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डीपीटी: देवी प्रसाद त्रिपाठी "वियोगी जी": साहित्य-जगत की एक बड़ी राजनीतिक शख़्सियत का अवसान — भूमिका द्विवेदी अश्क


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हाल ही में हिंदी को वर्तमान राजनीति में उसके सबसे बड़े साहित्यप्रेमी देवी प्रसाद त्रिपाठी के निधन का सामना करना पड़ा है.  प्रखर युवा कहानीकार भूमिका द्विवेदी अश्क के उनसे साहित्यिक व पारिवारिक सम्बन्ध रहे हैं, उन्हें याद करते हुए भूमिका ने डीपीटी का एक मार्मिक ख़ाका उकेरा है... स्व देवी प्रसाद त्रिपाठी जी को श्रद्धांजलि... भरत एस तिवारी

डीपीटी: देवी प्रसाद त्रिपाठी "वियोगी जी": साहित्य-जगत की एक बड़ी राजनीतिक शख़्सियत का अवसान

— भूमिका द्विवेदी अश्क


"जो तेरी बज़्म से निकला,
वो परीशाँ निकला..."

देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी यानी इलाहाबाद के "वियोगी जी" यानी मेरे 'देवी चाचा'!!

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता, कवि, संस्कृतिकर्मी और आम इलाहाबादी लोकप्रिय राजनेता डी पी त्रिपाठी का नये वर्ष के दूसरे ही दिन, गुरुवार 2 जनवरी, 2020 को राजधानी दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद ये फ़ानी दुनिया छोड़ गये। वह 67 वर्ष के थे। वह कई सालों से कैंसर से जूझ रहे थे।

नीलाभ जी की पहली बरसी में रखी गई 'स्मृति सभा' का निमंत्रण पत्र जब जुलाई 2017 को मैं उन्हें देने गई थी, तब भी वो बहुत बुरे हाल मे थे। श्वास नली लगाये हुये, हाथ में मनोहर पर्रिकर सर जैसे ग्लूकोज़ की बोतल लिये उनको देखकर एकबारगी मैं सहम गई थी। इतना दुर्बल मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था।

कहीं बाहर निकलने को तैयार, जब अपने शयनकक्ष से निकलकर ड्रॉइंग-रूम में मेरे पास आकर बैठे, निमंत्रण-पत्र देखकर बोले, "तेईस तारीख़ को यही दिल्ली में रहूँगा...आई.आई.सी. भी नज़दीक ही है, मैं आ जाऊँगा.. तुम्हारे लिये कॉफी बनाने को कह दिया है.. जब तक पियोगी, मैं लौट आऊंगा.. बस एक साइन मारकर लौट आना है.. मुश्किल से दस मिनट लगेगा..."

"अगर कॉफी ख़त्म होने तक आप न आये, तो मैं चली जाऊंगी..." कहते कहते मैं और गंभीर हो गई।

"पक्का..." हाथ मिलाकर वो तेज़ कदमों से अपने सांसद आवास, डी 13 फ़िरोज़शाह रोड से बाहर निकल गये। ये वो दर था, जहाँ कोई भी उनसे कैसी भी मदद लेने दिन के चौबीस घण्टे जा सकता था। मैं भी हमेशा बिना इत्तिला दिये न जाने कितनी बार गई थी।

उस रोज़ मानसून सत्र की अनिवार्य उपस्थिति दर्ज करने वो मुझे डायनिंग-टेबल पर सख़्त हिदायतों के साथ बिठा कर गये थे। उन्होंने अपने हंसमुख किशोर कुक को भी कठोर आदेश दिया कि, "इस पण्डिताइन को कुछ न कुछ खिलाते-पिलाते रहना, वरना ये उठकर चली जायेगी... तुम तो इसका सुभाव जानते हो..."


उनकी कार की आवाज़ आते आते कॉफी का मग और उनकी एक बुज़ुर्ग नर्स मेरे सामने आ गई थी।

बताने लगी, "अपने चाचा को बदपरहेज़ी से रोकिये... ही इज़ इन अ क्रिटिकल मोड नाओ.."


