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अवध नारायण मुद्गल की बेमिसाल कहानी — "और कुत्ता मान गया"


अवध नारायण मुद्गल की बेमिसाल कहानी "और कुत्ता मान गया"


मैं जब साहब के घर से फाइलें लेकर काफी रात गए अपने घर लौटने लगता हूँ, कुत्ता पंजे उठा-उठाकर हाथ मिलाता है, गुड नाइट कहता है, गले मिलता है। मैं प्रसन्नता से भर उठता हूँ। लगता है, जैसे साहब भी हाथ मिला रहे हों, गले मिल रहे हों। फिर सोचता हूँ—मैं भी कितना मूर्ख हूँ, भला साहब ऐसा क्यों करने लगे? साहब कुत्ता थोड़े ही हैं।

'बेमिसाल कहानी' बोलना और बेमिसाल कहानी को पढ़ना दो पूर्णतया अलग-अलग घटनाएं हैं. पहली वाली से तो अनेकों दफ़ा मन-बेमन रु-ब-रु हुआ है, यह पाठक, दूसरी वाली की चपेट में अभी फ़िलवक्त है और चाह रहा है कि आप भी इस साहित्यिक-घटना के साक्षी बन पायें.

पढ़ें अवध-जी की कहानी "और कुत्ता मान गया". यदि वरिष्ठ कथाकार सुश्री चित्रा मुद्गलजी के पति स्व० श्री अवधनारायण मुद्गल के बारे में कम या न जानते हों तो उनका परिचय कहानी से पहले दे रहा हूँ, पढ़ सकते हैं .

भरत एस तिवारी

अवध नारायण मुद्गल 
अपनी कविताओं और कथा दृष्टि में मिथकीय प्रयोगों के लिए विशेष रूप से जाने जाने वाले कवि, कथाकार, पत्रकार, सिद्धहस्थ यात्रावृत लेखक, लघुकथाकार, संस्मरणकार, अनुवादक, साक्षात्कारकर्ता, रिपोर्ताज लेखक और संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ, चिंतक विचारक अवध नारायण मुद्गल, लगभग 27 वर्षों तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 'सारिका' जैसी कथा पत्रिका से निरंतर जुड़े ही नहीं रहे, बल्कि 10 वर्षों तक स्वतंत्र रूप से उसके संपादन का प्रभार भी संभाला और कथा जगत में मील का पत्थर कई विशेषांक संयोजित कर उसे नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

28 फरवरी 1936 को आगरा जनपद के ऐमनपुरा गाँव में एक मामूली से जोत के मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में जन्मे मुद्गल जी के पिताजी पंडित गणेश प्रसाद मुद्गल जाने माने शिक्षाविद थे और माँ पार्वती देवी सहज गृहणी। अपने चार भाई बहनो में वे सबसे छोटे थे और खेतीबारी के बजाय उच्च शिक्षा के आकांक्षी। मंझले भाई के आकस्मिक मृत्यु ने उन्हें बहुत तोड़ा।

उन्होंने साहित्य रत्न और मानव समाज शास्त्र में लखनऊ विश्विद्यालय से एम. ए. किया और संस्कृत में शास्त्री। शिक्षा के दौरान संघर्ष के दिनों में उन्होंने यशपाल जी के साथ काम किया और अमृतलाल नागर, लखनऊ में उनके स्थानीय अभिवावक ही नहीं थे बल्कि उनका पूरा परिवार उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानता था। जनयुग, स्वतंत्र भारत, हिंदी समिति में कार्य करते हुए 1964 में वे  टाइम्स ऑफ़ इंडिया (मुंबई) से जुड़े। आगे चलकर मुद्गल जी को सारिका के साथ साथ वामा और पराग के संपादन का भार भी कुछ अरसे के लिए सौपा गया। इस बीच लिखना उनका निरंतर जारी रहा लेकिन उन्होंने अपनी सर्जना को प्रकाशित करने में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई।  उनकी रचनाएँ हैं 'कबंध', 'मेरी कथा यात्रा' (कहानी संकलन), 'अवध नारायण मुद्गल समग्र'( 2 खंड), 'मुंबई की डायरी '(डायरी ), 'एक फर्लांग का सफरनामा' (यात्राव्रत), 'इब्तदा फिर उसी कहानी की '(साक्षात्कार), 'मेरी प्रिय सम्पादित कहानियां' (संपादन), तथा 'खेल कथाएं' (संपादन)।

उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'साहित्य भूषण', हिंदी अकादेमी दिल्ली के 'साहित्यकार सम्मान', एवं राजभाषा विभाग बिहार के सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

कहानी:  और कुत्ता मान गया

— अवधनारायण मुद्गल


दिन-रात घटते रहते हैं। ऋतुएँ बदलती रहती हैं। भूगोल में लिखा है तो किसी न किसी के लिए ठीक ही होगा। शायद मेरी बीवी, मेरे साहब या भूगोल पढ़ाने वाले मास्टर जी के लिए ही ठीक हो, क्या मालम? मैं जब तक काम करता हूँ, दिन ही दिन लगता है। मुझे हर ऋतु में पसीना आता है, हर ऋतु में जाड़ा लगता है, इसलिए कभी अनुभव नहीं हुआ कि ऋतुएँ बदलती हैं। या शायद हुआ ही हो, जब मेरी बीवी किसी से मेरी तारीफ करती है याद नहीं। फुर्सत भी नहीं कि यह सब अनुभव कर देखें। मुझे अपनी बीवी को देखकर और कुछ देखने की ज़रूरत ही नहीं रहती।

मेरी बीवी श्रीमती है, लेकिन मैं श्रीमान् नहीं; बीवी जवान है, जो दूसरों के लिए खूबसूरत भी है। शायद वह भी अपने को वैसा ही समझती है। मेरे समझने न समझने का प्रश्न ही नहीं, मेरी तो बीवी है ही।

ऐसी बीवी भाग्यशालियों को मिलती है। मुझे मिली है, मैं भी भाग्यशाली हूँ। बड़े-बड़े आदमी उसे देखकर, उससे मिलकर अनजाने-पहचाने मुझसे, मेरे भाग्य से ईर्ष्या करते हैं, इसलिए मैं छोटा आदमी भी नहीं। हाँ, बीवी के सामने लगता है, जैसे अपरिचित बौनी आकृतियाँ मुझसे ही नहीं, मेरी कल्पना के भीमसेन से भी आठ हाथ बड़ी होकर मुझे चिढ़ा रही हैं। मेरा कुबड़ा व्यक्तित्व एक बिंदु से सिमटकर दृष्टि से ओझल हो जाता है।

मैं बीवी की तुलना में छोटा हुआ तो, बड़ा हुआ तो, आखिर वह है तो मेरी बीवी ही। आजकल अपनी बीवी के आगे कौन म्याऊँ नहीं करता? नानियों ने कहा है, आदमी अपनों से ही डरता है, अपनों से ही छोटा होता है। बीवी से अधिक कौन अपना हो सकता है?

मुझे बचपन की एक बात अकसर याद आती रहती है—अम्मा पिताजी से कहा करती थीं—औरतें जिन्स सेंतकर अपने लिए थोड़े ही रखती हैं, उनके पास जो कुछ बचा होगा, वक्त-ज़रूरत घरवालों के ही काम आएगा। संतोष अनुभव होता है-बीवी का बड़प्पन वक्त-ज़रूरत मेरे ही काम के लिए है।

मैं हाई स्कूल हूँ, बीवी इंटर। मैं मामूली क्लर्क या क्लर्क से भी छोटा, कुर्सी-मेज़ पर बैठकर काम करने वाला कोई नौकर हो सकता है, तो समझिए, नहीं हूँ। बीवी समाज-सेविका, विशेष रूप से नारी समाज-सुधारिका है। बड़े-बड़े बँगलों के बड़े-बड़े आदमियों में उसकी इज़्ज़त है, शोहरत है।

