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An Era of Darkness — (आंशिक) स्वतन्त्र प्रेस: भारतीय समाचार-पत्रों का उदय — Dr Shashi Tharoor | पार्ट 2





डॉ शशि थरूर की अवश्य पढ़ी जाने वाली किताब 'An Era of Darkness/अन्धकार काल' के अंश, एक ज़रूरी अध्याय 'प्रजातन्त्र, प्रेस, संसदीय प्रणाली एवं विधि सम्मत नियम' / Democracy, The Press, The Parliamentary System' की श्रृंखला English और हिंदी में, आप शब्दांकन पाठकों के लिए.

डॉ शशि थरूर जी का 'रूपा पब्लिकेशन' द्वारा अंग्रेज़ी अंश तथा 'वाणी प्रकाशन' द्वारा अनुवादित हिंदी अंश उपलब्ध कराने का आभार, धन्यवाद...भरत एस तिवारी/शब्दांकन संपादक.


Dr Shashi Tharoor — An Era of Darkness — Book Excerpts

डॉ शशि थरूर —  अन्धकार काल : भारत में ब्रिटिश साम्राज्य —  पुस्तक अंश

(आंशिक) स्वतन्त्र प्रेस: भारतीय समाचार-पत्रों का उदय


ब्रिटेन के समर्थक और अनेक आलोचक भारत में स्वतन्त्र प्रेस की धारणा का प्रारम्भ करने, प्रथम समाचार-पत्र की शुरुआत करने और एक स्वतन्त्र नागरिक के अधिकारों, जिनका आनन्द उठाने के वे पात्र हैं, के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने का श्रेय साम्राज्य को देने का प्रयास करते हैं। यह निश्चित ही सत्य है कि स्वतन्त्र प्रेस के सक्रिय योगदान के बिना भारतीय राष्ट्रवाद एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन का देश भर में प्रसार सम्भव नहीं था।

इस उपमहाद्वीप पर प्रथम प्रिंटिंग प्रेस यद्यपि 1550 में पुर्तगालियों ने प्रारम्भ की परन्तु इसमें केवल पुस्तकें प्रकाशित की जाती थीं, वस्तुतः जैसा कि 1664 में बम्बई में स्थापित प्रथम ब्रिटिश प्रिंटिंग प्रेस ने किया। भारत में पहला समाचार-पत्र प्रकाशित होने में एक शताब्दी से अधिक समय लग गया, जब 1780 में जेम्स ऑगस्तस हिकी ने ‘बंगाल गैजेट’ अथवा ‘कलकत्ता जनरल एडवर्टाइजर’ का प्रकाशन किया परन्तु शीघ्र ही कम्पनी इसके असुविधाजनक विचारों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगी और बढ़ते क्रोध के दो वर्ष के बाद 1782 में उसकी प्रेस को ज़ब्त कर लिया गया।

इससे हिकी की तुलना में कम विवादास्पद अन्य लोग निरुत्साहित नहीं हुए और शीघ्र ही भारत में अनेक ब्रिटिश समाचार-पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हो गया: प्रथम चार कम्पनी की राजधानी कलकत्ता से प्रारम्भ हुए—1784 में ‘कलकत्ता गैजेट’, 1785 में ‘बंगाल जर्नल’ और ‘द ओरिएण्टल मैगज़ीन ऑफ़ कलकत्ता’ और 1786 में ‘द कलकत्ता क्रॉनिकल’—और फिर दो अन्य प्रमुख ब्रिटिश व्यवसाय केन्द्रों—1788 में ‘द मद्रास कूरियर’ एवं 1789 में ‘द बॉम्बे हेराल्ड’—पर प्रारम्भ हुए। ये समाचार-पत्र छोटे-से यूरोपीय समुदाय के हितों, विशेष रूप से वाणिज्यिक हितों पर केन्द्रित थे और प्रायः जलपोतों के आगमन-प्रस्थान एवं कॉलोनी के शासन में विकास-कार्यों के सम्बन्ध में सही नहीं तो कम-से-कम उपयोगी सूचना दिया करते थे। उन्होंने ब्रिटिश भारत में समाचार-पत्रों की संस्कृति की स्थापना की और यद्यपि प्रारम्भ का कोई भी समाचार-पत्र अपने अस्तित्व को बनाये नहीं रख सका परन्तु शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि प्रेस यहाँ बनी रहेगी।



