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मधु कांकरिया की कहानी — 'उसमें उसको ढूँढने की कोशिश में' | Madhu Kankaria

अक्तू॰ 7, 2019

एक बेहतरीन कहानी जैसे 'आवारा मसीहा' ...

उसमें उसको ढूँढने की कोशिश में

— मधु कांकरिया 



कुछ यादें बड़ी ढीठ होती हैं। अनजाने अनचाहे ही घर बना लेती हैं आपके भीतर और घरवाले की तरह हुकूमत करने लगती है। लाडो की याद भी शायद ऐसी ही थी। पता ही नहीं चला कब घर बना लिया था उसने। पता चला एक नए उभरते दिन जब सुबह की नीलिमा मेरी आत्मा में उतर भी न पाई थी कि फोन घनघना उठा। अम्मा ने काला चोंगा उठाया…दो पल भी ना गुजरे होंगे कि अम्मा चीख उठी – क्या ? कैसे हुआ ?



लाडो ने आत्महत्या कर ली थी!

ओह नो! यह क्या बात हुई भला! धरती की लड़ाई लड़ नहीं पाए तो आसमान हो गए।

कान की लवें सुलग उठीं। अंतिम समय क्या सोचा होगा उसने मेरे लिए…दुनिया के लिए। नजरें अनायास ही घूम गयी पीछे की ओर। एक ख़त्म हो चुकी जिन्दगी की ओर मुड़ कर देखना भी कितना तकलीफदेह है! तब जब कहानी के शुरुआत में ही कुछ ऐसा हो कि इसके अन्दर ही इसका अंत भी छुपा हुआ हो, बस हम ही चूक गए हों।

लगभग साल भर पूर्व मिली थी मुझे उसकी अर्जेन्ट चिट्ठी, उदास धुन में लिपटी हुई। चिट्ठी से छूती वह आवाज़ – हम सच्चाई से डरते रहे हैं इसीलिए उसको कुचलते रहे हैं। संस्कृति के लम्बे इतिहास में सबसे ज्यादा दुर्दशा सत्य की ही हुई है और यह आप जैसों ‘शरीफ लोगों ‘ की बदौलत ही ऐसा हुआ बाईजी कि सच्चाई को कभी उसका ठौर मिला ही नहीं। बहरहाल आप यह सब नहीं समझेंगी बाईजी…यदि कर सकें तो मुझे मदर टेरेसा के आश्रम के बारे में कुछ बता दें, कुछ दिनों के लिए जाना चाहती हूँ वहां।

आज जब समय की धारा में उसके बनने, बदलने और मिटने का इतिहास भी बह गया है तो दिमाग रह रह कर हिसाब कर रहा है कि कितनी वह मेरी पकड़ाई में आई थी और कितनी बाहर रह गयी थी। मेरे भीतर कुंडली मार बैठी बड़ी बहन ने बिना जाने समझे ही अपनी समझावन दे डाली थी उसे – जिस जिन्दगी की तुम बात कर रही हो क्या उस पर सिर्फ तुम्हारा ही हक़ है ? क्या इसकी निर्मिती में तुम्हारे समय, तुम्हारे परिवार, परिजन और परिवेश का कोई योगदान नहीं ?  अपने परिवार के दूध से भरे ग्लास में शक्कर की तरह घुल मिल कर ही तुम अपने लिए खुशियाँ खोज सकती हो इसलिए परिवार के सामूहिक निर्णय का स्वागत करो। अभी जीवन को भोगो, समझो और अनुभव करो लाडो। उम्र के जिस नाजुक दौर से गुजर रही हो तुम…वहां अनचीन्हे—अनजाने रास्तों के अपने खतरे हैं…अपने उद्गम से निकली कोई भी लहर क्या कभी वापस लौट आती है ? आ सकती है ? यह रास्ता तुम्हारा नहीं है लाडो। यह उन्ही मस्तमौला फक्कड़ों और दरवेशों का हो सकता है जिन्हें ईश्वर ने इसी कर्म के लिए धरती पर भेजा है। राजनीति के उत्तुंग शिखर पर बैठे तुम्हारे पिता…कभी भी मुख्य मंत्री बनने की सम्भावना से लबरेज…तुम्हारा जीवन हरी भरी घाटियों, वादियों खुशनुमा रंगों और बहारों से भरपूर। इन्ही रंगों और नूरों के बीच पली बढ़ी तुम। तुम फूफा जी की ही तरह उन्नति के शिखर तक पंहुचने के लिए बनी हो। तुम्हारा मार्ग भी प्रशस्त है। इसलिए फिलहाल अपनी बेकाबू बेचैनियों और भटकते मन को…भीतर उठते तूफानी आवेगों को थोडा विश्राम दो। देखो समय के साथ सबकुछ नहीं तो भी बहुत कुछ सम पर आ ही जाएगा। फिलहाल जीवन को सहज प्रवाह में बहने दो। जीवन का अधिकतम विस्तार होने दो। जीवन जिस रूप में मिले, उसे स्वीकार करके देख लो। उसके बाद भी मदर तुम्हे लुभाए तो बेशक चली जाना वहां। मैं नहीं रोकूंगी।

एक बात और। मदर टेरेसा में जाने से पहले जान लो कि मदर टेरेसा मदर कैसे बनी, क्यों बनी। कैम्पबैल हॉस्पिटल के बाहर एक गली में उन्होंने एक मरती हुई औरत को देखा। उन्होंने उसे उठाया और हॉस्पिटल में ले गयी। लेकिन हॉस्पिटल वालों ने उसे दाखिला देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह बहुत गरीब थी। वह वहीँ गली में ही मर गयी। उन्ही जलते पलों उन्हें प्रेरणा मिली कि उन्हें मरते हुए लोगों के लिए आवास बनाना चाहिए। ईश्वर यदि इंसान से कुछ विशेष करवाना चाहता है तो उसे बताने का अपना रास्ता होता है। क्या तुम्हें ऐसी कोई प्रेरणा मिली है?

जवाब में उसकी एक पन्ने की चिट्ठी मिली थी मुझे – आपके पत्र में आपके भीतर बैठी बड़ी बहन बोल रही है। मुझे समझने वाली, मेरी अंतरात्मा को बांचनेवाली मेरी सखी नहीं! गलती मुझसे हुई बाईजी! फिर एक पंक्ति, ‘मैंने आपको बादल समझा और अपनी प्यास दिखा दी ‘ फिर लिखकर काटा लेकिन मैं पढ़ पायी…सितारे अपनी राह अकेले ही चुनते हैं, अपनी सलीब लगता है मुझे खुद ही उठानी पड़ेगी। आप सामान्य तापमान वाले लोग किसी की जिन्दगी के अधूरेपन को भला क्या समझेंगे ? भला क्या समझेंगे कि जिन्दगी के धागे किस प्रकार खुद – ब – खुद उलझते जा रहे हैं। आप ने लिखा जीवन जिस रूप में मिले, मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए। ओके…मैं तो स्वीकार कर लूं…पर लोग मुझे ऐसा करने कहाँ दे रहे हैं। आपको लगता है कि मुसीबत का कारण मेरे अन्दर है जबकि मैं जानती हूँ कि मेरा अन्दर मुझे ऐसा ही मिला है। मुसीबत का कारण मेरे बाहर है। बहरहाल आप भी उन्हीं लोगों में हैं बाईजी, जो चाहते हैं कि किसी प्रकार परिवार चलता रहे चाहे व्यक्ति घुट घुट कर मर ही जाए। आपने एक बार बताया था कि चीन और चेकोसलाविया जैसे कई साम्यवादी देशों में फसल की हिफाजत के लिए चिड़ियों को मार डालने का अभियान चलाया जा रहा है। आपने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा था कि क्या चिड़ियों को जीने का अधिकार नहीं? आज अपने उस आक्रोश को याद कीजिये बाईजी! फूल जैसा भी हो उसे खिलने का अधिकार होना चाहिए ना! मेरा अभिप्राय आप समझ ही गयी होंगी।