मेरी बीवी मेरे साहब के घर भी, कभी-कभी समस्या में सहयोग, परामर्श या किसी सामाजिक कार्य के लिए चंदा लेने आती-जाती रहती है। मैं भला इतने बड़े देश की समस्याओं, बड़े-बड़े लोगों और इतनी बड़ी समाज-सेविका के उत्तरदायित्व को क्या समझ सकता हूँ? समझता हूँ सिर्फ एक बात-मेरे साहब भी मेरी बीवी को मानते हैं। और वैसे न जाने कितनों के कितने साहब उसे मानते हैं।

संध्या समय प्रायः ही सुपरिटेंडेंट या हैडक्लर्क मुझे साहब के बँगले पर दस्तखत करवा लाने के लिए अर्जेंट फाइलें देकर भेज देते हैं। साहब की कृपादृष्टि पाने के लिए बँगले के छोटे-मोटे कामों में हाथ बँटा देता हूँ। अकसर साहब का सामीप्य पाने और उनकी नज़र में बने रहने के खयाल से ड्राइंगरूम में चाय लगाने का काम मैं सँभाल देता हूँ। कभी-कभी चाय के समय मेरी बीवी भी वहाँ पहुँच जाती है। साहब और उनके बीवी-बच्चों के साथ या कभी अकेले साहब के ही साथ बैठकर चाय पीती है। मैं आँगन में बैठा फाइलों की प्रतीक्षा करता हूँ।

साहब के यहाँ बड़े-बड़े भूरे बालों वाला ठिगना-सा एक कुत्ता है। जब साहब चाय पीते हैं, कुत्ता उनके पास पहुँच जाता है। साहब पुकार उठते हैं, "भाई, वहाँ ब्रोनी को भी कुछ दे दो। ब्रोनी, बाहर जाओ (आँगन में मेरी ओर इशारा करते हैं, वहाँ मिलेगा)।" दीक्षित कुत्ता, साहब की सिफारिश उगाह लेने के लिए आँगन में आकर मेरी ओर देखने लगता है। मैं उसे साहब के बेबी का छोड़ा हुआ जूठा दूध या कभी-कभी (उसी के लिए) मँगाया गया सैपरेटा का दूध और एक-आध बिस्कुट साहब के घरु नौकर बुद्ध (बुद्धसेन) से माँगकर देता हूँ।

जब मेरी बीवी साहब के घर आती है और यदि मैं कत्ते को दूध पिलाता होता हूँ, मेरा ध्यान कुत्ते से हटकर उनकी बीवी और अपनी बीवी के बेतरतीब-बेमतलब कहकहे “हँसी-मज़ाक” । साहब मेरी बीवी से समाज-सेवा के संबंध में कोई बात छेड़ देते हैं। कुत्ता मेरे हाथ-पैर चाटकर ध्यान वापस बुला लेता है, जैसे समझा रहा हो—”भाई, सेवा कर सेवा" मेरी, अपने साहब की वे बड़े आदमियों की बातें हैं, तुम उसमें क्या लोगे? मेरी आँखों के सामने किसी बड़े-से अपरिचित समाज का धुंधला चित्र उभरता है और धीरे-धीरे सारा समाज दो आकृतियों में सिमट जाता है-एक कुत्ते की, दूसरी साहब की।

कभी सुनाई देता है-मेरी बीवी साहब और उनकी बीवी से अपने पति की प्रशंसा कर रही है, “मेरे पति बहुत अच्छे हैं, उदार विचार के, मॉडर्न" मुझे पूरे अधिकार दिए हैं बराबर के ही नहीं, उससे भी ज़्यादा उससे भी बड़े।"
साहब की धीमी, दबी-सी आवाज सुनाई देती है, जैसे अपनी बीवी की नजरें बचाकर कह रहे हों, “यही“ यही तो चाहिए वाकई आपके पति बहुत नेक इंसान हैं।"

