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Book Review: अनामिका का उपन्यास — 'आईनासाज़': संबंधों के नए साज और सुर


अनामिका के नए उपन्यास आईनासाज़ की इस समीक्षा में सुनीता गुप्ता लिखती हैं कि "अनामिका के यहां प्रतिरोध की वह मुखर प्रतिध्वनि नहीं मिलती जो स्त्री विमर्श की पहचान है। स्त्री के साथ वे उस पुरुष मन को भी साधती हैं जिसे पितृसत्ता के बारीक रेशों ने बुना है। इसलिए वे उससे नफरत नहीं कर पातीं - करना भी नहीं चाहतीं। अपने अगाध मातृ भाव से वे उसे प्रश्रय देती हैं। "

प्रस्तुत समीक्षा वह है जिसे पढ़ने के बाद यदि आप अनामिका जी के आईनासाज़ को पढ़ेंगे तो समीक्षक से सहमत हुए बिना नहीं रह पाएंगे ... सादर भरत तिवारी/ शब्दांकन संपादक



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आईनासाज़: संबंधों के नए साज और सुर

— सुनीता गुप्ता


अमीर खुसरो ... उन्होंने बहुत से उतार चढ़ाव देखे थे। दिल्ली पर कई सुल्तानों के दरबार में रहे थे और राजनीतिक उठापटक के साक्षी रहे थे। अपने सूफी हृदय से जितना वे अपने परिवेश को अंकित कर पाए हैं, उतनी ही मार्मिकता से स्त्री मन को भी। इसलिए आज के स्त्री मन को समझने के लिए अनामिका खुसरो के पास जाती हैं।

कविता और स्त्री विमर्श की पुस्तकों के बाद अनामिका जब कथाजगत में आती हैं तो अपने चतुर्दिक की जटिल जीवन स्थितियों और मानवीय संबंधों को अपने आस पास के बिखरे चरित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं। ‘तिनका तिनके पास’ तथा ‘दस द्वारे का पिंजरा’ के बाद ‘आईनासाज़’ अनामिका का नया उपन्यास है। अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों तथा कविताओं की भांति यहां भी अनामिका अपने समय को व्याख्यायित करने के लिए अतीत से सूत्र जोड़ती हैं। वर्तमान के हिंसक हो रहे समय का प्रतिलोम वे सूफी परम्परा में पाती हैं — सूफी जो ईरान और सिल्क-रुट से होते हुए यहां आए थे और यहां आकर यहां के भक्त कवियों और यहां की संस्कृति में घुलमिल गए और मध्यकाल के आक्रमणकारी परिवेश में ‘सांस्कृतिक संवाद की पहल’ की। सूफियों के पास ऐसा स्व है जो अनंत में विस्तार की कामना रखता है और अपने में समूची दुनिया को समाहित कर लेता है। इसलिए वहां कोई भेद भाव नहीं है, है तो संवेदना-सिक्त हृदय जो हर किसी को अपने में आत्मसात कर लेता है और प्रेम और परमात्मा के गीत रचता है। यही कारण है किसी भी हिंसक समय में सूफी कविताएं सम्बल बन आ खड़ी होती हैं। जैसे दीए से दीया जलता है, वैसे ही यह परम्परा अखंड चलती रही है — ‘‘जिंदगी एक सूफी सिलसिला इस तरह भी है कि चिराग से चिराग रोशन होता है, मशाल से मशाल। ’’ समूचे जगत के लिए प्रेम से भरे उनके इस संवेदनासिक्त, उदात्त और भेदभाव रहित नजरिए में स्त्री मन के भी निकट आ जाते हैं और स्त्रियों के लिए वहां पर्याप्त जगह है। अमीर खुसरो इसी परम्परा के एक अनिवार्य और अमिट हस्ताक्षर हैं। अपने जीवन में उन्होंने बहुत से उतार चढ़ाव देखे थे। दिल्ली पर कई सुल्तानों के दरबार में रहे थे और राजनीतिक उठापटक के साक्षी रहे थे। अपने सूफी हृदय से जितना वे अपने परिवेश को अंकित कर पाए हैं, उतनी ही मार्मिकता से स्त्री मन को भी। इसलिए आज के स्त्री मन को समझने के लिए अनामिका खुसरो के पास जाती हैं। 