समाचार-पत्रों के प्रसार से सचेत होकर एवं इस बात से चिन्तित होकर कि कम्पनी के आलोचक और शत्रु (समझ में आने वाले फ्रांस सहित) प्रेस का प्रयोग कम्पनी के हितों के विरुद्ध कर सकते हैं, लॉर्ड वेलस्ले सेंसरशिप ऑफ़ प्रेस एक्ट, 1799 ले आये जिसके द्वारा भारत के सभी समाचार-पत्रों की प्रकाशन से पूर्व भारत सरकार द्वारा जाँच की जाती। इस अधिनियम को आगे चलकर वर्ष 1807 में सभी प्रकार के प्रकाशनों—समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, पर्चे—पर प्रभावी बना दिया गया। कुछ अधिक विरोधपूर्ण प्रकाशनों को बन्द कर दिया गया: ‘इण्डियन वल्र्ड’, ‘बंगाल गैजेट’ और ‘कलकत्ता जर्नल’ के सम्पादकों को तो गिरफ़्तार कर उन्हें कम्पनी के अधिकारियों व नीतियों की अत्यधिक आलोचना करने के आरोप में इंग्लैण्ड निर्वासित कर दिया गया। यह भारत में स्वतन्त्र प्रेस की धारणा की अच्छी शुरुआत नहीं थी।

भारत पर कम्पनी की पकड़ मज़बूत हो जाने एवं यूरोपीय प्रतिद्वन्द्वियों से ख़तरे के समाप्त हो जाने पर शीघ्र ही कठोर प्रतिबन्धों को ढीला कर दिया गया। उनकी अपनी मातृभूमि में प्रेस की बढ़ती स्वतन्त्रता भारत में भी दिखाई देनी प्रारम्भ हो गयी। प्रारम्भिक समाचार-पत्रों में से अनेक कभी प्रकाशक की मृत्यु अथवा उसके छोड़कर चले जाने से, क्योंकि बहुत सीमित पाठक वर्ग होने के कारण वे व्यावसायिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं थे और कभी क्योंकि सम्पादकों व स्टाफ में अपने कार्य के प्रति उत्साह नहीं रहा और उनके स्थान पर पर्याप्त स्टाफ नहीं मिला तो बन्द हो गये। जबकि अन्य न केवल बने रहे अपितु उनका एक अलग पाठक वर्ग बन गया। शीघ्र ही 1838 में बम्बई से प्रारम्भ हुए समाचार-पत्र ‘द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ और ‘कलकत्ता स्टेट्समैन’ (जो 1875 में प्रारम्भ हुआ परन्तु इसने 1818 में स्थापित हुए ‘फ्रैंड ऑफ़ इण्डिया’ को स्वयं में सम्मिलित कर लिया) ने स्वयं को प्रकाशन के विश्वसनीय स्तम्भों के रूप में स्थापित कर लिया। ये दोनों समाचार-पत्र यद्यपि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के प्रति सुदृढ़ता से समर्पित थे परन्तु ये सरकार की नीतियों व कार्यों की उत्तरदायी ढंग से आलोचना करने में भी सक्षम थे। जैसे ही ब्रिटिश साम्राज्य का उत्तर भारत में प्रसार हुआ, ‘द पायनीयर’ लखनऊ से प्रारम्भ होकर औपनिवेशिक समाचार-पत्र-त्रयी में शामिल हो गया। इसकी विचारधारा भी भारत में ब्रिटिश समुदाय का प्रतिनिधित्व करती थी।

