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Hindi Story: बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम — अशोक मिश्र



संपादक, कहानीकार अशोक मिश्र  की कहानी 'बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम' 2011 में परिकथा के युवा लेखन विशेषांक में प्रकाशित हुई थी. पढ़िए और कहानी के माध्यम से लेखक को जानिये! और यहीं कहीं यह भी  सोच लीजियेगा कि उत्तरप्रदेश के फैज़ाबाद के सुचित्तागंज बाजार कस्बे में जहाँ लेखक का जन्म हुआ है ,अब कैसे होंगे वह जिन्हें  मिश्रजी की इस कहानी का नायक, एक दलित वाभन, ठाकुर, लाला कहता है ... भरत एस तिवारी / शब्दांकन संपादक



संपादक ने उसकी ड्यूटी बिहार डेस्‍क पर लगा दी थी। यहां प्रभारी के रूप में सारा कामकाज रिंदजी नाम के एक पुराने शायर देख रहे थे। उन्‍होंने बुद्धिराम से प्रारंभिक जानकारी ली और बोले कि तुम तो शक्‍ल से ही गंवार और जाहिल दिखते हो ऐसे में क्‍या करोगे पत्रकारिता। पत्रकारिता तो बड़ा जटिल काम है। रिंदजी धीरे से बुदबुदाते हुए बोले- ‘जाने कहां-कहां से जंगली लोग चले आते हैं।’ महात्‍मा गांधी तो मर गए पर दलितों का दिमाग खराब कर गए। बुद्धिराम को अखरा तो बहुत। उसका मन किया कि वह रिंदजी को सीट से उठाकर फेंक दे मगर मन मसोसकर रह गया। 

बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम

— अशोक मिश्र 

बुद्धिराम की निगाहें कम्‍प्‍यूटर पर और ऊंगलियां कीबोर्ड पर थीं मगर खबर थी कि बन ही न रही थी...।

वह कहीं और ख्‍यालों में विचर रहा था। सीट पर सिर्फ उसका तन था जबकि मन कहीं और। सोच रहा था कि जिनकी वह दिल से इज्‍जत करता है, जिनके एक आदेश पर टाइलेट तक रोककर काम करता है, वे उसे आदमी समझते ही नहीं बल्कि ढोर, डांगर समझकर व्‍यवहार करते हैं। शायद न्‍यूज एडीटर ठाकुर के मन में यह बात घर कर गई है कि वह दलित है। अगर वह दलित है तो इसमें उसकी क्‍या गलती। वह भी अन्‍य छात्रों की तरह पढ़ाई करके ही इस पेशे में आया था पत्रकार बनने। उसे लगता है कि अब यह सपना कभी नहीं पूरा होगा। आज उसकी हालत किसी सड़क किनारे बैठे मजदूर से भी गई गुजरी है। मजदूर के पास कम से कम स्‍वाभिमान तो है कि तीन-पांच करते ही दूसरा दरवाजा देख वहां दिहाड़ी कर लेगा, मगर यहां तो उसके अस्तित्‍व को पूरी तरह नकारते हुए बार-बार फटकारा जा रहा है। फिर गांव और शहर का फर्क क्‍या...? बुद्धिराम के कान में बार-बार न्‍यूज एडीटर ठाकुर के शब्‍द रह-रहकर बज रहे थे- आपने बिना किसी से पूछे ‘दलितों का घर जलाया’... खबर दो कालम में क्‍यो लगाई...? आप दलित हैं ये ठीक है मगर यह कोई दलितों का अखबार नहीं है। इतना ही शौक है तो राजनीति करिये, उनके हकों के लिए लडि़ए, संस्‍थान का समय क्‍यों जाया कर रहे हैं? दलित हमारे पाठक नहीं हैं। ये लोग दो टाइम का खाना तो जुटा नहीं पाते फिर खरीदकर अखबार पढ़ना तो दूर की बात है। पत्रकारिता करना है तो जो कहा जाए वही करें अपना दिमाग न लगाएं। आपको एक हफ्ते के लिए सस्‍पेंड किया जा रहा है। एक हफ्ते बाद फैसला होगा कि आप काम करने लायक हैं या नहीं...?

बुद्धिराम एक दलित परिवार में पैदा हुआ था। उसका घर फैजाबाद जिले के सोहावल ब्‍लाक के दुर्जन का पुरवा गांव में हुआ था। उसकी प्रारंभिक स्‍कूली शिक्षा गांव की ही एक प्राथमिक पाठशाला में हुई, जहां के हेडमास्‍टर रामकुमार दूबे थे। दूबेजी की खासियत थी उनकी मूंछें, जिनको वह हमेशा हाथों की चु‍टकियों से ऐंठते ही रहते थे। उनकी एक और विशेषता थी कि वे हर दस मिनट पर खैनी बनाते उसे ठोंकते और मुंह में दबा लेते। सुबह स्‍कूल खुलते ही प्रार्थना के बाद वे साथी अध्‍यापकों के साथ बैठकर गप्पें मारते। दूसरी तरफ छात्रों के समूह किताबें खोलकर हो-हल्‍ला कर रहे होते। वैसे छात्र दूबेजी से बहुत घबराते थे। वे पूरे स्‍कूल में मरकहा टीचर के नाम से विख्‍यात थे।

गांव के पास के एक प्राथमिक स्‍कूल में बुद्धिराम फटी जांघिया-छेदही बनियान और फटी किताबें-कापियां और मैला-कुचैला झोला लिए पढ़ने जाता और शाम तक वापस घर को लौट आता। बुद्धिराम बचपन से ही दूसरे बच्‍चों से भिन्‍न स्‍वभाव था। अध्‍यापकों को यह बात अच्‍छी तरह पता थी कि यहां गरीब-गुरबा परिवारों के बच्‍चे पढ़ने आते हैं, जबकि संपन्‍न और खाते पीते घरों के लोग अपने बच्‍चों को कान्‍वेंट स्‍कूलों में पढ़ने भेजते हैं। यही कारण था कि गांव के इन गरीब दलित, पिछड़े और अल्‍पसंख्‍यक परिवारों के बच्‍चों को पढ़ाने की परवाह सवर्ण शिक्षक नहीं करते थे।

बारह वर्ष का बुद्धिराम पांचवीं उतीर्ण कर आगे की पढ़ाई के लिए ग्राम समाज इंटर कालेज जा पहुंचा। इस बीच उसके भीतर सोचने और समझने की शक्ति भी विकसित हो चुकी थी। बुद्धिराम कालेज का मनुवादी माहौल देखकर और भी दंग रह गया। कालेज के चपरासी से लेकर सारे अध्‍यापक और प्रधानाचार्य तक सभी पदों पर बाभन, ठाकुर और कायस्‍थ जातियों के लोग थे। मामला सिर्फ यही तक सीमित नहीं था बल्कि दिखावे के लिए एक दो टीचर निचली जातियों के भी थे।