"...आई विल ट्राई माय बेस्ट..." कहकर मैंने भी अपने ड्राइवर को आवाज़ दी।

मेरी कार अभी मंडी हाउस से कुछ कदम आगे बढ़ी ही थी कि मेरा मोबाइल फोन बजने लगा।

नाराज़गी स्पष्ट थी, ".... तुम इतनी ज़िद्दी लड़की हो, जिसकी कोई लिमिट ही नहीं.. कॉफी तक नहीं पी हो.. मैं कितना हड़बड़ाकर लौटा हूँ सदन से, तुम्हें क्या मालूम...?"

"मुझे नीलाभ जी याद आ रहे थे.. पिछली बार तो हम दोनों साथ आये थे आपके घर..." मैंने कुनमुनाते हुये अपने लौटने की वजह बताई।


"... और उसके भी पिछली बार, जब तुम्हारे हाथ में फ्रैक्चर था.. जब प्लास्टर समेत आईं थीं.. तब का कुछ याद नहीं आया.. कितनी तक़लीफ़ में थीं तुम.."

फिर हम दोनों फोन पर ही इतिहास के पन्ने पलटने लगे। अश्क साहब, माता कौशल्या जी, नीलाभ जी समेत मेरा पूरा मायका, मेरी लिखी कहानियां (तब तक मेरी कोई किताब प्रकाशित नहीं हुई थी..), इलाहाबाद, जनेवि भी उन पन्नों में बार-बार फड़फड़ाता रहा।
बेशक मैंने नीलाभ जी से अपनी मर्ज़ी से, घर में बिना किसी को बताये शादी की थी। मैं तो दिल्ली पढ़ने आई थी। लेकिन देवी चाचा ही वो शख़्स थे जिन्होंने मायके के हर फ़र्ज़ बिना कहे ताउम्र निभाये।

जब उन्होंने मेरे हाथ टूटने की ख़बर सुनी, उस वक़्त भी उनका फोन आया, "क्या ये जो मीडिया में ख़बरें आ रहीं हैं... वो सब सच है...?"

मैं चुप रही।

वो फिर बोले, "कल सुबह गाड़ी भेज रहा हूँ घर आओ..."

मेरा प्लास्टर वाला हाथ देखकर वो बहुत ज़्यादा परेशान हुये, एक पिता जैसे, एक अभिभावक जैसे, एक हमदर्द जैसे, परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य जैसे।

उन्होंने तत्काल तत्कालीन महिला आयोग की अध्यक्षा को फोन लगाया।

नीलाभ जी भी आये।

सारा मामला वहीं उसी फ़िरोज़शाह रोड वाले मकान में चुटकियों में सँभाल लिया गया।

मैं अपने ताज़िन्दगी याद रखे जाने वाले अनुभवों के आधार पर कह सकती हूँ, देवी चाचा, मेरे सर पर एक पितृवत् वरद्हस्त थे।

कुछ समय पहले ही मालूम हुआ रिटायरमेण्ट के बाद वो फ़िरोज़शाह रोड वाला मकान छोड़कर, बसंत कुंज वाले फ्लैट में रहने लगे हैं। वहाँ भी बहुत बार तय हुआ मिलना, लेकिन मैं कभी जा नहीं सकी। महज एक बार १, केनिंग रोड (पंडित रवि शंकर मार्ग) जहाँ एनसीपी का दफ़्तर था, वहीं मिली। भारतीय ज्ञानपीठ से आये मेरे दूसरे उपन्यास (किराये का मकान) के प्रकाशन की ख़ुशी में वो मिठाई लिये बैठे थे।

 नीलाभ जी के बग़ैर अकेले, मेरा आना-जाना बेहद सीमित हो गया था। मेरा कहीं भी, जी नहीं लगता था।

हालांकि देवी चाचा मेरे जन्म से बहुत पूर्व भी मेरे संबंधी रहे।

घर के लोगों ने बताया, मेरा जन्म नब्बे के जिन प्राऱभिक वर्षों में हुआ, देवी चाचा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से विदा लेकर दिल्ली में एक स्थापित नेता हो चुके थे। मेरे जन्म का सुनकर दिल्ली से खिलौने वाली एक बैटरी से चलने वाली गुड़िया लेकर इलाहाबाद में नेता जी की 'लाल कोठी' (यानी मेरे पिता के आवास) आये थे। मुझ एक लगभग तीन माह की संतान को बहुत दुलार से देखते रहे, सिर पर आशीष भरा हाथ फेरते रहे, एक फांउटेन पेन भी मेरे बगल में रख गये। पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि मेरे पितामह, जो कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में देवी चाचा के शिक्षक भी रहे, उनसे कह गये, "...कुछ बड़ा बनेगी ये.. देख लीजियेगा"।

