मार्मिक कहानियां: तरुण भटनागर — "तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड" - #Shabdankan
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मार्मिक कहानियां: तरुण भटनागर — "तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड"

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मार्मिक कहानियां: तरुण भटनागर — "तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड"

उसे यह भी नहीं पता था कि स्टीव को पल भर के लिए शराब पीने की इच्छा हुई थी। पब के सामने खड़े-खड़े उसने अपनी पॉकेट से पैसे निकालकर गिने थे। उसे काउण्टर वाले शख़्स पर गुस्सा आया जिसने उससे फ़ोन करने के चार यूरो ले लिये थे। उसे पैसे देते वक़्त उसे लगा था कि वह उसे बता दे कि वह एक मर रही बुज़ुर्ग औरत की मदद कर रहा था। पर ऐसा कहना उसे ठीक न लगा। अगर यह सुनकर भी वह मना कर देता तो उसे दुःख होता। अपने दुःख की ख़ातिर उसने उसे यह बात न बताई। —तरुण भटनागर, तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड
जब कोई आलोचक कहानी को सफ़र में पढ़े और वह मजबूर हो जाए उस पर टिप्पणी देने के लिए. ऐसे में पाठक कहानी को बगैर शंका के पढ़ सकता है, हां उसे न पसंद आये इसकी संभावना कम भले हो लेकिन होती है। रोहणी अग्रवाल जी का ‘तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड' : कहानी : तंत्र और आलोचना, पाठक को समृद्ध बनाएगा और विद्यार्थी को ज्ञान-वान. मुझे इस कहानी पर और कुछ नहीं कहना है, बस इसके सिवा कि भाषा का हिन्दुस्तानी और माहौल का यूरोपीय होना कहानीकार के विस्तार को दिखाता रहा, हाँ नुक्तों का न होना अखर रहा था, इसलिए उन्हें यथासम्भव लगाने की कोशिश की है और इसी के मद्देनज़र, शब्दांकन के फेसबुक पेज पर (और अब यहाँ) शब्दांकन पर रचना भेजने की प्रक्रिया और निर्देश को साझा किया है, जिसका पालन होना चाहिए, भाषा के लिए।

भरत एस तिवारी, सम्पादक





तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड

—  तरुण भटनागर

कहते हैं यह एक सच वाकया है जो यूरोप के किसी शहर में हुआ था।

बताया यूँ गया कि एक बुज़ुर्ग औरत थी। वह शहर के पुराने इलाके में अपने फ्लैट में रहती थी। शायद बुडापेस्ट में, शायद एम्सटर्डम में या शायद कहीं और ठीक-ठीक मालुमात नहीं हैं। पर इससे क्या अंतर पड़ता है। सारे शहर तो एक से दीखते हैं। क्या तो बुडापेस्ट और क्या एम्सटर्डम। बस वहाँ के बाशिंदों की ज़बाने मुख़्तलिफ़ हैं, बाकी सब एक सा दीखता है। ज़बानें मुख़्तलिफ़ हों तब भी शहर एक से दीखते रहते हैं।

वह बुज़ुर्ग औरत ऐसे ही किसी शहर के पुराने इलाक़े में रहती थी, अकेली और दुनियादारी से बहुत दूर। यूँ उसकी चार औलादें थीं, तीन बेटे और एक बेटी, पर इससे क्या होता है? सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, सबकी अपनी अपनी आज़ादियाँ, सबकी अपनी-अपनी जवाबदारियाँ, ठीक उसी तरह जैसे ख़ुद उस बुज़ुर्ग औरत की अपनी दुनिया है, उसकी अपनी आज़ादी। सो साथ रहने का कहीं कोई ख़याल नहीं। साथ रहना दिक़्क़त देता है। इससे ज़िन्दगी में ख़लल पड़ता है। पर उम्र को क्या कीजिये। वह बढ़ती रहती है और एक समय के बाद जिस्म साथ नहीं देता। वह इतना कमज़ोर हो जाता है मानो बीमार हो। एक दो बार तो उस बुज़ुर्ग औरत की तबियत इस क़दर ख़राब हुई कि वह अपने फ्लैट में अकेली ही पड़ी रही। उसमें उठ बैठने तक की ताकत न रही। उसने डॅाक्टर को फ़ोन पर ही बताया। डॅाक्टर ने फ़ोन पर ही उसे दवायें बता दीं। उसने फ़ोन से ही दवायें मंगा लीं। देर रात उसकी तबियत इतनी ख़राब हो गई कि उसे ऐसा लगा मानो वह मर जायेगी। पर उसने किसी को फ़ोन नहीं किया। बस पड़ी रही। थोड़ी-थोड़ी देर बाद सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट का एक रिकार्डेd फ़ोन उसके फ़ोन पर सुनाई देता - आप ठीक तो हैं न - और वह हाँ या हूँ में आवाज़ कर देती। तन्हाई में सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट का फ़ोन राहत देता है। सरकार ने इतनी सहूलियत दे रखी है कि किसी की मदद की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। उसे पल भर को ख़याल आया कि वह फ़ोन पर कह दे कि वह मर गई। थोड़ी सी झुंझलाहट, थोड़ा सा रंज, थोड़ा दर्द और थोड़ी सी बेबात आ जमी यह तन्हाई जाने क्या था कि वह ऐसा कहना चाहती थी, पर जानती थी कि ऐसा कहना ठीक न होगा।

कभी-कभी उसका दूसरे नंबर का बेटा और इकलौती बेटी उसे देखने आते हैं। कभी-कभी क्या बल्कि उनके आने के दिन तय हैं। माह के दूसरे गुरुवार को बेटा आता है और तीसरे शनिवार को बेटी। पर वह अक्सर भूल जाती कि आज कौन सा दिन है। अगर याद रहता तो वह उनका इंतज़ार करती। अगर याद न रहता तो इंतज़ार न करती। एक बार तो यह भी हुआ कि वह अपनी बेटी को पहचान भी न पाई। बेटी यह सोचकर आई थी कि आज तो माँ उसका इंतज़ार कर रही होगी। पर यह क्या, वह तो उसे पहचान ही नहीं रही थी। उसने उसे कुछ पुरानी तस्वीरें दिखाईं जिसमें वह और वे समंदर के किनारे खड़े हैं, पर वे तब भी बेटी को पहचान न पाईं। बेटी ने उनके बिस्तर के पास एक फ़ोन लगवा दिया। फ़ोन में एमरजेंसी बटन थे। लाल बटन दबाने से ऐंबुलेंस, पीला दबाने से फायर ब्रिगेड और हरा दबाने से सीधे-सीधे बेटी को फ़ोन। बेटी ने सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट को भी माँ के हालात के बारे में बताया। उन्ही की सलाह पर यह फ़ोन उसने लगवाया था।

