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विष्णु कुटी और कुँवर नारायण की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 16: | Vinod Bhardwaj on Kunwar Narain



कुँवर नारायण के उस घर में अमीर खान, जसराज, कारंत, संयुक्ता पाणिग्रही , अज्ञेय , अलकाजी जैसे कई नाम कुँवर नारायण के ख़ास मेहमान बन कर रह चुके थे। अमीर खान ने हंसध्वनि की अद्भुत रिकॉर्डिंग वहीं करायी थी। बिरजू महाराज का गायन हो या रघुवीर सहाय की कविता दे दिया जाता हूँ की दुर्लभ रिकॉर्डिंग, विष्णु कुटी में क्या नहीं हुआ था। 


विष्णु कुटी और कुँवर नारायण की यादें

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

जिस लखनऊ में मैं जवान हुआ, वहाँ उन दिनों लेखन की दुनिया की एक प्रसिद्ध त्रिमूर्ति सक्रिय थी। यशपाल, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा। भगवती बाबू को सिर्फ़ मैंने दूर से देखा, उनके मकान चित्रलेखा को भी बाहर से ही। क्रांतिकारी लेखक यशपाल के दो मकान थे, एक हीवेट रोड पर जिसके बाहर साथी प्रेस लिखा होता था। महानगर के उनके बड़े मकान के बाहर सिर्फ़ यशपाल लिखा होता था — झूठा सच नहीं। इन दोनों मकानों में मेरा कई बार जाना हुआ, यशपाल का भतीजा अनलपाल मेरा इंटर में सहपाठी था। उसकी बहन सरोजपाल गोगी आज बहुत मशहूर कलाकार हैं। उन दिनों वह मेरे वरिष्ठ कलाकार मित्र जयकृष्ण अग्रवाल की पहली पत्नी थीं। ये दोनों लघु पत्रिका आरम्भ से जुड़े थे। 


अमृतलाल नागर की दुनिया पुराने लखनऊ यानी चौक तक सीमित थी। एक बार एक साहित्यिक आयोजन सुरेंद्र तिवारी ने अपने घर पर किया, जहाँ युवा लेखक के रूप में मैं भी आमंत्रित था। नामी लोग रचनाएँ पढ़ रहे थे। मेरा नाम पुकारा गया, तो मैंने शायद घबड़ा के कहा, मेरी रचनाएँ यहाँ नहीं खपेंगी। मुझे नागर जी का बुलंद आवाज़ में कॉमेंट आज भी याद है, बच्चा, इस संसार में सब कुछ खप जाता है। 

नागर जी के चौक वाले घर यानी एक हवेली में मैं दो बार गया। एक बार प्रयाग शुक्ल दिनमान के लिए निराला के गाँव गढ़ाकोला जा रहे थे, बोले तुम भी चलो। उसी सिलसिले में हम नागर जी के घर गए। उनके घर की बैठक, खुला आँगन मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। दूसरी बार सत्यजीत राय और कुँवर नारायण के साथ चौक गया। राय शतरंज के खिलाड़ी बना रहे थे। नागर जी के घर फिर जाना हुआ। 

यशपाल से मिलने, बतियाने का ज़्यादा मौक़ा मिला। साथी प्रेस में तो रौबदार प्रकाशवती पाल ही मिलती थीं। वे ज़्यादा हमें लिफ़्ट नहीं देती थीं। बरसों बाद वह जब बच्चन की आत्मकथा से दुखी हुईं, तो वह मेरे घर आ गयीं। उन्होंने मुझे अपनी दिलचस्प यादें सुनाईं और कहा तुम इस पर लिखो। मैंने मंगलेश डबराल की स्वीकृति के बाद जनसत्ता में उस विवाद पर लिखा भी। उनका कहना था, तेज़ी एक बार लखनऊ अबॉर्शन के चक्कर में आयी भी थीं। सोचिए, अमिताभ बच्चन न पैदा हो पाते, तो हमारे फ़िल्म उद्योग का क्या होता। 

