स्वप्निल श्रीवास्तव, कविता में आज...


भगोड़े स्वर्ग में छिपे हुए हैं
और हम उन्हें नर्क में खोज
रहे हैं...

स्वप्निल श्रीवास्तव, कविता में आज...

कविताओं में भाषा के रोल से अधिक शब्दों का  रोल होता है. आपने वह क़व्वाली सुनी होगी:
  "नज़र ऊँची की तो दुआ बन गई
  नज़र नीची की तो हया बन गई
  नज़र तिरछी की तो अदा बन गई
  नज़र फ़ेर ली तो क़ज़ा बन गई"

हिंदी में उसके शब्दों की ताक़त को दूसरी भाषा से आये शब्द और मजबूती देते रहे हैं.  ऐसे में उर्दू, फारसी, सिन्धी, पंजाबी, मराठी..के शब्दों से ख़ार खाना वैसे ही है जैसे कि हिंदी की जयजयकार में 'जय' की भावना मुर्दा हो. नुक्ते के पीछे पड़कर उसे ख़त्म किये जाने से हिंदी और हिन्दीभाषी की ज़ुबान को क्या फ़ायदा होगा, यह आपमें से जो मुझे समझा सके कृपया समझाए. क्या मराठी का "ऑ" हमारी बोली और भाषा को मजबूती नहीं देता, हमारे उच्चारण को शुद्ध और हमारी ज़ुबान को शार्प नहीं बनाता? हम जितने प्यार से डाक्टर को डॉक्टर बुलाते हैं उतने ही प्यार से खुदा को ख़ुदा क्यों न बुलाएँ... और सज़ा क्या सजायी जाने वाली चीज़ है? 

स्वप्निलजी इत्मिनान से उन शब्दों  का प्रयोग करते हुए, जिन्हें हम रोज़मर्रा में इस्तेमाल करते हैं, अपनी कवितायेँ और और गहरी बना देते हैं... और कहते हैं:
  जिस अदालत में उनके लिए
  सज़ा प्रस्तावित है, उसे देवलोक ने
  माफ़ कर दिया है

आनंद लीजिये...

भरत एस तिवारी

1 - जन्नत

कितनी महफूज़ और ख़ुशगवार थी
हमारी जन्नत
बेख़ौफ़ बहती थी नदियां
फूल खिलते थे
बर्फ की बारिश होती थी

परियां की तरह ख़ूबसूरत लड़कियां
और उन पर जान देनेवाले लडक़े थे

निडर होकर आसमान में उड़ते थे परिंदे
जहां चाहते थे , बनाते थे घोसले

लोग एक दूसरे के मुहब्बत के
प्यासे थे

लेकिन जब से शैतान यहां दाखिल हुए
मुकमल्ल फ़िज़ा ही बदल गयी
उनके हाथ में बन्दूकें और ज़ेहन में
ख़तरनाक मंसूबे थे

वे लोगों को परिंदों की तरह
मारते थे
और हवा में बिखेर देते थे

उन्होंने इबादतगाहों पर कोई रहम
नही किया
शुरू से वे परवरदिगार के ख़िलाफ़ थे

तालीमखानों पर टूटे उनके क़हर
उसे मिट्टी के ढेर में बदल दिया
ताकि बच्चे जाहिल बने रहे
उनके दिमाग़ पर उनका हुक्म
चलता रहे

जिन जंगलों में बसती थी हमारी ख़ुशियाँ
वे उनके पनाहगाह बन गए हैं

शैतानों ने हमारी जन्नत को उजाड़ने का
पक्का बंदोबस्त कर लिया है
उनके इस क़ाफ़िलों में हमारे दुश्मन
बराबर के शरीक है

मैं अपनी उजड़ी जन्नत को देख कर
लाचार ख़ुदा को याद करता हूँ ।

2 - स्वर्ग में भगोड़े

भगोड़े स्वर्ग में छिपे हुए हैं
और हम उन्हें नर्क में खोज
रहे हैं

वे पुष्पक विमान से उड़ कर
इंद्रलोक में छिप गए है
और इंद्रसभा की शोभा बढ़ा रहे है

अप्सराओं के मादक नृत्य चल
रहे हैं
चषक में ढाली जा रही है
मदिरा

जिस अदालत में उनके लिए
सज़ा प्रस्तावित है, उसे देवलोक ने
माफ़ कर दिया है

3 - विज्ञापन

मंहगे कारों और शानदार महलों के
विज्ञापन आपके लिए नही है

आपकी क़िस्मत में नही लिखी है
हवाई यात्राएं
पेज थ्री में प्रकाशित मादक विवरणों
में नही होगा आपका ज़िक्र
अतः आप अपने न्यूनतम ज़रूरतों
तक महदूद रहिये

इन विज्ञापनों में नही दिखाई देगा
आम आदमी का चेहरा
इस जगह पर  खिलंदड़ अभिनेत्रियां
और लम्पट अभिनेता क़ाबिज़ हो गए है

आप इसे देखने तक सीमित रहिये
आपके लिए ये अंगूर खट्टे हैं

 4 - पैदल चलता हुआ आदमी

चमकदार सड़क पर चल रहे कारोँ
के हुजूम में कितना निरीह दिख रहा है
पैदल चलता हुआ आदमी

कार में बैठे हुए बड़े लोग उसे
हिक़ारत से देखते है
जैसे वह किसी दूसरी दुनियां से
आया हुआ आदमी हो

वे नही जानते कि उसके दम पर
उनके चेहरे पर रौनक़ है

वह अनाज उगाना बंद कर दे
तो वे भूखों मर जायेंगे
उनके मकान न बनाये तो उन्हें
सिर छिपाने की जगह नही मिलेगी

उन्हें पता नही कि पैदल चलता हुआ आदमी
कितना ताक़तवर है
वह जिस दिन होश में आ आएगा
उनके साम्राज्य ढह जायेगे

5 -  वे दोनों

वे दोनों साथ साथ रहते थे
उनके नाम बहुत सुंदर थे

उनके पिताओं ने किसी पवित्र दिवस पर
उनका नामकरण किया था
उस दिन उनके नाम का जश्न
मनाया गया था

जब वे बड़े हुए अपने नाम के
विरुद्ध आचरण करने लगे
उनके नाम की सुंदरता नष्ट
होने लगी

उनके नाम पुलिस स्टेशन में दर्ज
होने लगे
कई घोटालो में उनके नाम का
उल्लेख हुआ

जिन पिताओं ने उन्हें जन्म दिया था
वे इस दुनियां में नही है
लेकिन उनकी आत्मा ज़रूर सोच
रही होगी कि उन्होंने अपने बुरे बेटो
के लिए बेवजह अच्छे नाम खर्च
कर दिए है

6 - अनुपस्थित

इस फोटों में तीन लोग है
स्त्री दिखाई नही दे रही है
लेकिन वह अनुपस्थित नही है

वह एक लुप्त नदी की तरह
उन दोनों के बीच बह रही है

जिन चीजों को हम देख नही पाते
वे हमारे बीच रहती हैं

हवा को हम देख नही पाते
लेकिन वह हमें जगह जगह से
छूती है

स्त्रियां भले ही हमसे दूर या अदृश्य हो
वे हमारे भीतर मौजूद रहती है ।


स्वप्निल श्रीवास्तव
510 - अवधपुरी कालोनी -अमानीगंज, फैज़ाबाद -224001
मोबाइल: 09415332326 | ईमेल: swapnil.sri510@gmail.com

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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