पर उस दिन। उस दिन वह फ़ोन भी काम न आया। वे बुरी तरह से गश खा गईं। तेज़ ठण्ड थी और उन्हें ज़ोर का चक्कर आया था। ज़मीन पर पड़े-पड़े उन्होंने फ़ोन उठाया। उन्हें यह तो याद था कि यह फ़ोन है, पर बाकी कुछ भी नहीं। उन्हें यह भी याद न रहा कि वे कहाँ हैं। कब से हैं। बस इतना ही ख़याल आया कि यह फ़ोन है। इसके बटन दबाओ तो दूसरी तरफ किसी और से बात होती है। उनके सिर से ख़ून निकल रहा था। उन्हें लाल, पीला और हरा बटन समझ न आया। उन्होंने फ़ोन के नंबरों वाले बटन दबाये। बेतरतीब। एक बार, दो बार, तीन बार....।

स्टीव का जब सैल फ़ोन बजा तब वह एक कैफेटेरिया में बैठा था। रात के आठ बज रहे थे।

हैलो...।

मेरा नाम क्रिस्टीना है। मैं बहुत बुज़ुर्ग हूँ। मैं गिर पड़ी हूँ।

ओह। क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।

मुझे यहाँ से निकाल लो। मेरे सिर से ख़ून बह रहा है।

आप घबराये नहीं आप कहाँ पर हैं, यह बतायें।

मुझे याद नहीं मैं कहाँ पर हूँ।

क्रिस्टीना की आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

मुझसे बात करते नहीं बन रहा। आप मेरी मदद करो।

क्रिस्टीना ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रही थी।

अच्छा यह बताओ आपको आपके आसपास क्या दीख रहा है।

दीवार पर एक खिड़की है। आयताकार खिड़की। काँच वाली।

और कुछ....।

क्रिस्टीना ने फिर कुछ नहीं कहा। बस फ़ोन पर उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई देती रही। स्टीव कुछ देर तक फ़ोन पर हैलो-हैलो बोलता रहा। पर जब साँसों की आवाज़ के अलावा और कुछ भी सुनाई नहीं दिया तो वह थोड़ा बेचैन हो गया।

स्टीव बेरोजगार है। वह छब्बीस साल का है। उसने कुछ दिनों तक काम की तलाश की। रात दिन वह काम तलाशता रहा। पर इधर हफ़्ता भर से वह काम तलाश कर थक गया है। अब वह फ़ुर्सत में है। उसने काम तलाशने का काम मुल्तवी कर दिया है।

कैफेटेरिया के काँच के पार एक स्ट्रीट है। दूधिया मरकरी की रौशनी में जगमगाती। पत्थरों वाली स्ट्रीट। काँच के ठीक बाहर स्ट्रीट से सटा एक पाथ-वे है। पाथ-वे पर अभी-अभी तीन बच्चे भागते हुए खिड़की के सामने से निकले थे। काँच के कारण उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। स्टीव उसी तरफ देख रहा था। हल्की-हल्की बर्फ गिर रही थी। लैंपपोस्ट के नीचे एक अश्वेत लड़का खड़ा था, लबादे से कपड़े पहने, कानों में वॉकमेन लगाये, कुछ सुनता और सुने की धुन पर पैर-हाथ हिलाता सा।

मुझे एक कॉल करनी है।

स्टीव ने कैफेटेरिया के काउण्टर पर बैठे शख़्स से कहा। काउण्टर वाले शख़्स ने स्टीव के हाथ में सैल फ़ोन देखा। स्टीव ने देखा कि वह उसका सैल फ़ोन देख रहा है। जब पास सैल फ़ोन हो तो कोई क्यों काउण्टर के लैण्डलाइन से फ़ोन करेगा भला। स्टीव उसे नहीं बताना चाहता था कि उसके सैल फ़ोन पर एक बुज़ुर्ग औरत है। बल्कि यूँ कहें कि उसके सैल फ़ोन पर एक बुज़ुर्ग औरत की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही है। वह उसे नहीं काटना चाहता।

मैं कॉल के पैसे दूँगा।

स्टीव ने कहा। उसके पॉकेट में छह यूरो हैं। दो यूरो की उसने कॉफी पी है। कुछ पैसे वह कॉल पर खर्च कर सकता है।

हैलो।

हैलो।

मेरा नाम स्टीव है मुझे आपकी मदद चाहिए।

फ़ोन के दूसरी तरफ शहर की फायर ब्रिगेड सर्विस का हैड था। काउण्टर वाला शख़्स अपने काम में मगन हो गया। किसी का फ़ोन सुनना बेअदबी है। किसी को किसी का फ़ोन न सुनना चाहिए। इस मुल्क में कोई किसी के काम में दख़ल नहीं देता। यहाँ तक कि किसी को देखना खासकर लगातार देखना भी गलत माना जाता है। नज़र बाजी करना तो एकदम ही गलत है। लोगों को लगता है कि ऐसा करने से दूसरा आदमी डिस्टर्ब हो सकता है। अभी कल ही इस कैफेटेरिया से लगी स्ट्रीट से तीन औरतें गुजरी थीं। तीनों टाॅपलैस थीं। किसी ने भी उनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा।

इस तरह तो किसी को ढूँढ़ पाना मुश्किल है।

फायर ब्रिगेड स्टेशन का हैड़ फ़ोन पर स्टीव से कह रहा था।

हम उस बुज़ुर्ग औरत को बचा सकते हैं।

मैं तुम्हारे इरादों की तारीफ करता हूँ। यह बड़े ही सवाब का काम है। पर यह आसान काम नहीं लग रहा।

उसने बताया था कि वह जिस कमरे में है, उसमें बड़ी आयताकार खिड़की है। काँच वाली।

हाँ पर इससे क्या होता है?

ऐसी खिड़कियाँ शहर के पुराने इलाके में हैं। वहाँ के घरों और फ्लैट्स में।

एकदम सही।

आपके पास कितनी फायर ब्रिगेड हैं।

कुल तेरह।

क्या आप सबको काम पर लगा सकते हैं।

हाँ। अभी सभी स्टेशन पर खड़ी हैं। बहुत दिनों से ख़ाली खड़ी हैं। इस बहाने वे भी काम पर लग जायेंगी।

आप अगर उन सबको पुराने शहर रवाना कर दें। पुराने शहर के मुख्तलिफ इलाकों में और उनको बता दें कि वे सब अपना फायर अलार्म बजाते रहें।

उससे क्या होगा?

