इमदाद को इलाके तक पहुँचाने के काम में भारी धाँधली की है। इस आरोप के साथ ही बिन्ना और उसके परिवार का उस जंगल में प्रवेश वर्जित कर दिया गया था, जिसके बिना उनका एक दिन भी जी पाना संभव नहीं था। बिन्ना का परिवार जिसमें उसकी बीबी, रातुआ, और उसके चौदह, नौ और सात साल के तीन बेटे थे, वह जैसे जंगल से नहीं कटा था, पूरी धरती से ही कट गया था। उसके बड़े बेटे का नाम बेड़ी था, बाकी दो बेटों का नाम विश्रान्त और हरिधर को नहीं मालूम था, पर जब वे बिन्ना की मदद के लिए वहाँ पहुँचे थे तो उन्होंने उन दोनों को झोपड़े के एक कोने में केवल जांघिया पहने एक चटाई पर औंधे मुँह पड़े हुए देखा था। वे सो रहे थे या कई दिनों से घर में आग न जलने से, उनके मुँह में अन्न का एक दाना भी न जा सकने से, वे अपने तालू को जीभ स दबाते-दबाते उस समय बेहोश हो गए थे, जब मुँह में निवालों के इन्तज़ार में धीरे-धीरे निकलने वाला द्रव एक दम सूख गया था, पर उस समय उन दोनों की ओर किसी का ध्यान नहीं था। बिन्ना बहुत बेचैनी से, कई दिनों लाल मिट्टी से लीपी न जा सकने के कारण खुरदुरा गई ज़मीन पर एड़ियाँ रगड़ रहा था। उसके मुँह से झाग निकल रहा था। उसकी लगातार काँपती देह पर नीले चक्कत्ते उभर रहे थे। बिन्ना की पत्नी रतुआ बार-बार झोपड़े के अंदर-बाहर हो रही थी। वह किसी अंजानी भाषा में बोल रही थी। वह पगला-सी गई थी। बिन्ना का बड़ा बेटा बेड़ी झोपड़े के बाहर खड़ा जंगल और आबादी के बीच खिंची उस आभासीय त्रियक रेखा के पार लगातार घने होते सन्नाटे को देख रहा था।

विश्रान्त ने बिन्ना को अपने थैले से निकाल कर कोई लाल रंग की दवाई पिलाई थी, ऐसा करते हुए विश्रान्त ने उसकी नीली पड़ती देह को छुआ था। अब उसमें जीवन का ताप नहीं था। वह किसी मृत देह की तरह ठंडी और अकड़ी हुई थी, फिर भी उसका निचला हिस्सा काँप रहा था। विश्रान्त उसके हलक से उतरती दवा को देख रहे थे। वह जैसे हलक में ज़रा-सी उतरकर अटक गई थी। हरिधर ने बिन्ना के सिर पर हाथ फेरा था कि तभी एक झटके के साथ बिन्ना की अकड़ी देह दोहरी हो गई थी। बंदूक से निकली गोली के वेग से उसके मुँह से हरे रंग के पानी का फब्बारा बाहर निकला था। लगा था मानो उसकी ठंडी पड़ चुकी देह ने अपना प्रतिशोध लेने के लिए समय के मुँह पर थूक दिया था। वह धतूरे के बीज पीस कर पानी के साथ पी गया था। वह जीना नहीं चाहता था। उसने आत्महत्या की कोशिश की थी। ऐसा करने से पहले उसने अपनी पत्नी रतुआ से भी वह हरा जहरीला पानी पीने के लिए कहा था, पर रतुआ ने सोते हुए बच्चों की ओर देखकर ऐसा करने से मना कर दिया था, पर जैसे ही दोपहर के समय रतुआ अपने बड़े बेटे बेड़ी के साथ, खाने के लिए कुछ जुटाने की कोशिश में झोपड़े से बाहर निकली थी, बिन्ना ने वह पानी पी लिया था।

