हम सिर्फ योगियों की बात करते रहे हैं इसलिए इस किताब में मैंने.... — देवदत्त पट्टनायक


हम सिर्फ योगियों की बात करते रहे हैं इसलिए इस किताब में मैंने.... — देवदत्त पट्टनायक 
आज के हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में देवदत्त पट्टनायक की भरत एस तिवारी से हुई प्रस्तुत बातचीत का अंश प्रकाशित हुआ है.  http://epaper.livehindustan.com/epaper/hindustancity/hindustancity/2019-07-20/311/Page-5.html


देव योग 

— भरत एस तिवारी


लेखक का ख़ुद के लेखक होने की ज़िम्मेदारी समझना और अपने लेखन को अपने पाठकों की समझ और पसंद को ज़ेहन में रखते हुए लिखना कितना आवश्यक है, यह लम्बे समय से लेखकीय कलम की राह तक रही, भारत की पौराणिक कथाओं को मिलने वाले लेखक देवदत्त पट्टनायक के लेखन में देखा जा सकता है. देवदत्त को हमारे समय में हर वर्ग के लोगों, ख़ासकर युवाओं तक उनकी ही 21वीं सदी की समझ, सोच और जीवन की भाषा में पौराणिक कथाओं को पहुँचाने का श्रेय जाता है. उनसे हुई एक हालिया मुलाकात में क्या चर्चा हुई, आप भी जानिए:

देवदत्त माइथोलॉजी यानी पुराणशास्त्र पर ही क्यों लिखते हैं ?

पुराण शास्त्र में कहानियों के माध्यम से वह ज़रूरी बातें बतायी जाती हैं, जिन्हें अन्यथा समझ पाना मुश्किल है. वेद बीज हैं जिसमें रस और स्वाद नहीं होता, वह बीज फल बन जाने पर पुराण बन जाता है, जिसमें रस और भाव होता है, जिसका अनुभव करते हुए है वैदिक सत्य समझ आता है. रसास्वादन किया जाता है. इसलिए मेरा झुकाव आख्यानों में अधिक है.

वर्तमान समय में माइथोलॉजी की क्या आवश्यकता है?    

यह अभी की आवश्यकता नहीं है...सनातन है. जैसे हम कहते हैं कि भारतीय ज्ञान सनातन है. यह अभी भी समझा जायेगा. सौ वर्षों पूर्व भी समझा गया. सौ वर्षों, हज़ार वर्षों बाद भी समझा जायेगा. यह तत्व ज्ञान है जो पुराणों का फल है इसका रूप बदल सकता है लेकिन अर्थ सनातन है. 

आप जिस दृष्टि से माइथोलॉजी दिखाते हैं, उसकी इस समय क्या आवश्यकता है?

मुझे समय से कोई लेनादेना नहीं है. मुझे इसमें रूचि है इसलिए मैं इसपर लिखता हूँ. लोग पढ़ते हैं और अगर न भी पढ़ें तो मुझे क्या फर्क पड़ेगा. मैं बीस वर्षों से लिख रहा हूँ, लोग तो अभी आठ-दस वर्षों से मुझे पढ़ने लगे हैं. वह पढ़ें न पढ़ें, सुनें न सुनें मैं आख्यान का विश्लेषण करूँगा क्योंकि इससे मुझे आत्मरति मिलती है. भगवान की कृपा से लोगों को मेरा लिखा पसंद है जिससे मेरे घर में लक्ष्मी आ रही हैं. लेकिन मैंने यह  लक्ष्मी के लिए नहीं किया है.

पौराणिक नायकों नायिकाओं को पुनः परिभाषित किये जाने की क्या आवश्यकता हो गयी, आप भी और आपके समकालीन भी राम, सीता, हनुमान और हाल ही में रावण पर लिखते रहते हैं?

माइथोलॉजी फिक्शन और माइथोलॉजी अलग-अलग लेखन हैं. इस फिक्शन में लेखक अपने विचार को -- रावण, राम, कंस आदि पात्रों के माध्यम से -- प्रकट करता है यह हमारी प्राचीन विधा है, मैंने एक ही उपन्यास ‘प्रेग्नेंट किंग’ ऐसा लिखा है. मेरी रूचि यह जानने में है कि मसलन, वाल्मीकिजी या व्यासजी हमें क्या बताना चाह रहे हैं? अपनी समझ कि शायद हमें वाल्मीकिजी जो बताना चाह रहे हैं वह मैं आसान भाषा में लोगों तक पहुँचाने की कोशिस कर रहा हूँ. जैसे लोगों को नहीं पता कि रामायण, महाभारत कितने प्रकार के हैं या राम की पहली मूर्ति कब और कहाँ बनी थी

कहाँ बनी थी राम की पहली मूर्ति?

मथुरा में 1900 वर्ष पूर्व.

आपकी कोई नयी किताब ?

योग के आसनों और उनकी कहानियों पर अभी छपी है ‘योगा माइथोलॉजी, 64 आसन एंड देयर स्टोरीज’. लोगों को योग के अभ्यास, दर्शन और वेदांत के विषय में तो कुछ पता है लेकिन योग के विषय में पुराण शास्त्र है जो कहानियाँ है वह नहीं पता हैं. जैसे वीरभद्र आसन में वीरभद्र कौन है. क्या मत्स्य आसन विष्णु से सम्बंधित है? क्या कोई आसन जैन या बुद्ध बौध धर्म से जुड़ा हुआ है?

यानि आप पुराणों में छिपी हुई, योग से जुड़ी कहानियों को अपने पाठकों के लिए लाये हैं?  

(मुस्कुराते हुए) अरे… और उसको ऐसे बनाया है कि आपको समझ में आये. आप जब इसे पढ़ेंगे तो आपको समझ में आएगा कि देवी का मतलब क्या है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश क्या है यह आसनों के माध्यम से भी व्यक्त किया गया है .

हम सिर्फ योगियों की बात करते रहे हैं, माताओं की बात करते हैं, इस किताब में मैंने योगिनियों पर बात की है: उनकी कलाएं, मंदिर, एक ध्वंस हो गयी परंपरा.
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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