मेरे सैल फ़ोन पर उस बुज़ुर्ग औरत का फ़ोन होल्ड पर है। सैल फ़ोन में इतना पैसा है कि अभी वह दो-चार घण्टे होल्ड पर रह सकता है।

उससे क्या होगा?

हो सकता है कि उन फायर अलार्म में से कोई अलार्म मेरे सैल फ़ोन पर सुनाई दे जाये और उससे उस बुज़ुर्ग औरत के फ्लैट का कुछ पता चले।

आइडिया अच्छा है। ऐसा ही करते हैं।




स्टीव ने काउण्टर वाला फ़ोन रख दिया। फिर पल भर को अपने सैल फ़ोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ सुनी। फिर दो बार हैलो-हैलो किया। पर दूसरी तरफ से कोई जवाब न आया। कैफेटेरिया में दूसरी तरफ बैठे एक शख़्स ने पल भर को उसे देखा। उसने उसे बेचैनी से सैल फ़ोन पर हैलो-हैलो कहते सुना था। अगर दूसरी तरफ से हैलो-हैलो का जवाब न आये तो कौन भला इतनी दफा बार-बार हैलो-हैलो करता है। लोग एक दो दफा हैलो-हैलो करते हैं और फिर फ़ोन बंद कर बैठ जाते हैं। कितना अजीब शख़्स है। उसने सोचा। फिर दूसरी तरफ देखने लगा। कितना अजीब कि थोड़ी-थोड़ी देर में हैलो- हैलो कहता है पर सैल फ़ोन को नहीं काटता। सैल फ़ोन पर लाल और हरा दोनों रंगों का सिग्नल चमक रहा है। याने फ़ोन कटा नहीं है। फ़ोन पर बात भी नहीं हो रही है और वह कटा भी नहीं है। बस स्टीव थोड़ी-थोड़ी देर में उस पर हैलो-हैलो कहता है। पता नहीं क्या है, पता नहीं क्यों?

स्टीव बेचैन हो चला था। वह कैफेटेरिया के बाहर जाना चाहता है पर लगता है जैसे अभी फायर ब्रिगेड के हैड का फ़ोन आयेगा और काउण्टर पर रखा फ़ोन घनघना उठेगा। उसने पल भर को बाहर देखा। लैंप पोस्ट के नीचे खड़ा अश्वेत लड़का जा चुका था। उसके पीछे दीवार पर बना म्यूरल अब बिना किसी रोक के साफ़-साफ़ दीख रहा था। बस बर्फ थी जो आहिस्ते-आहिस्ते गिर रही थी, म्यूरल को थोड़ा ग़ैरवाज़ेह बनाती। म्यूरल में एक लड़की है जो दीवार पर रंग बिखेर रही है। लड़की की फ्राक अपनी पूरी गोलाई में खुली है। उसने ऊँची हील के बाद भी ख़ुद को पैरों से उचका रखा है। रंग दूर तक बिखरा हुआ है, जैसे वाकय में बकेट से फेंका जाता रंगीन पानी हो अपनी बुंदकियों, धार, रिसते रंग और छपाकों के साथ दीवार पर ही रुक गया हो। म्यूरल के ठीक सामने एक हाइड्रेण्ट हैं। लाल रंग का पाथ-वे के एक किनारे पर। उस पर एक बिल्ली बैठी है अपने आगे के पैरों को अपनी ज़बान से चाटती। स्टीव को लगा अगर उसका सैल फ़ोन एंगेज न होता तो वह काँच के बाहर देखता हुआ सिंपली रैड का एक पुराना गीत - इफ यू डोण्ट नो मी बाई नाउ यू विल नेवर नेवर नेवर नो मी - सुनता। तभी उसे ख़याल आया कि उसके जैकेट में इयर फ़ोन है। उसने इयर फ़ोन का पिन मोबाइल में लगाया और एक स्पीकर को बाँये कान में लगा लिया। दाहिना कान उसने काउण्टर के फ़ोन की घनघनाहट सुनने के लिए खुला छोड़ दिया।

उसे क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ एकदम साफ़ सुनाई दे रही थी। उसने इसके पहले कभी साँसों की आवाज़ों को इतना गौर से नहीं सुना था। अगर ज़रुरत न हो तो लोग सुनते नहीं। साँसों की आवाज़ कोई ऐसी चीज नहीं जो सुनी जाये। अगर वक़्त न होता तो शायद वह भी न सुन रहा होता। सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट को क्रिस्टीना का फ़ोन नंबर देकर फारिग़ हो लेता। वह थोड़ा बेताब था। जब वह ख़ाली होता है वह मुश्ताक हो जाता है। इतना बेताब कि साँसों की आवाज़ जैसी बेजान आवाज़ भी बड़ी जानदार लगती है। लगता है बस सुनते रहो। वह पहला है जो क्रिस्टीना की साँसों को इतने गौर से सुन रहा है। ख़ुद क्रिस्टीना को ही न पता हो। न उसके आशिक को, न उसके बच्चों को ही इल्म हो कि वह किस तरह साँस लेती है। कि उसकी साँसों की आवाज़ कैसी है? यह एक बोर काम है बेशक, पर वह ख़ुद को तसल्ली दे रहा है कि यह भी एक काम है।

बाहर गिरती बर्फ तेज हो गई है। हाइड्रेण्ट पर बैठी बिल्ली जा चुकी है।....और तभी, बस तभी उसे सैल फ़ोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ के साथ-साथ एक बिल्ली की आवाज़ सुनाई देती है जो धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। वह कभी हाइड्रेण्ट की वह ख़ाली जगह देखता है जहाँ बिल्ली बैठी थी, फिर सैल फ़ोन पर सुनाई देती बिल्ली की आवाज़ सुनता है। उसके जेहन में विण्डोसिल से सरककर खिड़की के भीतर बेआवाज़ कूदती बिल्ली का ख़याल आता है और फिर सैल फ़ोन के एकदम पास सुनाई देती उसकी म्याऊँ-म्याऊँ सुनाई देती है। उसे लगता है कि क्रिस्टीना फर्श पर पड़ी है, उसके सिर से निकले ख़ून का चकत्ता जमीन पर फैल है, आहिस्ते से मुँह खोल म्याऊँ करती बिल्ली ख़ून के चकत्ते को सूँघती है, उसकी छोटी लाल ज़बान धीरे से गढा चुके ख़ूँन को छूती है....। वह हड़बड़ाता इयर फ़ोन को हटाता है। सैल फ़ोन पर ज़ोर-ज़ोर से कहता है - हैलो, हैलो क्रिस्टीना......हैलो.....हैलो....क्या तुम मुझे सुन रही हो क्रिस्टीना.....हैलो, हैलो.....। बिल्ली की आवाज़ एकदम से बंद हो जाती है। जब-जब वह हैलो कहता है उसकी आवाज़ क्रिस्टीना के कमरे में गूँजती है। क्रिस्टीना के फ़ोन का स्पीकर ऑन है। वह थोड़ा ज़ोर-ज़ोर से कहता है - चले जाओ....चले जाओ वहाँ से....ओ बिल्ली तू चली जा वहाँ से, जा दूर चली जा, भाग वहाँ से.....भाग....भाग...। कैफेटेरिया में उसकी आवाज़ गूंजती है। सब लोग उसे अचरज से देखते हैं। काउण्टर पर खड़ा शख़्स उसे गुस्से से घूरता है।