..ऐसा युगीन सच्चाइयों से परे शाश्वत मूल्यों से जुड़ने पर ही संभव है। इस रूप में उपन्यास ऐतिहासिक भी है और सामयिक भी। कथा-लेखन के पारम्परिक मानक यहां ध्वस्त होते दिखते हैं और लेखिका उत्तर आधुनिकता के नए औजारों का इस्तेमाल करती हैं। 

उपन्यास की पृष्ठभूमि देश की राजधानी दिल्ली जैसे कास्मोपोलिटन शहर की है जहां अलग अलग भागों से आए लोगों के साथ सोच, विचार, व्यवहार आदि की कितनी ही भिन्नताएं एकाकार होकर मिश्र संरचना में बदल जाती हैं। विज्ञान, तकनीक और सूचना के तीव्र प्रसार के साथ आ रहे तेज बदलावों ने जीवन को सरल और एकसूत्रीय नहीं रहने दिया है। वह भी एक ऐसे शहर में जहां हर व्यक्ति के प्रवास की अपनी अलग अभिलाष और विवशता है। इन सबके बीच अपनी गति से बनते-बदलते-उलझते संबंधों के सूत्र हैं — स्त्री पुरुष संबंध जिसका एक बृहद पक्ष है। स्त्री-पुरुष संबंधों के दूसरे कई रूप अतीत में भी रहे हैं, खासकर कलाकार और साहित्यकारों के, पर वे इस तरह खुलकर अभिव्यक्त नहीं हो पाए हैं — उनपर एक प्रकार की रहस्यमयता रही है और प्रवाद भी खूब रहे हैं। आज के जटिल समय के चित्रांकन के लिए इस उपन्यास में जो कथासूत्र चुने गए हैं वे अनिवार्यतः जटिल हैं। कथा में समकालीन पात्रों के साथ अतीत की कथाएं भी जुड़ गई हैं। अमीर खुसरो सदियों की सरहदों को पार करते हुए इक्कीसवीं सदी में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं और मध्यकाल और आज के बीच पुल बन जाते हैं। स्पष्ट है कि ऐसा युगीन सच्चाइयों से परे शाश्वत मूल्यों से जुड़ने पर ही संभव है। इस रूप में उपन्यास ऐतिहासिक भी है और सामयिक भी। कथा-लेखन के पारम्परिक मानक यहां ध्वस्त होते दिखते हैं और लेखिका उत्तर आधुनिकता के नए औजारों का इस्तेमाल करती हैं। इसका एक कारण कथा फलक का विस्तार है जिसमें कई अवांतर कथा प्रसंग आ जुड़ते हैं, विविध जीवन प्रसंगों से जुड़े पात्र — आज के भी और अतीत के भी — शामिल होते जाते हैं और इन सबके बीच खुलते सामयिक जीवन के अनेक आयाम महाकाव्यात्मकत चेतना का संस्पर्श दे जाते हैं। पूर्व के उपन्यासों की भांति यहां भी कथा में बिखराव है — अतीत और वर्तमान में आवाजाही चलती रहती है, मुख्य कथा में कई अवांतर कथाएं जुड़ जाती हैं। एक तरफ अमीर खुसरो की कथा है और दूसरी तरफ सपना, शक्तिदा, और नफीस की। इसीमें ललिता चतुर्वेदी, प्रो. श्यामा और सरोज की कथा जुड़कर इक्कीसवीं सदी के कास्मोपाॅलिटन नगर की बृहत्तर कथा निर्मित करते हैं। निस्संकोच कहा जा सकता है कि इन बिखरे सूत्रों को एक साथ समेटना अतिरिक्त लेखकीय कौशल से ही संभव है। 


स्त्री-पुरुष ही नहीं, तेजी से बदल रही दुनिया के साथ मानवीय संबंधों के अनेक रूप इस उपन्यास में उद्भासित होते दिखते हैं। अमीर खुसरो और निजाम पिया, शाहिद और नमरूद - मानवीय संबंधों के ऐसे अनेक रूप हैं जिनका आधार केवल और केवल संवेदना की सहभागिता है। कहना न होगा कि ऐसे प्रसंगों ने उपन्यास को बहुत समृद्ध किया है।