कालेज के ज्‍यादातर अध्‍यापकों के मन में दलित या पिछड़े बच्‍चों के प्रति जाने कैसी दुर्भावना भरी हुई थी कि ऐसे किसी भी छात्र को देखते ही वे नफरत से भर जाते थे। बुद्धिराम कालेज में पढ़ाई से लेकर पानी पीने तक कदम-कदम पर सामाजिक भेदभाव और व्‍यवहार के स्‍तर पर गैर बराबरी का सामना कर रहा था। इस सबने उसके भीतर पढ़ाई के प्रति एक विरक्ति की भावना को जन्‍म दिया था। कालेज में पूरे दिन बुद्धिराम किताब खोलकर सामने रखे रहता था मगर बाल मन का हाहाकार कम होने का नाम ही नहीं लेता था।

बुद्धिराम कालेज के दो तीन अध्‍यापकों के चेहरे देखकर ही मन ही मन सिहर उठता था। ऐसी ही एक घटना उसे याद है जब गणित के अध्‍यापक जी.पी. सिंह ने कहा कि- ‘अबे तय वाभन ठाकुर के इसकूल मा पढि़बै, अरे ससुर जाय के कहूं गाय भैंस चराय के दूध बेंच...’ 

साले सूअर की औलाद वाभन, ठाकुर कय बराबरी कइके अंबेडकर बनय चला हय...।

ए‍क दिन क्‍लास में ही जी.पी. सिंह ने सिर्फ एक सवाल न करके लाने पर बुद्धिराम को वहशियों की तरह सिरसैया की छपकी से इस बुरी तरह मारा था कि उसका हाथ लहूलुहान हो गया। कई दिन उसकी माई रेंड का पत्ता और हल्‍दी तेल लगाती रहीं, तब जाकर हफ्तों में ठीक हुआ था उसका हाथ। उसके बापू तो इस घटना से खासे उद्वेलित हो गए थे। वे कई बार कहते थे- ‘इ हमार जौन सामाजिक व्‍यवस्‍था हय वहिमा वाभन ठाकुर का छोड़ बाकी सब मनई ढोर डांगर हैं। मगर अब जे यहि दुनिया मा आय गवा ऊ चाहे जैसे ओका जियय का तो परिबे करी।

बुद्धिराम सारी सामाजिक प्रताड़नाओं और उपेक्षापूर्ण व्‍यवहार को रोजमर्रा की जिंदगी में जैसे सांस ली जाती है जीने के लिए उसी तरह सब कुछ पीकर, जज्‍ब कर स्‍कूल जाता रहा। अच्‍छी कापी लिखने के बावजूद कभी भी उसे बेहतर अंक नहीं मिला। इसे भी वह सामाजिक विद्वेष की रणनीति का षड़यंत्र मानकर चुप ही रहा। वजह भी थी उसकी अपनी गरीबी। बापू के पास अधिया बटाई के थोड़ा बहुत खेत थे, ऊपर से तकरीबन चार पांच किलो एक भैंस का दूध और घी जिसे वे खुद न खाकर घर का खर्चा चलाने के लिए अपने पास रख लेते थे। दूध तो साकेत डेरी की गाड़ी सुबह आकर मुहारे-मुहारे से ले जाती। बापू अक्‍सर आधी टांग वाली लुंगी और दर्जी से सिलवाई मिरजई पहने रहते। 

बापू के कांधे पर एक गमछा रहता मौसम चाहे जाड़ा, गर्मी या बरसात कोई भी हो यही उनकी पोशाक थी। मां सामान्‍य-सी सूती साड़ी-ब्‍लाउज वाले पहनावे में रहती। बचपन में लगभग दस साल की उम्र तक बुद्धिराम जांघिया बनियान पहने नंगे ही घूमा करता था। कपड़े तीज-त्‍यौहार होली-दीवाली को छोड़कर मिले हों उसे याद नहीं। गांव में सब कुछ था मगर कमाई के साधन नहीं थे। यही गांव की सबसे बड़ी समस्‍या थी। कुछ लोग सुबह होते ही सा‍इकिल उठाकर मेहनत-मजदूरी के लिए पास के कस्‍बे या फैजाबाद शहर की ओर चल देते थे, जहां कुछ न कुछ काम मिल ही जाता था। खैर दिन, हफ्ता, महीना और साल दर बीतता रहा और देखते-देखते बुद्धिराम ने जैसे तैसे इंटर पास कर लिया।

न मंदिर न मंडल वाला समय:
बुद्धिराम देख रहा था कि यह 1980 का समय था जब न मंदिर था न मंडल और न ही राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ था। सब कुछ बहुत शांत चल रहा था। इमरजेंसी अर्थात् 1975 से लेकर 1977 के दौरान इंदिरा गांधी के लाड़ले बेटे और उसकी उच्‍छृंखल मंडली ने राजनीति के शक्ति केंद्रों पर कब्‍जा कर लिया था मंत्रियों, मुख्‍यमंत्रियों को ऊंगली के इशारे पर नचाता। कई वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता तो लाड़ले बेटे के जूते तक उठाते और पहनाते। इसी दौर में बीस सूत्रीय कार्यक्रम के नाम पर नौजवानों और साठ साला बूढ़ों की पकड़कर नसबंदी कर दी गई। जनता में इंदिरा सरकार के प्रति खासा आक्रोश भरता जा रहा था। उसी दौर में बुद्धिराम के गांव में सुबह संघ की शाखा लगा करती थी, जिसमें दस बरस से ऊपर के किशोर बच्‍चे भाग लिया करते थे।

अचानक एक सुबह- सवेरे पुलिस ने धावा बोलकर भगवा ध्‍वज-लाठी दोनों को निकालकर सारे बच्‍चों को डराकर भगा दिया। बच्‍चों से काफी धींगड़ शाखा के सूत्रधार संचालक लल्‍लन भैय्या को पकड़ ले गई। जनता इमरजेंसी के नाम पर किए जा रहे जुल्‍मों-सितम से आजिज आ चुकी थी। देश में इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव होते ही आम आदमी ने नई नवेली जनता पार्टी को सत्‍ता की बागडोर सौंपी मगर जनता पार्टी सरकार नेताओं की अंतरकलह के चलते गिर गई थी। इमरजेंसी के दर्द को पूरी तरह से भूलकर एक बार फिर देश की जनता ने गांधी नेहरू परिवार को सत्‍ता सौंप दी थी।

यही वह समय था जब प्रेम पर अघोषित सेंसरशिप लगा दी गई थी जिसके चलते अधिकांश संपादक विरोध की मुद्रा छोड़कर केंचुए की मानिंद लगे थे। इसी दौरान एक पागल अक्‍सर गाता रहता...

