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दारा शिकोह का पुस्तकालय और औरंगज़ेब के आंसू! — बोधिसत्व

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दारा शिकोह का पुस्तकालय और औरंगज़ेब के आंसू!

— बोधिसत्व


शाहजहां जब बादशाह था
उसके बड़े बेटे दारा शिकोह ने अपने लिए एक पुस्तकालय बनवाया था
दिल्ली में कहीं।

लेकिन अब वह पुस्तकालय नहीं मिलता खोजने पर भी समूची दिल्ली में
शायद नाम बदल गया हो उसका भी!

उस पुस्तकालय को खोजता हुआ मैं वहां पहुंच जाता हूं बार बार जहां दारा की सिर कटी देह दफन है!
अपने परदादा हुमायूं के मकबरे में।

दारा के कटे सिर का क्या हुआ?
उस कटे सिर को दिल्ली में किस किस ने देखा होगा और चुप रहा होगा? या रोया होगा?

यह प्रश्न दिल्ली में सुबकता हुआ सुनाई देता है!

तब किस किसने लगाया होगा बादशाह औरंगज़ेब जिंदाबाद का नारा?
तब कौन कौन चीखा होगा दारा को बचाने के लिए
इतिहास कुछ नहीं बोलता इस पर!

दिल्ली में इतिहास भी हो जाता है निरुत्तर!

एक सुनी सुनाई बात है
जब दारा दिल्ली लाया गया बांध कर
चिथड़े में घुमाया गया उसे चांदनी चौक और दिल्ली के बाजारों में।

तभी उसने अपना पुस्तकालय देखा
दूर से
उसने उसे घेर कर बैठे बहादुर खान से कहा कि उसे वेदों को पढ़ना है फिर से
उसे महाभारत का अनुवाद करना है
उसे फिर से काशी जाना है
उसे संस्कृत के और अध्याय सीखने हैं
उसे बादशाह नहीं बनना!

बहादुर खान चुप रहा तो दारा बोला
"मरियम का बेटा उसे बचाने आएगा!"

कहो औरंगज़ेब से मुझे पढ़ने के लिए जीवनदान दे दे
सारा हिदुस्तान लेकर मुझे मेरा पुस्तकालय दे दे!

लेकिन अपना पुस्तकालय खोजता हुआ दारा
अपने परदादा हुमायूं की समाधि के आहाते में
पहुंच गया!

जहां उसने पाया कि उसका सिर तो कब का धड़ से अलग हो चुका है!
पुरानी दिल्ली के अपने ही बाग में!

जहां वह मारे जाने के पहले तक कैद था
खिज्राबाद में

जब वह मुड़ा दूसरी ओर तो उसे केवल धुंआ दिखा
एक कराह की तरह का धुंआ!

उसका पुस्तकालय तो जल चुका था
सत्ता दखल करने में औरंगज़ेब बहुत आगे निकल चुका था तब तक
उसकी जय जयकार करने वाली भीड़ बहुत अधिक हो गई थी!

ऐसा नहीं कि हर कोई दारा के खिलाफ था
ऐसा नहीं कि
हर कोई नाराज़ था उससे की वह वेद क्यों पढ़ रहा है?
वह उपनिषद् क्यों पढ़ रहा है?
वह संस्कृत क्यों पढ़ रहा है?
वह कोई और हिंदुस्तान गढ़ रहा है?

लेकिन दिल्ली में चहेतों के रुदन और अपनापन में भी दारा अकेला हो गया
इसी दिल्ली में
उसका कटा सिर पता नहीं कहां खो गया
इसी दिल्ली में।

लोग चाहते हुए भी दारा को छुड़ा न सके
आंसुओं की लड़ियां मुक्ति नहीं दिलाते किसी को भी
यह दर्ज है इसी दिल्ली में
लोग औरंगज़ेब के बंधन से दारा को बचा न सके
इसी दिल्ली में।

इसी दिल्ली में मेल जोल चाहने वाले काट दिए गए
इसी दिल्ली में कटुता चाहने वालों को सिर पर बैठाया गया

औरंगज़ेब के नाम की माला जपते रहे
उसके नाम पर जयकारा लगाया!
उसे आलमगीर बनाया!

