रघुवीर सहाय की 5 बेहतरीन अंतिम कविताएँ


रघुवीर सहाय की ये 5 बेहतरीन अंतिम कविताएँ

उनके मरणोपरांत प्रकाशित अंतिम कविता संग्रह 'एक समय था' से हैं.

संग्रह के संपादक सुरेश शर्मा लिखते हैं: 

"इसमें अधिकांश कविताएँ उनके जीवन के आख़िरी चार-पाँच वर्षों की हैं जो कि ज्यादातर अप्रकाशित हैं। सहायजी के निधन के बाद उनके लेखन-कारखाने के तमाम कागज़ों, डायरियों और चिट-पुजों पर दर्ज उनके आलेख को पढ़ने की कोशिश की गई। उन आलेखों में ज्यादातर कविताएँ थीं। यह संग्रह उन्हीं कविताओं का संकलन है। सहायजी की काव्य सर्जन-प्रक्रिया शुरू के वर्षों में सुनियोजित थी। लेकिन धीरे-धीरे उनकी काव्य रचना-प्रक्रिया की यह व्यवस्था टूटने लगती है। उन्हें जहाँ भी और जब भी काव्य-सत्य हासिल होता है वे तुरंत उसे वहीं दर्ज कर लेते हैं। बाद में इन काव्य टुकड़ों को जस-का-तस रहने देकर या बड़ा या छोटा करके वे कविताएँ संभव करते हैं। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सहायजी ने रचने की यह प्रक्रिया अधिक अपनाई है। इसलिए ये कविताएँ किसी कापी में लिखी हुई नहीं मिलीं। ये निमंत्रणपत्रों की सादी पीठ, लिफ़ाफ़ों के रिक्त स्थान, दूतावासों के सूचना पत्रों, यहाँ तक कि सिगरेट की डिब्बियों पर भी लिखी हुई प्राप्त हुई। रघुवीर सहाय का कवि हर क्षण सक्रिय रहता था। जयप्रकाश नारायण से वे साक्षात्कार ले रहे हैं और नोटबुक में उसे लिख रहे हैं। जेपी से बातचीत के बीच नोटबुक पर अचानक एक गोल घेरा बना मिलता है जिसमें काव्य पक्तियों दर्ज हैं। फिर आगे साक्षात्कार"। यह प्रक्रिया इस बात का सबूत है कि वे पत्रकारिता के बीच भी एक कवि की हैसियत से निरंतर सक्रिय और सचेत रहते थे...

इन पाँच के अलावा कई और पाँच कविताएँ राजकमल प्रकाशन से छपी इस संग्रहणीय किताब में हैं...कभी हुआ तब और यहाँ शब्दांकन पर लगाया जाएगा.

भरत एस तिवारी


एक समय था
रघुवीर सहाय
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :152


पहले बदलो

उसने पहले मेरा हाल पूछा
फिर एकाएक विषय बदलकर कहा आजकल का
समाज देखते हुए मैं चाहता हूँ कि तुम बदलो

फिर कहा कि अभी तक तुम अयोग्य
               साबित हुए हो

इसलिए बदलो,
फिर कहा पहले तुम अपने को बदलकर दिखाओ
              तब मैं तुमसे बात करूँगा।

1980





लोकतंत्र का संकट

पुरुष जो सोच नहीं पा रहे
किंतु अपने पदों पर आसीन हैं और चुप हैं
तानाशाह क्या तुम्हें इनकी भी ज़रूरत होगी
जैसे तुम्हें उनकी है जो कुछ न कुछ ऊटपटाँग विरोध करते रहते हैं

सब व्यवस्थाएँ अपने को और अधिक संकट के लिए
तैयार करती रहती हैं
और लोगों को बताती रहती हैं
कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है
तब जो लोग सचमुच जानते हैं कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है
वे उन लोगों के शोर में छिप जाते हैं
जो इस व्यवस्था को और अधिक बिगाड़ते रहना चाहते हैं
क्योंकि
उसी में उनका हित है