नई सदी के साथ ही स्त्रियों के लिए परिदृश्य बहुत बदला है। आज से बीस पच्चीस साल पहले छोटे शहरों से गिने चुने घर की लड़कियां ही दिल्ली पढ़ने जाया करती थीं। आज लड़कों के अलावा लड़कियां भी दिल्ली जैसे शहरों में पढ़ने, नौकरी करने जा रही हैं। यह ठीक है कि दहलीज के बाहर की दुनिया स्त्री के लिए सुलभ हो गई है। पर इसके साथ ही कई नए खतरे भी उसके जीवन से से आ जुड़े हैं। बेसहारा सपना पांवों के नीचे जमीन खोजने दिल्ली आती है। अभावों में पली सपना कम समय में ज्यादा कमा लेने के चक्कर में सेक्स रैकेट की शिकार होती है। दिल्ली का बदलता परिवेश यौन शुचिता के प्रति आग्रही नहीं है। इसलिए यह दुर्घटना उसकी राहें बंद नहीं करता। अपने एक सहपाठी द्वारा वहां से निकाली जाने के बाद वह फिर से अपनी जिंदगी शुरू करती है। वह भाग्यशाली है कि उसे अपनी प्राध्यापिका ललिताजी का साथ और प्रो. श्यामा का आश्रय उपलब्ध हो पाता है। सपना के साथ कई दूसरे पात्र भी आते हैं और युवाओं के लिए शिक्षा तथा रोजगार के मुद्दों पर भी टिप्पणियां सामने आती हैं। महिमा, सिद्धु, शक्तिदा आदि के माध्यम से युवाओं का संघर्ष सामने आता है। व्यवस्था द्वारा इन पढ़े लिखे युवाओं को सही रोजगार न मिल पाना हताशा और कुंठा को जन्म देता है और उनके जीवन का सारा रस सोख लेता है। ये स्थितियां ही कई बार गलत समझौतों का कारण बनती हैं और हिंसा के रास्तों पर ले जाती हैं। 

बाहरी दुनिया स्त्रियों के लिए काफी बदल गई है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि स्त्रियों ने अपने आपको काफी बदला है और घर से बाहर की परिस्थितियों से जूझने में अपने को सक्षम बनाया है। नहीं बदला है तो पुरुष। कभी तो अपने संस्कारों के कारण, कभी अपनी अपरिपक्व मानसिकता के कारण, कभी अहंकार और कभी ईष्र्या या कुंठावश वह स्त्री की अवहेलना करता है, दमन और अनाचार करता है। निम्न घरों में यदि यह प्रवृत्ति घरेलू हिंसा की ओर ले जाती है तो मध्यवर्ग में इसका स्वरूप मानसिक प्रताड़ना में बदल जाता है। ऊपरी तौर पर सुखी सम्पन्न दीखने वाली स्त्रियों के पारिवारिक जीवन कितनी ही प्रताड़नाओं से भरे हुए हैं। इसकी वजह है पुरुषों का संस्कारित न होना — ‘‘इसीलिए तो शादियां कामयाब नहीं होतीं कि मर्द सिर्फ उम्र और कद काठी में बड़ा चुन लिए जाते हैं, दिल और दिमाग का बड़प्पन कोई तौलता नहीं!’’

ललिताजी प्रोफेसर हैं, उनके पति योग्य, पढ़े लिखे, प्रतिभाशाली। अच्छी खासी नौकरी छोड़कर वे कई प्रकार के प्रयोग करते रहें जिनकी असफलता की कंुठा वे अपनी पत्नी पर उतारते हैं। बात बात पर झल्लाना, गाली गलौज और आरोप प्रत्यारोप। ललिताजी उनकी मनोदशा को समझती हैं और सबकुछ बर्दाश्त किए जाती हैं मातृ भाव से। मध्यवर्ग के अधिकतर परिवारों की यह सच्चाई है — ‘‘... कोई भी औरत ऐसी न होगी जिसके भीतर एक उपन्यास न छटपटाता हो। ’’ यही कारण है कि अधिकतर स्त्रियों के लिए घर में सुकून उपलब्ध नहीं हैं। अनजाने लोगों के बीच वे ज्यादा सहज महसूस करती हैं — छत और बाथरूम वे जगहें जहां कुछ समय के लिए अपने जीवन के दर्द और टीस को बहाने का अवसर उन्हें मिल जाता है — ‘‘छत और मेट्रो उन्हें मायके की निश्ंिचतता देते हैं। ’’