वह अपना सैल फ़ोन लेकर बाहर आ जाता है। बाहर रोड पर जमी बर्फ पर गाड़ी के टायरों के निशान हैं। सफेद बर्फ पर कैफैटेरिया के काँच पर लटकती रंगीन लाइटें चमक रही हैं। चारों ओर खामोशी है। आकाश चुपचाप बर्फबारी कर रहा है। पाथ-वे और घरों की ढ़लुँवा छतों पर बेआवाज़ बर्फ गिर रही है। पास ही बर्फ में समा चुकी एक कार खामोशी से खड़ी है। खामोशी को चीरती उसकी आवाज़ थोड़ा देर तक सुनाई देती है - हैलो....हैलो क्रिस्टीना, क्या तुम सुन रही हो....। सैल फ़ोन में बिल्ली की आवाज़ दूर जाती जाती है। फिर खत्म हो जाती है। बस साँसों की आवाज़ रह जाती है। वह बर्फ से ढंकी स्ट्रीट चेयर बैठ कर कान में इयर फ़ोन लगाकर उस आवाज़ को सुनता मुस्कुराता है।

मेरा कोई फ़ोन था।

लौटकर स्टीव ने काउण्टर वाले शख़्स से पूछा। काउण्टर वाले शख़्स ने थोड़ा हिक़ारत से उसे देखा। फिर उसने ‘’में अपनी गर्दन डुलाई। तभी उसे अपने सैल फ़ोन पर साँसों की आवाज़ के साथ-साथ फायर ब्रिेगेड का फायर अलार्म सुनाई दिया। लगातार बढ़ता सा अलार्म। उसने काउण्टर पर रखे फ़ोन से एक फ़ोन मिलाया। काउण्टर वाले शख़्स ने उसे इशारे से मना किया। उसने कहा वह पैसे देगा। काउण्टर वाले शख़्स ने इशारा किया याने अच्छा कर लो....।

आप एक-एक कर सभी फायर ब्रिगेड को अपना अलार्म बंद करने को कहो।

उससे क्या होगा।

जब मेरे सैल फ़ोन पर सुनाई देने वाला फायर अलार्म बंद होगा मैं आपको बता दूँगा।

इस तरह पता चल जायेगा कि उस बुज़ुर्ग औरत का फ्लैट किस फायर ब्रिगेड के पास है।

एकदम। उस बुज़ुर्ग औरत का नाम क्रिस्टीना है।

ओह। शुक्रिया।

शुक्रिया किस बात का।

तुम कम से कम किसी की परवाह कर रहे हो। यही हमारा काम भी है। परवाह करना। हमारे पास कोई खास काम नहीं रहता। अक्सर ख़ाली। आज यह सवाब का काम करना अच्छा लग रहा है।

जब फ़ोन पर फायर अलार्म बंद हुआ स्टीव ने फिर से काउण्टर से फ़ोन लगाया। काउण्टर वाला शख़्स चिढ़ चुका था। पर इस मुल्क में कोई किसी को लैण्डलाइन का प्रयोग करने से मना नहीं कर सकता। यह बेअदबी है। पैसे देने की बात स्टीव कह ही चुका था। सो वह चुप रहा।

कौन से नंबर की फायर ब्रिगेड।

तेरह।

बस उसका फ्लैट वहीं कहीं होगा आसपास।

कैफेटेरिया में चार लड़कियाँ आई थीं। उन सबके बालों और कंधों पर बर्फ के क़तरे पड़े हुए थे। उनमें से एक लड़की स्टीव को देखकर मुस्कुराई थी। वे चारों थोड़ा दूर एक टेबिल पर बैठ गई थीं। वह लड़की जो स्टीव को देखकर मुस्कुराई थी, अब भी बीच-बीच में उसको देख लेती थी। स्टीव ख़ुद में मगन था। लड़की को लगता न जाने सैल फ़ोन पर क्या तो सुनता होगा यह लड़का। कोई जैज, कोई पॉप, कोई नेटिव.....पता नहीं, कुछ तो सुनता है। कितना मगन है। पर स्टीव को ख़याल भी नहीं आया कि कोई कुछ सोचता होगा कि वह क्या सुन रहा है। जब करने को कोई काम न हो, आप बेरोज़गार हों, ख़ाली- ख़ाली वक़्त हो, तो इयरफ़ोन पर किसी बुज़ुर्ग औरत की साँसों की आवाज़ सुनने का तो ख़याल ही इतना बौड़म है, कि किसी को कभी इसका इल्म भी न हो। सो वह निश्चिंत था। दुनिया कुछ भी सोच सकती थी अपनी बला से।

इयरफ़ोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ थोड़ा मद्धम हो गई थी। मानो किसी कंदरा से आ रही हो। ध्यान से सुनने पर उसकी साँसों के बीच का अंतराल बढ़ गया लगता था। साँसों की आवाज़ कमज़ोर हो गई थी। पल भर को लगता मानो क्रिस्टीना सो रही हो। पर दूसरे ही पल कोई डरावना सा ख़याल स्टीव को आता। उसे फायर ब्रिगेड के हैड की बात याद आई - ‘तुम्हारे हौसले की मैं दाद देता हूँ। हम सब यहाँ ज़िन्दगी बचाने के लिए ही तो हैं।’उसे लगा मानो कुछ छूटा जा रहा है। कुछ जो ठीक नहीं हो रहा। कुछ जो बेचैन करता है। कुछ जिसके ख़याल से मन ख़ौफ़-ज़दा हो जाता है। वह कैफेटेरिया के बाहर आ जाता है। पाथ-वे पर चलता-चलता फ़ोन पर फिर से ज़ोर-ज़ोर से कहता है - हैलो, क्रिस्टीना हैलो....जागो, उठो.....सुनो, सुनो....एक बार बात करो, बोलो, बोलो....तुम ठीक तो हो न...हैलो, हैलो....।