अतः इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि भारत में समाचार-पत्रों की स्थापना बरतानवियों ने की और औपनिवेशिक शासन से पूर्व इनका अस्तित्व नहीं था। ब्रिटिश साम्राज्य को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने भारतीयों को अपना अनुकरण करने की अनुमति देकर छोटे-से अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त वर्ग (और इसका अनुकरण करने के इच्छुकों) के लिए अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं में भी समाचार-पत्रों का प्रारम्भ होने दिया। गुजराती भाषा में ‘द बॉम्बे समाचार’ 1822 में प्रारम्भ हुआ (यह अभी भी चल रहा है और स्वयं को गर्व से एशिया का अभी भी छप रहा सबसे पुराना समाचार-पत्र बताता है) और कुछ दशक बाद कलकत्ता में बंगाली लोगों द्वारा दो समाचार-पत्र आये, इनमें से ‘द बंगाली’ 1879 में प्रारम्भ हुआ (इसे आगे चलकर सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने आईसीएस छोड़ने के बाद ख़रीद लिया और सैंतीस वर्ष तक इसका सम्पादन किया) और 1868 में ज़ोरदार समाचार-पत्र ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ का प्रकाशन शुरू हुआ (इसकी स्थापना तो बंगाली समाचार-पत्र के रूप में हुई थी और 1878 में राष्ट्रवादी हितों की पैरवी के लिए अंग्रेज़ी भाषा का समाचार-पत्र बन जाने से पूर्व यह कुछ समय तक द्विभाषी साप्ताहिक रहा)। अमृत बाज़ार पत्रिका कांग्रेस की प्रबल आवाज़ बन गया था जो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक चलता रहा और 1986 में बन्द हो गया।

भारतीयों के स्वामित्व वाले अन्य अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों ने स्वयं को भारतीय पाठकों के प्रति समर्पित रखा परन्तु वे इस बात को लेकर सतर्क थे कि उनके विचारों को औपनिवेशिक अधिकारी ध्यानपूर्वक देखेंगे। इसने उन्हें स्वतन्त्रता के आन्दोलन में अत्यधिक प्रभावशाली बना दिया। निश्चय ही मद्रास से प्रकाशित होने वाला ‘द हिन्दू’ इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय था जिसकी 1878 में साप्ताहिक के रूप में स्थापना हुई थी परन्तु 1889 से यह एक दैनिक समाचार-पत्र बन गया। ब्रिटिश शासक लम्बे समय तक भारतीय विचारधारा की उत्तरदायी आवाज़ के रूप में इसका सम्मान करते रहे (‘द हिन्दू’ के प्रथम संस्करण की कुल जमा अस्सी प्रतियाँ प्रकाशित हुईं, इस पर ‘एक रुपया आठ आना’ की लागत आयी थी और इसे क़ानून के चार विद्यार्थियों एवं दो अध्यापकों के समूह ने उधार ली हुई रक़म से छापा था)।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय राष्ट्रवादियों ने अपने विचारों को व्यक्त करने के स्पष्ट लक्ष्य से समाचार-पत्र प्रकाशित करने प्रारम्भ कर दिये। इनमें से श्रेष्ठ थे—पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सर फ़िरोज़शाह मेहता द्वारा 1910 में प्रकाशित ‘द बॉम्बे क्रॉनिकल’, कांग्रेस का समर्थन करने के लिए व्यावसायिक घराने बिरला द्वारा 1924 में स्थापित ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ एवं स्वयं जवाहरलाल नेहरू का ‘नेशनल हेराल्ड’, जिसका प्रकाशन 1938 में प्रारम्भ हुआ। मुस्लिम लीग भी इसी मार्ग पर चल पड़ी और जब युद्ध के वर्षों के दौरान राजनीतिक भाग्य बेहतर हुआ तो मुहम्मद अली जिन्ना ने 1941 में कराची और दिल्ली से ‘डॉन’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया।



एक आकलन के अनुसार 1875 में भारत में 475 समाचार-पत्र थे जिनमें से अधिकतर के मालिक भारतीय थे और उनके सम्पादक भी भारतीय थे। वे शिक्षित अल्पसंख्यक वर्ग के लिए थे परन्तु उनका प्रभाव इस वर्ग से बाहर भी था क्योंकि उनके द्वारा प्रकाशित समाचार और विचार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचते थे। समाचार-पत्रों का मुद्रण और प्रकाशन यद्यपि बड़े नगरों में होता था परन्तु उनके संस्करण कभी-कभी तो तीन दिन बाद ग्रामीण क्षेत्रों व ‘मुफ़स्सल नगरों’ में पहुँच जाते और वहाँ उनकी बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा होती और पढ़ा जाता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रेस ने भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं की बढ़ोतरी और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, व्यापक जन-चेतना का संचार किया, औपनिवेशिक प्रशासन की अनेक असफलताओं को उजागर किया एवं ब्रिटिश शासन के अनेक पहलुओं के प्रति विरोध को भड़काने में प्रभावकारी भूमिका निभाई।

