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हिंदी, उठापटक और जयश्री रॉय की कहानी "स्वप्नदंश"

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हिंदी में हिंदी पर हिंदी के साथ हिंदी वालों में हो रही उठापटक, स्वामित्व और वर्चस्व की लड़ाई के बीच कहानीकार जयश्री रॉय की कहानी 'स्वप्नदंश' ने मुझे घेर लिया. कहानी शुरू करते हुए मैं उसके नाम का अर्थ सोच रहा था, स्वप्न और दंश यानि स्वप्न में होने वाला दंश, जी कि है इस छोटी-सी कहानी में. कहानी कई तरफ से मुझे घेरती है - जयश्री रॉय के यहाँ हिंदी अपने काव्यात्मक रूप में गद्य को जगह-जगह संवारती है. सुर देखिये :

    सामने कोई गाँव था शायद। 
   आठ-दस घर, बिखरे और बेतरतीब। 
 म्लान चाँदनी में गुम 
    और ऊँघते हुये-से। 
   जैसे अपने पंखों में मुंह छिपाए 
   भीगे, 
 क्लांत पंछी।

कहानी में एक छोटा लेकिन तीक्ष्ण सस्पेंस-सा है, जो कि घेरता तो है लेकिन लुभाकर. किसी डार्क पेंटिंग — पूरी देह में साँप की खाल-से लिसलिसाते डर के बीच आतसी को अपना पुराना सपना याद आता है- वह खो जाना चाहती थी, हमेशा से, ठीक जैसे आज!  —   तस्वीर की तरह है यह कहानी जो दूर से कत्थई-हरी-मटियाली लगती है लेकिन देखने पर उसमें, प्रकृति-प्रदत्त जीवन को इंसान ने कैसा बनाया और बना रहा है — तुम्हारा ये आइवरी गोल्ड कॉमप्लेक्सन मेरे बंगले के डेकोर से भी मैच करता है —  रखा हुआ नज़र आता है.

कुछ देर के लिए ही सही, साहित्य ही हमें इन सारी उठापटकों से दूर ले जा सकता है, और वहाँ, उसकी शांति में  हमें समाधान मिल सकते हैं.

आपका
भरत एस तिवारी


street photography bharat s tiwari


स्वप्नदंश

- जयश्री रॉय 


थोड़ी देर पहले आईने-सी चमचमाती पहाड़ की चोटी एकदम से बादलों की स्याह, भारी परतों से घिर गई थी और फिर पानी उतरा था तेज धार में- मोटी-मोटी, सघन बूंदों की मटमैली चादर... पलक झपकते कई पहाड़ी नाले जादू की तरह यहाँ-वहाँ से फूट निकले थे। हवा की गति इतनी तीव्र कि लग रहा था देह से सर गिरा देगी। सांस लेना भी कठिन लग रहा था। पूरा पहाड़ सनसनाती, चिंघारती हवा की धमक से भर गया था। इसके साथ उतर आया था काले धुयें-सा पारदर्शी अंधकार! शाम देखते ही देखते गिरी थी। सघन, ताज़ा हरियाली थोड़ी ही देर में काही रंग में तब्दील हो गई थी। 

आतसी पूरी तरह भीग गई थी। साथ में छ्तरी या रेनकोट- कुछ भी नहीं! पहाड़ के मौसम के बारे में जानती है, फिर भी इस तरह निकल आई, वो भी शाम घिरने से ऐन पहले! श्यामल उस समय सो रहा था। उसे भी नहीं बताया कि निकल रही है। फोन जानबूझ कर गेस्ट हाउस में छोड़ दिया। बस खुद को पीछे छोड़ नहीं पाई! ढो कर लाना पड़ा। इस रूह को जिस्म इस तरह लगा है कि... मन की बात बस ये थी कि वह खो जाना चाहती थी- कुछ इसी तरह!