लोकतंत्र का विकास राज्यहीन समाज की ओर होता है
इसलिए लोकतंत्र को लोकतंत्र में शासक बिगाड़कर राजतंत्र बनाते हैं।






समझौता

एक भयानक चुप्पी छाई है समाज पर
शोर बहुत है पर सचाई से कतरा कर गुज़र रहा है

एक भयानक एका बाँधे है समाज को
कुछ न बदलने के समझौते का है एका

एक भयानक बेफिक्री है
पाठक अत्याचारों के किस्से पढ़ते हैं अख़बारों में
मगर आक्रमण के शिकार को पत्र नहीं लिखते हैं
संपादक के द्वारा

सभी संगठित दल विपक्ष के
अविश्वास प्रस्ताव के लिए जुट लेते हैं
एक भयानक समझौता है राजनीति में
हर नेता को एक नया चेहरा देना है।






मौक़ा

नेता ने कहा कि सब भ्रष्ट हो गया है सो ठीक कहा
हिम्मत की
पर हिम्मत नहीं थी लोग यह पहले ही जान चुके थे
अब यह केवल स्वीकार था कि मैं पिछड़ गया हूँ
समाज को समझने में
नेता कुछ नहीं बता रहा
जो जनता अभी नहीं देख रही
और यह तो बिल्कुल नहीं कह रहा कि यह जो पतन है
वह किस अर्थनीति का नतीजा है
वह केवल उसी अर्थनीति में विरोध की बात करता है
जिसका मतलब है अभी जो शासक है वैसा ही बनेगा
सिर्फ भ्रष्ट नहीं होगा, ऐसा कहता है
इस बार नेता का पतन राजनीति के द्वारा रोका नहीं जा सकता
जब तक कि राजनीति बदली नहीं जाती
एक बड़ी विपदा के छोटे-छोटे घेरों में कौन अच्छा कौन बुरा
उसकी किसी पहचान का आखिर क्या मतलब ?
तब नेता का यह कथन कि देखो यह वर्तमान
लोगों को उकसा रहा है कि वे अतीत भूल जाएँ
और भविष्य के लिए आशंका ग्रस्त हों
यदि शासक अपने कामों से पराजय को प्राप्त हो
तो वह जनता की जीत नहीं है : वह एक और पतन के लिए
एक और भ्रष्टाचार में लूट के लिए
किसी और नेता को मौका देने की बात है
लोग जानते हैं सब मगर जान लेना सब
राजनीति छोड़ ही देना है पतन के सहारे
क्योंकि जनता ने सब जाना, केवल विकल्प नहीं जाना
कोई विकल्प नहीं हो सकता उस समाज में जहाँ
लोग सब जानते हैं केवल उसी का अस्वीकार होता है
कोई तो बताए वह जो अभी लोगों को पता नहीं
लोगों को याद कोई यह दिलाए कि जो बीता
वह उनका किया था क्योंकि वे कुछ नहीं करते थे।






पराजय के बाद

तुमको लोग भूले जा रहे हैं 
क्योंकि तुम जाने जाते रहे हो अपने अत्याचारों के कारण
और आज तुम हाथ खींचे हुए हो 
कि तुम्हारे अत्याचारों को लोग भूल जाएँ 
पर लोग तुम्हीं को भूले जा रहे हैं 
करो कुछ जिससे कि वह शक्ति दुष्टता की 
लोग फिर देखें और लोग भयंकर मुग्ध हों 
एक राष्ट्र के पतन का लक्षण है कि 
वे जो जीवन भर परोपजीवी रहे
                 सत्ता के तंत्र में 
आज उससे बाहर होकर यह भ्रम फैला सकते हैं कि 
वे किसी दिन यह समाज बदल देंगे 
और अभी सिर्फ मौका देखते हुए बैठे हैं


9 जून, 1981



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