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कहानी की समीक्षा कैसे करें | तंत्र और आलोचना — रोहिणी अग्रवाल

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कहानी की समीक्षा कैसे करें | तंत्र और आलोचना — रोहिणी अग्रवाल

‘तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड‘


रोहिणी अग्रवाल
रोहिणी अग्रवाल
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,
रोहतक, हरियाणा
मेल: rohini1959@gmail.com
मो० : 9416053847
कौतूहल और पठनीयता - ये दो ऐसी विशिष्टताएं है जो कथा साहित्य की रीढ़ हैं, लेकिन कहानी के अधिकाधिक प्रामाणिक और शोध केंद्रित होने के आग्रह के कारण दुर्भाग्यवश आज ये दोनों कथा-अर्हतायें कथा-परिदृश्य से बाहर होती जा रही हैं. तरुण भटनागर की कहानी ‘तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड‘ (तद्भव, अंक 38) पढ़ते हुए इन्हें इनके वैभव और रचनात्मकता के साथ पुन: देखा तो जी जुड़ा गया।

तो क्या मैं कहानी की सराहना सिर्फ इसलिए करूं कि इन दोनों अचूक गुणों के साथ यह जीवन और मौत के बीच झूलती असहाय वृद्धा क्रिस्टीना की सफल रेस्क्यू कथा है? न, थ्रिल फिल्म की सफलता का रहस्य हो सकती है साहित्य का नहीं। साहित्य जिसे बचाना चाहता है, वह सिर्फ प्राण नहीं, मनुष्य की अस्मिता और गरिमा है। जाहिर है, कहानी में अचेत, घायल और विस्मृति की शिकार क्रिस्टीना कहानी का केंद्रीय पात्र होते हुए भी कहानी की मूल धुरी नहीं है। कहानी के केंद्र में है स्टीव जो चार घंटे से अनअटेंडेड फोन का एक सिरा पकड़े हुए है और थोड़े-थोड़े अंतराल बाद ‘हेलो हेलो‘ बोल रहा है मानो ऐसा करके फोन के दूसरी ओर मद्धम पड़ती सांसों को मौत के अंधेरे गलियारों में कूदने से बचा लेगा। बेशक, कहानी में कौतूहल की प्रचुरता है। कहानी को बुनते हुए कहानीकार घटना के भीतर त्वरित वेग से घटती अंतर्घटनाओं की अंतः डोरियों को जिस कुशलता से नचा रहा है, और उन्हें एक दूसरे की पारस्परिकता में गूंथ कर एक खास डिजाइन बना रहा है, उसी कुशलता से पाठक की सांस को भी अपनी पटु उंगलियों में थाम रहा है। ‘क्या क्रिस्टीना बच जाएगी?‘- उत्सुकता ….. व्यग्रता….दुआ में उठे हाथ!

‘ आहा! क्रिस्टीना बच गई!‘ राहत से निकला दीर्घ उच्छवास!

थ्रिल साहित्य का आंतरिक गुण होता तो कहानी फायर ब्रिगेड द्वारा क्रिस्टीना को हस्तगत करने के साथ ही खत्म हो जाती। कहानी रचनाकार का टास्क फोर्स नहीं है। इसलिए क्रिस्टीना के रेस्क्यू के बाद ही वह कायदे से शुरू होती है - एक बार फिर पाठक की स्मृति में फ्रेम फ्रेम बिंबात्मकता के जरिए। तब वह जान पाता है कि सूत्रधार तो स्टीव है - बेरोजगारी और मुफलिसी का मारा एक नौजवान जिसने जिंदगी के इतने आघात खा लिए हैं कि अब हाथ-पैर मार कर जिंदगी के प्रवाह में लौटने की कोशिश ही छोड़ दी है उसने। मैं चाहकर भी अपनी उम्र के अनुभव को उपदेश की पुड़िया में बांधकर उसे थमा नहीं सकती कि जिंदगी जिजीविषा का नाम है; कि जिंदगी में लय होकर ही जिंदगी के साथ-साथ अपने होने के मर्म को भी पाया जा सकता है। स्टीव ने पाठक के रूप में मेरी तमाम चेतना, अवचेतन, संस्कार और आकांक्षाओं को अपनी मुट्ठी में कसकर बांध लिया है। वह आकर्षक बायोडाटा न होने के कारण भौतिकता की रेट रेस में बाहर कर दी गई आधुनिक भौतिक इकाई भले हो, मनुष्यता के उत्कर्ष का स्वप्न देखती ऐसी नियामत है जो विचार और संवेदना के सम्मिश्रित रूप से बुनी कर्तव्यशीलता (उहूं, मुझे खुद ‘कर्तव्य‘ शब्द नागवार गुजर रहा है क्योंकि इसमें रूखे-ठंडे भाव से की गई ड्यूटी - जिसके एवज में पैसे मिलते हैं- का बोध होता है जहां प्रेम, तत्परता और समर्पण का स्वत:स्फूर्त भाव बिल्कुल नहीं होता) की अद्भुत मिसाल बन जाता है जहां तमाम फाकामस्ती के बीच निजी नफे-नुकसान का गणित नहीं, डूब पड़ती जिंदगी की सांसों को खींचकर किनारे तक ले आने का भाव है ।आश्चर्य नहीं कि तब स्टीव में मुझे ‘ओल्ड मैन एंड द सी‘ का बूढ़ा मछेरा दिखाई देने लगे।