उसके गोल गोल अक्षरों के बीच जैसे आंसू की बूँदें टपक रहीं थीं।

मुझसे 12 साल छोटी थी वो…मेरी फुफेरी बहन लाडो! मुझसे निकट भी थी और दूर भी। उससे मिलती तो जाने क्यों लगता जैसे उससे नहीं अपनी उदासी से मिल रही हूँ। कभी कभी वो मुझमें अपनी सखी ढूंढती थी इस कारण जबतब अपनी समस्याओं पर पड़े भारी भरकम पर्दों को कुछ समय के लिए हलके से मेरे लिए परे सरका देती थी। कई बार उसने मुझे संकेत देने की, अपने दिल की धड़कन सुनाने की कोशिश भी की, पर मंद बुद्धि मेरी…उसके भीतर उठते भूचाल को मैं कभी समझ ही न पायी। मेरी मोटी बुद्धि में यह महीन ख्याल कभी आ ही नहीं सका कि इतनी दौलत – शोहरत, रूप और सौन्दर्य के समंदर में भी उसकी नौका डावांडोल हो सकती है।

‘वही दाना देना, प्रभु / जिस पर मेरा नाम हो

वहीं बूंद पानी मिले / जिसमें मेरी प्यास हो…’

वे रिश्तों की अमीरी के दिन थे जब पहली बार मिलने जैसा मिलना हुआ था लाडो से। जहाँ भी वह देखती मुझे, लहरों की तरह दौड़ कर आ जाती थी करीब। तब शांत किनारों पर लय ताल में परिवार की डोंगी चल रही थी। इंद्र धनुषी व्यक्तित्व वाले फूफाजी तब राजनीति के आसमान में भारतीय जनसंघ की तरफ से राजस्थान के नेता विपक्ष के रूप में दमक रहे थे। लाडो रही होगी अठारह उन्नीस साल की। मस्त मलंग, थोड़ी अल्हड थोड़ी गुस्सैल…थोड़ी प्यारी, थोड़ी बदमिजाज…लम्बी, छरहरी, हाथी दांत के रंग की सी त्वचा। संघ की सोचवाले फूफाजी ने कभी परिवार नियोजन में विश्वास किया ही नहीं इस कारण जैसे जैसे उनकी राजनीति का ग्राफ ऊपर चढ़ता गया वैसे वैसे उनकी संतानों में भी वृद्धि होती गई और देखते देखते वे एक के बाद एक आधा दर्ज़न संतानों के पिता बन गए। लाडो से बड़ी दोनों बहने इतनी शरीफ थीं कि परिवार के जिस्म पर मामूली खरोंच तक न डाल पाई थी। पढ़ी, शादी हुई और फुर्र उड़ गयी वें। शांत झील से बहते इस परिवार में उजली धूप सी स्वच्छ और निर्द्वन्द लाडो के यौवन की दहलीज पर पाँव धरते ही परिवार के दिमाग की झिल्ली में वो तूफान वरपा की अनुशासन और मर्यादा के समीकरण बिगड़ गए और परिवार का लाड लताड़ में बदलने लगा।

इसका पहला धमाका घर में तब हुआ जब चढ़ती जेठ की एक उतरती शाम, दूरदर्शन के सीरियल के बीच हमारे बेफिक्र कहकहे, एक झन्नाटेदार थप्पड़ और एक करूण क्रन्दन तीनों एक साथ गूंजे।

या इलाही माज़रा क्या है!

भागते हुए और आवाज़ का पीछा करते हम लाडो के कक्ष तक पंहुचे। गुस्से में तमतमाई लाडो अब आसूओं में ढल चुकी थी। क्या हुआ ? मैं कभी लाडो के कक्ष की सफाई करती बाई को देखती तो कभी लाडो को जो प्रिया से कलहप्रिया बनी हुई थी। बाई का नाम था दुखिया जिसका अफ़सोस मिश्रित दुःख दोपहर की धूप की तरह इतना चमकीला था कि साफ़ उसके चेहरे पर चमक रहा था। तभी नज़र फर्श पर पड़े कांच के कुछ टुकड़ों पर गयी। कोई शो पीस था जो शायद सफाई करते वक़्त दुखिया से टूट गया था। मैंने लाडो को समझाना चाहा – इसमें इतना गुस्सा करने का क्या है, शो पीस ही तो था और आ जाएगा। नाक फुला कर ठुनकते बिसुरते कहा उसने,

यह शो पीस मुझे सुहानी ने उपहार में दिया था। उसका इकलौता उपहार। कमरे की सारी चीजों को बेशक यह तोड़ देती मुझे तकलीफ नहीं होती…पर यह…और वह फिर सुबकने लगी। नन्हे शावक सा उसका दुःख जैसे उसकी गिरफ्त से छूट छूट जा रहा था।

पहलीबार हवा में उड़ता एक नाम मेरे कानों से टकराया – सुहानी!

और इत्तफाक कि दूसरे दिन का आगाज़ ही उसके दुर्लभ दर्शन से हुआ। न इण्टरकॉम पर उसके आने की पूर्व सूचना और न ही किसी सिक्यूरिटी गार्ड की ही कोई रोक टोक (फूफा जी के बंगलो पर बिना घरवालों की पूर्व अनुमति के कोई अन्दर आ ही नहीं सकता था )रोशनी की लकीर सी वह सीधी घर के अन्दर घुस आई थी और आते ही उसकी धमाकेदार उपस्थित ने मुझे बिना परिचय करवाए ही उसका परिचय दे दिया था। इतनी आत्मविश्वास से भरी तो वही हो सकती थी। बुआ के इशारे के पूर्व ही मैं समझ चुकी थी और मेरी खुफिया नज़र उस पर गड चुकी थी।

वे सहेलियां थीं कि नयी जिन्दगी की दो नयी कोंपल जिनके एक साथ होने से पूरे घर की रंगत ही बदल गयी थी। दीवारों पर जैसे किसी ने खुशियों को पोत दिया हो। कोने में दुबकी बिल्ली तक मुग्ध भाव से उन्हें ताक रही थी। भरपूर नजरों से देखा उसकी ओर — गोरेपन की ओर उन्मुख सांवली रंगत का नमकीन चेहरा। बाज सी चमकती आँखें। गुदगुदी देह। हाथों में लाल रंग के सुरक्षा धागे। लहर लहर फैलती सुहानी की हंसी देख अपने मन के मधुवन में रमी लाडो के चेहरे से ऐसा नूर बरसने लगा जैसे उगते सूर्य की किरणों ने छू लिया हो उसे।

दोनों पात्रों की मनोदशा के उस एकांत संसार में हमारी ताक झाँक जारी थी। मैं उसी पल को जी रही थी। उसी पल की सोच रही थी इसलिए मुझे सबकुछ सुन्दर और कविता जैसा लग रहा था।

बुआ आने वाले पलों की सोच रही थी इसलिए वह चिंता में बेचैन थी। इसी चिंता में उन्हें एसिडिटी हो गयी थी। खट्टी खट्टी डकार लेते लम्बी लम्बी साँस खींची उन्होंने, सुहानी पर फिर एक नजर डाली। हलके से मुंह बिचकाया। दांत में अटके संतरे के फुस को बाहर निकालते हुए फडफडायी – हर आन्तरे पान्तरे आ धमके है, जाने क्या जादू टोना कर रखा है छोरी ने लाडो पर कि इसकी तो बुद्धि में ही भाटा पड़ गया है, घर भर में इसे तो कोई सूझे ही ना!आज नहीं आती ना तो शाम तक लाडो उसके यहाँ पुग जाती। सोते तक में इसी का नाम बक बकती रहे…कहते कहते बुआ की आँखों में बादल घिर आए थे।