उनके यूँ तो तीन बेटे हुये, लेकिन बेटी का चाव उन्हें सदा रहा।

कालान्तर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के अध्यापक नियुक्त होने पर मेरे कई सगे-संबंधियों को पढ़ाया भी।

बड़े प्यार दुलार और हड़क के साथ नीलाभ जी उलझ जाते थे, "परम आदरणीय नीलाभ भाईसाहब पूरी दुनिया में आपको यही एक लड़की मिली थी विवाह योग्य....?? अरे सर आप ही कहिये, जिसकी बरहीं छट्टी मेरे सामने हुई हो, जिसका जन्म मेरे सामने हुआ हो... पूरी दिल्ली में ये अकेली बिटिया थी, जो मुझे इतने स्नेह से 'देवी चाचा' पुकारती थी... उन्हें भाभी कैसे कहूँ... किस मुँह से कहूँ... और आप, साहित्य जगत के ख़ानदानी पुरोधा लोग..  अनगिन बार रहा हूँ आपके यहाँ.. न जाने क्या कितना खाया पिया होगाआपके दर पर... अब आपको दामाद कैसे कह दूँ...."

उस रोज़ देवी चाचा बहुत सुरूर में थे। हम लोगों को लौटने नहीं दे रहे थे। सोफे पर बैठे हुये नीलाभ के पास ज़मीन पर बैठ गये थे, ज़ोर ज़ोर से गा रहे थे, "अभी ना जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं..." कभी नीलाभ जी के घुटनों पर अपना सर टिका लेते, कभी गिलास लुढ़का देते। एक से बढ़कर एक जानदार शेर पर शेर उछाल रहे थे। हम लोग मुस्कुराते हुये कभी उन्हें, कभी एक दूसरे को देखते रहे।

हम सभी लोग आई आई सी डायनिंग-हॉल में सैकड़ों बार मिले। फ़ैज़ विशेषांक, "थिंक इण्डिया" के लोकार्पण समारोह में फ़ैज़ साहब की बेटी मुनीज़ा हाशमी से भी मुझे उन्होंने ही परिचित कराया। बोले, "ये भूमिका है, ग़ालिब की दीवानी, इलाहाबादी और जेएनयू-प्रॉडक्ट... मुनीज़ा जी कुछ नशा उतारिये इन मैडम का..."

हम लोग कई बार और भी देवी चाचा से मिलने उनके उसी घर गये। कभी अंग्रेजी के प्रोफेसर सचिन तिवारी सर से हाल लेने, कभी मेरे मायके से आये लोगों से मेरे लिये लाये गये मेरे पसंदीदा इलाहाबादी अमरूद या गजक या 'लकी स्वीट हाउस' के संदेश (बंगाली मिठाई) लेने। दरअसल ये सब दिल्ली में देवी चाचा के यहाँ ही ठहरते थे। लड़की के घर का पानी उन सबों के लिये हराम जो था। सभी परंपरा निभा रहे थे। जैसे वे ख़ुद कई सारी परिपाटियाँ एक साथ आगे बढ़ा रहे थे।

देवी प्रसाद त्रिपाठी सोलह साल की उम्र में ही राजनीति में शामिल हो गए और पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी के सहयोगियों में से एक बन गए। बाद में उन्होंने सोनिया गांधी के विरोध में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और वह 1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। और इसी NCP के आजीवन महासचिव एवं मुख्य प्रवक्ता रहे। सबसे पहले वह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ जुड़े और उनकी राष्ट्रीय एकता यात्रा के आयोजकों में शामिल रहे लेकिन जल्दी ही वह उनसे भी अलग हो गए और राजीव गांधी के क़रीब पहुंच गए. इतना क़रीब कि एक ज़माने में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले राजीव गांधी डीपीटी को ज़रूर याद करते थे. लेकिन डीपीटी और राजीव जी का साथ लंबे समय तक नहीं रह पाया।