पाठक यदि कहानी की जमीन पर सख्ती से पांव टिका कर कहानी के आसमान से बाहर किसी फ्लाइट पर निकल जाए तो यह कहानी की विफलता नहीं, कहानी के मॉन्यूमेंट बन जाने का संकेत है।मॉन्यूमेंट जो सभ्यताओं के उछाड़-पछाड़ के खेल में भले ही खंडहर बन जाए, जिंदगी की लय-ताल, गति और संगीत से कभी महरूम नहीं होता।

जिंदगी के प्रति आस्था स्टीव को लार्जर दैन लाइफ चरित्र बनाती है।

पूर्व और पश्चिम के पारिवारिक ढांचे और सांस्कृतिक संरचना के भेद को गाढ़ा करते हुए हम अपने गाल बजाकर चाहे कितने ही मुदित होते रहें, यह तय है कि परिवार, संबंध और समाज की जितनी जरूरत हमें है, उतनी ही विश्व के किसी भी गोलार्द्ध- महाद्वीप-संस्कृति में रहने वाले मनुष्य की भी है। फर्क यह है कि हम भारतीयता के महिमामंडन का अखंड संकीर्तन करते हुए कभी इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं दे पाते कि हमारे परिवार न केवल मनुष्य के रूप में हमारी निजी संवेदना पर महत्वाकांक्षा/वर्चस्व का आवरण डाल हमें ‘डिमीन‘ करते चलते हैं, बल्कि उसी अनुपात में परिवार के सदस्य के रूप में वृद्ध मां-बाप, पत्नी, बच्चे दमन और आतंक का शिकार होकर बौने/उपेक्षित होते चलते हैं। साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पास वेलफेयर नेशन स्टेट जैसी कोई संस्था नहीं जो वृद्धों को सीनियर सिटीजन होने का खिताब नहीं, सम्मान दे सके, और मुस्तैद सहयोगी की तरह उसकी एक कॉल पर कमर कस ले। हो सकता है, विशुद्ध भारतीय मिजाज को यह तुलना बेमानी गुजरे, लेकिन मनुष्यता के उत्कर्ष की कहानी जब लेखक विदेशी जमीन पर कहता है और विदेशी जमीन के हर शहर, हर परिवार, हर संस्कृति को यकसां कहने के उपहासात्मक भारतीय संस्कार के साथ अपने को वहां की सरजमीं की परिघटनाओं के ‘दर्शक‘ के रूप में अवस्थित करता है, तभी वह देख पाता है कि बर्फ की चादर तले संवेदना की ऊष्मा अपने में खोए तथाकथित आत्मकेंद्रित भौतिक इंसानों की रगों में भी दौड़ती है।

चार-चार संतानों के होते हुए भी क्रिस्टीना के बुढ़ापे का नितांत एकांत में कटना न उसका अपना निर्णय है, न किसी द्वारा थोपा हुआ। यह पाश्चात्य संस्कृति द्वारा दी गई ‘समझ‘ है - एक सांस्कृतिक अर्हता या सामाजिक आचार-व्यवहार की पद्धति, ठीक वैसे जैसे विवाह के बाद भारतीय स्त्री की अपने परिवार से विस्थापित होकर नए परिवार में घुल-मिल जाने की अर्हता।

एकांत और अकेलापन एक दूसरे के पर्याय नहीं। फिर भी, भारतीय परिवारों के मॉडल का पालन करते हुये यदि वहां बूढ़ों को परिवार की परिधि में अनिवार्य सदस्य के रूप में ले आना मानवाधिकार के तहत जरूरी है तो भारतीय परिवारों में हाशिए पर धकेल कर मान और अस्मिता से शून्य कर दिए जाने वाले बूढ़ों को रेबेका (क्रिस्टीना की पुत्री) सरीखी देखभाल के साथ आत्मीयता का संस्पर्श देना भी जरूरी है।