समय बदला पर स्त्री-देह की नियति नहीं बदली। घर के अंदर यदि वह मानसिक प्रताड़ना की शिकार है तो घर से बाहर उसकी देह पर सबकी निगाहें हैं। यौन हिंसा स्त्री जीवन का एक ऐसा सच है जो शरीर के साथ आत्मा तक को खरोंच डालता है। स्त्री शरीर कभी तो पुरुषों की शारीरिक जरूरतों के लिए, बकौल अनामिका, ‘पिकदान’ बन जाता है और इस रूप में क्रय विक्रय की वस्तु बनता है और कभी राजनीतिक छद्म का शिकार। साहित्य जगत भी इस प्रकार के छल कपट से अछूता नहीं रहा। सरोज कुंडू की कथा साहित्यक जगत में चलने वाली साजिशों को सामने रखती है। 

शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, यौन हिंसा — इन सबके अतिरिक्त एक और हथियार जिसका इस्तेमाल स्त्री को तोड़ने के लिए किया जाता है, वह है चारित्रिक लांछन। चरित्र स्त्रियों के जीवन का सबसे साॅफ्ट टारगेट है जिसका प्रयोग स्त्री के आगे बढ़ते कदमों को रोकने के लिए पुरुषों द्वारा किया जाता रहा है। अनामिका की ही एक कविता है ‘स्त्रियां’ जिसमें वे बताती हैं कि अपने आपको पढ़े जाने के आग्रह और अपने को अभिव्यक्त करने के आत्मविश्वास के साथ जब कोई स्त्री सामने आती है तो टिड्डियों की तरह उसपर लांछनों और अफवाहों की बौछार होने लगती है। स्त्री-चरित्र पर लांछन लगाने के लिए न तो प्रमाण की जरूरत महसूस की जाती है और न ही तथ्य की। इसके लिए कल्पना शक्ति और अफवाहों के पंख ही पर्याप्त हैं। 

उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री पुरुष के आपसी संबंधों के अनकानेक आयाम हैं। स्त्री पुरुष के संबंधों के अनेक रूप होते हैं जिन्हें किसी एक शब्द मात्र से परिभाषित नहीं किया जा सकता। अमूमन पुरुष के साथ स्त्री के लगाव को केवल एक नाम दिया जाता है प्रेम और इसे शारीरिक संबंधों का रूप देकर इसकी नैतिकता को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। किंतु जरूरी नहीं कि इस प्रकार का हर संबंध प्रेम या शारीरिक संबध में ही ढ़ला हो। स्त्रियां जब घर से बाहर निकल रही हैं तो सार्वजनिक जगहें हों, शैक्षणिक संस्थान, कला जगत, साहित्य परिसर, कार्य स्थल — हर जगह पुरुषों से सामना हो रहा है। ऐसे में संबंधो के कई तरह के रेखाचित्र बन रहे हैं। कला और साहित्यजगत की पारस्परिकता संबंधों की एक अलग रूपरेखा निर्मित करती है। राबिया फकीर का अन्य फकीरों से या रजिया सुल्तान का गुलाम यकूब से जो रिश्ता था उसे लेखिको बड़ा अच्छा-सा नाम देती हैं — सूफियाना। अमीर खुसरो और रानी पद्मावती, अमीर खुसरो की पत्नी मेहरू और शम्सुल, अमीर खुसरो की बेटी कायनात और शाहिद — ऐसे ही रिश्ते हैं जो रूहानी कहे जा सकते हैं। इस तरह के अनेक मानवीय रिश्ते स्त्री पुरुष संबंधों की सच्चाई हैं जिन्हें दुनियावी शब्दों से परिभाषित नहीं किया जा सकता। आज की स्त्री, बल्कि हर युग की स्त्री का यही दर्द है, वह चाहती है ऐसी दुनिया जो उसे समझ सके — ‘‘अल्लाह, कब बदलेगी यह दुनिया? कब औरतों के करीने से रहने लायक हो पाएगी? कब वो बसंत आएगा जब आदमी-औरत के रिश्ते एक ही नजर से तौले नहीं जाएंगे? कब समझेगी दुनिया कि आदमी-औरत का रिश्ता ऐसा नायाब हीरा है जिसके कई आयाम हैं, ठीक वैसे ही, जैसे मर्द-मर्द और औरत-औरत के बीच के रिश्ते के कई पहलू?’’ दुनिया इतनी संकीर्ण है कि संबंधों के अलग अलग रूपों को समझने को प्रस्तुत ही नहीं है — ‘‘आदम-औरत के बीच आदम-हौव्वा वाले नाते के सिवा भी तो कई तरह के नाते होते हैं, कोई यह समझने को तैयार ही नहीं। ’’