अब बिन्ना की नीली पड़ती देह का कम्पन धीरे-धीरे शांत हो रहा था। वह कु्छ कहने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखों के पूरी तरह पथरा जाने से पहले, उसके मुँह से इतना ही निकला था, ‘कागद पे अँगूठा धराय लौ,…हमें कछु न दयो बाउ जी।’ उसके बाद जैसे नीड़ तलाशते पंछियों के झुंड, उनका कलरव, उनके लिए लिखे-कहे गए सारे शब्द, डूबते सूरज को देखकर गाए जाने वाले सभी गीत अनायास ही लुप्त हो गए थे। डूबते सूरज से लाल होते आसमान का रंग, जंगलों के गहरे हरे रंग में घुल रहा था। लगता था सरकारी नक्शों से निकलकर लाल स्याही जंगलों का रंग बदल रही है। धरती-आसमान सब उन झोपड़ों के खिलाफ़ साजिश कर रहे हैं।

आज उस घटना के छ: महीने बाद बिन्ना राज्य के सरकारी विज्ञापनों में खड़ा मुस्करा रहा था। हरिधर और विश्रान्त दोनो ही जानते थे कि जिस आवास, धन, शिक्षा, राशन आदि का लाभ लेते हुए विज्ञापन में बिन्ना को दिखाया गया था, उसकी हवा तक बिन्ना या उसके परिवार तक नहीं पहुँची थी। परन्तु बिन्ना का मुस्कराता चेहरा झूठे सरकारी प्रचार तंत्र के विशाल क़िले की एक-एक ईंट पर छाप दिया गया था।

विश्रान्त की संस्था के कुछ सदस्यों ने प्रदेश की राजधानी से लौटते हुए और भी कई बड़े-बड़े होर्डिंगंस देखे थे, जिसमें बिन्ना के प्रदेश के जंगल, वहाँ का जीवन, सबकुछ किसी परिलोक की तरह बहुत लुभावना लग रहा था, पर सच्चाई कुछ और ही थी, बिन्ना का परिवार अभी भी कई दिनों से भूख और बेकारी से जूझ रहा था। सबसे छोटा बेटा कई दिनों से बुखार में तप रहा था। बिन्ना का परिवार भूख से अपनी लड़ाई हारने ही वाला था कि विश्रान्त अनल और हरिधर उन्हें विप्लव के कैम्प में ले आए थे।

विश्रान्त ने बिन्ना और उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिए, उसके परिवार की हालत और सरकारी तंत्र की अंधेरगर्दी पर विस्तार से एक रिपोर्ट तैयार कर, उसे कस्बे , जिले, प्रदेश और राष्ट्र के स्तर पर कई सरकारी तथा ग़ैरसरकारी संस्थाओं को भेज दिया था। इस बात की भनक उनके जिले के कुछ निचले स्तर के अधिकारियों को भी लग गई थी और वे जान गए थे कि विश्रान्त अनल द्वारा तैयार की गई बिन्ना के केस की रिपोर्ट एक ऐसी चिन्गारी है, जो हवा मिलने पर, एक धमाके के साथ सरकार की नींव हिला सकती है और करोड़ों ख़र्च करके चलाए जा रहे सरकारी प्रचार के विशालकाय गुब्बारे की एक ही झटके में हवा निकाल सकती है। इस बात को सत्ता के दलालों ने और झूठे प्रचार को हवा देने वालों बाबुओं ने सूँघ लिया था। इसीलिए सरकारी विभागों में वह रिपोर्ट ऐसे दबा दी गई थी कि एक बार खोजने पर भूगर्भ में दबे जीवन की उत्पत्ति के गूढ रहस्य खोजे जा सकते थे, पर उस फ़ाईल को, उस रिपोर्ट को और बिन्ना के नाम के किसी काग़ज़ को नहीं खोजा जा सकता था। दूसरी ओर वह रिपोर्ट कई हाथों से खिसकती हुई मानवाधिकारों की हिमायती कई विदेशी संस्थाओं तक जा पहुँची थी। वे संस्थाएं अपने-अपने तरीके से विश्रान्त अनल के प्रयासों और आदिवासियों की परिस्थियों की चर्चा कर रही थीं, पर यहाँ अपने ही देश में उस रिपोर्ट ने, दिल्ली पहुँचने से बहुत पहले ही, प्रदेश की सीमाओं के भीतर ही, सरकारी फ़ाईलों में दम तोड़ दिया था।