इसी देश की एक थी रानी
उसके दो थे राजदुलारे
नाना राजा मां भी रानी
छोटे ने फिर ये मन में ठानी
करता फिरता था मनमानी
पढ़ा लिखा कुछ खास नहीं था
दसवीं भी वो पास नहीं था
तबियत का शौकीन बहुत
आदत का रंगीन बहुत
फिर एक दिन ऐसा झोंका आया
जिसने किया उसका सफाया।


साकेत महाविद्यालय के दिन:
बुद्धिराम ने अपनी बदहाली और परिस्थितियों से लड़ते भिड़ते वर्ष 1980-81 में फैजाबाद स्थित कामता प्रसाद सुंदरलाल साकेत महाविद्यालय में बी.ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश ले लिया था। यह विद्यालय पढ़ाई-लिखाई के लिए कम गुंडागर्दी के लिए अधिक जाना जाता था। यहां का प्राचार्य संस्‍कृत विभाग का अध्‍यक्ष था जो कि खुद को दुष्‍यंत की जगह रखकर हर लड़की में शंकुलता का अक्स निहारता था। वह क्‍लास में कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ाते समय स्‍त्री सौंदर्य का वर्णन बेहद रस लेकर करता और उस दौरान उसकी निगाह छात्राओं के वक्ष की ओर होतीं।

इस बीच बुद्धिराम ने देखा कि छात्र संघ के चुनाव हुए और एक साल गोंडा जिले का एक नामी गुंडा छात्र आनंद भूषण सिंह छात्र संघ महासचिव के रूप में चुना गया। छात्रों के बीच दबी जबान से चर्चा थी कि जीतना तो सुनील शुक्‍ला को था लेकिन अज्ञात लोगों ने उसकी गोली मारकर हत्‍या करवा दी और फिर आनंद भूषण चुनाव जीता। आनंद भूषण की जीत का एक और कारण था कि उसने तमाम छात्रों को इस कदर डरवा दिया था कि लोगों ने मन मसोसकर उसे वोट दे दिया। छात्र संघ छात्रों के हित के लिए काम करने में असफल रहा। छात्र संघ की उपयोगिता छात्रों के हित में न रहकर अध्‍यक्ष और मंत्री के लिए कमाने खाने का जरिया बन गई थी। बुद्धिराम सोहावल से दून एक्‍सप्रेस पकड़कर बारह बजे के आसपास महाविद्यालय पहुंचता। महाविद्यालय का भी हाल गांव के समाज जैसा ही था। यहां भी दलित छात्रों के प्रति प्राध्‍यापक हिकारत का भाव रखते और ऐसे छात्रों को देखते ही नाक-भौं सिकोड़ते या फिर किसी तरह टरका देते। देखते ही देखते चार साल बीत गए और अब बुद्धिराम को समाजशास्‍त्र में एम.ए. की डिग्री मिल गई थी। पोस्‍ट ग्रेजुएशन की डिग्री मिलने के बाद बुद्धिराम कुछ उत्‍साह में था कि शायद किसी इंटर कालेज में लेक्‍चर की नौकरी मिल जाए। इसी बीच नौकरियों के लिए आवेदन देते- फार्म भरते तीन साल बीत गए पर कुछ न हुआ। एकाएक उसे पंडितपुर के रमणक जूनियर हाईस्‍कूल में सहायक अध्‍यापक एल.टी. ग्रेड में रख लिया गया जिसके मेहनताने के रूप में तीन सौ रुपये मिलते। वर्ष 1987-88 में वह बीएड का फार्म भरता है और उसे अकबरपुर के बीएनकेबी महाविद्यालय में दाखिला मिल जाता है। बीएड की डिग्री मिलने के बाद बुद्धिराम को दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती है। वह उत्‍साह में आकर कई ऐडेड कालेजों में अप्‍लाई करता है मगर हर जगह डोनेशन यानी अप्रत्‍यक्ष घूस के नाम पर उनसे एक लाख रूपये की मांग की जाती है। युवा होने के बावजूद बुद्धिराम को न के बराबर शौक था। धीरे-धीरे बुद्धिराम को साहित्‍य और पत्र-पत्रिकाओं से लगाव हो जाता है। वो प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, रेणु, जयशंकर प्रसाद समेत एक-एक कर सभी को पढ़ डालता है। बैठे-बैठे एक दिन वह सोचता है कि अध्‍यापन के स्‍थान पर अगर पत्रकारिता करे तो क्‍या अच्‍छा हो? यह विचार उसके भीतर सपना बनकर पलने लगा है। वह सोचता है कि माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, रघुवीर सहाय, अज्ञेय, राजेन्‍द्र माथुर और महात्मा गांधी समेत कई महान विचारक अपने जीवन के आरंभिक काल में पत्रकार रहे हैं...

बुद्धिराम को लगा कि पत्रकारिता में कलम एक ऐसा हथियार है जिसके माध्‍यम से समाज को जागरूक बनाया/बदला जा सकता है।


दलदल अखबार का:
अंतत: बुद्धिराम एक दिन ठान लेता है कि वह अब पत्रकार बनकर ही दम लेगा। एक दिन अचानक पास के कस्‍बे में एक साहित्यिक संस्‍था के वार्षिक समारोह में जनपद के एकमात्र दैनिक जनमोर्चा के कामरेड संपादक आनंद सिहं मुख्‍य अतिथि के रूप में आते हैं। यहां जलपान के दौरान बुद्धिराम लपककर उन्‍हें नमस्‍कार कर अपने मन की बात उगल देता है। वे धीरे से मुस्‍कुराते हैं और कहते है-‘देखिये हमारा बहुत ही छोटा और सहकारिता के आधार पर संचालित देश का एकमात्र हिंदी दैनिक है। यहां पर काम जरूर सीख सकते हैं लेकिन कोई स्‍टाईपेंड या वेतन दे पाना अखबार के लिए संभव नहीं होगा। आप किसी दिन आकर दफ्तर में मिलें तो मैं न्‍यूज एडीटर विनय मोहन जी को बोल दूंगा।’ अगले दिन ही वह सिंह साहब से मिलता है। वे इंटरकाम पर ही न्‍यूज एडीटर को निर्देश दे देते हैं।

बुद्धिराम जैसे ही न्‍यूज एडीटर विनय मोहन के कमरे में प्रवेश करता है कि वे उसे नख से शिख तक किसी नायिका की भांति देखते हैं। कहते हैं बैठिये। वे बुद्धिराम से उसकी शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी लेते हैं। उसे अगले दिन बारह बजे दोपहर से सांय छह बजे तक बैठने और पत्रकारिता का पहला बुनियादी पाठ प्रूफ रीडिंग सीखने का निर्देश दिया जाता है। बुद्धिराम अज्ञाकारी शिष्‍य की भांति पूरे प्राणप्रण से प्रशिक्षण में जुट जाता है। संपादकीय सहकर्मियों को जब पता चलता है कि एक कारसेवक काम सीखने आ चुका है, तो अगले दिन से वे अपने हिस्‍से का काम बुद्धिराम के आगे फेंककर दोपहर बारह से तीन का शो देखने चल देते हैं। संपादकीय विभाग वाले ट्रेनिंग के लिए आने वाले नए आगंतुकों को कूटभाषा में ‘कारसेवक’ कहते थे। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो किसी कारसेवक के आते ही दफ्तरवालों के पौ बारह हो जाते थे। बुद्धिराम ने देखा कि बड़ा ही पुराना टीनशेड वाला दफ्तर था जो गर्मी में झुलसाकर रख देता था। गर्मी के दिनों में आदमी का तेल निकल जाता था। दफ्तर में दो पुराने टेलीप्रिंटर थे जिन पर वार्ता-भाषा के समाचार लगातार आते रहते और किर्र-किर्र-किर्र की आवाज होती रहती। दफ्तर की कुर्सी और मेज ही नहीं बल्कि पंखे भी काफी बाबा आदम के जमाने के थे जिस पर बैठकर लोग अपना काम जैसे-तैसे निपटाते।

