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विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 12 : यशपाल | Vinod Bhardwaj on Yashpal

सित॰ 24, 2015

यशपाल - विनोद भारदवाज संस्मरणनामा  

विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 12 : यशपाल | Vinod Bhardwaj on Yashpal

लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, फिल्मकारों की दुर्लभ स्मृतियाँ

संस्मरण 12

कवि, उपन्यासकार, फिल्म और कला समीक्षक विनोद भारदवाज का जन्म लखनऊ में हुआ था और टाइम्स ऑफ़ इंडिया की नौकरी क़े सिलसिले में तत्कालीन बॉम्बे में एक साल ट्रेनिंग क़े बाद उन्होंने दिल्ली में दिनमान और नवभारत टाइम्स में करीब 25 साल नौकरी की और अब दिल्ली में ही फ्रीलांसिंग करते हैं.कला की दुनिया पर उनका बहुचर्चित उपन्यास सेप्पुकु वाणी प्रकाशन से आया था जिसका अंग्रेजी अनुवाद हाल में हार्परकॉलिंस ने प्रकाशित किया है.इस उपन्यास त्रयी का दूसरा हिस्सा सच्चा झूठ भी वाणी से छपने की बाद हार्परकॉलिंस से ही अंग्रेजी में आ रहा है.इस त्रयी क़े  तीसरे उपन्यास एक सेक्स मरीज़ का रोगनामचा को वे आजकल लिख रहे हैं.जलता मकान और होशियारपुर इन दो कविता संग्रहों क़े अलावा उनका एक कहानी संग्रह चितेरी और कला और सिनेमा पर कई किताबें छप चुकी हैं.कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार क़े अलावा आपको संस्कृति सम्मान भी मिल चुका है.वे हिंदी क़े अकेले फिल्म समीक्षक हैं जो किसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जूरी में बुलाये गए.1989 में उन्हें रूस क़े लेनिनग्राद फिल्म समारोह की जूरी में चुना गया था. संस्मरणनामा में विनोद भारद्धाज चर्चित लेखकों,कलाकारों,फिल्मकारों और पत्रकारों क़े संस्मरण एक खास सिनेमाई शैली में लिख रहे हैं.इस शैली में किसी को भी उसके सम्पूर्ण जीवन और कृतित्व को ध्यान में रख कर नहीं याद किया गया है.कुछ बातें,कुछ यादें,कुछ फ्लैशबैक,कुछ रोचक प्रसंग.

संपर्क:
एफ 16 ,प्रेस एन्क्लेव ,साकेत नई दिल्ली 110017
ईमेल:bhardwajvinodk@gmail.com
विनोद भारदवाज संस्मरणनामा - 12 : यशपाल | Vinod Bhardwaj on Yashpal
यशपाल साठ के दशक में लखनऊ की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति के सबसे चर्चित और आधुनिक लेखक थे. अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा और यशपाल की इस त्रिमूर्ति में वर्माजी से मेरा दूर से ही नमस्कार का रिश्ता था. नागरजी से थोड़ा बहुत परिचय था, पर यशपाल के महानगर वाले घर भी आना जाना था और कॉफी हाउस में शाम को जब वे लेखकों से घिरे बतिया रहे होते थे, तो कभी कभी मैं भी वहां बैठ जाता था. कोने की एक मेज़ में गोपाल उपाध्याय, प्रबोध मजूमदार वगैरह उन्हें घेर लेते थे. यशपाल उन्हें दिलचस्प किस्से सुनाते रहते थे. महानगर के उनके घर में एंट्री का एक कारण भी था. इंटर करते हुए कान्यकुब्ज कॉलेज में यशपाल का भतीजा अनल पाल मेरा सहपाठी था. वो उम्र में मुझसे बड़ा था पर बीमारी के कारण उसे अपनी पढाई छोड़ देनी पड़ी थी. वह मार्क्स और फ्रायड के उद्धरणों से अपनी बात करता था. उसकी छोटी बहन गोगी सरोजपाल चितेरी थी और प्रिंटमेकर जयकृष्ण से उसका प्रेम विवाह हुआ था. गोगी और अनल पर अपने क्रन्तिकारी तायाजी का गहरा असर था. अनल के कारण मैं यशपाल के घर कई बार चला जाता था. बाद में यशपाल के बेटे आनंद की कार के पीछे एनकाउंटर पत्रिका के अंक सजे हुए रखे देखता था. यशपाल लखनऊ की हस्ती थे और उनकी बातें भी काफी रसभरी होती थीं. साथी प्रेस हमारे कॉलेज के पास ही था जहाँ कभी कभी यशपाल की डेंटिस्ट रह चुकीं पत्नी प्रकाशवती पाल से मेरा सामना हो जाता था. अब वह यशपाल के विप्लव प्रकाशन का काम देखती थीं.

कॉफी हाउस में अपने प्रशंसकों से घिरे यशपाल अपनी पूरी फॉर्म में होते थे. एक बार मैं जब उनकी मेज पर बैठा हुआ था, तो वो सिगरेट पीने को दिमाग के मच्छर भगाने का उपाय बता रहे थे. जैसे गावं के लोग मच्छर भगाने के लिए आग जलाते हैं वैसे ही हम सिगरेट पीते हैं. यशपाल की कुछ जिज्ञासाएं भी अनोखी और शरारती होती थीं. मिसाल के लिए एक बार वे कह रहे थे, कभी कभी मैं सोचता हूँ सुन्दर स्त्रियां पेशाब करने कैसे जाती होंगी?
बरसों बाद जब यशपाल नहीं थे, तो प्रकाशवती बच्चन की आत्मकथा में अपने से जुड़े प्रसंगों से बहुत नाराज़ थीं. वे दिल्ली में कई बार मेरे घर आयीं और एक बार जनसत्ता में मैंने उनकी कहानी थोड़ी बहुत लिखी भी. उन्होंने बातचीत में एक दिलचस्प तथ्य बताया की तेज़ी बच्चन एक बार अमिताभ के जन्म से पहले एबॉर्शन के इरादे से लखनऊ भी आई थीं. सोचिये, ऐसा हो जाता तो मुम्बईया फिल्म उद्योग को कितना नुकसान होता. तस्वीरों से लगता है प्रकाशवती कभी सुन्दर रही होंगी. कभी मैं साथी प्रेस में उनके सामने आने से घबराता था और अब उन्हें छड़ी के सहारे चलते हुए अपनी कहानी का सच छपवाने के लिए परेशान देख कर अच्छा नहीं लगता था. मंगलेश डबराल उनका सच, कौन जाने सच्चा या झूठा, छापने को तैयार हो गए.


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