कुँवर नारायण | फ़ोटो: भरत एस तिवारी


यशपाल शाम को कॉफ़ी हाउस में जब आते थे, तो सब लेखक उन्हें घेर लेते थे। वे दिलचस्प क़िस्से सुनाते थे। एक बार बोले, मैं सिगरेट इस लिए पीता हूँ ताकि दिमाग़ का कूड़ा निकल सके, गाँव के लोग जैसे मच्छर भगाने के लिए आग जलाते हैं। यशपाल सेक्स को ले कर भी काफ़ी दिलचस्प बातें करते थे। एक बार अपने ख़ास अन्दाज़ में बोले, मुझे ये बड़ा अजीब लगता है कि सुंदर स्त्रियों को भी पेशाब करने जाना पड़ता है। मुझे यशपाल के महानगर वाले घर में भी कई बार जाने का मौक़ा मिला। 

कुँवर नारायण के घर का नाम था — विष्णु कुटी। उनके पिता का नाम था, विष्णु नारायण। पिता ज़्यादातर फ़ैज़ाबाद में रहते थे। आते थे, तो पूरे तामझाम के साथ। एक बड़ा अलग तरह का परिवार था उनका। वे अकेले नहीं आते थे और विष्णु कुटी की एनेक्सी में रहते थे। मेरे सामने वे एक ही बार आए। इस हिस्से में जयकृष्ण और कवि नरेश सक्सेना भी रह चुके हैं। 

आज विष्णु कुटी टूट चुकी है, उसका कोई रेकर्ड विडीओ या तस्वीरों में खोजना आसान नहीं है। कुँवर नारायण के सुपुत्र अपूर्व आज इस बात का बड़ा अफ़सोस करते हैं। उस घर में अमीर खान, जसराज, कारंत, संयुक्ता पाणिग्रही , अज्ञेय , अलकाजी जैसे कई नाम कुँवर नारायण के ख़ास मेहमान बन कर रह चुके थे। अमीर खान ने हंसध्वनि की अद्भुत रिकॉर्डिंग वहीं करायी थी। बिरजू महाराज का गायन हो या रघुवीर सहाय की कविता दे दिया जाता हूँ की दुर्लभ रिकॉर्डिंग, विष्णु कुटी में क्या नहीं हुआ था। 

पर आज विष्णु कुटी सिर्फ़ यादों में है। दिल्ली आ कर एक छोटे मकान में रहने वाले कुँवर नारायण की उस विशाल और भव्य विष्णु कुटी के न रहने के दर्द को कुछ ही लोग समझ सकते हैं। पर कुँवर नारायण का स्वभाव कुछ ऐसा था कि अपनी निजी पीड़ा के बारे में वह कुछ बोलते नहीं थे। किसी मुश्किल हालात में वह अपने इमोशन को दिखाते ही नहीं थे। नियंत्रण कर लेते थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। 

विष्णु कुटी उन्होंने अंत में 2006 में बेच दी, कई कारण थे। उनके मकान की बग़ल में मंदिर माफ़िया ने पूरी सड़क पर क़ब्ज़ा कर लिया था। उनका शोर असहनीय हो गया था। नब्बे के दशक के मध्य में एक दुखद घटना ने उन्हें अंदर से और भी तोड़ दिया। उनकी पत्नी भारती फ़ैज़ाबाद में थीं, बेटा मुंबई में और उनका ड्राइवर कुछ गुंडे ले कर उनके घर पैसों और ज़ेवर की तलाश में उन्हें अकेला पा कर अत्याचार की सीमाएँ तोड़ कर एक ऐसा घाव कवि के मन में छोड़ गया जिसके बारे में वह कभी कुछ बोलते नहीं थे। लखनऊ उनके लिए जीने लायक नहीं रह गया। दिल्ली तो उन्होंने अस्सी के दशक के अंत में ही अपना ली थी। कभी कभी लखनऊ चले जाते थे। 

लखनऊ में कृष्णनारायण कक्कड़ एक अलग व्यक्तित्व थे — बुद्धिजीवी, अंग्रेज़ी के अध्यापक, कलाकार, कला और साहित्य समीक्षक सब कुछ थे। कुँवर नारायण के गहरे दोस्त भी थे। युवा लेखकों को काफ़ी समय देते थे, उनकी मदद भी करते थे। रिक्शा में बैठ कर लखनऊ की सड़कों में भटकते रहते थे। रिक्शा करने का भी उनका एक अलग स्टाइल था, पहले बहुत ग़ौर से चलाने वाले की क़द-काठी देखते थे। मरगिल्ला क़िस्म का रिक्शावाला उन्हें पसंद था। लखनऊ की संस्कृति में होमोसेक्शूऐलिटी भी हवा में रहती थी। वे अविवाहित थे, बहन ने भी विवाह नहीं कराया था। एक बार कुछ ठंडी हवा के हल्के नशे में मुझसे रिक्शे में बोले, मेरा मन कर रहा है तुम्हें चूम लूँ। पर मेरे में ऐसा कोई रुझान दूर दूर नहीं था। लखनऊ में चिकने लड़कों का अपना नशा हवा में रहता था पर मुझे सिर्फ़ लड़कियाँ आकर्षित करती थीं। 