क्रिस्टीना के बंद कमरे में स्टीव की आवाज़ गूँजती है। आयताकार खिड़की का काँच कांपता है, जब-जब वह कहता है - जागो, जागो....बोलो, बोलो.....तो आयताकार खिड़की का काँच अपने फ्रेम में कांपता है। उसकी आवाज़ पर फ़ोन का ब्लिंकर चमकता है - बात करो, बात करो क्रिस्टीना.....हैलो, हैलो....तुम सुन रही हो न...हरा ब्लिंकर झिझकता सा चमकता है, बुझता है, चमकता है। अभी इसी कमरे तक तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का सायरन गूँजा था।

बाहर फायर तेरह नंबर की फायर ब्रिगेड का ड्रायवर खड़ा है। चारों ओर ऊँची-ऊँची इमारते हैं। इमारतों में हज़ारों आयताकार खिड़कियाँ हैं। काँच वाली आयताकार खिड़कियाँ। आज फ्राइड़े नाइट है। लोग अपने-अपने घर छोड़कर जाने वाले हैं। शनिवार और इतवार की छुट्टियाँ मनाने। हर आयताकार खिड़की रौशनी से चमक रही है। वह फायर ब्रिगेड से उतरकर उन खिड़कियों को देख रहा है। इन्हीं हज़ारों में से किसी एक में क्रिस्टीना है। वह माइक उठाकर ज़ोर-ज़ोर से एनाउंस करता है -

कृपया अपने-अपने घरों की लाइटें बंद कर दें। हम एक बुज़ुर्ग औरत की तलाश में हैं जिसका नाम क्रिस्टीना है।

....जागो, जागो...बोलो, बोलो.....स्टीव ने फिर से सैल फ़ोन पर कहा। क्रिस्टीना के कमरे की निपट निर्जनता में उसकी बात गूँजी ....जागो, जागो....

....उसका नाम क्रिस्टीना है। क्रिस्टीना। वह बुज़ुर्ग महिला है । - तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर एनाउंस कर रहा था। गिरती बर्फ के बीच से उसकी आवाज़ गूँज रही थी। गर्म कमरों में बैठे लोगों तक उसकी आवाज़ पहुँच रही थी - उसका नाम क्रिस्टीना है....क्रिस्टीना...। ठण्ड से उसकी आवाज़ कांप रही थी। वह लगातार एनाउंस कर रहा था।

कृपया लाइट बंद कर दें। इस तरह हम उसे ढूँढ़ पायेंगे। आप लाइट बंद कर देंगे तो हम उस खिड़की को देख पायेंगे जिसकी लाइट बंद नहीं हुई।

चारों ओर से लोग उमड़े पड़ रहे थे। हर तरफ से लोग चले आ रहे थे। फ्राइड़े नाइट थी। आगे वीकेण्ड था। पाथ-वे पर, स्ट्रीट्स में, पब में, रेस्तरां में.....हर जगह, लोग ही लोग। लोगों से टकराता चलता स्टीव लगातार बोल रहा था.....हैलो क्रिस्टीना, हैलो...।

हज़ारों जगमगाती आयताकार खिड़कियों वाली बिल्डिंगों को देखता तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर बार-बार चिल्ला रहा था - ‘कृपया अपने-अपने घरों की लाइटें बंद कर दें।’सब लोगों को उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। घर में कुछ लोगों ने आपस में एक दूसरे से पूछा था - क्या तुम किसी क्रिस्टीना को जानते हो? एक आदमी ने एक दूसरे फ्लैट के आदमी से फ़ोन लगाकर पूछा था कि वह जो बुज़ुर्ग औरत रहती है उसके पड़ोस में कहीं उसका नाम तो क्रिस्टीना नहीं? दूसरी तरफ से जवाब आया था - नहीं। उसका नाम तो सुजान है। हर तरफ तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड के ड्रायवर का एनाउंसमेण्ट सुनाई दे रहा था - लाइटें बुझा दें, बुझा दें.....।

भागती दौड़ती दुनिया बेख़बर थी, अपनी धुन में जाने क्या-क्या बड़बड़ाता स्टीव रास्ते गुज़रता जा रहा था.....सुनो, सुनो....बोलो, बोलो....बोलो क्रिस्टीना....

हज़ारों आयताकार खिड़कियों से आती रौशनियाँ बुझ रही थीं, एक के बाद एक, धीरे-धीरे, क्या तुम जानते हो किसी क्रिस्टीना को?.....न, नहीं, मैंने नहीं सुना, क्या कहा कोई बुज़ुर्ग औरत है, पता नहीं, इधर कहीं ही रहती है क्या, किस तरफ, मैंने कभी नहीं सुना, कैसी दीखती है वह, नहीं, नहीं तो, इधर पर, न, इधर तो कभी नहीं सुना..... हज़ारों आयताकार खिड़कियों की रौशनी बुझ रही थी, एक के बाद एक, मैं किसी क्रिस्टीना को नहीं जानता ऐसा कहकर एक आदमी ने बुझाई थी लाईट, पता नहीं कौन है ऐसा कहकर दूसरे ने.....एक चुपचाप गाना सुन रहा था, उसने पल भर को उसका नाम सुना था - क्रिस्टीना और आपने बेटे को लाइट बुझाने को कहा था, एक ने बिना कुछ सुने ही बुझा दी थी लाईट, एक बालकनी से झांक रहा था तसल्ली से लाइट बुझाने के बाद, ‘बुज़ुर्ग औरत हुँह’ऐसा कह कर एक लंपट लड़के ने बुझाई थी लाइट.....लाइटें बुझ रही थीं, बिल्डिंग की दीवार पर से मिटती जा रही थीं आयताकार काँच की खिड़कियाँ। तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर को लग रहा था कि जिस आयताकार खिड़की की लाइट न बुझेगी वह क्रिस्टीना के फ्लैट की लाइट होगी। ज़रूर वही होगी।

आयताकार खिड़कियों की लाइटें बुझ रही थीं लगातार, हुँह कौन है यह क्रिस्टीना...एक औरत ने झल्लाकर लाइट बंद करते कहा था, उफ्फ ये क्या मुसीबत एक दूसरी ने अनमने ढंग से बंद की थी बत्ती, एक की बत्ती कुछ इस तरह बंद होती थी जिससे टी.वी. भी बंद होता था और उससे फुटबाल का मैच बाधित होता था, उसके फ्लैट की बत्ती देर से बंद हुई थी, ज्यादातर फ्लैटों की बत्तियाँ एकसाथ बंद हुई थीं यह कहते हुए कि वे सब किसी क्रिस्टीना को नहीं जानते.....

