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दुःख या सुख कई जगहों से आता रहता है और जाता भी रहता है - शर्मिला बोहरा जालान

जन॰ 13, 2020


दुःख या सुख कई जगहों से आता रहता है और जाता भी रहता है - शर्मिला बोहरा जालान

समीक्षा: जयशंकर की प्रतिनिधि कहानियां

दुःख या सुख कई जगहों से आता रहता है और जाता भी रहता है। यह सब कुछ बहुस्तरीय चेतना से होता है जिन्हें मैं इन कहानियों में हर बार नए ढंग से पढ़ और समझ पाती हूँ। इन कहानियों के पात्र खूब आत्म मंथन आत्म विश्लेषण करते हुए , सोचते हुए पात्र हैं  और इस तरह ये कभी रूसी लेखकों की याद दिलाते हैं तो कभी  साठ के दशक के असाधारण लेखक अशोक सेकसरिया की कहानियों की...

हाल ही में जयशंकर जी की प्रतिनिधि कहानियां आधार चयन से आई है। ये कहानियाँ ‘शोकगीत’, ‘लाल दीवारों का मकान’, ‘मरुस्थल’, ‘बारिश ईश्वर और मृत्यु’ तथा ‘चेंबर म्यूजिक’ शीर्षकों से आये कहानी संग्रह में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन कहानियों को समय-समय पर पढ़ती रही हूँ और वे अच्छी लगती रहीं हैं। इनके अच्छे लगने के कारण को बता पाना कठिन है। हो सकता है कोई स्मृतियाँ हों, देखा सुना कुछ भी हो सकता है। जो भी हो पढ़ने से सुख मिला है। सुख मिलने का कारण यह भी हो सकता है कि  ये कहानियां किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, और जिज्ञासा बनाये रखती हैं। इनमें निष्कर्ष का प्रतिरोध है।

कहानी का जन्म भी क्या इसी जिज्ञासा को बनाये रखने के कारण नहीं हुआ है? ‘अरेबियन नाईट्स’ में शहरजाद बादशाह को कहानियां इसलिए सुनाती चली जाती है कि अगर वह  सुनाना बंद कर दे, उसे मौत के घाट उतार दिया जायेगा । वह कहानी को ऐसे मोड़ पर छोड़ती थी कि बादशाह की जिज्ञासा बनी रहती थी और वह उसे मारता नहीं था। निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाना और जिज्ञासा बनाये रखना कहानी कला का क्या एक गुण नहीं है?

‘प्रतिनिधि कहानियां’ के माध्यम से इन्हें फिर से पढ़ पाना, इनमें लौटना कई-कई तरह के सुख के संसार में लौटना है। यह अकारण नहीं है कि पर्यवारणविद अनुपम मिश्र ‘चेम्बर म्यूजिक’ के ब्लर्ब में कहते हैं - “इन कहानियों के पात्र,घटनाएँ ठीक उन्हीं की तरह हमारे भी चारों और बिखरी पड़ी है। पर हम इन घटनाओं और पात्रों के आर पार नहीं देख पाते। जयशंकर इनके आर पार देख सकते हैं और फिर वे इनको अपनी कलम से उठाकर हमारे सामने कुछ इस तरह से रख देते हैं कि लो हम भी इनके आर पार देखने लग जाते हैं ।”

इन कहानियों में  मानवीय रिश्तों की जांच पड़ताल, रिश्तों के अकथनीय और जटिल होने की विडम्बना, रिश्तों को समझने समझाने की लहुलूहान करती कोशिशें, मन को गहरे तक प्रभावित करती रही है । मैने इनको पढ़ते हुए यह पाया है कि इन कहानियों के पात्रों के अंदर दुःख सुख बहुस्तरीय  ढंग से आते रहते हैं । पात्रों को लगता है कि दुःख  यहाँ से आया है या वहां से आया है पर ऐसा नहीं है। कभी-कभी आता भी होगा। पर वह दुःख या सुख कई जगहों से आता रहता है और जाता भी रहता है। यह सब कुछ बहुस्तरीय चेतना से होता है जिन्हें मैं इन कहानियों में हर बार नए ढंग से पढ़ और समझ पाती हूँ। इन कहानियों के पात्र खूब आत्म मंथन आत्म विश्लेषण करते हुए , सोचते हुए पात्र हैं  और इस तरह ये कभी रूसी लेखकों की याद दिलाते हैं तो कभी  साठ के दशक के असाधारण लेखक अशोक सेकसरिया की कहानियों की भी जिनकी मैं मुरीद हूँ।