कॉलेज में तो मिलते होंगे ?  मैंने सिर्फ इस प्रसंग में दिलचस्पी दिखाने भर के लिए पूछा। पीछे सर्वेंट क्वाटर से निरंतर आती ढेकियों के चिवड़ा कूटने की आवाज़ के थोडा थम जाने पर विरक्ति से जवाब दिया बुआ ने,

कॉलेज में भी मिले हैं पर सुहानी कॉलेज में ज्यादा बतियाये नहीं…पढ़ाई पर ध्यान देवे, बाप की तो बापरे की छोटी सी किरानी की दूकान ठहरी। मुश्किल से खर्चा पानी निकाल पाए। सुहानी ही सबसे ठाडी है…आगे इसी को देखना है।

फूफा जी बड़े नेता हैं…ऊंची हैसियत के हैं इसी कारण चिपकी रहती होगी लाडो से। मुंडी हिलाते और नाक की हीरे की कणी को घुमाते हुए बोली बुआ,

ना ना!वो ना चिपके है, आ तो लाडो ही है जो बाबली हो रखी है सुहानी के पीछे। महंगा से महंगा ‘गिफट ‘ खरीदेगी। आक्खो घर एक तरफ सुहानी एक तरफ। एक बार बुखार चढ़यो, लाख समझाई मैंने कि डाक्टर न दिखा दे। डाक्टर फूफा जी के चेकअप के लिए आयो भी थो पर ना। उसी दिन दोपहर को सुहानी आई मैंने बतायी सारी बात। म्हारे सामने ही जो डांट लगाई कि तावरे (धूप ) में ही दिखा आई डाक्टर न।

जैसे बुआ के वजूद की चट्टानें हिल गयी हो गहरी सांस ले वे फिर बोली,

जाने कैसा काला जादू कर रखा है छोरी ने! शुरू शुरू में तो जैसे ही वह आती घर में, सारे काम धंधा छोड़ मैं भी खातिरदारी में लग जाती। भई क्यूं न करती, लाडो की ख़ास भायली जो ठहरी। बात घणी कोनी होती, खिल खिल जियादा होती। कदी कदी गुस्सा भी करती, झूठ वाला, बड़ा मजा मिलता, धीरे धीरे जे ही मजा जान की आफत बन गया।

फूफा जी कुछ नहीं कहते? बुझे हुए चाँद सी उदास आँखों से देखा बुआ ने मेरी ओर। फिर उबासी लेते हुए कहा,

उन्ने फुर्सत ही कहाँ है पलिटिक्स से, फाइलों से ? सारे देश, गाँव, पार्टी सबकी चिंता में दुबले होंगे सिवाय घर की चिंता के। वियावर में आनंदी को सांप ने डस लिया। मैं कितना कलपी कि मुझे ले चलो पर नहीं…मर गयी बापरी। आनंदी ?  आनंदी कौन ?  मैं चौंकी। अरे अपनी गैया…दस साल से थी म्हारे साथ, अपने ही प्रवाह में बहती रही बुआ — जबतक आफत सर पर न आ जावे हर आफत को दरी के नीचे सरकाते जावें हैं। उनने तो यह तक नहीं पता कौन टावर (बच्चा )किस में है। मेरी बहन ने पूछा उनसे, राजीव कौन सी ‘ किलास ‘ में है तो ठीक से बता तक नहीं सके। वापस आकर मुझसे पूछा। वे गए तो मैं दांत के दर्द से मरी जा री थी…कल इक्कीस दिन बाद घर आये तो अखबार पढ़ते पढ़ते पूछते हैं अब सर दर्द कैसा है तेरा। यह तो हाल है उनका। एकबार मैंने उनसे लाडो की बात भी छेडी थी तो बोले…दो भायलियों के प्रेम में मैं क्या कर सकता हूँ। घर में कुछ भी हो रहा हो उनकी बला से…सुनेंगे…दो घड़ी सोचेंगे, मुंह बनाएँगे, चिंता चबाएँगे और फिर थूक देंगे।



घर में रहते हुए भी इस घर के दो लोग… सबसे ज्येष्ठ…फूफा जी और सबसे कनिष्ठ लाडो घर के घेरे से बाहर थे। मैं ऐसा ही कुछ देख कर सोच रही थी या सोच कर देख रही थी कि बुआ के दुःख ने फिर बोलना शुरू किया — पर क्या सचमुच यह दो भायलियों का परीत प्रेम ही है ? मुझे तो लगता है सुहानी ने कुछ करवा दिया है। सोने पर मीने की कारीगरी वाली चूड़ियों को ऊपर चढाते हुए एक ठंडी सांस भरी बुआ ने और भौंहे चढाते हुए मुझे कुहनी मारी…देखो देखो नजारा उधर।

बुआ से उकताकर मैं थोड़ी दूर चली आई। पर दिन की डूबती रौशनी में उस दृश्य में जाने कैसा आकर्षण था कि पल पहर थम गए। नजरें वहीँ टिकी रही — जाती हुई सुहानी को भी द्वार पर ही अटकाए हुए थी लाडो जैसे सुहानी के साथ समय नहीं बिता रही थी वरन समय और सृष्टि से परे उन साथ बिताए लम्हों को कविता में ढाल रही थी। लहर लहर फैलती दोनों की हंसी बांसुरी सी बज रही थी। अहिस्ता अहिस्ता आँगन के पार पाँव धरा सुहानी ने। लाडो ने उसके हाथों में लिफाफा जैसा कुछ पकड़ाया जिसे सुहानी ने लौटाया। लाडो ने मुरब्बे सी मीठी मुस्कान के साथ वापस लिफाफे को उसके हाथों में धरा। लगा अमेरिका सोमालिया के आगे सर झुका रहा है ‘तुम रख लो मेरा मान अमर हो जाए…’। फिर हाथ लहराए। जाती हुई सुहानी को यूं देख रही थी लाडो जैसे गोपियाँ भी कृष्ण को क्या देखती होगी। फिर भी जी नहीं भरा उसका तो कमरे की खिड़की से जाते हुए उसे यूं देखने लगी जैसे बच्चे खिड़की से चाँद देखा करते हैं। मैं जादू टोना नहीं मानती पर कहीं न कहीं लाडो बुरी तरह सम्मोहित लगी उससे। मैंने भी झाँका था सुहानी की आँखों में…सांप की तरह सम्मोहित करने वाली थी वे आँखें।

हर रोज मैं लाडो को थोडा थोडा देखती और उसके भीतर प्रवेश करने की कोशिश करती और सोचने लगती कि जो प्रेम पहले सुगंध फैला रहा था कैसे प्रदूषण फैलाने लगा वह अब ?  क्या सचमुच ऐसा हो सकता है ? क्या बुआ ठीक कहती है कि लाडो उसके वशीभूत थी ?