दाम्पत्य संबंधों के कई पक्ष भी सामने आते हैं जिनकी प्रासंगिकता आज के समय से भी जुड़ती है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच खुसरो की बीवी मेहरू की रचनात्मकता निखर नहीं पाती। खुसरो और मेहरू के संबंधों की गांठें आज के दाम्पत्य में भी कहां खुल पाई हैं! आज भी स्त्रियों की रचनात्मकता पारिवारिक वेदी पर होम होती रही है। संबंधों का एक रूप पिता और पुत्री का भी है। 

उपन्यास में मध्यकाल और आज के समय के बीच आवागमन चलता रहा है। इनके बीच के सूत्र को लेखिका ने अत्यंत कौशल से साधा है। खुसरो के जीवन प्रसंग किसी फूल की पंखुड़ी की तरह एक एक कर खुलते हैं। बेटियों पर खुसरो के बहुत से मार्मिक गीत हैं। खुसरो और उसकी बेटी के बीच दुनिया की सारी मासूमियत और विश्वास सिमट आता है। पिता और बेटी के इस रिश्ते का सूत्र आगे चलकर सपना के जीवन से जुड़ता है — एकतरफ खुसरो हैं जिनकी सतर्क निगाहें स्त्रियों के प्रति समाज की क्षुद्रताओं को देखते हुए अपनी प्राणप्रिय बेटी कायनात के लिए आशंकित रहीं — सदियों पार है इक्कीसवीं सदी जहां पिता के संरक्षण बिना तबाह होता सपना का जीवन है। छोटी सी अवस्था में बम विस्फोट में अपने पिता को खो देने वाली सपना के मन में मुसलमानों के प्रति घर कर गए नफरत की गांठें खुसरो को पढ़ने से धीरे धीरे खुलने लगती हैं जिसकी परिणति यह होती है कि वह सहज ही नफीस को स्वीकार कर लेती है। 

स्त्री-पुरुष ही नहीं, तेजी से बदल रही दुनिया के साथ मानवीय संबंधों के अनेक रूप इस उपन्यास में उद्भासित होते दिखते हैं। अमीर खुसरो और निजाम पिया, शाहिद और नमरूद — मानवीय संबंधों के ऐसे अनेक रूप हैं जिनका आधार केवल और केवल संवेदना की सहभागिता है। कहना न होगा कि ऐसे प्रसंगों ने उपन्यास को बहुत समृद्ध किया है। 

उपन्यास में एक अत्यंत मार्मिक स्थल है जहां यौन हिंसा की शिकार सरोज कुंडू का मनोवैज्ञानिक उपचार करने वाली मनोविज्ञान की डाॅक्टर स्त्री सृजनशीलता के उत्स को व्याख्यायित करती हैं। 

परम्परा ने स्त्रियों को सुकून देने वाली दुनिया नहीं बनाई — घर में हर वक्त पीछा करती, सवाल करती और डिमांड करती निगाहों के बीच छत और बाथरूम के अलावा कोई जगह ऐसी नहीं जहां वह चैन की सांस ले सके और अपने टीसते घाव को बहा या सहला सके। घर के बाहर की दुनिया नोचने खसोटने को तैयार है। पर स्त्री का मन और उसकी दुनिया बदल रही है। ऐसे में सहज लगते हैं उन्हें मेट्रो के अजनबी लोग, लाइब्ररी का एकांत कोना और अपनी जैसी संवेदनशील स्त्रियों का साथ। बदलती दुनिया के साथ अपने को साधने के लिए स्त्रियों ने अपने लिए कई स्पेस ढ़ूंढे हैं। कभी तो लाइब्रेरी के एकांत कोने उसके लिए आश्वस्तिपरक बन जाते हैं। पर इसका सबसे उदात्त रूप वे सामूहिक जगहें हैं जहां वे प्रताड़ित स्त्रियों और बच्चों को संरक्षण देने के लिए बना रही हैं। ‘मातृसदन’ एक ऐसी ही जगह है, वंचित, अनाथ और प्रताड़ित लागों को अपने में आश्रय देने को प्रस्तुत!