मगर अब घबराहट हो रही है । आसपास के सारे लोग बारिश के साथ ही जाने कहाँ अदृश्य हो गए! एक मोटे, स्याह कंबल-से आपादमस्तक मुड़ा हुआ सारा पहाड़ी परिदृश्य! तेज हवा और गरज के साथ एकसार बरसता पानी और तीखी घाटियों से उमड़-घुमड़ कर उठते बादलों के अनवरत रेलें... वो टटोल-टटोल कर चलती रही थी, जाने किस तरफ! इस निविड़ अंधकार के जंगल में चुपचाप खड़ा नहीं रहा जा सकता था। याद है, आते हुये मुख्य सड़क से वह एक संकरी पगडंडी पर उतर आई थी। मगर अब कुछ समझ नहीं आ रहा। दिशाएँ गडमड हो गई हैं। हर तरफ अंधकार की ऊंची, घनी दीवारें और पानी का तेज शोर। शायद पास ही कोई झरना या नाला बह रहा है। दूर कहीं घाटी में गिरते पानी की धमक हर तरफ छाई हुई है।

इस आंधी-तूफान और पूरी देह में साँप की खाल-से लिसलिसाते डर के बीच आतसी को अपना पुराना सपना याद आता है- वह खो जाना चाहती थी, हमेशा से, ठीक जैसे आज! व्यवस्थित जीवन, जिसमें सब कुछ तय हो, सुनिश्चित और सुरक्षित- उसे उबाता था। मगर विडम्बना यह कि उसे हमेशा यही मिला- सब कुछ थाल पर परोसा, सजा हुआ! एक पिक्चर परफेक्ट जीवन! वह सबकी प्रिय है। जिधर देखो प्यार! सम्पन्न माँ-बाप की इकलौती संतान, सुंदर, पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल… फिर श्यामल- उसका पति- दोनों हाथ से प्यार लुटाने वाला! कोई अभाव नहीं, कोई दुख नहीं, कोई अनिश्चितता नहीं! वही- पिक्चर पर्फेक्ट जीवन! वह ऊब गई- प्योर बोर!

अभाव से इच्छाएं जनमती हैं, उसके पास कोई इच्छा नहीं! कुछ मांगने से पहले ही उसे सब मिल जाता है। वह अक्सर अपने आलीशान बंगले की खिड़की पर खड़ी आते-जाते लोगों को देख कर सोचती है- भूख का स्वाद, दुख का रंग  कैसा होता है! टीवी, अखबार में कैसा घमासान मचा है, लोग चिल्ला क्यों रहे हैं... वह चाँद के हिंडोले पर बैठी है, एक बार अपनी चप्पलें उतार कर जमीन पर पाँव रखना चाहती है, चलना चाहती है ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर...

अपने सोच में डूबी उसने अचानक महसूस किया था, बारिश जाने कब रूक गई है। अब बस हल्की झींसी पड़ रही है। पूरा जंगल झींगुरों की आवाज से भर गया है। बादलों के पार कहीं चमकते चाँद की मद्धिम रोशनी में घाटियों में लाखों जुगनू जल-बुझ रहे हैं। उनकी तरफ देखते हुये आतसी को अपना डॉल हाउस-सा सजा हुआ घर याद आता है। मन में वर्षों से मोटी काई की परत-सी जमी ऊब और पसरती है- पिंजरे को कभी किसी पंछी ने अपना घर माना है! आकाश का शून्य ही उसका आखिरी ठौर है। उसके कंधों पर भी दो पंख थे, किसी ने देखा ही नहीं! 

आज पहली बार वह अपने आकाश में आई है, जमीन पर उतरी है- वह खो गई है! भयभीत है! उसका कोई घर नहीं! आश्रय नहीं! उसे भूख लगी है, थकान है... इट्स लाइफ! आज वह इच्छा कर सकती है, सपने देख सकती है, कुछ मांग सकती है... वह अपने ठंड से शून्य पड़ गए हाथों को आपस में रगड़ती है। जाने भय से कि खुशी से, उसकी देह में अनायास झुरझुरी फैल जाती है। जैसे कोई नागिन अभी-अभी उसे डंस कर पलट गई हो। तो रोमांच इसे कहते हैं! 