इस रिपोर्ट के विषय में विश्रान्त अनल ने एक लम्बे अर्से बाद मीता को भी पत्र लिखा था तथा उसमें उनकी अपनी संस्था द्वारा भी आदिवासियों के साथ हो रही इस तरह की धांधलियों को उजागर करने की अपील की थी, इस पर मीता ने भी उन्हें अपनी पुरानी दोस्ती का हवाला देते हुए चुप रहने की ही सलाह दी थी। तब से विश्रान्त की चुप्पी और भी गहरी हो गई थी और उन्होंने बिन्ना के परिवार को न्याय दिलाने के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ने का मन बना लिया था।

विश्रान्त अनल ने बिन्ना के परिवार को न्याय दिलाने के लिए कोर्ट जाने का फ़ैसला कर लिया था। उस दिन इसी की तैयारी के लिए विश्रान्त कुछ जल्दी ही धड़मौच के कैम्प में बिन्ना के परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी हरिधर पर छोड़ कर पनरबा चले आए थे। उन्हें आए हुए अभी घन्टा भी नहीं हुआ था कि हरिधर हाँफ़ते-दौड़ते बदहवास से उनके पास पहुँचे थे। उन्होंने अपने सूखे गले से बहुत मुश्किल से कुछ टूटे-फूटे शब्द बोले थे। विश्रान्त उनकी बात से बस इतना ही समझ पाए थे कि इस समय उन्हें बिना कुछ पूछे यहाँ से भाग जाना चाहिए। उन्हें पता चला था कि धड़मौच में विप्लव के कैम्प में किसी ने आग लगा दी है। हरिधर ने बताया था कि बिन्ना की पत्नी और उसके तीनों बेटों को जंगल में एक सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया गया है। विश्रान्त बिना कुछ लिए खाली हाथ, अपने कमरे का ताला लगाकर हरिधर के साथ वहाँ से भाग निकले थे। वह नहीं जानते थे कि वह किससे भाग रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं।

डेढ़ घन्टे की एक ट्रक की सवारी, तथा लगभग एक घन्टे गिरते-पड़ते, उबड़-खाबड़ रास्तों पर भागते हुए वह हरिधर के साथ जहाँ पहुँचे थे, वह एक बहुत वीरान जगह थी। यहाँ आकर रास्ते और पगडण्डियाँ ख़त्म हो गई थीं, यहाँ से जंगल घना और भयावह दिख रहा था। सूरज आसमान से गिरकर घनी झाड़ियों में फँसा छटपटा रहा था। इस कोशिश में वह फिर से उसी तरह लाल हो गया था जैसा बिन्ना की मौत के समय हुआ था, पर उस शाम विश्रान्त आबादी और जंगल को बाँटने वाली आभासीय त्रियक रेखा के उस पार थे। आज वह उस रेखा को पार करके घने जंगल के बीच उस जगह खड़े थे, जिसे नक्शों में लाल स्याही से रंग दिया गया था। वहीं एक पेड़ पर बांधी गई मचान पे, एक ही चादर में लिपटे बिन्ना की पत्नी रतुआ और बेड़ी से छोटे दोनो बेटे बैठे थे, जिनका नाम अब तक विश्रान्त नहीं जान पाए थे। उनकी आँखों में भय की छाया शाम के धुँधलके में भी साफ़ दिख रही थी। सबसे छोटे बेटे का शरीर बुखार में तपकर एंठता हुआ रतुआ की छाती से चिपट रहा था। पेड़ के नीचे आग जल रही थी। वहीं बेड़ी हाथों में कुल्हाड़ी लिए खड़ा था। उसका पेट पीठ से चिपक गया था। उसकी पसलियाँ गिनी जा सकती थीं, पर जिस हाथ से उसने कुल्हाड़ी का हत्था पकड़ रखा था, वह लोहे की तरह सख़्त था। लगता था जैसे दसियों लोग मिलकर भी उसके हाथ से कुल्हाड़ी नहीं छीन सकेगें। उसके शरीर में बहते हुए ख़ून का लोहा सिमट कर उसकी मुट्ठियों में आ गया था। उसकी आँखों में बिन्ना और रतुआ की आँखों वाली लाचारगी नहीं थी। इस समय उसकी आँखें किसी घाघ शिकारी की तरह चौकन्नी हो गईं थीं। आज दोपहर जब विश्रान्त उसे अपने परिवार का ख़्याल रखने की हिदायत देकर धढ़मौच से चले थे, तो यही आँखें, एक डरे हुए हिरन की तरह उन्हें दूर तक जाते हुए देखती रही थीं। उस समय उनमें एक डर था। पर अब उनमें एक भयावह सन्नाटा था।