वैसे तो वह शुरू से ही राजनीतिक प्राणी थे और पहले माकपा के छात्र संगठन एसएफआई और बाद में व्यापक वामपंथी छात्र एकता के हिमायती रहे लेकिन प्राध्यापकी छोड़ने के बाद उनकी सोच में भारी बदलाव हुआ. कई वर्षों तक वह नरसिंह राव के साथ रहे और दूर हुए तो कांग्रेस से इतने दूर चले गए कि विदेशी मूल के मसले पर डीपीटी शरद पवार और पीए संगमा के क़रीब पहुंचे। उन्हीं सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ खड़े हो गए जिनके साथ एक ज़माने में राजीव गांधी के चलते घर जैसी निकटता रही थी. आख़िर तक डीपीटी शरद पवार के ही साथ रहे और एनसीपी ने ही उन्हें राज्यसभा में भी भेजा।

दक्षिणी दिल्ली का लुटियन ज़ोन उन्हें डीपीटी के नाम से जानने लगा था.

सुल्तानपुर के बेहद ग्रामीण परिवेश में सन् 1952 में जन्मे और उसी माहौल में पले-बढ़े डी.पी.टी. का असली नाम भले ही देवी प्रसाद त्रिपाठी था. लेकिन कई परम प्रिय मित्रों ने उन्हें कई और भी नाम दे रखे थे, जैसे वियोगी जी, गुरु जी, आचार्य जी इत्यादि।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद वह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू ) में पढ़े और वहां के बहुचर्चित छात्र संघ अध्यक्ष भी बने. जेएनयू से पढाई पूरी करने के बाद डीपीटी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में प्राध्यापक भी रहे. लेकिन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की प्राध्यापकी उन्हें अधिक रास नहीं आई और जल्दी ही उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी थी.

एक मज़ेदार ज़माना यह भी रहा, कि जिस मशहूर डीपीटी को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्र संघ के चुनाव में यूनियन के सबसे निचले पद प्रकाशन मंत्री के लिए कभी हराया था वही शख्स एक दिन जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष बन गया और कालान्तर में देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक दल को छोड़ नया दल सृजित किया।

उन्होंने 'थिंक इण्डिया' नामक त्रैमासिक पत्रिका सहित "भारत और ताइवान', 'सेलिब्रेटिंग फ़ैज़', 'भारतीय अर्थव्यवस्था', 'संक्रमण में नेपाल' एवं 'भारत चीन संबंध' का कुशल सम्पादन कार्य भी किया।

देवी प्रसाद त्रिपाठी भारत में बोली जाने वाली कई भाषाओं के अतिरिक्त कुछेक विदेशी भाषाएँ भी जानते थे।

डीपीटी में अद्भुत प्रतिभाएं थीं. वह एक साथ कम से कम हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, उर्दू, बांग्ला और कुछ दक्षिण भारतीय भाषाएं धारा प्रवाह बोल सकते थे. उनकी एक आंख क़रीब-क़रीब समाप्त थी लेकिन एक आंख से ही किसी भी पुस्तक को तेज़ गति से मिनटों में पढ़ कर पूरा कर देने में उन्हें महारत हासिल थी।

देवी त्रिपाठी जी का इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लगभग सभी उन छात्रों से अजीब किस्म की मित्रता का भी एक गहरा रिश्ता था, जो दिल्ली में आने के बाद तक यथावत बना रहा. उन्होंने नये लड़कों की हरसंभव, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, पत्रकारिता संबंधित सहायता लगातार की। कभी अहम आड़े नहीं आया। ग़ुरूर, घमंड, सस्ती राजनीति का दोगलापन कभी उन्हें छू भी ना सका।

 ख़ालिस उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की पैदाइश डीपीटी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव भी रहे थे। उनकी कविताभी उनके मित्रों, परिचितों, सहपाठियों के बीच लोकप्रिय रहीं। यही वजह थी कि 1971/72 में इलाहाबाद से प्रकाशित कविता-संग्रह ‘प्रारूप’ में दिनेश कुमार शुक्ल, कमलाकांत त्रिपाठी आदि कवियों के साथ देवी प्रसाद त्रिपाठी की कविताएँ भी संकलित हुई थीं।

इलाहाबाद से वे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए आये लोकप्रिय नेता 1973 में एस.एफ.आई. की ओर से जवाहरलाल विश्वविद्यालय में डंके की चोट पर छात्र-संघ के अध्यक्ष बने।  मीसा ऐक्ट के तहत त्रिपाठी जी की पहली बार 1975 में आपातकाल के दौरान गिरफ़्तारी भी इसी दौरान हुई और इसके चलते उनकीलोकप्रियता में स्वाभाविक इजाफा भी देखा गया।