सामने कोई गाँव था शायद। आठ-दस घर, बिखरे और बेतरतीब। म्लान चाँदनी में गुम और ऊँघते हुये-से। जैसे अपने पंखों में मुंह छिपाए भीगे, क्लांत पंछी। पहले घर का दरवाजा आतसी ने संकोच के साथ खटखटाया था। उसी के झरोखों से रोशनी दिख रही थी। शायद भीतर कोई जगा हो। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला था और उसकी बात सुन कर दरवाजे की एक तरफ सरक कर उसे भीतर आने दिया था। भीतर घुस कर आतसी ने उस आदमी को ताक पर जल रही मोमबत्ती की पीली रोशनी में ठीक से देखा था। एक खूब लंबा-चौड़ा, गहरा सांवला आदमी। सिगरेट से जले हुये होंठ, कंधे तक लंबे, उलझे बाल पोनी टेल में बंधे हुये। उम्र पैतीस-चालीस के आसपास। बहुत बेरुखी से कहा था, वह यहाँ अकेला रहता है, अगर इस बात से उसे कोई आपत्ति ना हो तो रात को वहाँ ठहर सकती है। मगर अल्लसुबह उसे जाना पड़ेगा क्योंकि मुंह अंधेरे उसे शिकार के लिए निकलना है।

सुन कर आतसी उल्टे पाँव लौट जाना चाहती थी मगर बाहर फिर से बारिश शुरू हो गई थी। इस आंधी-पानी में जाये भी तो कहाँ! उसके पास चुनने का विकल्प नहीं। कुछ सोच कर वह ठहर गई थी।

उस आदमी ने बिना और कुछ कहे कमरे में बिछे एक तख्त पर बिस्तर डाल दिया था और एक मर्दाना कुर्ता थमाते हुये उसी बेरुखी से कहा था- अगर बाथरूम जाना हो तो पीछे के बरामदे में दाहिनी तरफ है। बिना कुछ कहे उसने उसके हाथ से कपड़ा ले लिया था। इन भीगे कपड़ों में कुछ देर और रही तो हाथ-पैर जम जाएँगे।

बाथरूम से लौटते हुये उसने कोने में रखे टेबल पर एक औरत की तस्वीर देखी थी। शक्ल-सूरत और पहनावे से कोई आदिवासी लग रही थी। बगल में एक बच्चा भी था। शायद उसकी सवालिया नजर को समझ कर उस आदमी ने अचानक बदली आवाज में कहा था- ये मेरा परिवार... अब नहीं है! आतसी ने सुन कर कुछ नहीं कहा था, पूर्ववत देखती रही थी। उसने फिर कुछ रुक कर कहा था- कोई नरभक्षी उठा ले गया इन्हें ऐसी ही एक रात में। तराई की तरफ से उठ आया था, सुना फिर एक दक्षिण की तरफ वाली गुफा के आसपास देखा गया है, कुछ मवेशी भी गायब हुये हैं...

सुन कर आतसी सिहरी थी- यहाँ आदमखोर भी हैं! वह मुड कर अपने काम में लग गया था- अक्सर तराई के जंगलों से उठ आते हैं। अब तक कितनों को मार चुका! हत्यारा है ये जंगल... भीतर ही भीतर थरथराती वह चुपचाप बैठ कर उसे सामने के बरामदे में अपनी बंदूक साफ करते हुये देखती रही थी-  यह एडवेंचर तो कुछ ज्यादा ही हो गया!  उधर बात खत्म करते ही जैसे वह उसकी उपस्थिति एकदम भूल चुका था। उसकी तरफ पीठ फेरकर तल्लीनता से अपने काम में लग गया था।

जाने कितनी देर बाद आतसी ने डरते हुये कहा था- सुनिए, मुझे बहुत भूख लगी है... उसकी बात सुन कर देर तक उसने कोई जवाब नहीं दिया था। अपने काम में पूर्ववत लगा रहा था। आतसी धीरे-धीरे अपमान और गुस्से से भर उठी थी- ऐसी भी क्या बेरुखी! एक मेहमान से पानी के लिए पूछने की भी तमीज नहीं! 