धीरे-धीरे उतरता रात के जंगल का सन्नाटा।

तभी लगभग बीस-बाईस आदिवासी युवकों के एक समूह ने पेड़ों पर बंधी मचान को घेर लिया था। उनके हाथों में कुल्हाड़े, लाठियाँ, भाले और कुछ ऐसे पुराने हथियार थे, जिन्हें विश्रान्त ने इतने दिनों तक आदिवासियों के लिए काम करते रहने पर भी कभी नहीं देखा था। लेकिन उनके पास बन्दूकें नहीं थीं। उनके पास झंडे, नारे या पोस्टर नहीं थे। उनमें से किसी ने रूस, चीन, यहाँ तक कि पाकिस्तान का नाम भी नहीं सुना था। आदिवासियों के इस समूह को बड़ा टोला कहा जाता था। यह टोला आदिवासियों को, जंगल को किसी भी बाहरी आक्रमण से बचाता था। इसका गठन तब हुआ था, जब शायद राज्य, राष्ट्र, लोकतंत्र एवं संविधान जैसे शब्द नहीं बने थे। नई पीढ़ी के जाँबाज़ इस टोले में शामिल होते थे। उनके जंगलों की रक्षा और अपने बचाव के अलग तरीके थे। टोले के एक सदस्य ने बेड़ी से अपनी माँ और दोनों भाईयों को मचान से उतारने का इशारा किया।

कुछ ही देर में विश्रान्त अनल-हरिधर, बिन्ना के परिवार और आदिवासियों के बड़े टोले के साथ एक ऐसा सफ़र कर रहे थे, जिसके बारे में उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। जंगल अपने भीतर एक अलग ही दुनिया छुपाए था। एक डरा देने वाली तिलिस्मी दुनिया। समूह में आगे और पीछे चलने वाले दो युवकों ने मशालें जला ली थीं। वह आपस में जो भाषा बोल रहे थे, विश्रान्त अनल उसे नहीं समझ पा रहे थे।

तभी समूह में आगे चलते युवक अचानक ही कुछ ज़्यादा चौकन्ने हो गए थे। उन्होंने आने वाले किसी अदृश्य संकट को सूंघ लिया था। उन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी दिशा बदल ली थी और विश्रान्त, हरिधर और बिन्ना के परिवार को समूह के बीच एक सुरक्षित घेरे में ले लिया था।

अंधेरा तारकोल की तरह गाढ़ा हो गया था।

सभी के सिरों पर असंख्य कीट-पतंगे-मच्छर और अन्जाने-अनदेखे कीड़े-मकोड़े मंडरा रहे थे। चाँद हसिए की तरह आसमान में झूल रहा था, पर उसकी रोशनी में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह इस अंधेरे में उन्हें रास्ता दिखा सके। हाँ, वह किसी हारी और बिकी हुई पार्टी का चुनाव चिन्ह अभी भी बना रह सकता था। तभी अंधेरे में कोई सरसराती चीज़, मशाल लेकर आगे-आगे चल रहे युवक का सीना चीर कर उसके भीतर घुस गई। एक हिचकी, जो शायद उस युवक की घुटी हुई चीख़ थी, अंधेरे में खो गई। उसके हाथ से छूटकर मशाल ज़मीन पर गिर गई और उससे उठती लपटों से ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों ने आग पकड़ ली। दूसरी मशाल को पलक झपकते ही बुझा दिया गया, समूह ने फिर अपनी दिशा बदल दी। अब वे घुप्प अंधेरे में कीट-पतंगों के किसी झुण्ड की तरह लगभग हवा में तैरते हुए आगे बढ़ रहे थे। कई सरसराती हुई आवाज़ें उनका पीछा करती हुई, पेड़ों से टकराकर नीचे गिर रही थीं। बीच-बीच में कोई घुटी हुई चीख़ जंगल में पसरे सन्नाटे के सीने पर एक पिन सी चुभा देती थी। मरने वाला ध्यान रखता कि उसके मुँह से निकली चीख़, उनका पीछा करती सरसराती आवाज़ों को उनके समूह के आकार, दिशा या गति की कोई जानकारी न दे दे।