साहब की बीवी टोक देती है, “अजी, इंसान नहीं, फरिश्ता कहिए, फरिश्ता बहन जी, कभी हमें भी दर्शन कराइए कभी यहाँ भी लाइए न!" और और पल-भर मुझे लगता है—दिन-रात घट-बढ़ रहे हैं, ऋतुएँ बदल रही हैं आगे कुछ नहीं सुन पाता। कुत्ता फिर मेरे हाथ-पैर चाटने लगता है।

मैं लगभग दो साल से साहब के घर फाइलें ला रहा हूँ, फिर भी यही लगता है, जैसे नई जगह आ गया हूँ, जहाँ मुझे कोई नहीं पहचानता।

उस घर का असर ही कुछ ऐसा है कि वहाँ मेरी बीवी भी मुझे नहीं पहचान पाती। हाँ, पहचानता है तो वही कुत्ता, जिसका मैं आदर करता हूँ, जिससे मेरी भावात्मक आत्मीयता हो गई है।

मैं जब साहब के घर से फाइलें लेकर काफी रात गए अपने घर लौटने लगता हूँ, कुत्ता पंजे उठा-उठाकर हाथ मिलाता है, गुड नाइट कहता है, गले मिलता है। मैं प्रसन्नता से भर उठता हूँ। लगता है, जैसे साहब भी हाथ मिला रहे हों, गले मिल रहे हों। फिर सोचता हूँ—मैं भी कितना मूर्ख हूँ, भला साहब ऐसा क्यों करने लगे? साहब कुत्ता थोड़े ही हैं।

कुत्ता मुझे अपना दोस्त मानता है। प्यार करता है, प्यार माँगता भी है। कभी-कभी आँख बचा मेरे गाल चाटकर चूम लेता है। क्या करूँ? मुझे प्यार करना ही पड़ता है। मेरे लिए उसका दिल तोड़ना, साहब का दिल तोड़ना बराबर है।

मैं जिस तरह साहब को नाराज़ करके नौकरी नहीं कर सकता हूँ, उसी तरह उसे (कुत्ते को) नाराज़ करके नौकरी नहीं कर सकता और मुझे नौकरी करनी है। अगर नौकरी नहीं करूँगा तो क्या इतनी सम्मानित, प्रसिद्ध समाज-सेविका का निखट्टू आवारा शौहर होकर भरे समाज में बीवी की नाक काटूँगा? उसकी शान-शौकत और इज़्ज़त की पीठ पर झाड़ मारूँगा?

अब मैं उस कुत्ते को सचमुच प्यार करने लगा हूँ। उससे अपनी कोई बात नहीं छिपाता।

साहब के घर अकेला कुत्ता ही जानता है—वह औरत, जो समाज-सेविका है, जिसके आदर में साहब मझसे भी एक हाथ छोटे लगते हैं, जिसके आने पर मैं कुत्ते की ओर ध्यान नहीं दे पाता मेरे कान, जिसके चाय की चुस्कियों पर नाचते कहकहे सुनते रहते हैं और जिसे देखकर मेरे मुँह की लार मेरी आँखों में आ जाती है मेरी बीवी है। यह बात वहाँ और कोई नहीं जानता। उस बेजुबान कुत्ते के जानने न जानने से मेरा या मेरी बीवी का बनता-बिगड़ता ही क्या है? इसीलिए उसे मैंने स्वयं सब कुछ बता दिया है। यद्यपि उसकी छोटी-छोटी पनीली आँखों में हमेशा एक अविश्वास, एक संदेह तैरता है। मैं कभी उसकी आँखों में नहीं झाँकता।

मेरा वह दोस्त, कुत्ता, कभी नहीं पूछता—मैं अपनी बीवी के साथ बैठकर चाय क्यों नहीं पीता? वह क्यों नहीं बताती कि मैं ही उसका ‘फरिश्ता' शौहर हूँ? वह जानता है। आखिर क्यों न जाने? मेरे साहब का कुत्ता होकर इतनी मामूली-सी बात भी नहीं जानेगा?