बुद्धिराम सारा काम पूरी तन्‍मयता से करते हुए न्‍यूज एडीटर मोहन जी के हर निर्देश का अक्षरश: पालन करता। विनय मोहन जी उन समाचार संपादकों में से थे जो कि अखबार में प्रूफ, वर्तनी या फिर शीर्षक की किसी भी गलती के लिए उप संपादकों को माफ नहीं करते थे। किसी तरह की गलती करने पर सही क्‍या है उसे पूरे तर्क के साथ समझाते हुए ही डांटते। उनके द्वारा सिखाए गए लोग कई बड़े प्रादेशिक अखबारों में काफी बेहतर काम कर रहे थे। उसे अच्‍छी तरह याद है कि जब उसने एक बार- ‘तमंचे की नोंक पर मुसाफिर को लूटा’ शीर्षक लगा दिया था। उस समय उन्‍होंने डांटते हुए कहा कि ‘चाकू की नोंक तो होती है मगर तमंचे की नहीं।’ इतना कहकर वे अपने काम में मशगूल हो गए। विनय मोहन जी ऐसे पत्रकारों में थे जो कि हर समय अखबार को जीते थे। वे कभी किसी भी कर्मचारी पर अकारण रूआब दिखाने का प्रयास नहीं करते थे। उनके भीतर काम के प्रति बेहद लगाव, स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण और गजब का उत्‍साह देखने को मिलता। ठीक यही स्थिति आनंद जी की थी जिन्‍हें दफ्तर का हर सदस्‍य पिता तुल्‍य सम्‍मान देता। अखबार की विचारधारा सर्वहारा और मार्क्‍सवाद के साथ जुड़ी थी। जनमोर्चा पढ़कर ही लोग शहर, कचहरी या विश्‍वविद्यालय के लिए निकलते। अगर किसी कारण शहर में बंद, हड़ताल, धरना-प्रदर्शन-जुलूस होता, तो उसकी खबर अखबार में जरूर रहती। अखबार न सिर्फ शहर बल्कि सुदूर गांवों में सड़कों के किनारे चाय के ढाबों और पान की गुमटियों तक भी जाता था। ऐसी ही जगहों पर आकर गांवों के लोग जनमोर्चा पढ़कर देश-दुनिया और जिले की खबरों से रूबरू होते थे।

जनमोर्चा पढ़े बिना लोगों का खाना नहीं हजम होता था। सुबह शहर के चौराहों पर खड़े होकर हाकर आवाज लगाता- वकीलों में मारपीट, हड़ताल से कचहरी में काम ठप... डीएम से नाराज मुख्‍यमंत्री ने ली क्‍लास... और फिर देखते ही देखते उसके हाथ में लिया अखबार फटाफट बिक जाता। अखबार बेच वह तुरंत आगे बढ़ जाता क्‍योंकि कई बार वह जिन खबरों को चिल्‍लाकर अखबार बेचता वे खरीदने के बाद ढूंढने से भी नहीं मिलती थी।


बहादुशाह जफर की दिल्‍ली:
जनमोर्चा में ट्रेनिंग समाप्‍त होते ही बुद्धिराम फैजाबाद में कोई संभावना न देख सीधे दिल्‍ली चला आया। यहां कविता-कहानी लिखने के चलते कुछेक शीर्षस्‍थ कहानीकार उसे जानने लगे थे। ऐसे ही लोगों में थे दिल्‍ली निवासी चर्चित कथाकार और पत्रकार हिमांशु दिव्‍याल। दिव्‍यालजी दिल्‍ली से नए-नए शुरू हुए हिंदी दैनिक राष्‍ट्रीय समाचार के एसोसिएट संपादक के रूप में एडीट पेज और मुद्दों पर केंद्रित वीकली सप्‍लीमेंट के प्रभारी थे। हिमांशुजी का बौद्धिक हलकों में खासा नाम था। उनकी गिनती देश के चोटी के पत्रकारों में होती थी। वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नवांकुर रचनाकारों और पत्रकारों का मार्गदर्शन करते और उन्‍हें नौकरी दिलाने का प्रयास करते। नई दिल्‍ली स्‍टेशन से फोन कर बुद्धिराम हिमांशुजी के घर दिलशाद गार्डन जा पहुंचता है। हिमांशुजी आए और बहुत ही अपनापे के साथ मिले। कंधे पर हाथ रखते हुए बोले कि सब ठीक हो जाएगा थोड़ा धैर्य रखो। उनका पहला सवाल था कि तुम रहोगे कहां जिसका जवाब वह ठीक से न दे पाया। आखिर देता भी कैसे इस विषय में सोचा भी नहीं था। अंतत: उन्‍होंने अपने एक विधुर मित्र के घर उसके रहने की व्‍यवस्‍था करा दी। लगभग एक हफ्ते के बाद हिमांशुजी ने राष्‍ट्रीय समाचार के प्रबंधन से बातचीत कर उसको ट्रेनी जर्नलिस्‍ट के तौर पर रखवा दिया था। अखबार में ट्रेनी की सेलरी दो हजार रूपये प्रति माह थी। संपादक ने उसकी ड्यूटी बिहार डेस्‍क पर लगा दी थी। यहां प्रभारी के रूप में सारा कामकाज रिंदजी नाम के एक पुराने शायर देख रहे थे। उन्‍होंने बुद्धिराम से प्रारंभिक जानकारी ली और बोले कि तुम तो शक्‍ल से ही गंवार और जाहिल दिखते हो ऐसे में क्‍या करोगे पत्रकारिता। पत्रकारिता तो बड़ा जटिल काम है। रिंदजी धीरे से बुदबुदाते हुए बोले- ‘जाने कहां-कहां से जंगली लोग चले आते हैं।’ महात्‍मा गांधी तो मर गए पर दलितों का दिमाग खराब कर गए। बुद्धिराम को अखरा तो बहुत। उसका मन किया कि वह रिंदजी को सीट से उठाकर फेंक दे मगर मन मसोसकर रह गया। डेस्‍क पर कुल जमा तीन लोग थे। एक सी.पी.एन. सिंह दूसरे नरोत्तम शर्मा और तीसरा प्राणी बुद्धिराम खुद। रिंदजी कुर्सी डालकर बस बैठे रहते थे। डेस्‍क पर तार, कोरियर या फैक्‍स से खबर आने पर जिसे वे खाली देखते उसे पकड़ा देते। खुद सारे समय पत्रिकाएं-अखबार पढ़ते या कोई मोटी किताब यही उनकी शैली थी। पेज जब बनकर आता तो एक सरसरी नजर शीर्षकों और फोटो कैप्‍शनों पर डालकर ओ.के. कर देते। एक दिन साथी नरोत्‍तम शर्मा के साथ चाय पी रहा था तो वह बोला बुद्धिरामजी मीडिया में गरीबों-शोषितों की बात करने वाला कोई नहीं है। मीडिया पर सत्‍ता के साथ-साथ बिल्‍डरों, ठेकेदारों और नवधनाढ़यों का कब्‍जा हो चुका है। पिछले दस बरसों में मीडिया को करिअर के रूप में देखा जाने लगा है। इसमें परिवारवाद, करिअर के अलावा रसूख और ग्‍लैमर का भी प्रवेश हो चुका है। पत्रकारिता की शिक्षा अब अमेरिकन और यूरोप के सिद्धांतों पर दी जा रही है। निष्‍पक्ष और सरोकार वाली पत्रकारिता के दिन लद चुके हैं। इसके जिम्‍मेदार उपभोक्‍तावाद और बाजारवाद हैं। आज तो बस फील गुड वाली पत्रकारिता की जा रही है। 