अपना काम खत्म कर उसने चीजें समेटी थी फिर अंदर से एक सूखी रोटी और कटोरे में थोड़ा मधु ले आया था- घर में कुछ नहीं, अगर ये खा सके तो... उसकी बात खत्म होने से पहले ही आतसी ने उसके हाथ से रोटी झपट कर खाना शुरू कर दिया था- तो भूख इसे कहते हैं! रोटी का स्वाद ऐसा होता है! उसे इस तरह खाते हुये वह कुछ देर देखता रहा था फिर बाहर के बरामदे में बिछी एक बेंच पर जा कर लेट गया था- मुझे सोना होगा, सुबह उठना है।

पानी अब भी बरस रहा था। तेज हवा के साथ छींटे छोटे-से बरामदे में दूर तक आ रही थीं। आधा बरामदा गीला था। बिजली चमकती तो उस आदमी की चौड़ी पीठ किसी इस्पाती ढाल की तरह कौंध उठती। उस तक भी पानी आ रहा होगा! इस तरह बिना बिस्तर-चादर के लगभग भीगते हुये...

उसने खुली खिड़की से देखते हुये संकोच के साथ कहा था- बरामदे में पानी आ रहा है। आप कैसे सोएँगे! अंदर आ जाते... सुन कर वह मुड़ा था। मोमबत्ती की सुनहरी लौ उसकी पुतलियों में कौंध उठी थी- हर हाल में, हर अभाव में जीना मुझे उस वन कन्या ने सिखाया था... 

“आप यहीं के हैं?” खुद को रोकते हुये भी आतसी ने पूछ लिया था।

“नहीं! दिल्ली का।“

“तो लौटे नहीं, यहीं बस गए?”

“यहीं, इसी घर के पीछे मंदा और छोटू जमीन के नीचे सोये हुये हैं। उनको छोड़ कर जा नहीं सका... कहते ही जैसे वह एक अजनबी के सामने खुद को खोलने के एहसास से सकपकाया था और झट से करवट बदल ली थी- कल सुबह मैं आपको मेन रोड तक छोड़ दूंगा...  सुन कर जाने क्या घटा था उसके भीतर- तो प्यार ऐसा होता है! अब तक तो प्यार का अर्थ था उसके लिए कैन्डल लाइट डिनर, फूल, चॉकलेट, खूबसूरत कार्डस... वो लेट तो गई थी मगर निश्चिंत हो कर सो नहीं पा रही थी। अजनबी माहौल का डर भीतर कहीं बना हुआ था। फिर चिंता भी। उसके ना लौटने से श्यामल पर जाने क्या गुजरी होगी। सारा शहर सर पर उठा लिया होगा। घर भी फोन किया होगा। हो सकता है मम्मी-पापा यहाँ आने के लिए निकल पड़े हों!

उसने आधी से अधिक जल चुकी मोमबत्ती की काँपती लौ में कोने में रखी उस औरत की तस्वीर को एक बार फिर देखा था जिसका नाम शायद मंदा था। अनायास उसे उस साधारण औरत से ईर्ष्या-सी हुई थी। कोई जोगी हो गया इसके लिए... क्या था उसके पास- ना रूप, ना रंग, ना ऐश्वर्य! मगर... वह एक बार मुड़ कर फिर उस अजनबी की पीठ की ओर देखती है- ये दीवार उसके लिए है! उसके यानि आतसी जिंदल के लिए... उसे अपनी प्रशंसा में झिलमिलाती आँखें याद आती हैं, सामने सजे फूलों के गुलदस्ते याद आते हैं और साथ ही कांटे की कसक की तरह याद आती है सामने मुंह फेर कर लेटे हुये इस अजनबी की अवज्ञा, अवहेलना! क्या एक बार भी उसने उसे सराहना भरी नजरों से देखा था? नहीं, बिल्कुल नहीं! उसने तो उसे जैसे नोटिस ही नहीं किया था...