तभी एक ‘धाँय’ की आवाज़ गूँजी और एक ज़ोरों की चीख़ सभी के कानों में पड़ी। यह चीख़ आदिवासियों के बड़े टोले के किसी सदस्य की घुटी हुई चीख़ नहीं थी। इस बार चीख़ उस दिशा से आई थी जहाँ से निकलकर सरसराती हुई आवाज़ें बड़े टोले का पीछा कर रही थीं। इस बार गोली बिना साइलेन्सर लगी बन्दूक से चली थी। तभी एक और बड़ा धमाका हुआ, जिससे जंगल के उस हिस्से में दिन जैसा उजाला हो गया, जिसमें एक पल के लिए सबकुछ साफ़-साफ़ देखा जा सकता था। बड़े टोले के सदस्य – बिन्ना के परिवार, विश्रान्त अनल और हरिधर के साथ एक काली चट्टानों वाली पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। बन्दूकधारियों के दो दल आमने-सामने थे। दोनों तरफ़ से फ़ायरिंग हो रही थी। एक तरफ़ के लोगों ने हरे रंग की वर्दी पहन रखी थी और सिर पर काली पट्टी बांधी हुई थी। उनकी बन्दूकों के मुँह पर साइलेन्सर नहीं थे। दूसरी तरफ़ के लोगों ने ख़ाकी वर्दी पहन रखी थी। उनकी बन्दूकों पर साइलेन्सर चढ़े थे। उनसे गोलियाँ बिना शोर किए एक हल्की-सी सरसराती हुई आवाज़ के साथ निकलती थीं।

इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर बड़ा टोला तेज़ी से पहाड़ी पर चढ़कर ओझल हो गया था। उनके पीछे बहुत देर तक गोलियों की आवाज़ गूँजती रही। विश्रान्त अनल पहाड़ी पर पहुँच कर औंधे मुँह गिर पड़े थे। उनका शरीर कई जगह से छिल गया था। उनके घुटनों और पसलियों में कई मुँदी चोटें आई थीं। उनकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। पूरी पहाड़ी चकरी की तरह घूम रही थी। वह धीरे-धीरे जंगल से, धरती से अलग हो रही थी। तभी उनके कानों से किसी के ज़ोर ज़ोर से चीखने की आवाज़ टकराई। यह बिन्ना की पत्नी रतुआ की आवाज़ थी। वह ‘बेड़ी………ओ बेड़ी हौ’ की आवाज़ लगा रही थी। बेड़ी, बिन्ना का बड़ा बेटा, जिसने इस एक रात में ही अपनी उम्र के कई साल पार कर लिए थे, जिसे विश्रान्त अनल ने अपने कैम्प में लिखना-पढ़ना सिखाया था, जो बिन्ना की मौत के बाद पनरबा कस्बे  में अपने परिवार के साथ कोई रोज़गार शुरू करने वाला था, जो अपने परिवार को इस दुरूह जीवन से खींच कर विकास की मुख्यधारा में ले जाने वाला था। वही बेड़ी आज अपनी माँ और दोनो छोटे भाईयों के साथ नहीं था। सब हैरान थे। उसकी तो चीख़ भी किसी ने नहीं सुनी थी। उसे जंगल का अंधेरा लील गया था। उसी पहाड़ी पर जिसे बड़े टोले के लोग काली पहाड़ी कहते थे, रतुआ बेड़ी को पुकारती यहाँ-वहाँ भाग रही थी। तभी उसके छोटे बेटे का शरीर ज्वर के ताप और उसकी असहय पीड़ा से उठी, एक लम्बी एंठन के बाद, स्थिर हो गया था। काली पहाड़ी विश्रान्त के सामने फिर चकरी की तरह घूमने लगी थी। अब उस पर बैठा हर आदमी गर्त में डूब रहा था। उसके लिए पूरी दुनिया में कहीं भी, कोई रोशनी शेष नहीं थी। पहाड़ी पर बैठे-बैठे ही किसी ब्लैकहोल में समा जाना, उसकी नियति बन चुका था।