कैफेटेरिया में लोगों का सैलाब उमड़ आया था। एक गायिका गाना गा रही थी। कुछ लोग शराब पी रहे थे। बाहर आती जाती गाड़ियों के हार्न की आवाजें थीं। रात गहरा रही थी और शहर जाग रहा था। अंधेरा बढ़ रहा था और लाइटें जगमगा रही थीं एक के बाद एक। बर्फ गिर रही थी और शोर बढ़ रहा था।

आखिर में सिर्फ तीन आयताकार काँच की खिड़कियाँ बची थीं। सिर्फ तीन आयताकार खिड़कियों से रौशनी आ रही थी। बाकी सब बंद थीं। लोगों को पता था कि अगर बत्ती जलती रही तो अभी कोई फायर ब्रिगेड वाला आकर उनके फ्लैट की बैल बजा देगा। सबने बत्तियां बंद कर दी थीं। अब सिर्फ अंधेरे में डूबी इमारतें रह गई थीं। बर्फ फेंकते आसमान की ओर उठी भुतही अंधेरी विशाल इमारतें जिनमें से एक के बारहवें माले पर तो एक के सातवें माले पर और एक के ग्यारहवें माले पर आयताकार खिड़की चमक रही थी। अंधेरे में डूबी विशाल इमारतें किसी प्रेत की तरह दीख रही थी। उनके निचले हिस्से रोड की लाइटें पड़ने के कारण चमक रहे थे और धीरे-धीरे ऊपर की ओर अंधेरा बढ़ता जाता था। ऊपर के सारे हिस्से अंधेरे में समाये हुए थी। गिरती बर्फ में उनका विशाल भुतैल आकार दैत्य की तरह उठा हुआ था आसमान से गिरती बर्फ के घनेपन में समाया हुआ। दो इमारतें तो ऐसी थीं कि वे नीचे से ऊपर तक पूरी तरह से अंधकार के समंदर में डूबी हुई थीं।

तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड के पास खड़ी ऐंबुलेंस की सायरन वाली लाइटें लुकझुक हो रही थीं। फायर ब्रिगेड के कुछ लोग उन तीन खिड़कियों वाले फ्लैटों के दरवाजे चैक कर रहे थे। दो के दरवाजे बाहर से बंद थे और एक अंदर से। जो अंदर से बंद था उसे खोलने में मशक्कत लगी।

थोड़ी देर बाद फायर ब्रिगेड के हैड का मैसेज आया स्टीव के सैल फ़ोन पर। लगभग आधा घण्टे बाद।

हमने कर दिखाया।

वह कैसी है? उसकी साँस बहुत कमज़ोर हो गई थी।

अब ठीक है। उसे अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया है।

आपने मुझे आधे घण्टे बाद बताया कि वह ठीक है। आपको तुरंत बताना चाहिए था।

सॉरी स्टीव।

फायर ब्रिगेड सर्विस के हैड ने स्टीव को मैसेज किया।

तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर लौटने से पहले उन इमारतों की ओर देखता है। गिरती बर्फ के दरमियाँ जगमगाती हज़ारों आयताकार खिड़कियाँ। दूर एक खिड़की खुली है। एक बच्चा उसमें से झाँक रहा है। वह उसे देखकर हाथ हिलाता है। इमारतों के बेसमेण्ट से गाड़ियाँ निकल रही हैं। लगातार एक के बाद एक। कुछ लोग पैदल जा रहे हैं, फुटपाथ पर। रात दिन में बदल रही है।

तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर पिछले बारह दिनों से ख़ाली था। उसे शहर का डाउनटाउन इलाक़े का एक हिस्सा मिला हुआ है। वहाँ बहुत कम वारदात होती हैं। पिछले तीन सालों में वहाँ आग लगने का कोई भी वक़िया नहीं हुआ। सिर्फ एक रैस्क्यू उन्होंने चलाया था, एक स्कूल में जिसकी छटी मंजिल पर एक शिक्षक ने ख़ुद को कमरे में बंद कर लिया था और कमरे की खिड़की से लटक गया था।

उसने फायर ब्रिगेड को स्टार्ट किया। अबकी उसने उन इमारतों की ओर नहीं देखा। उसे पल भर को ख़ून से सना क्रिस्टीना का चेहरा दीखा। धीरे-धीरे फायर ब्रिगेड सरकने लगी। लबादा पहने एक बच्ची ने सरकती फायर ब्रिगेड को देखकर हाथ हिलाया, वह मुस्कुरा दिया। बच्चों की स्कूल की किताब में फायर ब्रिगेड की फोटो होती है इसलिए वे हाथ हिलाते हैं - उसके साथी ने उसे एक बार कहा था। चारों ओर रौशनी थी। इतनी रौशनी कि लगता था मानो बर्फ गिरना बंद हो गई हो। वह गाड़ी चलाता लौट रहा था, बीच-बीच में हॉर्न के बजने से उसे थोड़ा अच्छा सा लगता था।

स्टीव कैफेटेरिया से बाहर आ गया था। स्ट्रीट के किनारे-किनारे पाथ-वे पर वह सीटी बजाता टाँगें नचाता चल रहा था। पाथ-वे पर कोक की एक ख़ाली केन पड़ी थी, उसने उसे पैरों से मारने अपनी दाहिनी टाँग पीछे की, फिर पल भर को रुका और केन को उठाकर पास रखे डस्ट बिन में डाल दिया। डस्ट बिन खरगोश के आकार का था। खरगोश के आकार को देखकर उसने इस तरह हाथ हिलाया जैसे कोई किसी का अभिवादन करता है। पास से गुजरते एक आदमी ने उसे पल भर को देखा, शराब पिये है - यह ख़याल उसके जेहन में आया। उसे नहीं पता था कि स्टीव की जेब में सिर्फ ड़ेढ़ यूरो थे और रम का एक पैग तीन यूरो में आता है। उसे यह भी नहीं पता था कि स्टीव को पल भर के लिए शराब पीने की इच्छा हुई थी। पब के सामने खड़े-खड़े उसने अपनी पॉकेट से पैसे निकालकर गिने थे। उसे काउण्टर वाले शख़्स पर गुस्सा आया जिसने उससे फ़ोन करने के चार यूरो ले लिये थे। उसे पैसे देते वक़्त उसे लगा था कि वह उसे बता दे कि वह एक मर रही बुज़ुर्ग औरत की मदद कर रहा था। पर ऐसा कहना उसे ठीक न लगा। अगर यह सुनकर भी वह मना कर देता तो उसे दुःख होता। अपने दुःख की ख़ातिर उसने उसे यह बात न बताई।