पर थी तो भी इसमें इतना भयभीत होने की क्या बात थी। याद आया अपने स्कूल के दिनों मैं और मेरी सहेली भी अपनी एक टीचर के प्रति अनूठी भक्ति रखती थी। उनकी एक झलक के लिए पागल रहती थीं हम। उनको लेकर हम दोनों के बीच इर्ष्या भी पैदा हो जाती थी। हम सभी ही पहले समान सेक्स के प्रति आसक्त होते हैं, बाद में विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण प्रबल होता है। पर वह सब छोटी उम्र में होता है। लाडो अब उतनी छोटी नहीं रही। इसी भादों में बीस पूरे कर चुकी है। हाँ पर जब तक उसके जीवन में कोई सुहानी से बढ़कर नहीं आ जाता तबतक…

अपने ही सवाल और जवाब में डूबी हुई थी कि फिर एक विचित्र बात और देखी मैंने। दुखिया ने सुहानी की झूठी थाली उठानी चाही तो रोक दिया लाडो ने और खुद ही उठाकर ले गयी उसकी थाली को और थोड़ी ही देर बाद मैंने जो पागलपन देखा कि मन हैरानी और हलकी जुगुप्सा से भर गया। अपने लिए खाना भी वह उसी झूठी थाली में लेकर आई। उसके छोड़े गए जूठे खाने को भी उसने बड़ी आत्मीयता से खाया। यूं इसमें कुछ भी आपतिजनक नहीं था यदि यह सामान्य मानसिकता में किया गया होता पर कुछ तो था जो दृश्य में रहते हुए भी पकड़ाई में नहीं आ रहा था। हे परवरदिगार! इस यथार्थ के पीछे का सत्य क्या है? क्या इसके पीछे कोई भक्ति भाव छिपा था, ईष्ट के प्रति किसी एकनिष्ठ योगी सा? या उसकी बुनावट में ही कोई केमिकल लोचा था ?

उसमें उसको ढूँढने की कोशिश में मैं सोचती कि कैसे उसके दिमाग के भीतर घुस जाऊं। पर वह थोड़ी पागल भी थी और एक पागल के दिमाग के भीतर किस तरह घुसा जा सकता था ?

इन्ही बेतुके ख्यालों में बीता वह पूरा दिन और देखते देखते लज्जा में लिपटा एक अजीब सा विषाद हम सबके बीच आ बैठा था। पहली बार हमारे ललाट पर सात सलवटें उभरी थीं और बुआ की आँखों में एक अशांत अपवित्रता भर गयी थी। जैसे भी हो हमें लाडो को सुहानी के पिंजरे से बाहर करना ही था!

बुआ के भीतर २०वी और १८वी सदी एक साथ वर्तमान थी। शाम होते न होते १८वी सदी ने वो जोर मारा कि विचलित बुआ ने राज ज्योतिष को बुलवाया। ये वही राज ज्योतिष थे जिन्होंने ईमेर्जेंसी हटने के बाद फूफा के चुनाव जीतने और बड़े राजयोग पाने की भविष्यवाणी कर दी थी (ईमेर्जेंसी के बाद जो चुनाव हुए उसमें फूफा जी प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बने थे )। घर की छत पर झूलते फानूस को देखते हुए राज ज्योतिष ने कुछ गणना की और बताया कि सूर्य, शनि और राहू ये तीनों अलगाववादी ग्रह हैं, जिस घर में बैठते हैं उसे उसके भाव से अलग कर देते हैं। लड़की के पति और पिता दोनों के घर में ये अलगाववादी ग्रह बैठे हुए हैं इसलिए शादी की सफलता में अड़चन रहेगी…बहरहाल ग्रह की शांति के लिए पूजा पाठ और दान का प्रिस्क्रिप्शन लिख कर चलते बने वे।

बुआ की आँखों में अमंगल की छाया कांपी और उसी के प्रतिवाद स्वरूप आनेवाले कल की चिंता में घर के कोने अंतरे में पूजा, मन्त्र, जाप और ईश्वर को स्थापित कर दिया गया था।

उसके अगले दिन सुबह सुबह ही बुआ ने पंडित जी का दिया मारक मन्त्र बुदबुदाया और लाडो के आते ही बीमारी का बहाना कर उसे सुहानी के घर जाने से अटका दिया। बुआ शायद मारक मन्त्र का प्रभाव देखना चाह रही थी। लाडो घर में रुक गयी पर दूर रहकर भी दूर् कहाँ रह पाती थी वह। जहाज के पंक्षी की तरह वह पुन:पुन: जहाज पर। कनखियों से देखा…कॉलेज से आते ही खाना खाते ही वह फिर उससे फोन के जरिये चिपक गयी थी। फिर देखा, सामानों से भरा कोई बैग नौकर के जरिये सुहानी के घर भेजा जा रहा था। नेता फूफा जी के यहाँ तोहफों के ढेर लगे रहते थे उसी भार को उसने हल्का करने की कोशिश की थी। इसबार मैंने हिम्मत कर उससे कहा – अति सर्वत्र वर्जयेत…तीर निशाने पर लगा था। समझ गयी थी वह। रोम रोम में विद्रोह भरा हुआ था उसके। चेहरा कस गया, पलटवार करते हुए उसने मिसाइल चलायी – और जीवन जो अति करता है हमारे साथ उसका क्या ? समय जो घुटन पैदा कर रहा है मेरे भीतर उसका क्या ?

वह एकाएक सयानी हो गयी थी।

बीस से चालीस की हो गयी थी।

क्या मतलब ?

कुछ नहीं…धीरे धीरे बुदबुदायी वह। मुझे लगा इसी पल से एक परायापन उगने लगा था हमारे बीच, इसीलिए स्पष्ट कुछ जवाब नहीं दिया उसने। पर उसके चेहरे का असमंजस…उसकी कशिश…उसकी तपिश…उसकी देह की, उसके अंग अंग की, उसकी आँखों की भाषा मुझसे कुछ कहना चाह रही थी।

जीवन, समय, घुटन, अति…जैसे उसके शब्द मेरी आत्मा की देह को बार बार अपनी नुकीली चोंच से कोंचते रहे। मुझको पहलीबार लगा कि सबकुछ ठीक नहीं, कुछ तो रहस्य है उसकी दुनिया में। कोई तो टीस है जो उसके सीने की परतों में दबी हुई है वरन जो जीवन इस उम्र में स्वप्न और संघर्ष को समर्पित होना चाहिए था वह इस कदर एक सखी के इर्द गिर्द कैसे सिमट सकता है। पर क्या है वह रहस्य ? क्यों कर रही है वह ऐसा व्यवहार ? मैं बस इतना भर समझ पाई कि उसके यथार्थ को शब्दों में नहीं रखा जा सकता था…कि उसको गिराने के चक्कर में खुद मैं भी गिर रही थी। दूसरी शाम फिर उसके पास बैठी भी पर उस दिन वह पूरी तरह सजग थी…खुद में थी। ऋषि भाव में थी। मैंने फिर पूछने की हिमाकत की,

क्या तुम्हे नहीं लगता कि उधार की ख़ुशी से भर रही हो तुम अपने खाली मन को। सिर्फ एक पर अपने को पूरा का पूरा खर्च कर रही हो…देखना वो कभी भी किसी भी दिन अपनी डोर वापस खींच लेगी।

मेरी अशुभ बात पर अपनी बात लादते हुए कहा उसने,

जो अपनी ही काट पीट में लगा है, खुद से ही खुद को बचा रहा है। वह खुद को दूसरे पर क्या खर्च करेगा बाईजी। जिसके पास अपना आप ही नहीं उसकी डोर कोई क्या खींचेगा…फिर यह सवाल तो आपको उनसे पूछना चाहिए जिन्होंने मुझे तन मन और आत्मा दी। यदि मैं दूसरों से अलग हूँ तो उसमें क्या मेरा कसूर है ?  उसने कहा मुझसे नहीं खुद से। मैंने पूछा,

क्या मतलब ?