वह जानता है—मेरी बीवी मुझे अपना पति बताकर मेरे मुँह पर तमाचा कैसे मार दे? भला कोई हिंदुस्तानी औरत अपने पति के मुँह पर तमाचा मार सकती है? वह मेरी बेइज्जती नहीं कर सकती। मेरी बेइज्जती, उसकी बेइज्जती है। अपने हाथों अपनी बेइज्जती कैसे कर ले?

वह यह भी जानता है—साहब मुझे इतनी बड़ी समाज-सेविका महिला का शौहर जानकर मामूली-सी नौकरी मेरी शान के खिलाफ समझेंगे “और” और मैं निखट्टू, आवारा हो जाऊँगा, भरे समाज में बीवी की नाक काटूँगा, उसकी शान-शौकत और इज्जत की पीठ पर झाड़ मारूँगा “जो मैं पसंद नहीं करता, जिसे वह नहीं पसंद करेगी। फिर भला कैसे कह देती कि”

वह यह भी जानता है—मेरी बीवी पढ़ी-लिखी, समझदार है और कोई भी समझदार बीवी अपना, अपने घरवालों का अपने हाथों नुकसान कैसे कर सकती है? उनकी बदनामी कैसे सह सकती है? मुझे उसका पति जानकर मेरे साहब (गलत होते हुए भी) शायद उससे कहेंगे, 'हम चंदा समाज-सेवा के लिए देते हैं, किसी का घर चलाने के लिए नहीं।'

साहब की बीवी, चोट खाई पागल कुतिया की तरह, उसे काटने को दौड़ेगी। अपनी और मेरी बीवी की जान-पहचान के हर बँगले की बीवियों के सामने ज़ोर-ज़ोर से, फटी-फटी, भद्दी आवाज़ में भौंकेगी, 'यह चार सौ बीस है-इसे जेल भिजवाना चाहिए।'

मेरी बीवी आज जो कुछ अपनी इच्छा से करती है, शायद तब वही सब उसे अपनी अनिच्छा से करना पड़ेगा, क्योंकि समाज-सेवा के बिना उसका खाना ही हजम नहीं होता।

और वह यह भी जानता है—यदि मेरी बीवी बता ही दे कि मैं ही उसका पति-शौहर हूँ, तो अब विश्वास भी कौन करेगा? भला एक अदना नौकर, एक कुत्ते का (तब दोस्त नहीं) नौकर, इतनी सम्मानित समाज-सेविका महिला का शौहर कैसे हो सकता है? लोग हँसेंगे। क्यों न हँसें? यह भी कोई गंभीरता से सोचने, स्वीकार करने और विश्वास करने योग्य बात है? साहब क्या, मामूली से मामूली आदमी भी विश्वास नहीं करेगा। कहेगा, 'भाई, बड़ों के मज़ाक भी बड़े होते हैं। फिर वह विश्वास न करने योग्य सच्ची बात अपनी बड़ी ज़बान से कैसे कह दे? वह अपनी बात का वज़न जानती है

अब वह कुत्ता काफी समझदार हो गया है। जब भी मेरी बीवी आती है, कुत्ता संभवतः साहब के आदर में या मेरे परिचय की गहराई जाहिर करने के लिए सहानुभूति में, उसके पास चला जाता है। मेरी बीवी उसे गोद में बैठा लेती है और प्यार से आहिस्ता-आहिस्ता उसके सिर और पीठ पर अपना कोमल हाथ फिराती है तो मेरी पीठ और सिर के बालों में कुछ होने-सा लगता है। मुझे बुरा लगता है कि इस गोद में वह मेरे या अपने बच्चे, 'मुन्ना' को लेकर कभी इतना प्यार नहीं करती, जितना उस कुत्ते को करती है। फिर सोचता हूँ—होगा, वह मेरा या उसका और इंसान का बच्चा थोड़े ही है। वह मेरे साहब का बच्चे से भी अधिक प्यारा कुत्ता है। तब मुझे अपनी बीवी पर शायद गर्व अनुभव होने लगता है। लगता है, मेरी बीवी ने गर्व का सही-सही अहसास कराने के लिए मेरी हमेशा झुकी रहने वाली गर्दन सीधी करके और खींचकर साहब की छत से बाँध दी है। लेकिन, न जाने क्यों, उस रात घर जाकर मैं अपने मुन्ने को किसी न किसी असली या अकली बात के लिए पीटता अवश्य हूँ।