ब्रिटिश अधिकारी निश्चित ही सतर्क होने लगे थे। लॉर्ड लिटन द्वारा भारतीय भाषायी समाचार-पत्रों पर नियन्त्रण के लिए 1878 में भाषायी प्रेस अधिनियम लाया गया और उसकी सरकार अंग्रेज़ी भाषा के समाचार-पत्रों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करती थी (इस अधिनियम के कारण ही ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ समाचार-पत्र इस नये क़ानून की सीमा में आने से बचने के लिए रातोरात बदलकर अंग्रेज़ी भाषा का समाचार-पत्र बन गया)। फिर भी यह स्पष्ट सेंसरशिप और दमन इंग्लैण्ड में आम जनता को पसन्द नहीं आया होगा और अधिकारियों को सावधानी से चलना पड़ा। ब्रिटेन को गम्भीर ख़तरे के कुछ अवसरों, विशेष रूप से युद्ध के समय और राष्ट्रवादी विरोध के बढ़ जाने के समय प्रेस द्वारा साम्राज्य के हितों की रक्षा के लिए समाचार-पत्रों में सीधे-सीधे काट-छाँट की जाती थी—यहाँ रॉलेट एक्ट याद आता है, अन्यथा व्यापक सीमा तक ब्रिटिश प्रशासन की आलोचना की अनुमति थी। भारतीय भाषायी प्रेस को वस्तुतः अशिष्ट ढंग से भर्त्सना करने की अनुमति दी गयी थी। उदाहरण के लिए, 1889 में एक बंगाली समाचार-पत्र ‘हलिशाहर पत्रिका’ ने ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जॉर्ज कैम्पबेल का ‘बैबून (लंगूर) कैम्पबेल...शरीर बालों से ढका और आँखें क्रोध उगलती हुईं और पूँछ लपटों से घिरी’—के रूप में बहुत रंगीन वर्णन किया। परन्तु यदि इसका उपनिवेश-विरोध अधिक राजनीतिक पुट ले लेता—यथा ब्रिटिश शासन के आधार पर ही प्रश्न चिह्न लगा देता अथवा उसे उखाड़ने का आह्वान करता तो ब्रिटिश अधिकारी इतने सहनशील न रहे होते।

अपेक्षाकृत अधिक स्वतन्त्र समय में भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया की सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक के प्रभाव, आज भी उपमहाद्वीप में दिखाई देते हैं, वर्ष 1891 में ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ का एक पत्रकार वाइसराय लॉर्ड लैंस्डाउन के कार्यालय में रद्दी काग़ज़़ों की टोकरी को खँगालने में सफल हो गया। उसमें उसे एक फटे हुए पत्र के टुकड़े मिले जिन्हें वह बहुत श्रमपूर्वक किसी प्रकार जोड़ सका। पत्र में विस्फोटक समाचार था, पत्र में वाइसराय की हिन्दू महाराज द्वारा शासित मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर पर क़ब्ज़ा करने की योजना का विस्तार से वर्णन था। ब्रिटिश अधिकारी यह देखकर भौंचक्के रह गये कि ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ ने उस पत्र को अपने मुख पृष्ठ पर छापा था। रहस्य उजागर हो चुका था। अख़बार कश्मीर केे महाराजा तक पहुँच गया था जिसने तत्काल इसका विरोध किया और लन्दन रवाना हो गया, जहाँ उसने अपने राज्य को ‘स्वतन्त्र’ दर्जा दिये जाने के वचन का सम्मान करने के लिए अधिकारियों को अपने पक्ष में करने के ज़ोरदार प्रयास किये। महाराजा सफल हुआ और भारतीय राष्ट्रवादियों ने उपनिवेशकों के साम्राज्यवादी इरादों को विफल कर देने के लिए ‘पत्रिका’ को बधाई दी। यह योजना यदि उजागर न हुई होती तो कश्मीर देशी रियायत अर्थात् ‘प्रिंसली स्टेट’ न रहा होता और उसे 1947 में आज़ादी के बाद अपना देश व शर्तें चुनने की स्वतन्त्रता न होती। यह बरतानवी भारत का प्रान्त होता जिसके लिए विभाजन के दौरान किसी ने लापरवाही से क़लम चला दी होती। ‘कश्मीर समस्या’ का स्वरूप उस स्थिति में आज से बहुत भिन्न होता।