उसकें गले में एक अस्पष्ट सी घरघराहट हुई। वह नहीं बोली कुछ। उसकी पलकों की झालर भींगने वाली थी ही कि मुंह घुमा लिया उसने। मैं चली आई। ऐसा कई बार हुआ, जब जब मैंने उसके अंतरतम तक पंहुचकर सत्य जानने की कोशिश की, जाने क्या कमी रही मेरी कोशिश में कि दरवाज़ा पूरा कभी खुला ही नहीं।

लाडो को उसके मन का पाखी उडाता रहा और हम सब अपनी अपनी पतंगे उड़ाते रहे। हम सबके दिलो दिमाग में एक ही चीज केंचुए सी रेंगती रही…सुहानी। बुआ को लगता कि सुहानी ने उसपर कुछ करवा कर उसके दिमाग में इस कदर गोबर भर दिया है कि उसे और कोई न दीखता है न सुनता है। दोनों बहनों और भाइयों को यह टीनएज आकर्षण जैसा कुछ लगता…यद्यपि वह टीन ऐज को साल भर पहले ही पीछे छोड़ चुकी थी। राजनीती के तालाब में छप छप डुबकी लगाते संघी मनसिकता वाले फूफाजी इसे अनुशासनहीनता और पागलपन से जोड़कर देखते।

सूखे सूखे दिन। न कोई बादल न कोई हवा…न पत्तों पर गिरता बारिश का संगीत…कुछ भी तो नहीं गुजरा हमारे घर से। धूल मिट्टी के बबंडर से भरे कुछ दिन और वहीँ गुजारकर मैं कोलकता लौट आई। आते वक़्त मन किया भी कि उससे कुछ अन्तरंग बात करूं कि नए सिरे से उसे जानने की कोशिश करूँ पर नहीं जानती कि कैसी दुविधा थी मेरे अन्दर। बिगाड़ का डर या कायरता?  मन के उस टुकड़े को वहीँ छोड़ दिया मैंने पर नहीं छेड़ा उस उदास कविता को। परिचय अपरिचय की देहरी पर ठिठकी खडी रही वह। हम दोनों एक दूसरे के चेहरे से एक दूसरे के दुःख को पढ़ते रहे। फिर उसने ‘धोक ‘ दिया, मैंने पीठ पर हाथ फेरा, दोनों के दुःख मिलते मिलते रह गए।

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इस बीच…

बुआ के दोनों लड़के पढ़ाई के लिए दिल्ली निकल गए थे। फूफा जी के मुख्य मंत्री बनने की संभावनाएं चमक रही थीं। राजनीति से फुर्सत मिलती उन्हें तो गाँव की बेशुमार प्रॉपर्टी…कुत्ते बिल्ली तक के नाम खरीदी गयी जमीन…इन सबमें समय फुर्र फुर्र उड़ रहा था उनका । घर आए महीनों बीत जाते और आते भी तो बाहर की दुनिया साथ चली आती। इस कारण अब लाडो सुहानी मिलाप निर्विघ्न लहर लहर आगे बढ़ता जा रहा था। समय का फायदा उठा वह अधिकतर कॉलेज से सीधा सुहानी के साथ घूमने निकल जाती। देर रात तक घर आती। सुहानी के चाचा तक की शादी में भी वह बुआ को अकेली छोड़ बरात के साथ भीलवाडा चली गयी थी। उसके चक्कर में घनचक्कर बनी बुआ कछुए सी सिकुड़ती जा रही थी और एक ही गुहार बार बार लगा रही थी मैं किसी प्रकार लाडो के मन से सुहानी का नाम खरोंच दूं। कुछ तो ऐसा कर दूं कि उनके हेत में रेत पड़ जाए।

मैं चाह कर भी लाडो से कुछ कह नहीं पा रही थी। मन उधेड़बुन में लगा रहता…कहूं तो भी क्या कहूं ? गलत लगते हुए भी कुछ भी गलत नहीं लग रहा था। यही हमारी सबसे बड़ी बिडम्बना थी। क्या वह कोई अपराध कर रही थी? एकबार कहा, पढ़ाई पर ध्यान दो तो उसने अपनी मार्क्स शीट मुझे पोस्ट कर दी। मैंने देखा उसके अंक काफी अच्छे थे। उस बड़े बाप की बेटी को यह भी तो नहीं कह सकती थी कि घर के काम में बुआ को मदद करो। उस घर में सरकारी नौकरों की फ़ौज खडी थी।

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चार साल बाद उतरतें बसंत में जबतक मैं गुलाबी नगरी जयपुर फिर आयी, घर के रंग बदरंग होने शुरू हो गए थे। हालाँकि लाडो ने अच्छे मार्क्स से एम। ए पास किया था और फूफा जी के प्रभाव से एक कॉलेज में लेक्चरर भी नियुक्त हो गयी थी वह। लेकिन अब समस्या यह थी कि पूरी सुबह वह सुहानी की प्री स्कूल में बिताती थी। उसको प्री स्कूल चलाने में मदद करती थी। सुनगुन यह भी थी कि यह प्रीस्कूल भी लाडो के आर्थिक सहयोग से ही खुल पाई थी। एकबार बुआ ने उसके पीछे से उसके कमरे की तलाशी ली तो देखा उसकी चेक बुक खुली पड़ी थी। बुआ ने मुझसे नाम पढवाए तो पता चला कि कई चेक सुहानी की प्री स्कूल के नाम काटे गए थे। इनसब को तो बुआ फिर भी सहने की आदि हो चुकी थी, पर तलाशी के दौरान ही उसकी डायरी मेरे हाथों लग गयी। डायरी का शीर्षक पढ़ते ही जैसे बुआ और मुझे एकसाथ डंक मार गया। जाने किस दुनिया का डर हमारे अंदर दुबका बैठा हुआ था कि डायरी के हाथ लगते ही उस डर ने हमें ही धर दबोचा। जैसे शीर्षक नहीं समय की शिला पर लिखा अपना भवितव्य पढ़ लिया हो हमने। पहले पृष्ठ पर ही लिखा था ‘सुहानी शरणम् गच्छामि ‘ उसके नीचे लिखा था – ‘जिन्दगी, दर्द और प्यास का रिश्ता खुल रहा है धीरे धीरे…अपार अथाह जलाशय मेरे सामने है पर उससे क्या…मुझे तो प्यारी वही बूँद जिसमें हो मेरी प्यास ‘

यानी आगे भी सुहानी के साए में ही चलते रहने का इरादा था उसका! तो सत्य उससे भी ज्यादा था जितनी हमारी आँखें देख पा रही थी।

बुआ के अन्दर जैसे नुकीले चाकू की तरह धंस गयी थी सुहानी।, हाहाकार करती बोली – अब तो समाज में भी इकी अटपटी और उल जलूल हरकता कै चलते जगहंसाई हो री है, लोगों को बैठा बिठाया मिल गया मसाला। छोटी सी बिरादरी, बात छिपी कोनी रहे। काल मंदिर गयी तो लोग फुसफुसा रिया थे। जाने कांई खार जणा था इनै! कुलबोरनी न और कोई मिल्यो ही कोनी!

शाम तक ग़दर मच गयी थी। कपास से उड़ते लाडो के मन को घेरने की पूरी योजना हो चुकी थी। गली में भौंकते कुत्तों और पेड़ों पर बैठे परिंदों की फडफडाहट तक काबू में थी। फूफा जी को अविलम्ब बुलाया गया था। डिटर्जेंट छाप सफ़ेद झक झक कुर्ते में फूफा जी आए। हालचाल जाने और जानते ही उनका बीपी बढ़ा और तीसरा नेत्र खुला। बेटी की शक्ल देखी तो मन अकुलाया। राजनीति ने भीतर से हांक लगायी तो ममता कोने में दुबक गयी। हाथ पीछे बाँध गोल गोल घूमते हुए वे मन ही मन बुदबुदाए – बेटी क्या हुई कश्मीर हो गयी…तुरंत कुछ करना होगा।

और इस तुरंत के अजेंडे में सबसे पहले उन्होंने अपने पितृ प्रेम को फोल्डिंग कुर्सी की तरह समेटा और एक कोने में पटक पारिवारिक  फिदायीन की भूमका में आ गए। तय हुआ लाडो की नजरबंदी। घर…कॉलेज…भीतर — बाहर…सब पर पाबन्दी। पाबन्दी की माकूल व्यवस्था कर फूफा जी अपनी किसी प्रेस कांफ्रेंस में व्यस्त हो गए। सुबह नौ बजे लाडो के रोशन कमरे में मैं जब चाय देने पंहुची तो पंख टूटे पाखी की फडफडाहट उसके कलेजे पर सवार थी। कमरे में टेप चल रहा था ‘आवाज़ दिल की पहचान ले, मैं कौन हूँ…जान ले तू ये… लाडो आँखों में जल और ज्वाला के साथ कमरे की खिड़की से बाहर उमड़ते घुमड़ते काले बादलों की ओर देख रही थी। मैंने पूछा क्या देख रही हो? उसके बुझे हुए चेहरे पर जीवन जैसा कुछ कांपा। निचला जबड़ा अपमान से कंपकंपाता रहा। पहली बार मैंने उसके चमकीले चेहरे से कई रंगों को एक साथ उड़ते देखा।

कुछ बोझिल पल!