अब बुद्धिराम को राष्‍ट्रीय समाचार में काम करते हुए लगभग छह महीने से चुके थे। उसके सामने पत्रकारिता की बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें करने वाले साथियों के दोहरे आचरण और दोमुंहेपन, चुगलहेपन, उखाड़-पछाड़, ईर्ष्‍या–द्वेष, जातिवाद की दिलों में बैठी खाईयां सीधी-सीधी नजर आ रही थीं। उसे साफ-साफ दिख रहा था कि डेस्‍क इंचार्ज, न्‍यूज एडीटर, फीचर संपादक, मैग्‍जीन हेड, ब्‍यूरो चीफ, चीफ रिपोर्टर जैसे किसी भी निर्णायक पद पर एक भी दलित या पिछड़ी जाति का व्‍यक्ति नहीं था। साठ व्‍यक्तियों के संपादकीय में एकाध लोगों को छोड़कर कोई भी दलित या अल्‍पसंख्‍यक नहीं था। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो पूरा का पूरा मीडिया वाभन, ठाकुर, लालाओं के हाथ में था। यही लोग अखबार के नियंता थे। इत्‍तफाक से अगर उस जैसे एकाध लोग काम कर भी रहे थे तो वे किसी खबर को रोकने/छापने या प्रकारांतर से नीतियों को प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं थे। इस अखबार को एक फाइनेंस कंपनी का मालिक चला रहा था जिसका उद्देश्‍य अपने मीडिया घराने के माध्‍यम से सत्‍ता के गलियारे में अपनी स्थिति और पहुंच को मजबूत बनाना था। यही वजह थी कि अखबार को खुशामदी स्‍वर वाला माना जाता था।



जाहर वीर गोगाजी टाइम्‍स:
दो साल बीतते-बीतते बुद्धिराम एक नए अखबार जेवीजी टाइम्‍स (जाहर वीर गोगाजी) में पहुंच गए। इस बार उन्‍हें एडीट पेज पर काम दे दिया गया था। एडीट पेज के इंचार्ज सहायक संपादक आर.के. मिश्र नाम के एक चोटीधारी पंडितजी थे। पंडितजी पूरे कर्मकांडी वेदपाठी ब्राह्मण थे। वे प्रतिदिन सुबह चंदन का टीका लगाकर और धोती कुर्ता पहनकर दफ्तर आते। ये सहायक संपादक महोदय अखबार में आरएसएस के एजेंट के रूप में रखे गए थे। इन महोदय का एकमात्र काम और उद्देश्‍य भाजपाई विचारधारा के विद्वानों के लेख छापना तथा मार्क्‍सवादियों को गाली देना था। यहां भी सभी प्रमुख पदों पर वही स्‍वर्ण भस्‍मासुर बैठे हुए थे। एक दिन पंडितजी की अनुपस्थिति में बुद्धिराम ने अंबेडकर की विचारधारा को आगे ले जाने वाला एक दलित विद्वान का लेख छाप दिया। लेख छपने से पहले संपादक उनियालजी को दिखा दिया था। दूसरे दिन पंडितजी ने दफ्तर आते ही इतना हंगामा किया कि पूछो मत। माफी मांग लेने के बावजूद उन्‍होंने बुद्धिराम वहां से हटवाकर हरियाणा डेस्‍क पर फिकवा दिया था।

हरियाणा डेस्‍क का इंजार्च एक मुस्लिम सख्‍स था जो कि काफी मिलनसार और अपने काम से काम रखता था। एक माह बाद ही वह किसी और अखबार में बड़े पद पर चला गया था जिसके बाद वरिष्‍ठता के नाते बुद्धिराम को प्रभारी बना दिया गया। इसके साथ ही यह निर्देश भी जारी किया गया कि खबरों के विषय में न्‍यूज एडीटर दुबेजी से निर्देश प्राप्‍त करें। 

दुबेजी ने मिलते ही कहा- ‘देख भाई तू दलित है सो तो ठीक है पर अखबार को चौपट मत करियो। मायावती, लालू, मुलायम की अंट-संट किस्‍म की खबरें दिखाकर भेजियो नहीं तो मेरी जिम्‍मेदारी ना है।’ वह स्‍वीकृति में सिर हिलाकर आ गया।

बुद्धिराम को लगता कि उसके गांव के प्रधान लंबरदार और यहां के पढ़े-लिखे बड़े पत्रकारों की सोच में कोई बहुत अंतर नहीं है। अब ढकोसला है। सारा परिवेश सैद्धांतिक वाग्‍जाल-भ्रमजाल और छद्म से भरा है। दो साल पूरा होने से पहले ही यह अखबार अपनी मूल फाइनेंस कंपनी के संकट में आने के चलते भरभराकर गिर गया था। अचानक ही अखबार बंद होने से बुद्धिराम और कई दूसरे साथियों के सामने अस्तित्‍व का संकट पैदा हो गया था कि कहां जाएं और क्‍या करें।