कहानी पाठक की चेतना पर छाप छोड़ती है क्योंकि इसकी अंडरकरंट्स में अपने को थहाने के कई कई कोण भी हैं।

घटनाएं यदि लेखक की युक्तियों के अधीन कार्य करते हुए पात्रों, वातावरण, एक्शन का परिचय देने में ही रीत जाएं तो कहानी कभी बड़ी नहीं बन पाती। वह तभी बड़ी बन पाती है जब घटनाएं आरोपित अर्थध्वनियों को संप्रेषित करने के बाद स्वयं पात्र, विचार, संवेदना के रूप में ढल कर पाठक के साथ बौद्धिक संवाद करें।
स्टीव जैसे बेरोजगार अनाम युवक के एक फोन कॉल पर फायर ब्रिगेड के हैड द्वारा महानगर के समंदर में खोई नाम-पताविहीन बुढ़िया की खोज के लिए सारी की सारी चौदह फायर ब्रिगेड गाड़ियों को डाउनटाउन की सड़कों पर दौड़ा देना; स्टीव के आग्रह पर स्पॉट किए गए एरिया में क्रिस्टीना की आयताकार खिड़की की खोज हेतु पूरी बिल्डिंग के 1006 घरों को रोशनी गुल कर देने का आग्रह करना; और इस आग्रह की परिपालना में सभी घरों की बत्ती का बुझ जाना - भौतिक रूप से उन्नत और आत्मिक- संवेदनात्मक रूप से विपन्न(?) समाज का परिचय नहीं हो सकता। यह मनुष्य की जान बचाने के लिए किया गया एक संयुक्त टास्क फोर्स है, क्योंकि मनुष्य की जान के साथ जुड़ी उसकी अस्मिता और संबंधों के महीन जटिल संसार की कीमत वे जानते हैं। गौरतलब है कि इस पूरी प्रक्रिया में फायर ब्रिगेड अधिकारी के सामने न सीनियर अफसरों से परमिशन लेने की ब्यूरोक्रेटिक अड़चनों की बहानेबाजी है, न अपने लिए तयशुदा दायित्वों से बाहर जाकर अन्य क्षेत्र में घुसपैठ करने का नैतिक हीला हवाला।

व्यवस्था जब अपने ‘तंत्र‘ की मजबूती को अपना ‘धर्म‘ बना ले, तभी मनुष्य गौण हो जाता है। भारतीय संदर्भ में अपनी जिम्मेदारी पर औसत व्यक्ति द्वारा क्या ऐसे किसी रेस्क्यू ऑपरेशन की कल्पना की जा सकती है?
जान की कीमत हम लोग नहीं जानते। जान पाते तो मॉब लिंचिंग, हिंसा की बढ़ती वारदातों और वर्चस्ववादियों के आए दिन के फतवों की वजह से सड़क-परिवार पर दम तोड़ते लोगों को देख भावशून्य से अपनी भूख-हवस की परिधि की परिक्रमा न करते रहते।

एक बेहतर इंसान होने का अर्थ है किसी अन्य की जरूरत के वक्त अपना हाथ आगे बढ़ा देना।

कहानी ‘तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड‘ एक बेहतर मनुष्य रचने के सपने की कहानी नहीं है, बेहतर मनुष्य के संग कुछ पल गुजार कर अपने को उसके कर्मों की दूधिया रोशनी से आलोकित करने की चाहत है। जेम्स हेनरी ले हंट की कविता पुरानी भले ही हो गई हो, आज भी ताजा है जहां देवदूत अबू बिन आदम का नाम उसके तमाम अनुरोध के बावजूद उन लोगों की सूची में नहीं लिख पाता जो खुदा को प्यार करते हैं। उसका नाम उस सूची में है जिन्हें स्वयं खुदा दोनों बाहें फैलाकर प्यार करता है क्योंकि खुदा का अर्थ पत्थर खोदकर बनाई गई कोई बेजान मूरत नहीं, सांस लेते हम जैसे हमशक्ल इंसान हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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1 टिप्पणी:

  1. प्रहार पर धार ये पक्की रखिए !
    कहने वाली ये सर्वहारा समीक्षाएं, कहानी के निस्सिम के केवल भौमिक अर्थ निक्षेप टटोलती चलतीं हैं। लेखक की भावना को समझने दावा करना प्रकाश और प्रेरणा को सिद्ध करने जैसा दुरूह काम है ।

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