लैंस्डाउन-पत्रिका की घटना एक अपवाद है: अधिकांशतः भारतीय मीडिया कठोर प्रतिबन्धों में काम करता था। 1910 के संशोधित प्रेस अधिनियम का लक्ष्य जनमत पर सम्पादकों के प्रभाव को सीमित करना था; यह भारतीय प्रेस पर ब्रिटिश नियन्त्रण का मुख्य हथियार बन गया। इसके प्रावधानों के अन्तर्गत एक स्थापित प्रेस अथवा समाचार-पत्र को पाँच हज़ार रुपये तक की सिक्योरिटी जमा करवानी होती थी (यह उन दिनों में एक बड़ी राशि थी): नये प्रकाशन को दो हज़ार रुपये तक की राशि देनी होती थी। यदि समाचार-पत्र कुछ ऐसा प्रकाशित करता जिसे सरकार की अनुमति नहीं थी तो यह राशि ज़ब्त की जा सकती थी, प्रेस को बन्द किया जा सकता था और इसके मालिकों व सम्पादकों पर मुक़दमा चलाया जा सकता था। कांग्रेस नेता एनी बेसेंट ने, उदाहरणतः होमरूल की पैरवी के लिए चलाये जा रहे समाचार-पत्र के लिए सिक्योरिटी देने से इनकार कर दिया और उन्हें ऐसा न करने और अधिनियम का उल्लंघन करने के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया।

यह उल्लेखनीय है कि भड़काने वाले और आलोचनात्मक लेख न प्रकाशित न करने के अपने वचन को न निभाने पर केवल भारतीय प्रकाशनों की ही अधिकारियों के पास रखी गयी सिक्योरिटी राशि ज़ब्त होती थी; ब्रिटिश स्वामित्व वाली प्रेस के प्रजातिवाद की ऐसी कटु आलोचना कभी नहीं होती थी। प्रान्तों की बरतानवी औपनिवेशिक सरकारों को किसी भी समाचार-पत्र के परिसरों की तलाशी लेने एवं उनके द्वारा पायी जाने वाली किसी भी ‘राजद्रोहात्मक’ सामग्री को ज़ब्त करने का अधिकार था। दूसरे शब्दों में, भारतीय प्रेस स्वतन्त्र होने की बजाय बेड़ियों में थी परन्तु फिर भी इसका अस्तित्व बना हुआ था और यह जनमत की अभिव्यक्ति के मंच के रूप में काम कर रही थी—जिसका श्रेय ब्रिटिश अधिकारियों एवं इसमें काम करने वाले भारतीयों दोनों को जाता था।