कुत्ता मेरी बीवी की गोद में चुपचाप बैठा ही नहीं रहता, मुँह उठाकर उसका मुँह, गाल, नाक, कान चाटने लगता है। जैसे जानना चाहता हो—मेरी और मेरी बीवी की त्वचा का स्वाद-गंध एक-सा ही है, एक-दूसरे में घुला-मिला और क्या वह सचमुच मेरी ही बीवी है? फिर न जाने क्या सोचकर चुपचाप, मुँह लटकाए, गंभीर मुद्रा में मेरे पास आ जाता है और अपने कान-पूँछ हिलाने लगता है।

मेरे मन में एक टीस-सी अनुभव होती है। इसलिए नहीं कि वह मेरी बीवी नहीं है, मेरी तो बीवी है ही, मेरे लिए इसमें संदेह या अविश्वास की कोई बात नहीं। टीस सिर्फ इसलिए होती है कि वह मेरा दोस्त और विश्वासपात्र होकर भी विश्वास नहीं करता।

मैं उदास मन से कुत्ते को समझाने लगता हूँ। न जाने क्यों, मुझे अपनी बीवी को भी बीवी कहने के लिए अपने उस दोस्त के सामने बार-बार यह कहना पडता है. 'सच मानो, वह मेरी बीवी है।’ लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता नहीं हटती, मेरी उदासी दूर नहीं होती।

कुछ सोचकर कुत्ता मेरी बीवी के पास फिर चला जाता है। अगले पंजे सोफा-कुर्सी की बाँह पर रख लेता है और कुछ उचककर उसके कानों के पास कूँ-कूँ करता है, जैसे मेरी उदासी न सहकर, दोस्ती और प्रेम की फर्ज़-अदाई के लिए मेरी बीवी को 'भाभी' कहा हो और मुझे समझा रहा हो, 'बुरा न मानो दोस्त, मुझे तुम पर विश्वास है।' फिर लौट आता है। मैं बिना उसकी आँखों में झाँके प्रसन्नता के उन्माद में उसे अपनी बाँहों में भर लेता हूँ।

रोज़ मैं दफ्तर चला जाता हूँ, बीवी समाज-सेवा के लिए निकल जाती है। मुन्ना दिन-भर पड़ोसिन चाची के बच्चों के साथ उन्हीं के घर खेलता रहता है। पड़ोसिन चाची मेरी रिश्तेदार भी हैं।

कल सबह. तडके ही बीवी काम से जाने लगी तो मझसे कहती गई, "सुनते हो, दाल-चावल चढ़ा दिए हैं, उतारकर खा लेना, मुन्ना को खिला देना। मैं शाम तक लौट सकूँगी।"

मैं मुन्ना को चाची के घर छोडने गया तो चाची बोली, "बेटा, आज हम सब देहात जा रहे हैं। न हो, मुन्ना को साथ ही लेते जाओ।"

क्या करता? कपड़ों का पता नहीं कहाँ रखे थे? ढूँढ़ने में देर होती, फिर भी मिलते या न मिलते, इसलिए मुन्ना जैसे भी कपड़ों में था, उन्हीं में उसे ऑफिस लेता गया।

रास्ते-भर चाची पर भुनभुनाता गया—आखिर इन्हें भी आज ही देहात याद आया। जाना ही था, पहले बता देतीं, कम से कम मुन्ना को कपड़े तो पहना देता।