अंतत: बुद्धिराम फिर हिमांशुजी के सामने दयनीय, कातर और निरीह व्‍यक्ति की भांति बैठा हुआ था। हिमांशुजी ने फोन मिलाकर जाने किससे बात की और उससे मुखातिब हो बोले तुम कल नरसिंह नारायण से मिल लेना। यह कहते हुए उन्‍होंने एक स्लिप पकड़ा दी जिस पर उन सज्‍जन का पता लिखा हुआ था। अगले ही दिन वह नारायणजी से मिलने पहुंच गया। वे एक छोटा साप्‍ताहि‍क ‘जनवाणी’ निकालते थे जो उत्‍तराखंड में खासा लोकप्रिय था। उन्‍होंने तुरंत ही कुछ प्रारंभिक जानकारियां लीं जिसे हर नए मिलने वाले व्‍यक्ति को देना ही पड़ता था। अगले दिन से वो नारायणजी के दफ्तर पहुंच गया। वह उसी दफ्तर में रहकर काम करता और शाम को एक छोटे से कमरे में जाकर सो जाता। नरसिंह नारायण बहुत ही शालीन व्‍यक्ति थे। वह सामाजिक मुद्दों और सरोकारों वाली पत्रकारिता करते थे। वे हर स्‍टोरी को देखकर उसे नए ऐंगिल से लिखवाते। यहां उसे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा था। उनका व्‍यवहार भी पिता जैसा था। इसके बावजूद बुद्धिराम को लगा कि यहां कम वेतन में कब तक काम सीखता रहेगा इसलिए वह इधर उधर बैठे साथियों से फोन पर बात भी करता कि किस अखबार में जगह खाली है। अचानक एक दिन वह एक विज्ञापन पढ़ता है कि उत्‍तर भारत के एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जन जागरण को उप संपादकों की आवश्‍यकता है। बुद्धिराम ने भी एप्‍लाई कर दिया। अर्से बाद लिखित परीक्षा के साथ-साथ साक्षात्‍कार हुआ। लगभग माह भर के भीतर ही उसका बुलावा आ गया। वह फिर से एक नए अखबार के दफ्तर में था। जन जागरण में न्‍यूज एडीटर अजय ठाकुर थे, उन्‍होंने बुद्धिराम को डाक डेस्‍क पर भेज दिया। उसे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश संस्‍करण से संबद्ध किया गया, जहां हापुड़ एडीशन के पेजेज निकालने का जिम्‍मा दिया गया। यहां कुछ हद तक प्रोफेशनल किस्‍म का वातावरण था।

अचानक एक दिन उसके साथ काम कर रहे प्रशांत वर्मा ने कहा कि यहां सब कुछ ठीक है ऐसा मानना बेवकूफी होगी। यहां का जीएम बिहार का है सो चुन-चुनकर बिहारियों को ही प्रमोशन और अच्‍छा इंक्रीमेंट दिया जाता है। बाकी योग्‍यता गई तेल लेने। उसी ने कहा कि अपनी पंद्रह साला पत्रकारिता में आज भी उप संपादक से आगे नहीं बढ़ पाया हूँ। सच्‍चाई तो यह है कि नौकरी में कौन कितनी ऊंचाई पर जाएगा यह जातिवादी समीकरणों, उसके तेलीपन, चंपुअई पर निर्भर करता है। वर्मा बोला पिछले दस बरसों के दौरान हर अखबार में लड़कियों की संख्‍या काफी बढ़ गई है। न्‍यूज चैनलों में तो लड़कियों का खासा बोलबाला है। आखिर न्‍यूज चैनलों की टीआरपी तो खूबसूरत एंकरों से ही बढ़ती है। लड़कियों के मामले में हर इंचार्ज काफी उदार हो जाता है। मौका पड़ने पर ये लड़कियां सारे छिछोरेपन करने को तैयार रहती हैं। उसने देखा कि इसी दफ्तर में समाचार संपादक के पास एक महिला उप संपादक प्रतिदिन कभी गाजर का हलवा, कभी दही बड़ा कुछ न कुछ पकवान लेकर पहुंचती। दिन भर में एक दो बार सायास वह अपना दुपट्टा अपने वक्ष से जरूर हटाती। न्‍यूज एडीटर जो दूसरे लड़कों का खून पी जाता था वह इन लड़कियों के आगे हें...हें...हें... करता रहता। ज्‍यादातर लड़कियों को फीचर डेस्‍क पर शाम सात बजे तक ही रखा जाता। चाय सत्र के दौरान एक दिन बुद्धिराम को प्रशांत ने बताया कि कई बार यहां टायलेट में कंडोम निकल चुके हैं। इतने में खेल डेस्‍क वाला शुक्‍ला बोला- तीस साल तक मां-बाप लड़कियों की शादी नहीं करेंगे तो क्‍या होगा? आखिर उनका भी तो मन है, जीती जागती दुनिया की इंसान तो वे भी हैं। उनके भीतर भी आनंद की इच्‍छा कुलांचे भरती है। प्रशांत ने कहा यार बुद्धि यहां एक से एक केंचुआ, घोंघा, भिड़, बर्रे, कीड़ा, बीछी टाइप के लोग हैं, जो आदमी के हर मूवमेंट को सूंघते रहते हैं। ये सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। मौका पड़ने पर काट खाते हैं। कौन मोबाइल पर कितनी देर बतियाता है, कौन कित्‍ती बार चाय पीने बाहर जाता है, लोगों के हगने, मूतने का हिसाब रखने वाले मैनेजमेंट के इनफार्मर भी यहां हैं। यहां जितना काम जरूरी है उतना ही डेस्‍क इंचार्ज को मक्‍खन लगाना भी।

एक दिन सीनियर संपादक दादा बुद्धिराम से कहने लगे कि अब जमाना बदल गया है- ‘पहले मालिक संपादक के केबिन में पूछकर जाता था पर अब तो वह सीधे दिन में दस बार इंटरकाम पर बुलाता रहता है।’ पीढि़यों के बदलाव के साथ ही अब संपादकों ने अपनी नई भूमिका के तहत अखबार मालिकों के हितों के लिए काम करना शुरू कर दिया है। मालिकों को सस्‍ते दरों पर न्‍यूजप्रिंट दिलाने से लेकर, सस्‍ती भूमि, निजी सुविधाएं दिलाने, विज्ञापन जुटाने, हवाई यात्राएं प्रायोजित करने के काम मुख्‍य हो गए हैं। सुविधाएं न जुटाने पर लात मारकर निकाले जाने वाले संपादक अब ढूंढने से नहीं मिलेंगे और तो और अपने स्‍टाफ को ठीक-ठीक वेतन और सुविधाएं, वातावरण दिलाने के लिए लड़ने वाले संपादक अब समाप्‍त हो चले हैं। अब कोई संपादक इस्‍तीफा नहीं देता बल्कि सारे दंद-फंद कर येन-केन प्रकारेण अपनी कुर्सी बचाए रखते हैं। संपादक का बस नाम रह गया है उसकी भूमिका बदलकर अब सिर्फ सीईओ या मैनेजर की हो गई है। संपादक की भूमिका बदली जरूर है मगर आज भी कुछ ऐसे संपादक हैं जो पद की गरिमा को काफी हद तक बचाए हुए हैं।

इसी अखबार में काम करते हुए एक दिन बुद्धिराम को मौखिक निर्देश दिया गया कि खबरों के शीर्षक सही ढंग से लगाएं और मायावती की खबर को जरूरत से ज्‍यादा तवज्‍जो देने की जरूरत नहीं है। एक दिन सीजीएम का नोटिस आ जाता है कि सभी संपादकीय सह कर्मियों को सूरजकुंड में प्रतिदिन दस बजे से दो बजे तक चलने वाली तीन दिवसीय विशेष कार्यशाला में अनिवार्य रूप से हिस्‍सा लेना है। कार्यशाला के लिए प्रतिदिन जाने की व्‍यवस्‍था नोएडा स्थि‍त कार्यालय परिसर से प्रात: नौ बजे की जाएगी।