भारतीय समाचार-पत्रों—विशेष रूप से देशी भाषायी जो औपनिवेशिक अधिकारियों की भर्त्सना करने में कम नियन्त्रित थे—को जुर्माना लगाया जाता, शोषण किया जाता और उन्हें बन्द कर दिया जाता। उन समाचार-पत्रों के सम्पादकों को आमतौर पर गिरफ़्तार कर लिया जाता और भर्त्सनापूर्ण छोटे-से लेख के लिए उन्हें तेईस माह का कठोर श्रम का कारावास भुगतना पड़ता। प्रेस अधिनियम के अन्तर्गत उनके टाइप के भण्डार को, जिसके बिना वे छपाई नहीं कर सकते थे, ज़ब्त किया जा सकता था। परन्तु ऐसे ख़तरे भारत में साम्राज्य के हिमायती बरतानवी समाचार-पत्रों को कभी नहीं होते थे। उदार सोच के ब्रिटिश टिप्पणीकार हेनरी नेविनसन ने 1908 में लिखा था कि ‘मैंने किसी भी भारतीय समाचार-पत्र को एंग्लो-इण्डियन (भारत में स्थापित बरतानवी) अख़बारों की तुलना में अधिक नस्लवादी घृणा एवं हिंसा को उकसाने के जानबूझकर प्रयास करते नहीं देखा है।’ नेविनसन ने कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले एंग्लो-इण्डियन साप्ताहिक (9 मई, 1908) ‘द एशियन’ द्वारा ‘अन्धाधुन्ध’ मारकाट को भड़काने के लिए स्पष्ट रूप से उकसाए जाने का उदाहरण दिया है:
श्री किंग्सफोर्ड (कलकत्ता में एक ब्रिटिश मजिस्ट्रेट, जिसकी अदालत को बम का निशाना बनाया गया) के पास बहुत बड़ा मौक़ा है और हमें आशा है कि वह कम दूरी पर निशाना लगाने वाला ठीक-ठाक निशानेबाज़ है। हम उसकी जानकारी में माउजर पिस्तौल लाना चाहते हैं या फिर कोल्ट ऑटोमेटिक जिसकी गोली भारी होती है और ज़ोर से लगने वाली और पीड़ा देने वाली होती है। हमें आशा है कि श्री किंग्सफोर्ड इससे बहुत बड़ा ‘शिकार’ कर पायेंगे और हमें उसे मिले अवसर से ईर्ष्या है। उनके घर अथवा स्वयं उनकी ओर बढ़ने वाले प्रत्येक अजनबी देशी व्यक्ति को मार गिराना उनके लिए औचित्यपूर्ण होगा और स्वयं उनकी भलाई के लिए ही हमें आशा है कि अपने हथियार को अपने कोट की जेब से निकाले बिना ही काफ़ी सीधा निशाना लगाना सीख लेंगे। इससे समय की बचत होगी और इससे लगभग दस से पन्द्रह गज़ तक किसी भी दूरी पर काफ़ी अच्छी उछाल मिलती है। उस आदमी को, जो स्थिति की ज़रूरतों को सही ढंग से समझता है, हमारी शुभकामनाएँ।
नेविनसन ने आगे लिखा है कि एंग्लो-इण्डियन प्रेस का लहजा लगभग सदा अक्खड़पूर्ण एवं भड़काऊ होता है। यदि ‘राजद्रोह’ का अर्थ केवल ‘हिंसा की सम्भावना वाला’ है तो यह भी राजद्रोहात्मक है। दूसरे शब्दों में, प्रेस स्वतन्त्र थी परन्तु कुछ समाचार-पत्र (ब्रिटिश स्वामित्व वाले) दूसरों से अधिक स्वतन्त्र थे।
(अगली कड़ी में: भारत में संसदीय प्रणाली)
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Dr Shashi Tharoor — An Era of Darkness — Book Excerpts

THE (PARTLY) FREE PRESS – the rise of Indian newspapers 


Apologists for Britain, and many critics, tend to give the Empire credit for introducing the concept of the free press to India, starting the first newspapers and promoting a consciousness of the rights a free citizen was entitled to enjoy. It is certainly true that Indian nationalism and the independence movement could not have spread across the country without the active involvement of the free press.

Although the first printing press was introduced to the subcontinent by the Portuguese in 1550, it only printed books, as indeed did the first British printing press, established in Bombay in 1664. It took more than a century for the first newspaper to be printed in India when, in 1780, James Augustus Hicky published his Bengal Gazette, or Calcutta General Advertiser. But the East India Company soon looked askance at his inconvenient views and, after two years of mounting exasperation, seized his press in 1782.

This did not, however, dissuade others less contentious in manner than Hicky, and soon a raft of British newspapers began printing in India: the first four in the Company capital of Calcutta—The Calcutta Gazette in 1784, The Bengal Journal and The Oriental Magazine of Calcutta in 1785, and The Calcutta Chronicle in 1786—and then two in the other principal British trading centres, The Madras Courier in 1788 and The Bombay Herald in 1789. The newspapers all reflected the interests of the small European community, particularly commercial interests, and provided useful, if not always accurate, information about the arrivals and departures of ships and developments in the governance of the colony. They did establish a newspaper culture in British India, however, and though none of the initial newspapers survived, it was soon apparent that the press was here to stay.



Alarmed by their proliferation, and concerned that the Company’s critics and enemies (including conceivably the French) could use the press to the Company’s disadvantage, Lord Wellesley introduced the Censorship of the Press Act, 1799, which brought all newspapers in India under the scrutiny of the Government of India prior to publication. This Act was later extended in 1807 to cover all kinds of publications—newspapers, magazines, books and pamphlets. Some of the more obstreperous publications were closed down; the editors of Indian World, Bengal Gazette and Calcutta Journal were even arrested and deported to England for their intemperate criticism of Company officials and policies. It was not a propitious beginning for the idea of a free press in India.