पहाड़ी, काली पहाड़ी सचमुच ही किसी ब्लैकहोल में समा गई थी। विश्रान्त दोनों हाथों से सिर पकड़े हुए अपने कमरे में बैठे थे। वह सामने रखे लिफ़ाफ़े को देख रहे थे। वह उसे खोलकर, उसमें रखे काग़ज़ को, जो किसी ख़त के जैसी ही कोई चीज़ लग रही थी, पढ़ लेना चाहते थे। पर अब भी उनका सिर रह-रह कर बुरी तरह घूम रहा था।

विश्रान्त अनल ने सुना था कि इन जंगलों के नीचे अपार प्राकृतिक सम्पदा दबी पड़ी है। उन्होंने सुना था कि लोहा, ताँबा जैसी धातुओं के भण्डार यहाँ धरती के गर्भ में छुपे हैं। क्या यह आदिवासियों का बड़ा टोला उसी की सुरक्षा के लिए बना था? क्या पहाड़ी के नीचे चलने वाली गोलियाँ, अंधेरे में बहने वाला ख़ून, सब उसी सम्पदा को पाने के लिए था? क्या सचमुच ही कई ताक़तें, अलग-अलग नाम रख कर आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करने की साज़िश कर रही थीं? हाँ शायद यही सच था! और विश्रान्त उस पहाड़ी से उतरते हुए, जंगल से बाहर निकल कर दुनिया को यही सच बताने के बारे में सोच रहे थे। वह बताना चाहते थे कि अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है। कौन किसके लिए, किस वजह से लड़ रहा है, वह इसकी साफ़-साफ़ तस्वीर सबके सामने रखना चाहते थे। वह पहाड़ी पर बैठे लोगों को वहाँ से निकाल लाना चाहते थे, पर उस रात बड़े टोले के नियमानुसार उन्हें सुबह होने से पहले ही काली पहाड़ी से चले आना पड़ा था।

टोले के दो युवक और हरिधर उन्हें पनरबा कस्बे के बाहर तक छोड़ गए थे। हरिधर आदिवासी टोले के ही थे, सो उन्हें विश्रान्त को छोड़कर पहाड़ी पर लौट जाना पड़ा, पर वह उस रोज़ विश्रान्त को धीरे-धीरे अपनी आँखों से ओझल होते हुए देखते रहे थे। वह जानते थे कि इस घटना के बाद विश्रान्त अनल का जीवन पहले की तरह रहने वाला नहीं है। वह एक ईमानदार कोशिश को, एक उम्मीद को अपने सामने अपनी आँखों से ओझल होते हुए देख रहे थे। काली पहाड़ी पर लौटते हुए उनके लिए सभ्य समाज में बोले और व्यवहार में लाए जाने वाले तमाम शब्द बेमानी हो गए थे, उन शब्दों में प्यार, दोस्ती, रिश्ते जैसे भाव सूचक शब्द ही नहीं थे, बल्कि परिवार, समाज, सभ्यता, राज्य, देश, कानून, संविधान जैसे कई ज्ञान सूचक शब्द भी अब उनके लिए बिलकुल निरर्थक हो गए थे। विप्लव के कैम्प के साथ उनका अपने लोगों के लिए काम करने का, उन्हें रोशनी दिखाने का सपना भी जल गया था। वह जानते थे कि अब गाँव और कस्बे  में उनके लिए भी कोई जगह नहीं बची है। अब वह ऐसी लड़ाई का हिस्सा बन चुके हैं जिसका कोई अन्त नहीं है। वह फिर से एक सदियों पुरानी भाषा सीखने के लिए काली पहाड़ी की ओर बढ़ गए थे।