उनकी तमाम विशिष्टताओं में एक लाजवाब याद्दाश्त भी थी. एक बार कोई भी किताब पढ़ने के बाद उसमें लिखी बातों की समीक्षा पेज नंबर तक बताते हुए कर लेते थे. विदेश नीति, कूटनीति, राजनीति से लेकर समाज विज्ञान और अर्थशास्त्र तक, साहित्य से लेकर समस्त ललित कला तक की लगभग हर विधाओं साहित्यिक विषयों, कृतियों तथा रचनाकारों पर पूरे अधिकार के साथ बोलते थे,

और देश दुनिया की हलचलों तक पर वह समान अधिकार से बहसें करते थे, उन पर लंबे भाषण देते थे। ये एक ग़ैर मामूली बात थी कि त्रिपाठी जी हर एक अनछुये विषय पर यहाँ तक कि मोहम्मद साहब की जन्मतिथि

 पर जेएनयू में आयोजित प्रोग्राम में लाजवाब व्याख्यान पेश कर दिया करते थे। जिन क़ुरान की आयतों को बड़े बड़े इस्लामिक ज्ञानी भी इतनी सहजता से ये नहीं समझा सकते जिस तरह वे अरब के समाज में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में, महिलाओं के अधिकार और क़बीलाई संस्कृति में पैग़म्बर के क्रांतिकारी योगदान के लिए उस वक़्त समझाने के लिए मक़बूल हुये थे।

 फ़िरोज़ शाह रोड का उनका आवास एक छोटी सी लाइब्रेरी में तब्दील हो गया था, पूरा गलियारे में किताबें करीने से सजी थीं, अब वहाँ नये सांसद का निवास हो गया है। लेकिन एक स्कॉलर एक लोकप्रिय नेता हरदिल अज़ीज़ विद्वान की ऐतिहासिक जीवनी का गवाह आज भी बना हुआ है।

त्रिपाठी जी के भूतपूर्व निवास से, उनके कैनिंग रोड दफ्तर तक, यहाँ तक की अंतिम सफ़र में लोदी रोड शमशान घाट तक उन्हें अनगिनत लोग विदाई देने आये।

 एनसीपी के तमाम बड़े नेता शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल से लेकर, वर्तमान रक्षामंत्री रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, सी.पी.आई. के डी राजा, दिनेश, सी.पी.एम. की वृंदा करात, कांग्रेस के संदीप दी़क्षित, आसिफ़ मोहम्मद खान शरद यादव तक भी पहुँचे थे।  उनके क़रीबी मित्रों में इलाहाबाद से लेकर जेएनयू के साथी, मीडिया जगत, साहित्यिक क्षेत्र सामाजिक कार्यकर्ता सभी तो विदा करने को एनसीपी दफ़्तर केनिंग रोड तक लगातार मौजूद रहे।

मेरे घर-ख़ानदान, बामन्ह-कुनबे में देवी चाचा, एकलौते व्यक्ति थे जिन्हें मेरा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाख़िला लेना पसंद आया था। बाक़ी सब तो ऐसा रियेक्ट कर रहे थे, गोया मुझसे कोई जघन्य पाप हो गया हो।

27 दिसम्बर 2019 को किसी घरेलू मामले में मैंने उन्हें फोन लगाया था। मालूम हुआ वो अस्पताल में भर्ती हैं। बहुत धीमी आवाज़ में बोले, "...गुड़िया अगले हफ्ते घर पंहुचकर कॉल करता हूँ।"

मैंने पूछा भी था, "...चिंता की कोई बाततो नहीं..."

"कैसी बात करती हो, क्या देवी चाचा को पहचानती नहीं..." वो धीमी से हंस दिये।

अगले हफ्ते ज़िन्दगी में ऐसा पहली बार हुआ जब पलटकर उनका फोन आया ही नहीं। जो कि अब कभी नहीं आयेगा....


"जाने वाला चला गया
ये दर, ये गलियाँ छोड़कर
याद करने वाले अब
उम्र भर रोया करें..."



भूमिका द्विवेदी अश्क,
नई दिल्ली
9910172903.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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