पेड़ से झरती पत्तियों की तरह फिर कुछ शब्द गिरे उसके होंठों से – इस समय सुहानी इधर से अपनी स्कूल के लिए गुजरती है…शायद दिख जाए। मैंने धीरे से कहा – कितने बड़े नेता और कितने इज्ज्दार परिवार से हो तुम। मेरा बोलना हुआ कि सारे बाँध भरभरा कर टूट गए। वह भीतर से बाहर निकली और फूट पड़ी – पिता की प्रतिष्ठा का भार मुझसे न ढोया जाएगा बाईजी। मेरे लिए तो मेरे पिता घर में भी विपक्षी नेता ही हैं…मेरी आत्मा के विपक्ष में खड़े जिन्होनें जन्म दिया पर जीवन जीने की आज़ादी छीन ली…बोलते बोलते वह फफक पड़ी। डाल से टूटी टहनी सी उसकी कराह, अपमान की फांस और न समझे जाने का आक्रोश उसकी आँखों से धार धार इस कदर बह रहा था कि लाडो पर लाड उमड़ आया। एकबार मन हुआ कि बुआ से सिफारिश करूँ कि सारी पहरेदारी हटा दे…कि स्वातन्त्र्य में ही चीजें पूरी तरह प्रस्फुटित होकर खिलती है पर घर में छाए तनाव के कुहरे और पोर पोर दुखी बुआ का बुझा हुआ चेहरा देख मुझसे कुछ भी बोलते नहीं बना।

खुल गया दिशाओं का बेचैन आकाश!

फूफाजी बेचैन थे कि उनके पोलिटिकल सलाहकार ने उनसे गलत वक्तव्य दिलवा दिया था। डर था कि सही दिशा में अग्रसर उनकी राजनीती की नाव कहीं डगमगा न जाए। लाडो के दोनों भाई बेचैन थे कि इतनी नाकेबंदी के बावजूद लाडो के इरादों में कोई बदलाव नहीं आ पाया था। हमने शर्त रखी कि वह शादी के लिए तैयार हो जाए। उसने अभी तक हमारी शर्त पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया था। बुआ और मैं…दो विपरीत भावनाओं के प्रवाह में पड़कर छटपटा रहे थे। एक मन करता करने दे लाडो को मनमानी…तो दूसरा सामाजिक संस्कारी मन करता…इसके उज्जवल भविष्य के लिए जरूरी है यह नाकेबंदी।

दूसरे दिन देखा लाडो की मोटी मोटी आँखे जवा फूल की तरह लाल लाल थी। अधिकार सम्पन्नता से भरे फूफाजी ने सुहानी के पिता को जी भर जूतियाया – यदि असल बाप के पूत हो तो रख अपनी बेटी को काबू में, मेरी बेटी का पीछा वो छोड़ दे नहीं तो…। हमारे गुप्तचरों ने खबर दी कि इस ’ नहीं तो’ की धमक और दमक ने अपना काम तुरंत कर दिखाया। कल सुबह जब खेत में झूमती गेहूं की बालियों की तरह झूमते हुए लाडो सुहानी की स्कूल पंहुची तो सुहानी ने उसे बहुत जलील किया था। उसके लाए गिफ्ट पैकेट को भी पूरी ताकत से बाहर उछाल दिया था। पहलीबार उम्मीद का सूरज निकला और हमारे चेहरों पर विजेता के भाव यूं दिप दिपाए जैसे हमने चित्तोड़ फतह कर लिया हो। सुहानी के बड़े भाई संजू ने ओंठों को गोल करते हुए कहा –अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे!



मध्यवर्गीय मर्यादाओं से बेजान और खोखली पड़ी बुआ टुकुर टुकुर ताकती रही अपने कामयाब पति को। राजनीति में ही नहीं घर में भी एक झटके में ही उन्होंने विरोधी दुश्मन को धूल चटा दी थी। अगले कदम के रूप में फूफा जी ने कहा ‘शादी’ और अपने ड्राइंग रूम में लगी ‘लिव एंड लेट लिव’ के फोटो फ्रेम पर नज़र गडाते हुए शर्ट पर लगी अदृश्य धूल को हाथों से झाड़ा। फिर सर्वसम्मति से सोचा गया कि एकबार लाडो के स्वाभिमान और आत्मा के घायल हंस पर शादी की मिट्टी का लेप लग जाए तो इसकी जुबान से तकिये से उतरते मैले गिलाफ की तरह सुहानी का नाम उतर जाएगा। इस ‘प्रस्ताव ‘ के सर्वसम्मति से पास होते ही उसपर एकबार फिर शादी का भरपूर जोर डाला गया, यहाँ तक कि उससे संवाद बंद कर दिया गया जब तक वह शादी के लिए सहमत नहीं हो जाती। सम्बन्धों ने नयी करवट ली और हर निगाह रडार बनी उसकी गतिविधि की टोह लेती रही।

और एक शाम कमाल हो गया। जो लाडो शादी के नाम से ही यूं बिदकती थी जैसे सनातन धर्मी गो मांस के नाम से बिदकते हैं, वही लाडो साथ सिरहाने की डोर को हाथ से छूटती देख कच्ची पड़ी और बिना धमाल मचाए ही हम पर रहम खाते हुए, दिए की लौं सी कांपती आवाज़ में कहा ‘हाँ हाँ SSS ‘। फूफा जी के आलीशान ड्राइंग रूम में उसकी आवाज़ गूंजी और दीवार पर लगे ‘लिव एंड लेट लिव’ का फोटो फ्रेम व्यंग्य से मुस्कुरा पड़ा। उसके हाँ भरते ही एक नन्हीं कामयाबी हमारे होंठों पर चमकी और दूसरे दिन से ही जोर शोर से उसके लिए वर की तलाश में पूरा कुनबा जुट गया। सुन्दर कन्या ऊपर से पिता नेता विपक्ष! दस दिन के भीतर ही डौल बैठ गया वर का बल्कि यूं कहिये कि कतार लग गयी। वरों की कतारों में एक ऐसे वर को उठाया गया जो ठंडी तासीर और थोड़ी कमजोर हैसियत का था। और इसके साथ ही फूफा जी सहित हम सब ने चियर्स की। लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार से घेवर और आम का कलाकंद मंगवाया गया। लाडो का भविष्य और फूफाजी का परिवार असुविधाजनक स्थिति में पड़ने से बच गया था।