ऐसा नहीं कि दारा के लिए रोने वाले न थे
लेकिन इतिहास रोने से नहीं बदलता!
दारा आंसुओं से नहीं बचता!

इसीलिए कितनी बार हुआ ऐसा इसी दिल्ली में
यह बात दिल्ली भी भूल गई है
और इतिहास भी कुछ नहीं बोलता!

लेकिन दारा का कटा हुआ सिर अपना पुस्तकालय खोजता फिर रहा है!

हुमायूं के मकबरे से उसके धड़ के सिसकने की आवाज आती है
बिना सिर वाली दारा की लाश
अपने पुस्तकालय को बचाने की फरियाद लगाती है।

लेकिन
औरंगज़ेब नहीं चाहता कि दारा जिंदा होकर लौट आए
सबको अपने पुस्तकालय लेे जाकर
सत्ता के खिलाफ सोचना सिखाए!

दारा का कटा हुआ सिर
लाया गया थाल में रख कर औरंगज़ेब के सामने
उसने पवित्र जमुना का पानी मंगवा कर धुलवाया खून और धूल से सना दारा का चेहरा

और फिर रोने लगा!

उससे बोला नहीं गया बहुत देर तक
वह भावनाओं से भर गया था!
वह फफक रहा था
कटे सिर के सामने!

अपने आंसू रोक कर बोला औरंगज़ेब
अभागे दारा का कटा हुआ सिर देखे दारा के लिए रोने वाली सारी अभागी दिल्ली!

तब से
दारा का कटा हुआ सिर
दारा का पुस्तकालय
दारा की सिर कटी देह
दिल्ली के लिए सवाल हैं!
हर युग में
औरंगज़ेब के आंसू औरंगज़ेब के लिए एक ढाल है!

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बोधिसत्व
मूलनाम : अखिलेश कुमार मिश्र

जन्म : 11 दिसंबर 1968, गाँव भिखारी रामपुर, भदोही, (उ.प्र.)

शिक्षा : प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला से। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम।ए. और वहीं से तारसप्तक के कवियों के काव्य-सिद्घान्त पर पीएच.डी. की उपाधि ली। यूजीसी के रिसर्च फैलो रहे।

प्रकाशित कृतियाँ : सिर्फ कवि नहीं (1991); हम जो नदियों का संगम हैं (2000); दुख तंत्र (2004),ख़त्म नहीं होती बात (2010)
तार सप्तक कवियों के काव्य सिद्धांत और उनकी कविता(2016)

पुरस्कार/सम्मान : भारतभूषण अग्रवाल सम्मान (1999); संस्कृति सम्मान (2000); गिरिजा कुमार माथुर सम्मान (2000); हेमंत स्मृति सम्मान(2001), फिराक सम्मान ( 2013) शमशेर सम्मान ( 2015)

सम्पादन
गुरु महिमा पर लगभग 400 श्लोकों का संग्रह “गुरवै नम:” (2002)
रचना समय का “शमशेर अंक” (2012)

अन्यः कुछ कविताएँ देशीविदेशी भाषाओं में अनूदित हैं। दो कविताएँ मास्को विश्वविद्यालय के एम।ए. के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। दो कविताएँ गोवा विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल थीं।

विविध
महारथी कर्ण (2002), 1857 क्रांति (2003), आम्रपाली(2002), जोधा अकबर(2013-14, देवों के देव महादेव (2011-14) महाबली हनुमान (2015-16) समेत अनेक टीवी धारावाहिकों और शिखर (2005) और धर्म (2006) जैसी फिल्मों का लेखन

इन दिनों दो फिल्मों की स्क्रिप्ट और एक धारावाहिक के लेखन में व्यस्त।

निवास
2001 से मुंबई में

सम्पर्कः श्रीगणेश को.हा.सो, स्वातंत्रय वीर सावरकर मार्ग, सेक्टर नं.3, प्लॉट नं. 233, फ्लैट नं. 3, चारकोप, कांदीवली (पश्चिम) मुम्बई - 400067

मो. : 098202-12573





(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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