एक बार मैं कक्कड़ जी के साथ हज़रत गंज में लखनऊ की मशहूर गंज़िंग का मज़ा ले रहा था, की एक छोटी ख़ूबसूरत कार आ कर हमारे पास रुकी। वोक्स वागेन कार थी। कुँवर जी ख़ुद ड्राइव कर रहे थे। बोले, कक्कड़ घर चलो। उन्होंने मुझे भी निमंत्रण दिया। कक्कड़ जी ने कुँवर जी की विष्णु कुटी को काफ़्का का कैसल बना रखा था। घर पर अपनी स्टडी में कुँवर जी ने अपनी नई कविता सूत्रधार सुनाई, राय भी माँगी और मैंने अपने जोश में कुछ ख़राब राय दे दी। वापस हमें कमज़ोर रिक्शे में ही जाना था, मुझे काफ़ी कुछ सुनना पड़ गया, अमां इतने बड़े कवि की कविता पर नेगेटिव बातें कहे जा रहे थे। 

उसके बाद विष्णु कुटी मेरा दूसरा घर बन गयी, कुँवर जी ने अपनी निजी स्टडी के इस्तेमाल की पूरी छूट मुझे दे दी। ड्रॉइंग रूम की बग़ल में एक छोटा सा गेस्ट रूम था जहाँ मैं एअर कंडिशनर चला कर पढ़ते पढ़ते सो जाता था। वोल्टास का एअर कंडिशनर हमने तब देखा भी नहीं होता था। हाथ में बोरखेस की किताब, बग़ल में टाइम्ज़ लिटरेरी सपलीमेंट की पूरी फ़ाइल, सोचिए ज़रा। 

मेरा साहित्यिक जीवन कुँवर नारायण ने बदल दिया। वे मेरे दोस्त, बड़े भाई , पिता कुछ भी हो सकते थे। वह बहुत पैसे वाले नहीं थे, ठीकठाक ज़िंदगी आराम से बिता रहे थे। स्पीड मोटर कम्पनी में वे सिर्फ़ कुछ काग़ज़ साइन करने जाते थे। आकारों के आसपास कहानी संग्रह में उन्होंने अपने परिचय में लिखा, साहित्य का धंधा न करना पड़े इसलिए मोटर का धंधा करता हूँ। 

वे ख़ुद ही बताते थे, कैलाश वाजपेयी ने मुझ पर एक कविता में कहा है, बड़े बाप के बेटे हैं, जब से जन्म हुआ लेटे हैं। पर विष्णु नारायण उस तरह के बड़े आदमी नहीं थे। वे पीने के काफ़ी शौक़ीन थे, बेटा पीता ही नहीं था। बड़े भाई ही बिजनेस देखते थे, कुँवर जी ख़ुद को मात्र स्टेपनी कहते थे। 

वे किताबों को ख़ूब डूब कर पढ़ते थे, फ़िल्में बहुत देखते थे, चंदगी राम की कुश्ती भी उन्हें बहुत पसंद थी। उम्र में इतना बड़ा फ़ासला पर हमारी दोस्ती अनोखी थी। मेरी पत्नी देवप्रिया किसी लड़की से ईर्ष्या नहीं करती थी, पर जब कुँवर जी दिल्ली आते थे, तो उसे चिंता होती थी। 

कुँवर जी बहुत सहज थे, बड़प्पन के बिलकुल शिकार नहीं थे। एक बार अनुवाद की बात आयी, तो उन्होंने एक ही दिन में मेरी चार कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद कर दिए। 

अपूर्व उनका बेटा भी अद्वितीय है, पिता की बीमारी में जो उसने किया वो बेमिसाल है आज के ज़माने में। 

उसे सचमुच बहुत दुख है विष्णु कुटी के न रहने का। इन यादों को दर्ज कर दिया ताकि सनद रहे। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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