ऑफिस के पास चपरासियों की कोठरियाँ हैं। मुन्ना को इकन्नी रिश्वत देकर दीनू चपरासी के बच्चों के साथ खेलने को राजी कर लिया। संध्या साहब के घर जाना पड़ गया। मुन्ना को कहाँ छोड़ जाता? साथ ही लेता गया। मेरे वहाँ पहुँचने के कुछ ही देर बाद मेरी बीवी भी आ गई। मैं मुन्ना को किचन में छोड़, साहब के नाम का हौवा उसके अल्हड़ मस्तिष्क में बैठाकर, ड्राइंगरूम में चाय देने चला गया। कुत्ता अपना हक माँगने आ पहुँचा। साहब ने ट्रे में से दो बिस्कुट मुझे देते हुए कहा-“बाहर दे देना। ब्रोनी, गो अवे।"

साहब की बीवी बोल पड़ी, “अरे, ऐ क्या नाम है किचेन में बेबी का छोड़ा दूध रखा है, ब्रोनी को पिला देना।"

मैं कुत्ते के साथ आँगन में आ गया और उसे दूध पिलाने लगा।

मुन्ना आकर मेरी गोद में बैठ गया था। कुत्ता उसे ध्यान से घूरने लगा। मैंने एक हाथ मुन्ने के सिर पर, दूसरा कुत्ते के सिर पर फिराकर जैसे बता दिया—यह मेरा बेटा मुन्ना है। कुत्ता मुन्ने की ओर पंजा उठाने लगा, जैसे आशीर्वाद दे रहा हो या नमस्ते कर रहा हो। कुत्ता कुछ सनक गया था। वह मुन्ना को चाटने लगा। मुन्ना मेरी गोद में सिमटकर रुआँसा हो गया था। कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से कान-पूँछ हिलाने लगा, मानो पूरे विश्वास से कह रहा हो, 'दोस्त, मानो चाहे न मानो, यह बच्चा तुम्हारा नहीं।' फिर ड्राइंगरूम की ओर, जिसमें मेरी बीवी बैठी थी, मुँह उठाकर इशारा-सा करने लगा, 'और न वह औरत ही तुम्हारी बीवी है। किसी की त्वचा का स्वाद-गंध एक-सा नहीं।

मैंने उदासी दबाकर, बड़े प्यार से कुत्ते को समझाया, “भाई, मैं पूरा मर्द हूँ, वह औरत है और यह बच्चा। तीनों की अवस्थाएँ और श्रेणियाँ अलग-अलग हैं। फिर त्वचा का स्वाद-गंध एक-सा कैसे हो सकता है?”

कुत्ता कान-पूँछ हिलाने के साथ-साथ कूँ-कूँ भी करने लगा, जैसे डाँटकर और ज़ोर देकर कह रहा हो, "चुप, झूठे कहीं के! मेरी जीभ और नाक झूठी नहीं हो सकती। मुझे दुनिया में उन पर सबसे अधिक विश्वास है, तुमसे भी अधिक । मैं नहीं मान सकता कि"

मैंने बहत समझाया, कसमें खाईं, लेकिन उसके कान-पूंछ का हिलना बंद न हुआ।

उसी समय, असावधानी या घबराहट में मुन्ना का दायाँ पैर कुत्ते के दूध वाले तसले में गिर गया। कुत्ते ने पैर में दाँत गड़ा दिए, जैसे मेरी बात पर बिलकुल विश्वास न हो, मुन्ना का खून मेरे खून से मिलाना चाहता हो। मुझे लगा—मेरे पैर में दाँत गड़ गए हों। क्रोध में मेरी फुकार छूट गई, जैसे कहा हो, 'इतना विश्वास!' और उठकर दूध का तसला कुत्ते के सिर पर दे मारा। कुत्ता के-कें करने लगा। मुन्ना की ऐं-ऐं और बढ़ गई।