उस गहराती रात जब नींद के उड़ते पाखी को बुलाते बुलाते थक गयी मैं और पानी पीने के लिये बाहर निकली तो देखा उसके कमरे से हलकी हलकी रौशनी झाँक रही थी। दरवाज़े को हलके से हिलाया तो खुल गया दरवाज़ा। घुसी कमरे में तो झटका खा गयी। नाईट लैंप की झपकती लौं में उसका उदास चेहरा झिलमिला रहा था। उसके हाथ में प्याला था…झन्न सा गिरा कुछ। स्तब्ध –सी आँखें स्थिर हुई तो समझ में आया कि नींद भरी आँखों से झोंके खाते वह पी रही थी। ’यह अंतिम बेहोशी, साकी अंतिम प्याला है…’ मेरे देखने को वह देख भी रही थी। फिर भी न वह सकपकाई और न ही उसने छिपाने या हटाने का कुछ प्रयास ही किया। एक घुटा घुटा डर मेरे अन्दर समा गया। उस नन्हें क्षण, मन में यह भी आया कि इस दुस्साहसी बेलगाम घोड़ी पर लगाम कस फूफा जी ने ठीक ही किया है। (उस पम्परावादी संघी घर में स्त्री तो क्या पुरुष तक नहीं पीते थे )नज़र कुछ और देर उसपर टिकी रही तो उसके प्रति गीली गीली सहानुभूति उगने लगी। राय बदल गयी। गहरी वेदना और आसूओं में डूबा उसका भींगा मासूम सा चेहरा अलग ही कहानी कह रहा था…शायद जीवन की कठोरता को सोमरस में बहाने की असफल चेष्टा स्वरूप ही उसने उठाया था यह कदम। भीतर मेरे भी जाने क्या पिघला कि मैंने उसके सर पर हाथ फेर दिया। वह सुबक सुबक कर रोने लगी थी जैसे मेरे हाथ फेरते ही अपने भीतर के यातना गृह को फिर से देख लिया हो उसने। कोई तो पीड़ा थी जो उसे भीतर ही भीतर कुतर रही थी। फिर मन किया…बात करूँ उससे, पूछूं कि जो लाडो शादी के नाम से ही यूं आतंकित हो जाती थी जैसे कभी यहूदी हिटलर के नाम से हो जाते थे…वो शादी के लिए अचानक राजी कैसे हो गयी ? पर जाने कैसे डर ने…शायद शादी की ताजा ताजा बनी बात के बिगड़ने के डर ने…या इस पीने के दृश्य ने ऐसा आविष्ट कर रखा था मुझे कि शब्द भाग खड़े हुए, बस चुप्पियाँ ही खेलती रहीं हम दोनों के बीच। उस दिन से बल्कि ठीक उसी पल से उसने मुझे विरोधी दल का समझा और ठंडी निस्संगता से मुझे जाते हुए देखती रही।

फूफा जी के पिता-मन पर उनका राजनैतिक मन हावी हो रहा था क्योंकि उनके मुख्य मंत्री बनने की संभावनाएं दिन पर दिन चमक रही थीं। चुनाव अधिक दूर नहीं थे इसकारण उनकी बैठक में दिनभर कार्यकर्ताओं, सरपंच, विधायकों और पटवारियों का ताँता लगा रहता। पोस्टर, बैनर, झंडों और नारों की दुनिया अलग उन्हें खींचती रहती। कार्यकर्ताओं की दारु, जीप, मुर्गा और भत्ता की मांग ने अलग से उन्हें परेशान कर रखा था। ऊपर से बेटी की बला! ऐसे में लाडो की शादी के लिए सहमती!

वे परम पुलकित थे।

लेकिन हम सब भीतर भीतर थोड़े डरे थोड़े सहमें थे। लग रहा था जैसे घर में शादी नहीं श्राद्ध मनाया जाने वाला है। जब हमने कुंवर सा को धों पोंछ सजा धजा उसके सामने खड़ा किया तो उसने आँख तक ऊपर नहीं उठाई। जब जब हमने कुंवर सा को लेकर उससे चुहल करनी चाही उसने चुप्पी ओढ़ ली। हमने चाहा कि वह शादी की खरीददारी में संग चले तो उसने ओंठ गोल कर लिए। जब उसे शादी का घाघरा – ओढनी का सेट दिखाया गया तो उसने आँख मूँद ली। बुआ ने प्यार से कहा भी – अपने घर जा रही हो…ख़ुशी ख़ुशी जाओ तो चुपचाप वह अपने कमरे में चली गयी। उस शाम बुआ सचमुच विचलित थी। आशंकित थी। उसके अन्दर बैठी माँ ने फिर उफान मारी। कलपते हुए पूछा उसने फूफा जी से – क्या हम ठीक कर रिये हैं ?

आत्मविश्वास से दिप—दिप करते फूफा जी ने मूंछ पर ताव दी और गर्दन हिलाते हुए बुआ को समझाया –। तू क्यों कांग्रेस की तरह चिडचिडी हो रही है। तेरे जिगरा नहीं तो मुझ पर छोड़ दे। तू ने तो देखा है एक से एक सूरमाओं को कैसी पटखनी दी है मैंने…याद है वो शेखावत… चला था मुझे बदनाम करने…जमानत जब्त करवा दी गधे की। लाडो की जिन्दगी पटरी पर आ जाएगी…कैसे… यह मुझ पर छोड़ दे। मेढकी आखिर कितना उछल लेगी…कील को तो हथोड़े से ही ठोका जा सकता है। उसके लिए शादी ही सही हथोडा है। अरे शादी ने बड़े से बड़े छुट्टे सांड की नाक में नकेल डाल दी है…हमारी लाडो किस खेत की मूली है? फिर शादी के लिए तो कम मन से ही सही पर हां तो उसने भरी ना! बस उस कम मन को ही पूरे मन में बदल देना है हमें। इसके लिए जरूरी है कि हम सब उससे हल्का सा फासला बनाए रखे जिससे उसके इस अहसास को बल मिलता रहे कि अब इस घर से उसका दाना पानी उठने वाला है। असली घर उसका वही है।

शादी पूर्व की हर रस्म में उपस्थित रहते भी अनुपस्थित रही वह। हम भी उन रस्मों को निभाते ऊपर—ऊपर तैरते रहे। पत्‍ते चुनते रहे।सांस रोके समय को अपने ऊपर गुजरता देखते रहे। जाने किस विपक्ष के किस अदृश्य हाथों ने एक प्रकार की क्रूर निस्संगता को हमारे बीच उगा दी थी।

उस कम मन को पूरे मन में बदलने की धुन में हम देखकर भी नहीं देख पाए कि जैसे जैसे शादी की तिथि करीब आती जा रही थी उसके जीवन से जीवन रिसता जा रहा था। सगाई की रस्म के समय जिन क्षणों उसे हीरे जडित अंगूठी वर को पहनानी थी उसकी उन स्वप्निल निरीह आँखों में जैसे पृथ्वी का सारा आर्तनाद भर आया था! हम सब उसकी इस गहन और महाकाव्यात्मक पीड़ा के गवाह थे पर हम करते भी क्या। हम उसका भला चाहते थे और इस चाहने में पीड़ा का एक अध्याय हमारा भी था। इसलिए हम सब सख्ती का काला चोंगा पहने रहे और दम रोके विवाह के दिन का इंतज़ार करते रहे।

‘अजायबघर से तुम्हारे

जाती हूँ अपनी बेहतर दुनिया में

अलविदा देवताओं, अलविदा…। ’

२५ मई १९९७!

सत्ताईस दिन के भीतर उसके केसरिया बालम हीरे की कलंगी वाले गहरे लाल रंग के साफे और सुनहरी शेरवानी में घोड़ी पर चढ़ हमारे द्वार पधारे। तोरण मारा। रस्म रिवाजों के साथ किसी कुशल बढई की तरह हमने लाडो को शादी के चौखटे में किसी प्रकार फिट किया। सात वचन, सात फेरे और ‘बाबोसा री प्यारी म्हारी बनरी नथ पर मोर नचावै छै… ’ के बीच असली वसरा मोती के जेवर और राजस्थानी घाघरा ओढ़नी में सजाकर कन्या दान कर उसे विदा किया। विदाई ज्यादा ही भावभीनी विदाई थी। हमारी आँखों में नमी के साथ साथ सतर्कता का चश्मा भी चढ़ा हुआ था। उसकी भींगी नम आँखों में दूर दूर तक फैला इंतज़ार था…सुहानी का।

विदा के क्षणों प्रकाश भाईसा (फूफा जी के भाई )के मुंह से ढ़ीली सी आवाज़ में निकल गया था – बेटा, अपने घर जा रही हो। देखो! वहीँ दिल लगाना… वही असली घर!