उस लड़की ने जो कैफेटेरिया में उसे घूर रही थी उसी ने उससे कहा था कि वह अगर चाहे तो वे दोनों शराब पीने चल सकते हैं। स्टीव ने उससे कहा था कि वह एक ज़रुरी काम में लगा है। उसने कहा कि वह इंतज़ार कर सकती है। पर स्टीव का ज़रुरी काम लंबे समय तक चला। पूरे तीन घण्टे। लड़की समझ न पाई कि ऐसा क्या ज़रुरी काम है। फ़ोन पर हैलो-हैलो करने का काम भी कोई काम होता है। थोड़ी देर बाद वह चली गई। कई दिनों बाद यह पहला वीकेण्ड है जो उसे बिना शराब के बिताना पड़ेगा। उसे टांगे नचाता जाता हुआ देखते पास से गुजरती एक कैब के ड्रायवर ने हाथ हिलाया। उसने भी हाथ हिलाया। कैब का ड्रायवर अपने रियर मिरर में उसे टांगे नचाते गुज़रता हुआ देखता रहा।

सामने मुख्य चौराहा था। बर्फ में दफ़न। रोड के किनारे पेड़ों की एक कतार जिनकी टहनियों पर, पत्तों पर बर्फ पड़ी थी, बर्फ से ढंके उनकी शंक्वाकार चोटियाँ लाशों की तरह आसमान की ओर उठी थीं, ख़ामोश और मरी हुई। पेड़ों के नीचे-नीचे गाड़ियों की लाइटों की चकाचौंध थी, जो अचानक बढ़ी थी और बढ़ती जा रही थी। सामने घण्टाघर पर लटकी घड़ी में बारह बजकर पैंतालिस मिनट हुये थे। किसी को समय देखने उस घड़ी की दरकार नहीं है, लगता है मानो वह बरसों से रुकी हो, उसका चलना भी रुका हुआ जान पड़ता है। बर्फ की चादर मोटी होती जा रही है और साथ-साथ गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ भी बढ़ती जा रही है। लगता है सुबह तक शहर बर्फ में दफ़न हो जायेगा, पर लोग आते रहेंगे, सैंकड़ों, हज़ारों, लाखों लोग जैसे अचानक अपनी कंदराओं से फूट पड़ती हैं दीमकें, चींटियों की कतार लगातार....बस वे शोर नहीं करतीं, ये सब बेतरह शोर करते हैं।

हैलो मेरा नाम स्टीव है।

उसने अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी क्रिस्टीना को देखते हुए कहा। क्रिस्टीना ने कुछ नहीं कहा। वह चुप थी। डॉक्टर ने बताया कि क्रिस्टीना को अब कुछ याद नहीं। उसकी उम्र छियासी साल है, फिर सिर पर चोट। पता नहीं उसे कभी याद भी आये या नहीं कि उसके साथ क्या वाकया हुआ था?

स्टीव ने थोड़ा झिझकते हुए उसके पास फूलों का गुलदस्ता रख दिया। कारनेशन के फूलों का एक सस्ता सा गुलदस्ता वह ख़रीद लाया था।

क्रिस्टीना ने उसे पल भर को देखा और फिर दूसरी तरफ देखने लगी। स्टीव ने सोचा था कि वह उसे बतायेगा कि उसको ढूँढने पूरे एक हज़ार तीन सौ छह घरों के लोगों ने अपने-अपने घरों की लाइटें बुझा दी थीं। है न कितनी अद्भुत बात। एक के बाद एक वे बुझती रहीं। इस तरह हज़ारों की संख्या में वे बुझीं। उसने अच्छा किया जो उसने बताया कि वह जहाँ बंद है वहाँ एक आयताकार काँच वाली खिड़की है। सच कितना अच्छा दीखता होगा, इस तरह हज़ारों आयताकार खिड़कियों की रौशनियों का बुझते जाना, किसी छियासी साल के बुज़ुर्ग के लिए। वह सोचकर आया था, कि वह कहेगा कि उसने पूरे चार घण्टो तक उसकी साँसों की आवाज़ सुनी थी। उसकी साँसों की आवाज़ सुनकर उसे सिंपली रैड का एक बहुत पुराना गीत याद आया था - इफ यू डोंट नो मी बाय नाओ - शायद क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ ऐसी है जिससे उस गीत की धुन की याद आती है।

तभी क्रिस्टीना की बेटी आ गई। स्टीव से मिलकर वह खुश हुई। क्रिस्टीना उसे भी पहचान न पाई।

इनके घर में बिल्ली आती है। शायद किसी खिड़की से। वह कोई पालतू बिल्ली नहीं है। यह खतरनाक हो सकता है।

अरे मुझे नहीं पता। मुझे कभी नहीं दीखी।

पर वह है।

अच्छा। मैंने इनके फ़ोन पर हरा बटन भी लगवाया था ताकि ये सीधे मुझे रिंग कर पायें।

क्रिस्टीना की बेटी को उसके बेटे ने कहा था कि वे फ़ोन पर हरा बटन न लगावायें। वही हरा बटन जिसके दबाते सीधे क्रिस्टीना का इमरजेंसी मैसेज उसे मिल जाता। मान लो क्रिस्टीना ने वह बटन दबाया और तुम वक़्त पर उस तक न पहुँच पाईं तो - उसके बेटे ने शंका जाहिर की थी। उसने कहा था कि कम से कम सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट को तो वो बता ही देगी भले क्रिस्टीना तक न पहुँच पाये। उसका बेटा उसके इस तर्क पर चुप हो गया था।

सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट वाले कह रहे थे कि क्रिस्टीना का फ़ोन व्यस्त था। उन्हें लगा वह कहीं बात कर रही है। सो उन्होने मान लिया कि वह ठीक है।

ओह.....।

स्टीव ने नहीं कहा कि फ़ोन के दूसरे तरफ वह था, इसलिए फ़ोन एंगेज था।

मैं काम में लगी रहती हूँ। मेरे पास एक पल भी ख़ाली नहीं। इस वाकये की बात भी मुझे आज पता चली। पूरे दो दिन बाद। फायर ब्रिगेड वालों का मैसेज था। दो दिन पुराना मैसेज जो मैं आज देख पाई।

अरे। पर मैं व्यस्त नहीं रहता हूँ। मैं बेरोज़गार हूँ।

ओह।

ऐसी कोई बात नहीं। यह होता रहता है। यह ज़िन्दगी है।

हाँ यह तो है।

तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर कह रहा था कि उसके पास पिछले तीन सालों से कोई काम नहीं रहा। उसे क्रिस्टीना की मदद करने का यह काम करना अच्छा लगा।

बड़ा भला मानुस है। आज शाम जार्ज भी आ जायेगा।

जार्ज?