उपन्यास इक्कीसवीं सदी की इसी बदली हुई स्त्री के साथ है। स्त्रियों की दुनिया तेजी से बदल रही है, और उसके साथ ही स्त्रियां भी बदल रही हैं — घर बाहर, पति बच्चों, रसोई साहित्य — सबको साधती। उसने अपना कद बढ़ाया है। नहीं बदल रहा तो पुरुष — ‘‘सारा संकट इसी बात का है कि एक औसत स्त्री का नैतिक कद एक औसत पुरुष से इतना ज्यादा हो गया है कि पुरुष कुंठा में जीने लगे हैं। ’’ इसीलिए आज की प्रबुद्ध स्त्रियां अपने को बहुत अकेला पा रही हैं — ‘‘शिक्षादीप्त स्त्री उतनी ही अकेली है जितनी कि ध्रुवस्वामिनी थी — रामगुप्तों का समाज है, चंद्रगुप्त नजर ही नहीं आते। ’’ पुरुष को यदि स्त्री का साथ चाहिए तो उसे स्त्री के योग्य बनना होगा। जब तक वह वर्चस्व स्थापित करने की मुद्रा में रहेगा तबतक वह स्त्री को नहीं पा सकता — ‘‘औरत की खूबसूरती हो या कायनात की, जब तक वह कब्जे की चीज बनी रहेगी, सभ्यताएं चैन की सांस नहीं ले पाएंगी और आदमी का मन पीपल का पात ही बना रहेगा। ’’

पुरुष भी स्त्री का सहचर हो सके, यह आज की स्त्री की एकांतिक कामना है जिसे एक पात्र के मुख से लेखिका ने बड़ी मासूमियत से व्यक्त किया है — ‘‘... लेकिन वो दिन कब आएगा बुआ दादी, जब बीवी भी किसी बड़ी धुन में है, शौहर के लिए भी यह फख्र की बात होगी?’’

अनामिका के यहां प्रतिरोध की वह मुखर प्रतिध्वनि नहीं मिलती जो स्त्री विमर्श की पहचान है। स्त्री के साथ वे उस पुरुष मन को भी साधती हैं जिसे पितृसत्ता के बारीक रेशों ने बुना है। इसलिए वे उससे नफरत नहीं कर पातीं — करना भी नहीं चाहतीं। अपने अगाध मातृ भाव से वे उसे प्रश्रय देती हैं। वे जानती हैं कि बदलाव की प्रक्रिया धीमी होती है, इसलिए उनके यहां धैर्य है और धैर्य है तो सहनशीलता भी है। उनका मातृभाव उन्हें क्षमाशील बनाता है और यही वह भाव है जो दूसरों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने को प्रेरित करता है। हिंसक हो रहे समय का मुकाबला वे सूफी भाव से करना चाहती हैं और इसलिए अपने समय को हथेली पर लिए वे खुसरो के साथ जा खड़ी होती हैं। मातृसदन की परिकल्पना में प्रताड़ितों के लिए प्रश्रय का भाव है। 

पर बड़ा सवाल यह है कि आज की स्त्री के पास क्या इतना धैर्य है कि इस उदात्त भूमि से वह अपनी लड़ाई लड़ सके? और यह भी कि मातृसदन जरूरत तो हो सकते हैं पर क्या विकल्प भी?

संबंधों की उदात्त भूमि ... भक्त की तन्मयता ... सूफियों की अव्यक्त रहस्यमयता ... अपने में सबको समाहित करने वाला अगाध मातृ भाव — अनामिका की रचनात्मकता के ये वे पहलू हैं जो उन्हें दार्शनिक और मानवीय भूमि पर स्थापित करते हैं और जहां वे अपने समकालीनों के बीच अलग लकीर खींचती हैं। अनामिका के स्त्री विमर्श का अपना अलग चेहरा है। स्त्री मन की बारीक अनुगूंजों की सूक्ष्म तान से तरंगित उनकी ररचनाएं आज की जिस स्त्री को लाती हैं अपने स्वरूप में वह आदिम भी है और एकदम आधुनिक भी। खुसरो का समय हो या नई सदी की दिल्ली, अपने आंतरिक बुनावट में उनके बीच एक तारतम्यता है जिसे केवल और केवल आदिम राग ही कहा जा सकता है।
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सुनीता गुप्ता,
एसोसिएट प्रोफेसर,
बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में हिंदी की विभागध्यक्ष.
कथा लेखन और आलोचना में सक्रिय
प्रकाशित पुस्तकें -
1 रेणु का कथेतर साहित्य
2 स्त्री चेतना के प्रस्थान बिंदु
3 हिंदी कविता में स्त्री स्वर
4 उड़ान, वैयक्तिक संस्मरण
ईमेल: sunitag67@yahoo.com

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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