उसने कुछ जवाब नहीं दिया बस आहत नज़रों से टुकुर टुकुर देखती रही हमें। शादी तय होने के बाद से ही हमारे हर सवाल का जवाब उसने चुप्पी के पत्थर से देना सीख लिया था।

बुआ ने भी कुछ जोड़ा – मैं पाप की माँ…नितीश की माँ तेरी धर्म की माँ…कहते कहते जाने भावनाओं का कैसा तो दौरा पड़ा बुआ पर कि वह फूट फूट कर रो पड़ी। लाडो ने आसक्ति—विरक्ति से बुआ की ओर ताका। उसके ओंठों में हल्का सा कम्पन हुआ। पथराई आँखें दूर दूर तक ताकती रही…काश दिख जाए सुहानी! हमारा दिल धड़का…कहीं आ न धमके…तभी दुल्हे नितीश ने हाथ का सहारा दे फूलों से सजी गाडी में उसे अन्दर ले लिया।

सबकुछ ठीक ठाक निपट गया था इसलिए उम्मीद थी कि विदाई के बाद चमकती हुई धूप खिलेगी पर काले बादल ही छाए रहे हमारे आँगन में। धूप उतरी भी पर तितलियों की तरह क्षण भर अपनी रंग और छटा दिखाकर अदृश्य हो गयी। चूल्हे की राख में आंच दबी थी जिसे हम महसूस नहीं कर पाए। महसूस हुआ ग्यारह दिन बाद ही जब एक रात उसने ट्रंक कॉल पर बताया कि उसके कॉलेज की छुट्टियाँ कुछ दिनों बाद ही ख़त्म हो रही है और उसे वापस जयपुर आना पड़ेगा। कॉलेज ज्वाइन करने के लिए।

घर में फिर पंचायत बैठी। पिता के अवतार पुत्रों ने सलाह दी – क्यों न उसका तबादला वहीँ करवा दिया जाए – न रहे बांस, न बजे बांसूरी। फूफा जी को भी राय जंची। उन्होंने अपनी ऊंची हैसियत का फायदा उठाया और उसके आने के पूर्व ही उसका तबादला वहीँ बड़ौदा करवा दिया।

******

अब चलें बड़ोदा…उसकी ससुराल

दोनों परिवार एक मुद्दत बाद तृप्ति के सागर में आकंठ डूबे…खूब सोए

लेकिन जिन दो जोड़ी बदन की है यह कहानी…वहां,

न दिन चांदनी से हुए, न रात सोने सी हुई,

न जिस्म पर चांदनी बरसी, न गुलाब महका,

न बादल बरसा, न बिजली चमकी,

दोनों सूखे मुड़े तुड़े कमरों के दो छोरों पर पड़े रहे।

मधुमय रात को जैसे ही उमंगित उतावले उन्मत्त दूल्हे राजा ‘बांहों में चंदा सा बदन होगा की ‘ मानसिकता से घुसे, चिर प्रतीक्षित स्वप्न घर में, तो गश खा गए। देखा उनकी स्वप्नों की रानी मुंह उल्टा कर सुबक रही है और पास ही रखी है एक चिट ‘ मुझे अप्रत्याशित पीरियड हो गए हैं…मुझे क्षमा करें…मैं दर्द से बेहाल हूँ ‘

इस अप्रत्याशित पीरियड की अवधि फिर कभी ख़त्म ही नहीं हुई। उस रात से जो विदेह हुई वह कि फिर होती ही चली गयी।

सुख की चिड़िया फिर नहीं लौटी उस आशियाने!

जयपुर वह फिर आई भी एक बार पर सिर्फ अंतिम सांस लेने और अपनी काया की माटी को उसी माटी में सौंप देने जहाँ जिंदगी ने फिर खिलवाड़ किया उसके साथ। उससे न मिलने दिया जो जीने में सहायक थी उसकी और जिससे मिलने की उम्मीद लेकर आयी थी वह। इसी गम में रात के अंतिम पहर में विराट की साक्षी में पंखे से बंधी रस्सी से झूल पंच तत्व में समा गयी वह और थमा गयी हमें एक चिठ्ठी, जो उसके कमरे में उसकी टेबल पर रखे पेपर वेट के नीचे दबी पड़ी थी।

लिखा था — उजासभरी इस मखमली और जीवनदायी चांदनी में जब लोग जी भर जीना चाहें, मैं यदि प्रेयसी की तरह मौत को गले लगा रही हूँ तो सोचियेगा क्यों करना पड़ा मुझे ऐसा?  मैंने सोचा भी कि जिस तेज बहाव में बह रही हूँ उसे रोक दूँ, पर मेरे लिए नामुमकिन था वह, इसलिए खुद को ही जीने से रोक दिया। क्या करती मैं भी ? जब जीवन के सारे रास्ते बंद हो जाए तो कोई कैसे जीए, विशेषकर वह जिसे जीवन ने अपना आप दिया ही नहीं। जिसके अंतर्मन के भीतर कोई विरही पुरुष बैठा हो नारी संसर्ग के लिए छटपटाता, क्या करे वह ?  आपकी आँखें उस सत्य को क्यों नहीं देख पाई जो जी रही थी मैं। शायद हर आँख से बड़ा होता है सत्य! मुझे जाना ही होगा। अपने अंधेरों से घिरा, प्रतिपल जलता एक कमजोर और खंडित इंसान आपकी दुनिया में जीए तो कैसे ?  जीवन के वे ही चंद पल जीए मैंने जो सुहानी के साथ बीते। उन्हीं लम्हों जिंदगी के करीब बैठी मैं जब सुहानी करीब बैठी मेरे। उस मासूम से भी सबको दिक्कत थी। पहले उसके पिता को धमकाया गया फिर उसे। फिर मुझे धमकाया गया शादी के लिए। मैंने भी जाने क्यों यह उम्मीद पाल हाँ भर ली कि शायद पति नामधारी मुझे समझें और अपने संरक्षण में लेकर जिंदगी और मेरे बीच जो विराट फासले आप लोगों ने पैदा कर दिए थे उसे दूर करने में मेरी मदद करें। पर मैं भूल गयी कि जिसकी जणी न हुई उसका धनी भी क्या होगा?  फिर उसे मुझसे मिलना भी क्या था। मैं लौट आयी जयपुर वापस, सुहानी से मिलने की उम्मीद में। पर यहाँ भी धोखा। आपने मुझसे पूछे बिना मेरा तबादला करवा दिया। सुहानी ने मुझसे मिलने से इंकार कर दिया क्योंकि आपने उससे वचन ले लिया था, मुझसे किसी भी प्रकार का संबंध न रखने का। वह अंतिम दरवाज़ा भी बंद करवा दिया आप लोगों ने।क्या कसूर था मेरा?  मेरा एक ही सहारा था जिसे आप ने छीन लिया, बिना सहारे के तो अमरबेल भी नहीं जी पाती।

पुन:श्च : मैं आपके लिए समस्या बनी तो सिर्फ इसलिए कि हम न रिश्तों में जीते हैं न प्रेम में, न करुणा में, न ममता में, न भाव में न भावना में। हम सब सिर्फ ऊपरी खाल में जीते हैं।

आपकी लाडो,

जो न आपकी हो सकी और जिसके न हो सके आप।


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