The draconian restrictions were eased soon enough, as the Company established its stranglehold over India and the threats to it from European rivals disappeared. The growing independence of the press in the mother country also began to be reflected in India. While many of the early newspapers faded away—sometimes with the death or departure of their publishers, sometimes because they were not commercially viable given their small readership base, and sometimes because the editors and staff simply ran out of enthusiasm for their task and adequate replacements could not be found—others not only survived but established a considerable following. The Times of India, established in Bombay in 1838, and the Calcutta Statesman (which began life in 1875, but incorporated the Friend of India which was founded in 1818) soon established themselves as reliable pillars of the establishment, solidly committed to British imperial interests but able to criticize the policies and actions of the government in a responsible manner. As the British expanded across northern India, The Pioneer established itself in Lucknow as the third in a colonial triumvirate of newspapers whose views could be taken as broadly representative of the British community in India.

It must, therefore, be acknowledged that it was the British who first established newspapers in India, which had been unknown before colonial rule, and it is to their credit that they allowed Indians to emulate them in doing so both in English, catering to the tiny English-educated elite (and its aspirational imitators) and in Indian vernacular languages. The Bombay Samachar, in Gujarati, was founded in 1822 (it is still running, and proudly calls itself the oldest newspaper in Asia still in print) and a few decades later, two Bengali-owned newspapers followed suit in Calcutta, The Bengalee in 1879 (later purchased, and edited for thirty-seven years, by Surendra Nath Banerjea after he left the ICS) and the formidable Amrita Bazar Patrika in 1868 (which, after being founded as a Bengali-language publication, then became a bilingual weekly for a time, before turning into an English-language newspaper in 1878 to advocate nationalist interests. The Amrita Bazar Patrika became a formidable pro-Congress voice and survived till the late twentieth century, before closing in 1986).

Other English-language, Indian-owned newspapers addressed themselves to Indian readers but in the awareness that their views would be paid attention to by the colonial authorities; this made them increasingly influential in the freedom movement. Arguably the most notable of these was The Hindu in Madras, established as a weekly in 1878 and converted into a daily from 1889, which the British came to regard for a long time as the voice of responsible Indian opinion. (The Hindu’s first issue counted a grand total of eighty copies, printed with ‘one rupee and eight annas’ of borrowed money by a group of four law students and two teachers).

In the early twentieth century, Indian nationalists began to establish newspapers explicitly to advocate their cause: the best of these were the Bombay Chronicle, founded by former Congress president Sir Pherozeshah Mehta in 1910, Hindustan Times, which was started by the Congress-supporting Birla business family in 1924, and Jawaharlal Nehru’s own National Herald, which started publication in 1938. The Muslim League followed suit, when its political fortunes picked up during the war years, Muhammad Ali Jinnah establishing Dawn in Karachi and Delhi in 1941.



By 1875, it was estimated that there were 475 newspapers in India, the vast majority owned and edited by Indians. They catered to the literate minority—less than 10 per cent of the population at that time—but their influence extended well beyond this segment, since the news and views they published were repeated and spread by word of mouth. The nascent library movement in India also helped, as did public reading-rooms, and each copy sold enjoyed at least a dozen readers. Though the newspapers were printed and published in the big cities, editions made their way, sometimes three days later, to the rural areas and ‘mofussil towns’, where they were eagerly awaited and avidly read. There is no doubt that the press contributed significantly to the development and growth of nationalist feelings in India, inculcated the idea of a broader public consciousness, exposed many of the failings of the colonial administration and played an influential part in fomenting opposition to many aspects of British rule.

Inevitably, the British authorities began to be alarmed: Lord Lytton brought in a Vernacular Press Act in 1878 to regulate the Indian-language papers, and his government kept a jaundiced eye on the English-language ones. (It was the introduction of this Act that prompted the Amrita Bazar Patrika to convert itself into an English-language newspaper overnight, to avoid coming under the new law’s purview.) Still, outright censorship and repression would not have gone down well with the British public at home, and the authorities had to tread warily. While on certain occasions of grave danger to Britain, especially at times of war, and during periods of elevated nationalist resistance, the press was directly curtailed to protect imperial interests—the Rowlatt Acts come to mind—a wide range of criticism of British administration was permitted most of the time. Indeed, the Indian vernacular press was allowed to get away with crude invective: for instance, in 1889, a Bengali newspaper, Halishaher Patrika, colourfully described the British Lieutenant Governor Sir George Campbell as ‘the baboon Campbell with a hairy body… His eyes flash forth in anger and his tail is all in flames’. But had its anti-colonialism taken on a more explicitly political tone, for instance in questioning the very premises of British rule at all or calling for its overthrow, the authorities would not have been quite as tolerant.