पहली बार भीतर कुछ दंश दे उठा था। एक औरत छटपटाई थी। शादी के बाद उसके सवाल के जवाब में श्यामल के कहे शब्द याद आए थे- तुम्हें क्यों पसंद किया? वेल! तुम आर्किटेक्ट, मैं सीए! पर्फेक्ट जोड़ी। फिर तुम्हारा ये आइवरी गोल्ड कॉमप्लेक्सन मेरे बंगले के डेकोर से भी मैच करता है...  श्यामल के आलीशान बंगले में सालों से वह उन आइवरी गोल्ड डेकोर के बीच किसी पोर्सलीन डॉल-सी सजी हुई है। श्यामल गर्व से कहता है, यू आर माइ ट्रॉफी, माइ गोल्ड मेडल! कई बार उसके दोस्त मजाक कर चुके हैं- जब तुम अपनी मसकारा लगी पलकें झपकाती हो तब समझ आता है तुम डॉल नहीं, जिंदा इंसान हो!

श्यामल के प्यार की कीमती निशानियों से उसका कवर्ड भरा हुआ है, मगर मन... आज पहली बार आतसी को एहसास हुआ, सामान से सिर्फ स्पेस भरा जा सकता है। भीतर का शून्य तो पाताल कुआं-सा अंतहीन पड़ा है! यह रात क्या उसे निःशेष करने ही आई है...

बुझती-बुझती मोमबत्ती की काँपती लौ में आतसी जाने कितने अरसे पहले गुजर गई एक गरीब औरत का वैभव देखती है- उसका घर, हर तरफ यत्न से सहेजी रखी उसकी स्मृतियाँ- आईने पर चिपकी बिंदियाँ, खूंट से टंगे चूड़ियों के गुच्छे, सूखे आलता की शीशी... ना हो कर भी किसी के जीवन में होना, इस तरह कि कुछ या किसी और के होने की गुंजाइश ही ना हो... अनायास उसके मन में अजीब-सी चाह जगी थी- काश यह सब उसके पास भी होता! एक घर, एक मन जिसकी हर दीवार पर उसके ही हाथों के छापे हो, जब वह ना हो, तब भी बस वही हो...

मोमबती अचानक बुझ गई थी। आतसी उठ कर धीमे कदमों से चल कर बरामदे में आई थी, मानो नींद में हो और फिर कुछ देर अनिश्चय की-सी स्थिति में खड़ी रह कर उस अजनबी की पीठ पर हाथ रखा था। वह शायद जागा ही हुआ था। आतसी के छूते ही जैसे उसे बिजली लगी थी। तेजी से उसका हाथ झटकते हुये उसने दूसरी तरफ करवट बदल ली थी।

आतसी कुछ देर स्तब्ध-सी खड़ी रहने के बाद बरामदे की सीढ़ियाँ उतर गई थी। हरे जंगलों के बीच बन आए छोटे-छोटे मटमैले टापू रात भर हुई बारिश की गवाहियाँ दे रहे थे...  वातावरण में अब भी बूँदाबाँदी हो रही थी। सफ़ेद-स्लेटी बादलों के पीछे से जागती सुबह ने जैसे चारों दिशाओं को बैजनी उजास से भर दिया था। वह आँखेँ बंद किए कुछ देर तक अपने जलते चेहरे पर पानी की ठंडी बूंदों को महसूस करती रही थी... क्षण भर को उसने पीछे मुड़कर घर के उस कोने की तरफ देखा, जहां टेबल पर मंदा की तस्वीर थी फिर मन ही मन कुछ बुदबुदाती हुई सामने संकरी पगडंडी की ओर चल पड़ी... तभी तेज़ आवाज के साथ सघन वन में बिजली चमकी थी... उसने देखा उस अजनबी पुरुष की उन्नत साँवली पीठ उसकी उपस्थिति से बेखबर अब भी किसी अभेद्य दीवार-सी खड़ी थी...


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संपर्क- तीन माड, मायना, शिवोली,   गोवा – 403517 मोबाइल - 09822581137

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