सभी कहानियों के शीर्षक हटा दिए जाएँ तो यह एक ऐसा कोलाज है जो कि  उपन्यास लगता है। जिसमें जीवन के कई शेड्स हैं । पात्रों में बाहर सब कुछ ठीक ठाक लगता है पर अंदर ही अदर कुछ रिसता रहता है। कुछ पात्र तो परिस्थितयों की वजह से अकेले रहते हैं पर कुछ परिस्थितियां कैसी भी रहे अकेले ही रहते हैं । इनके  विश्वास कभी अविश्वास में बदलते हैं तो कभी अविश्वास विश्वास में । ये मार्मिक किस्म की विकलताओं से गुजरते रहते हैं । कभी ऐसा भी लगता है कि आदमी अपनी खोल से ही बाहर  निकल गया है। एक तरह के  आत्म निर्वासन में । जयशंकर की कहानियों पर ‘लाल दीवारों का मकान’ के ब्लर्ब में  आलोचक मदन सोनी कहते है-“पाठक इन कहानियों में शायद एक खास चेहरे को लक्ष्य करेंगे। अपने अस्तित्व का एहसास कराता चेहरा।”

इन कहानियों में जो जीवन है वह काफी आत्ममंथन से गुजरता रहता है। इसके उदाहरण स्वरुप ‘कोई ऐसी कहानी’ को याद करती हूँ तो इसके समानांतर ‘मृतकथा’ कहानी भी सामने आ जाती  है । ‘कोई ऐसी कहानी में’ माँ लेखक है और लड़का माँ जैसी कहानियां लिखना चाहता है और माँ को लगता है कि वह खुद बहुत अच्छी कहानी नहीं लिखती हैं । वह अपने बेटे को कहती है-“पर लिखते-लिखते ही तुम अच्छा लिख सकोगे।” माँ का हर समय सोचना इस बात को फिर से याद दिलाता है कि इन कहानियों के पात्र सोचते हुए पात्र है। यहाँ मन के अंदर सोचने की, आत्म मंथन की प्रक्रिया चलती रहती है। इसमें जो अंतर्द्वंद है वह लगभग सभी कहानियों का मूल स्वर है।

जयशंकर के पास वे आँखें हैं जो स्त्री मन की बारीकियों को देख पकड़ पाती है  । इन कहानियों का सघन असर हुआ है, होता है। कहानियों में आते हुए कई लेखक, संगीत, पेंटिंग और बिल्ली जीवन को भरापूरा बनाते हैं

इन कहानियों को पढना जीवन जगत को जानना तो है ही , स्वयं को भी जानना है।इनमें आते  सूक्ष्म विवरण और बारीकियाँ मेरे कहानी लिखने की यात्रा में मुझे ऐसे संसार में ले जाती हैं जो आसपास तो है पर अलक्षित है । इनको पढ़ते हुए उस अमूर्त जगत पर आलोक पड़ता है जो हमारे अंदर  स्मृतियों और अवशेषों के रूप में दबा छुपा हुआ है।

अगर यह पुस्तक एक उपन्यास है तो इसका मुख्य पात्र न लिख पाने,जो लिखा वह अच्छा न लिख पाने के संदेहों से घिरा हुआ है।

अंत में निर्मल वर्मा ‘मरुस्थल’ के ब्लर्ब में जयशंकर की कहानियों पर जो कहते हैं वह लिखते हुए अपनी बात को विराम दूँगी। वे लिखते हैं -
"सारे दुख एक तरह की अवधारणाएं हैं । हम सब अपनी अवधारणाओं की वजह से दुख भोंगते हैं । "

यह एक वाक्य जयशंकर की कहानियों के बीच बिजली की कौंध की तरह चमक जाता है- एक तरह से उनकी लगभग सब कहानियों को चरितार्थ करता हुआ। धारणाएं सच या झूठ नहीं होतीं-- वे आत्मावंचनाएं होती हैं मनुष्य को अपने अनूठे सत्य से भटकाकर एक 'औसत ' यथार्थ में अवमूल्यित करती हुई।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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