One of the most notable accomplishments of the Indian nationalist media, during a period of relative freedom, ironically has implications that haunt the subcontinent even today. In 1891, a journalist from the Amrita Bazar Patrika managed to rummage through the wastepaper basket at the office of Viceroy Lord Lansdowne. There he found the fragments of a torn-up letter, which with great enterprise he managed to piece together. The letter contained explosive news, revealing as it did in considerable detail the viceroy’s plans to annex the Hindu Maharaja-ruled Muslim-majority state of Jammu & Kashmir. To the consternation of the British authorities, Amrita Bazar Patrika published the letter on its front page. The cat was out of the bag: the newspaper reached the Maharaja of Kashmir, who promptly protested, set sail for London and vehemently lobbied the authorities there to honour their predecessors’ guarantees of his state’s ‘independent’ status. The Maharaja was successful, and Indian nationalists congratulated the Patrika on having thwarted the colonialists’ imperial designs. Had this exposé not taken place, Kashmir would not have remained a ‘princely state’, free to choose the country, and the terms, of its accession upon Independence in 1947; it would have been a province of British India, subject to being carved up by a careless British pen during Partition. The contours of the ‘Kashmir problem’ would have looked very different today.

Nonetheless, the Lansdowne-Patrika episode was an exception: for much of the time, the Indian media operated under severe constraints. The revised Press Act of 1910 was designed to limit the influence of editors on public opinion; it became a key instrument of British control of the Indian press. Under its provisions an established press or newspaper had to provide a security deposit of up to five thousand rupees (a considerable sum in those days); a new publication would have to pay up to two thousand. If the newspaper printed something of which the government disapproved, the money could be forfeit, the press closed down, and its proprietors and editors prosecuted. The Congress leader Annie Besant, for instance, had refused to pay a security on a paper she published advocating Home Rule, and was arrested for failing to do so and thereby violating the Act.

It is noteworthy that only Indian publications were vulnerable to forfeiting the substantial bond they had posted with the authorities if they failed their undertaking not to publish inflammatory or abusive articles; the racism of the British-owned press was never subject to similar strictures. The British colonial governments in the provinces enjoyed the right to search any newspaper’s premises and confiscate any material they found ‘seditious’. The Indian press, in other words, was fettered rather than free, but that it existed, and could serve as a rallying point for public opinion, is to the credit of both the British authorities and the Indians who worked in the media.

Indian papers—especially the vernacular ones which tended to be less retrained in their abuse of the colonial masters—were fined, suppressed, and shut down; their editors were frequently imprisoned, and several times given twenty-three months of hard labour for a piece of invective; and under the Press Act, their stock of type, without which they could not print, was liable to confiscation. But such threats were never focused on the pro-imperialist British papers in India. In no Indian newspaper, wrote the fair-minded British observer, Henry Nevinson, in 1908, ‘have I seen more deliberate attempts to stir up race hatred and incite to violence than in Anglo-Indian [i.e. British settlers’] papers, which suffer nothing’. Nevinson offers as an example ‘this obvious instigation to indiscriminate manslaughter by The Asian, an Anglo-Indian weekly in Calcutta (9 May 1908)’:

Mr. Kingsford [a British magistrate in Calcutta whose court was the target of a bomb] has a great opportunity, and we hope he is a fairly decent shot at short range. We recommend to his notice a Mauser pistol, with the nickel filed off the nose of the bullets, or a Colt’s automatic, which carries a heavy soft bullet and is a hard-hitting and punishing weapon. We hope Mr. Kingsford will manage to secure a big ‘bag’, and we envy him his opportunity. He will be more than justified in letting daylight into every strange native approaching his house or his person, and for his own sake we trust he will learn to shoot fairly straight without taking his weapon out of his coat pocket. It saves time and gives the elevation fairly correctly at any distance up to about ten or fifteen yards. We wish the one man who has shown that he has a correct view of the necessities of the situation the very best of luck.

Nevinson adds that ‘the tone of the Anglo-Indian press is almost invariably insolent and provocative. If “seditious” only means “likely to lead to violence”, it is seditious too.’

The press, in other words, was free, but some newspapers (the British-owned ones) were freer than others.
(Next in the series: the Parliamentary system in India)
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