उस रोज़ विश्रान्त अपनी पसलियों को दोनों हाथों से दबाए, लंगड़ाते, लड़खड़ाते बड़ी मुश्किल से अपने कमरे पर पहुँचे थे। उनकी आँखों के चारों तरफ़ गहरे काले निशान थे। उनके होठों पर पपड़ियाँ जमी थीं। उनके कमरे के दरवाज़े खुले पड़े थे। उनकी अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरत भर के लिए जुटाए गए सामान में से, अब वहाँ कुछ भी नहीं बचा था। बिजली कट गई थी। फ़ोन का तार भी कटा हुआ हवा में झूल रहा था। कमरे में अंधेरा था। बाहर की दुनिया में धीरे-धीरे सूरज निकल रहा था। कुछ किरणें रोशनदान से कमरे के फ़र्श पर गिर रही थीं। कुछ अधजले पन्ने, कुछ किताबें यहाँ-वहाँ फैली पड़ी थीं। विश्रान्त अपनी पसलियाँ पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गए थे। उनके शरीर को देख कर लगता था कि वह बहुत थक चुके हैं, पर आँखों से लगता था कि अभी उन्होंने हार नहीं मानी है। वह कमरे में बिखरी अधजली किताबों और यहाँ-वहाँ उड़ते पन्नों को समेटने लगे थे।

उसके बाद सूरज नीयत समय पर डूबा और दूसरे दिन फिर निकल आया, पर विश्रान्त अनल के कमरे के दरवाज़े नहीं खुले। इस बीच उन्होंने फटे, अधलिखे पन्नों पर, कई बार कुछ लिखने की कोशिश की, पर काग़ज़ों पर कुछ भी दर्ज न हो सका। कभी कुछ लिखा भी गया तो उसे उन्होंने ख़ुद फाड़ कर चिन्दी-चिन्दी कर दिया। इस बीच उन्होंने कई बार अपने फेफड़ों में हवा भरी और ज़ोर से चीख़ना चाहा, पर पसलियों में उठे दर्द से वह ऐसा नहीं कर सके और पसलियाँ पकड़ कर फ़र्श पर लोट गए। वह न जाने कब तक छत के शहतीर में लगी घुन को ताकते रहे। कटे हुए फ़ोन के तार-तार को उँगलियों में लपेटते और तोड़ते-मरोड़ते रहे। उन्होंने बार-बार आँखों के आगे छाते अंधेरे से बाहर निकलने के लिए, फ़र्श पर पड़ी पुरानी, अधजली बीड़ी को फिर से जला लिया, पर पहला कश खींचते ही खांसी का ऐसा धसका उठा कि लगा दम लेकर ही थमेगा। खाँसते-खाँसते आँखें लाल हो गईं, उसमें उनका पूरा प्रदेश, उसमें दूर-दूर तक फैले जंगल, धू-धू करके जल उठे। उस कमरे की दीवारों ने उनकी आँखों से लपटें निकलते हुए देखीं, पर कमरे की दीवारों की आँखें और कान तो थे, पर मुँह नहीं था, सो दीवारें यह सब देखकर भी खामोश ही रहीं।

वह खाँसते-खाँसते कब बेहोश होकर फ़र्श पर गिर गए, किसी को पता नहीं चला, पर बेहोशी में भी वह काली पहाड़ी उनके सामने चकरी-सी घूमती रही, वह पहाड़ी जहाँ से भी गुज़र रही थी, वहाँ के जंगल झुलसते जा रहे थे। नदी, नाले, झरने सूखते जा रहे थे। पशु-पक्षी भस्म होते जा रहे थे। बस जो चीज़ बची रह गई थी, वह थी बड़े-बड़े सरकारी विज्ञापनों पर बिन्ना का मुस्कुराता चेहरा और उसके साथ खड़े मंत्री की आँखों की चमक। विश्रान्त उन सभी होर्डिंगों को गिरा देना चाहते थे, पर वह उठ नहीं पा रहे थे।

उसी समय कोई ज़ोर से खटखटाकर, उनके दरवाज़े पर एक ख़त छोड़ गया था। वह अपनी इंद्रियों की सम्पूर्ण चेतना समेटकर उस लिफ़ाफ़े को खोलकर पढ़ना चाहते थे। वह उस पहाड़ी को पल भर के लिए भूल कर वर्तमान में लौटना चाहते थे। बहुत कोशिश करने पर, इस बार वह काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोलकर, उसमें रखे काग़ज़ पर लिखे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों से बनने वाले शब्दों को पढ़ने में सफ़ल हो गए थे। उस पर लिखा था —