मुन्ने का चीखना, कुत्ते का चिल्लाना और तसले की फन-फन सुनकर आतंकित-से साहब, साहब की बीवी और उनके पीछे-पीछे मेरी बीवी आँगन में दौड़ आई। मुन्ना की नज़र अपनी माँ पर पड़ गई। मेरी बीवी ने भी मुन्ना को देख लिया था। वह चौंक पड़ी, जैसे कुत्ते ने अचानक भौंककर उसे काट खाया हो।

मेरी आँखें मुन्ना और मुन्ना की माँ पर थीं, लेकिन सुन्न हो गए मस्तिष्क के अँधेरे प्रकोष्ठ में भी जैसे दिखाई दे रहा था—'के-कें' करता साहब का कुत्ता, उससे भी तेज़ भौंकती हुई-सी साहब और उनकी बीवी की भद्दी भयानक आँखें, आँगन में फैला कुत्ते की लार से चिपचिपाता सफेद दूध।

मुन्ना दौड़कर अपनी मम्मी की टाँगों से लिपट गया था। मस्तिष्क की सुन्नता में भी मुझे अपनी बीवी कुछ कमज़ोर लगी और छोटी भी—साहब से, साहब की बीवी से, अपने से, मुन्ना से, और शायद कुत्ते से भी अधिक छोटी। लग रहा था, जैसे जन्मजात रोगिणी हो या समाज-सेवा के लिए अपना पंसेरियों खून दान देकर आई हो। एक बार फिर अपने को बीवी से छोटा अनुभव किया।

साहब को देखकर कुत्ते का भौंकना बंद हो गया था।

मुन्ने की दम सधी। वह और जोर से अपनी माँ से लिपट गया। हिचकियों के स्वर में बोला, “मम्मी, मम्मी कुत्ते ने काट लिया।"

साहब और साहब की बीवी, उस समाज-सेविका महिला को, मुन्ना की माँ या मेरी बीवी के रूप में पहचानकर चौंक पड़े। मुझे लगा—उनके पिटे-पिटे, सूजे चेहरे मेरी ओर घूर रहे हैं। साहब का चेहरा विकृत, अनपहचाना हो गया था। उन लोगों की आँखें अविश्वास, आश्चर्य, घृणा या क्रोध में बिना किसी कारण विशेष के, बेतरतीब फैलकर और अधिक डरावनी लग रही थीं।

मेरी बीवी ने मुन्ने को झकझोरा, दो चाँटे लगाए और ऊबकर उठाए रद्दी के टोकरे की तरह बाँहों से झिंझोड़कर कमर पर पटक लिया। वह बिना किसी की ओर देखे, होंठ चबाती-सी तेज़ी से दरवाज़े की ओर मुड़ गई।

साहब और साहब की बीवी की आँखें और भी अधिक फटकर दरवाजे की ओर घूम गईं, घूमी रहीं, जैसे छिटककर मेरी बीवी की पीठ पर जा गिरी हों और उसे धक्के देकर कह रही हों, 'निकल जा, निकल जा।’
मैं जड़वत् खड़ा रहा। संभवतः उस समय, सीधी खड़ी तराजू के ज़बरदस्ती हिला दिए गए पलड़ों की तरह, दिन-रात तेजी से घट-बढ़ रहे थे “सारी ऋतुएँ एक साथ, एक ही बिंदु पर सिमटकर निःशब्द, निरपेक्ष, तेज़ गति से, बड़े-से धब्बे के रूप में बदल गई थीं।

सहसा, पैरों पर गुनगुने, चिपचिपे, कोमल स्पर्श ने मुझे चौंका दिया। नीचे देखा—साहब का कुत्ता मेरे पैर चाट रहा था, जैसे सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ कह रहा हो, 'माफ कर भाई, माफ करना दोस्त, मुझे पूरा विश्वास हो गया है—मुन्ना तुम्हारा ही बेटा है और वह औरत भी तुम्हारी ही बीवी है।'



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