कार्यशाला के पहले दिन ही समूह संपादक अजय गुप्‍ता डायस पर आते ही बोले-
जैसा कि आप सभी को मालूम है कि हमारा अखबार दिन प्रतिदिन सफलता की ओर अग्रसर है और हम कानपुर देश के आखिरी छोर जम्‍मू और दसरे छोर कोलकाता तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इस सबके पीछे मार्केटिंग टीम, कुशल संपादकीय टीम का बहुत बड़ा योगदान है।’ तभी पीछे से धीमे स्‍वर में किसी ने कमेंट किया कि- ‘तभी तो संपादकीय को साल में दस परसेंट और मार्केटिंग को दो बार बीस परसेंट का इंक्रीमेंट मिलता है।

अजय गुप्‍ता ने संपादकीय टीम के लिए कुछ नए दिशा-निर्देश जारी किए- 
1. खबरों के साथ आकर्षक फोटो का प्रयोग करें।
2. सेलीब्रेटीज के समाचार बढ़ाएं उन्‍हें बेहतर ढंग से डिस्‍प्‍ले दें।
3. पीआर विज्ञप्तियों को समाचार में बदलें।
4. किसानों की आत्‍महत्‍याओं और जन संघर्षों की खबरें कम लगाएं।
5. रेवेन्‍यू रिलेटेड न्‍यूज को सभी पेजों पर पूरी प्राथमिकता दें।
6. फीचर सप्‍लीमेंट में कलर पेजेज पर नेताओं और फिल्‍म वाली पार्टियों के फोटो और समाचार अधिक लगाएं।
7. युवा वर्ग को लुभाने के लिए फीचर पेजेज पर हीरोइनों की सेक्‍सी फोटो जरूर प्रयोग करें।
8. विदेशी खबरों में ग्‍लैमर से जुड़े समाचार बढ़ाएं।
9. हिंदी शब्‍दों के साथ अंग्रेजी के शब्‍दों का प्रयोग कर समाचारों को स्‍मार्ट बनाएं।
10. सभी संपादकीय सहयोगी दाढ़ी बनाकर स्‍मार्ट तरीके से रहें।

कार्यशाला में तीन दिनों तक कई समाचार संपादकों/विद्वानों ने जमकर ज्ञान का अमृत उड़ेला। भाषण इतना बोरिंग था कि जिससे बुद्धिराम समेत कई संपादकीय साथी इस बीच सीट पर बैठे ऊंघते ही रहे। दसवां निर्देश पढ़कर तो कई सहयोगी भन्‍ना गए कि यह अखबार का दफ्तर है या किसी मल्‍टीनेशनल कंपनी का। बुद्धिराम को लगा कि पत्रकारिता अब मिशन के बजाय सिर्फ प्रोफेशन बनकर रह गई है। ऐसी पत्रकारिता का क्‍या फायदा कि – ‘जल्‍द बच्‍चे को जन्‍म देंगी ऐश्‍वर्या’ जैसी खबरें छापी जाएं। एक साथी शमीम बुद्धिराम से बोला- मालिकों को तो ऐसा लगता है कि अखबार सिर्फ मार्केटिंग के बल पर चल रहा है। यही वजह है कि उनको कमाऊ पूत और हम सबको खर्चाऊ पूत समझा जाता है। दफ्तर में कार्यशाला के निर्देशों की कई दिनों तक व्‍याख्‍या होती रही।

समय बीतता जाता है। बुद्धिराम उत्‍तर भारत में दलित समाज की स्थिति पर लेख लिखता है जिसे वह बाद में प्रकाशन के लिए सहायक संपादक और संपादकीय पेज के प्रभारी सदानंदजी के पास लेकर जाता है- ‘वे लेख देखते ही भड़क गए कि देखो भाई इस तरह का लेख किसी दलित पत्रिका को भेज दो। ये लेख अखबार की नीति से मेल नहीं खाता। हमारे अखबार के रीडर दलित नहीं हैं। वैसे भी इन भूखे नंगे दलितों के पास अखबार खरीदने के लिए पैसा ही नहीं है फिर इन्‍हें पढ़वाकर क्‍या करना।’ बुद्धिराम मन मसोसकर रह गया। लेख को उसने एक वैचारिक पत्रिका को भेज दिया जो अगले अंक में छपा और उसके मोबाइल में एसएमएस और चिट्ठियों के रूप में काफी सारी प्रतिक्रियाएं आईं। इन प्रतिक्रियाओं ने उसके भीतर एक नया जोश और जज्‍बा भर दिया। उसे लेखन की सार्थकता और ताकत का नया एहसास हुआ।

बुद्धिराम को पत्रकारिता में देखते-देखते बारह साल बीत गए। न तो प्रमोशन मिला, न बुद्धिराम उप संपादक से आगे बढ़ पाया। उसे कई बार लगा कि वो किसी ढोर या डांगर की मानिंद है जो सिर्फ अपना पेट भरने के लिए मजदूरों की भांति खट रहा है। नौकरी में उसे कभी भी डेस्‍क इंचार्ज नहीं बनाया गया। पेज फर्स्‍ट पर भी नहीं रखा गया, संपादकीय पर भी नहीं। हर अखबार नौकरी तो उसको देता मगर बस डाक, सिटी अथवा फीचर जैसी अनुपयोगी डेस्‍कों पर। इन डेस्‍कों पर कुछ भी रचनात्‍मक या सार्थक पत्रकारिता कर पाना वैचारिक रूप से लिख पढ़ पाना संभव नहीं था। कंप्यूटर स्‍क्रीन पर आंख गड़ाकर बस बिंदी-कामा ठीक करो या अनुवाद करो।

घर पर एक वीकली ऑफ के दिन बुद्धिराम एक साहित्यिक पत्रिका पलट रहा था कि एक सर्वे पर निगाह पड़ती है। सर्वे अखबारी संस्‍थानों में दलितों की स्थिति पर था। सर्वे का सार था कि लगभग सभी संस्‍थानों में प्रमुख पदों पर सवर्णों का कब्‍जा था। दलित, स्‍त्री और अल्‍पसंख्‍यक हैं भी तो बस दिखावे के लिए या फिर उन्‍हें दोयम दर्जे के कामों पर रखा गया है। यहां बैठकर कभी भी वे नीतियों और प्रकाशित होने वाले समाचारों/फीचर को किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं कर सकते। ऐसे में उसकी पत्रकारिता बस नौकरी बनकर रह गई थी। वह जिन उद्देश्‍यों और सपनों को लेकर आया था वे कहीं से भी पूरे होते न दिख रहे थे। अखबार की अस्थिर नौकरी के चलते ही बुद्धिराम ने शादी भी नहीं की थी।