   विश्रान्त जी,
   अब आप जो चाहो, सो लिखो
   जो चाहो, सो करो
   अब हम आपके साथ हैं।
   अब कोई कुत्ता आप तक नहीं पहुँच पाएगा।
   बस कुछ समय और
   फिर हमारी तरह
   किसी को चौपाया बन कर
   जंगलों से भागना नहीं पड़ेगा।
   अब कोई अंधेरे में हमारा शिकार
   नहीं कर पाएगा।
   अब मेरे पास कलम नहीं है।
   कुल्हाड़ी भी नहीं है।
   अब मेरे पास बन्दूक है।

   — बेड़ी

बेड़ी! विश्रान्त की आँखें गहरे आश्चर्य से फैल गईं। बिन्ना का बड़ा बेटा बेड़ी! बेड़ी ज़िंदा था? पर कहाँ? और बन्दूक! बन्दूक उसके पास कहाँ से आई? बन्दूक तो बड़े टोले के पास नहीं थी। बेड़ी किसके साथ इस लड़ाई में उतर गया था? और किसके ख़िलाफ़?

विश्रान्त अनल ने उस ख़त को कई बार पढ़ा। उन्हें बेड़ी की एक डरे हुए हिरन की तरह कातर आँखें याद आ रही थीं, जो अब एक शिकारी की आँखों में बदल रही थीं।

उसके बाद कई दिनों तक विश्रान्त अनल को किसी ने नहीं देखा था। कुछ लोगों का कहना था कि एक रात सादी-वर्दी में पुलिस उन्हें उठाकर ले गई थी। उनके ख़िलाफ़ क़ीमती लकड़ी और जानवरों की खाल की तस्करी करने वाले गैंग के लिए मुखबिरी और दलाली करने के आरोप थे। उनके घर से कोई ऐसा ख़त भी मिला था, जिससे उनका नाम एक ऐसे आंदोलन से जुड़ गया था, जिसके दमन के लिए पूरा सरकारी तंत्र अपनी पूरी शक्ति के साथ लगा था। अनायास ही एक लेखक, एक कहानीकार विश्रान्त अनल एक बड़े अपराधी, एक देशद्रोही बन गए थे। पर उनकी गिरफ़्तारी का कोई रिकार्ड प्रदेश के किसी थाने में नहीं था। पुलिस, प्रशासन और सरकार उन्हें एक भगौड़े अपराधी, एक देशद्रोही के रूप में दुनिया के सामने रख रही थी।

चुनाव नज़दीक आ रहे थे सरकार हिंसा फैलाने वालों से सख्ती से निपटने की योजना बना रही थी। मीता को रूलिंग पार्टी से टिकिट मिलने कि संभावना थी। वह लगातार आस-पास के आदिवासी इलाकों का दौरा कर रही थी। प्रोफेसर तिवारी को अमेरिका की एक नामी यूनीवर्सिटी में पढ़ाने के लिए बुला लिया गया था। उनका नाम इस बार शिक्षा के क्षेत्र में मिलने वाले सर्वोच्च सम्मान के लिए रिकमन्ड किया गया था।

अब इन सब बातों को हुए बहुत समय हो चुका है।

सूरज अब भी नीयत समय पर निकलता और डूबता है। राज्य के मौसम विभाग की सूचना के अनुसार कई बार सही जगह पर सही समय बारिश भी होती है। कुछ लोगों का कहना है कि विश्रान्त अनल ने पुलिस की हिरासत में आत्महत्या कर ली थी, कुछ लोगों का कहना है कि आजकल जंगल में होने वाली सारी हिंसा का मास्टर माइन्ड विश्रान्त अनल ही हैं, पर कुछ लोगों का कहना है कि उनकी ही क़द-काठी के एक आदमी को, जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, आँखें लाल थीं, कस्बे  से जंगल की ओर जाती हुई सड़क के किनारे छोटे-छोटे गड्ढ़े खोदकर, ज़मीन में काग़ज़ों के छोटे-छोटे कुछ टुकड़े दबाते हुए देखा गया था। ...आजकल पनरबा कस्बे  से जंगल की ओर जाने वाली सड़क के किनारे लम्बे-लम्बे सफ़ेद तने वाले पेड़ लगे हैं। कुछ लोग कहते हैं, उनकी लकड़ी से माचिस बनती है। कुछ लोग कहते हैं उनकी छाल से काग़ज़ बनता है।

पनरबा कस्बे  के किसी काग़ज़ को माचिस की तीली से जलाकर देखियेगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रान्त अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।


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