मेरा छोटा भाई है। बहुत दूर से आ रहा है। यू.एस. से। क्रिस्टीना को बहुत चाहता है।

ओह। फायर ब्रिगेड सर्विस का हैड कह रहा था कि उनके पास कोई काम नहीं रहता है। काम होकर भी वे बेरोज़गार जैसे ही हैं। कि उनके पास बहुत सारा वक़्त है।

दोनों पल भर को चुप हो गये। क्रिस्टीना को उनकी बात का ओर-छोर समझ न आ रहा था। उसने ख़ामोशी में ख़लल डालते हुए कहा -

अच्छा लगता है कि इस दुनिया में कुछ लोगों के पास वक़्त है। कि वे ख़ाली हैं। कि वे फुर्सत में हैं। वे इतने व्यस्त नहीं कि किसी की परवाह भी न पाल पायें।

दोनों ने क्रिस्टीना की तरफ देखा। स्टीव ने देखा क्रिस्टीना कि आँखों में आँसू थे। आँसुओं के साथ वह मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी।

माँ ये स्टीव है और मैं तुम्हारी बेटी रेबेका।

क्रिस्टीना की बेटी ने उसके पास आकर धीरे से कहा। क्रिस्टीना ने स्टीव को पल भर को देखा और नज़रें फेर लीं। उसने अपनी बेटी को इस तरह देखा मानो किसी अजनबी को देख रही हो। रेबेका ने स्टीव की ओर देखकर धीरे से कहा - सॉरी। स्टीव ने कहा - कोई बात नहीं। रेबेका ने कहा - क्रिस्टीना डांसर थी। स्टीव ने कहा - अमेजिंग। बैले करती थीं क्या? रेबेका ने कहा - नहीं, एक्सोटिक करती थीं। स्टीव ने कहा - ओह। रेबेका ने कहा - ऐसी कोई बात नहीं। उसने ख़ुद यह काम किया था। हमने बहुत कठिन दिन गुज़ारे। स्टीव ने कहा - समझ सकता हूँ। रेबेका ने कहा - क्रिस्टीना ख़ूबसूरत थी। उसे डांस में ठीक-ठाक पैसे मिल जाते थे। स्टीव ने कहा - क्रिस्टीना आज भी ख़ूबसूरत हैं। रेबका ने कहा - हाँ, पर अब उसे कुछ याद नहीं रहता। स्टीव ने कुछ नहीं कहा। उसे लगा अगर क्रिस्टीना समझ पाती, उसकी याददाश्त आ जाती तो उसके पास कितना कुछ था उसे बताने को। पर उसे तो इस वाकये तक का इल्म नहीं।

स्टीव अस्पताल से लौट रहा था। उसके सैल फ़ोन पर तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड के ड्रायवर का फ़ोन आया। वह कह रहा था कि वे जब क्रिस्टीना के कमरे में घुस रहे थे तब उस कमरे में उन्हें स्टीव की आवाज़ सुनाई दे रही थी। फ़ोन से उठती उसकी आवाज़ - हैलो, हैलो क्रिस्टीना.....बात करो, कुछ कहो.....तुम सुन रही हो न.....हैलो, हैलो....। उसने कहा कि वह चाहता तो स्टीव को बता सकता था कि उन्होंने क्रिस्टीना को ढूँढ़ लिया है और अब फ़ोन पर यह सब कहने की कोई ज़रुरत नहीं। वह चाहता तो उस फ़ोन को बंद भी कर सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया ।

तुम जो कह रहे थे कि आधा घण्टे बाद बताया। कि तुम्हें क्रिस्टीना के मिल जाने की ख़बर तुरंत क्यों नहीं बताई। आधे घण्टे बाद क्यों बताई। तुम उस बात का बुरा न मानो स्टीव। तुम मेरी बात को समझो।’- उसने कहा।

क्या अंतर पड़ता है जो तुम्हारी आवाज़ अकेले कमरे में गूँजती थी स्टीव, हो सकता है क्रिस्टीना को ले जाने के बाद भी उस ख़ाली कमरे में जहाँ उसका ख़ून बिखरा था, जहाँ वह लाल, पीले और हरे बटन वाला फ़ोन लावारिस पड़ा था, जहाँ काँच को थामे दीवार पर जमी थी आयताकार खिड़की, जहाँ फर्श पर थे क्रिस्टीना के गिरने और बेहोश होने के निशान, जहाँ ठण्ड में जम रहा था फर्श पर बिखरा उसका ख़ून लाल से गहरा लाल और काला होता, जहाँ कोई बिल्ली थी अब भी दरवाजे के पीछे छिपी ......वहाँ तब भी तुम्हारी आवाज़ गूँजी हो स्टीव - तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर उससे कहना चाहता था।

तरुण भटनागर
+91 94251 91559


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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5 comments:

  1. एक बेहद शानदार कहानी लेकिन जाने क्यूँ ऐसा लगा जैसे ऐसा कुछ कभी सुना या पढ़ा था बरसों पहले

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  2. यही कारण रहा इस कहानी को पढने का जब रोहिणी अग्रवाल जी की पोस्ट पर पढ़ी आलोचना ......वहीं लगता है जैसे अंग्रेजी में पढ़ा था कुछ ऐसा ही ........लेकिन याद नहीं आ रहा .........मगर कहानी मनुष्यता ज़िन्दा है के नारे को बुलंद करती है फिर वो आज का नौजवान ही क्यों न हो वो भी कभी कभी अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हैं और कई बार वो कर जाते हैं जिसकी उनसे कोई आशा नहीं करता .

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  3. निशब्द। बेहतरीन कहानी।

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  4. अद्भुत कहानी! स्टीव के साहस के बारे में इस कहानी में बहुत ही अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है! मैं लेखक का भी धन्यवाद करना चाहता हूं कि उन्होंने साहित्य क्षेत्र में शब्दों को इस प्रकार जीवंतता प्रदान की है कि यह कहानी कम और वास्तविकता ज्यादा लगती है जो कि हमारे या आप किसी के जीवन की सच्ची घटना पर आधारित हो जैसे! सर ;आपकी अन्य पुस्तक जंगल में दर्पण भी एक प्रसिद्ध पुस्तक है जो कि वास्तविक घटना पर आधारित सी लगती है जैसे !कहानियों को अपने कुछ इस तरीके से जीवंतता प्रदान की है कि वह कहानी कम हकीकत ज्यादा लगती है आपने शब्दों के माध्यम से समाज से भलीभांति परिचित करवाया है इस पुस्तक में!

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  5. नई पीढ़ी में अपने बुजुर्ग के प्रति अभी भी संवेदना बची हुई है...मार्मिक कहानी। जबरदस्त किस्सागोई। बधाई।

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