एक दिन बुद्धिराम समय पर दफ्तर नहीं पहुंच पाता, तो अगले दिन उससे जवाब मांगा जाता है कि आप संस्‍थान में टाइम टेबल का पालन नहीं कर रहे हैं। जब वह समाचार संपादक के पास पहुंचता है तो वे भन्‍नाकर कहते हैं कि- ‘मैं क्‍या करूं आपकी आरती उतारूं या सीजीएम का नोटिस देखूं।‘ उसे याद आया कि यही न्‍यूज एडीटर ठाकुर मैन पावर कम होने पर उसके पास रिरियाते हुए आता और चाय भिजवाकर काम करवाता। काम खत्‍म होते ही फिर भूल जाता था। इनके बारे में कहा जाता था कि ये किसी को भी कंडोम की तरह इस्‍तेमाल कर फिर हाशिए पर डाल देते। पिछले तीस सालों से टाप मैनेजमेंट के नाक का बाल बने हुए थे। कितने जीएम और एजीएम आए और चले गए फिर भी न्‍यूज एडीटर ठाकुर अखाड़े के लतमरुआ पहलवान की तरह डटे ही रहे। यही वजह थी कि वे ग्रुप में अजेय थे।

एक दिन बैठे ठाले बुद्धिराम को सूझता है कि रोज-रोज के मरने से बेहतर है कि क्‍यों न वह अपनी पत्रिका निकाले। अखबार के दफ्तर में दिया गया उसका इस्‍तीफा धमाका कर देता है। उसका इस्‍तीफा तमाम संस्‍थानों में चर्चा का विषय बन जाता है। वह प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया की भूमिका पर कई तीखे सवाल उठाता है जिससे बौद्धिक जगत में काफी हलचल होती है। देखते ही देखते बुद्धिराम अखबारी दुनिया को नमस्‍कार कर विकल्‍प के रूप में अपनी पत्रिका शुरू कर देता है जिसका नाम होता है ‘दलित विमर्श।

बुद्धिराम तमाम हलचलों से दूर शांत भाव से किसी वीतरागी की तरह कमरे पर बैठकर डाक से आने वाले लेख और पत्र देखता है, फोन पर बतियाता है। बुद्धिराम अब अपनी पत्रिका के जरिए पिछड़े, दलितों तथा हाशिए के लोगों को जागरूक बनाने में अपना पूरा श्रम व समय लगा देता है। कुछ समय बाद देखते ही देखते पत्रिका चल निकलती है और बुद्धिराम पीर, बबर्ची, भिश्‍ती, खर की भांति संपादक से लेकर चपरासी तक की भूमिका का निर्वाह करता है। धीरे-धीरे उसकी गिनती दलित चिंतकों में होने लगती है। खुली हवा में सांस लेना और अपने दलित समाज के लिए कुछ कर पाने के अहसास से बुद्धिराम को काफी शांति, सुख और संतुष्टि का अनुभव होता है। 

वह ख्‍यालों में खोया ही रहता मगर अचानक डेस्‍क इंचार्ज शुक्‍लाजी की कर्कश आवाज उसके कान में पड़ती है- बुद्धिरामजी एक घंटे से आप खबर क्‍यों नहीं बनाकर दे रहे हैं? उसकी तंद्रा अचानक भंग हो जाती है और वो अतीत से निकलकर वर्तमान में आ जाता है। जवाब में ‘अभी देता हूँ’ कहकर झटके से बाहर निकल जाता है। धीरे-धीरे उसके कदम चाय की दुकान की ओर बढ़ जाते हैं... बुद्धिराम फिर सीट पर आ बैठता है। उसके हाथ की बोर्ड पर चलते हैं मगर वह क्‍या टाइप करता है खुद समझ नहीं आता। वह फिर सीट छोड़कर टाइलेट जाता है। लौटकर फिर सीट पर आ बैठता है मगर उसका मन काम में नहीं लगता। उसका आत्‍मविश्‍वास डगमगाने लगता है। 

वह वर्ल्‍डपैड में जाकर रिजाइन फाइल बनाकर इस्‍तीफा टाइप करता है। इसी बीच अम्‍मा, बापू के चेहरे, घर-परिवार की दिक्‍कतें उसके सामने सवाल बनकर आ खड़ी होती हैं। बापू की बीमारी और मुनिया की शादी की जिम्‍मेदारी भी उसके कंधों पर थी... 

अचानक वह फिर कंप्यूटर पर लौटता है और आरएनआई की साइट से नई पत्रिका के लिए फार्म डाउनलोड करता है... इतने में शुक्‍लाजी फिर दहाड़े, बुद्धिरामजी आपका ‘अभी देता हूँ’ कब पूरा होगा?... बुद्धिराम स्वप्न की दुनिया से सीधे हड़बड़ाकर खबर पर वापस आता है और उसकी उंगलियां की बोर्ड पर दौड़ने लगती हैं...

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अशोक मिश्र
जन्मतिथि – 14 सितंबर  1962  ( उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिला स्थित सुचित्तागंज बाजार कस्बे में )  
शिक्षा – पत्रकारिता -जनसंचार में स्नातकोत्तर एवं बी.एड. ।    
लेखन विधा – शुरुआत लघुकथा से, बाद में कहानी, पुस्तक समीक्षा, साक्षात्कार, रपट, टिप्पणियां, लेख, फीचर आदि विधाओं में लेखन । 
संप्रति – इन दिनों महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की वेबसाइट हिंदी समय के संपादक ।  
मार्च 2012  से  दिसंबर 2019 तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन के संपादक । जनवरी 2018 -2019  के दौरान पुस्तक वार्ता का संपादन ।  
वर्ष 1992 से फैजाबाद से प्रकाशित दैनिक जनमोर्चा से पत्रकारिता की शुरुआत। तत्पश्चात राष्ट्रीय सहारा, डेली हिंदी मिलाप, दैनिक जागरण, अमर उजाला और इंडिया न्यूज व आज समाज दैनिक के संपादकीय विभागों से संबद्ध रहकर 20 बरस पत्रकारिता की । सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में विशेष ख्याति । 
प्रकाशन – परिकथा, लमही, पाखी, हंस, नया ज्ञानोदय, जनसत्ता सबरंग, साहित्य अमृत,  आजकल, इंद्रप्रस्थ भारती सहित कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, संस्मरण, फीचर, समीक्षाएं एवं अन्य रचनाएं प्रकाशित ।  सपनों की उम्र लघुकथा संग्रह (2004), मीडिया का अंतर्पक्ष ( संपादित), कहानी संग्रह दीनानाथ की चक्की शीघ्र प्रकाश्य । मीडिया पर संपादित एक पुस्तक और लेखों का संग्रह प्रकाशनाधीन ।    
सम्मान – दीनानाथ की चक्की कहानी को वर्ष 2002 का किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित आर्य स्मृति साहित्य सम्मान । उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग बस्ती सहित दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पत्रकारिता व लेखन के लिए सम्मानित । 
वर्ष 1987 से  1993 के दौरान फैजाबाद से  लघुकथा केंद्रित पत्रिका रचनाकार वार्षिकी का संपादन और प्रकाशन। वर्ष 2010 से दिल्ली से छमाही पत्रिका रचना क्रम का संपादन, जिसके वर्ष 2012 तक कुल तीन अंक प्रकाशित हुए ।    

संपर्क – संपादक हिंदी समय  
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, पोस्ट- गांधी हिल्स  
वर्धा-442005 (महाराष्ट्र)
ईमेल – amishrafaiz@gmail.com  
मोबाइल –  07888048765 
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