भाषा से मुझे बचपन में ही प्यार हो गया था — शशि थरूर | #शब्दों_का_संसार

शब्दों का संसार

— शशि थरूर 

खलीज टाइम्स के संपादक ने जब मुझे शब्दों और भाषा के ऊपर स्तम्भ लिखने के लिए आमंत्रित किया तो मैं तोड़ा झिझका। शब्दों के ऊपर लिखना तो ठीक था, लेकिन क्या कोई गंभीर राजनेता उस छवि को पुख्ता करना चाहेगा जिसमें वह व्युत्पत्तिशास्त्री दीखता हो? जैसे एक पत्रकार ने तक़रीबन हांफते हुए मुझसे पूछा, “आपकी शब्दावली तो मीम्ज़, हास्य कार्यक्रमों और अब एक किताब का विषय भी बन गयी है! क्या आपने कभी सोचा था कि ऐसा भी हो जायेगा?



नहीं… ऐसा तो नहीं सोचा था। भाषा से मुझे बचपन में ही प्यार हो गया था। जिन शब्दों से दो-चार होता था उन्हें बिना किसी पूर्व निर्धारण के प्रयोग करता था, जैसे समुद्र तटों को खंगालने वाला एक नए मिले शंख में फूंक मारता हो। लेकिन इस सब के बीच, अनजाने में ही मेरी एक शब्दकार की रूप में कुछ ज्यादा ही साख बन गयी। वैसे तो इस तरह की साख बनने में समय लगता है लेकिन मेरी साख तो एक ख़ास ट्वीट के कारण एकदम ही हवा से बातें करने लग गयी। एक टीवी कार्यक्रम में धूर्त मीडिया द्वारा मुझे झूठा बदनाम करने पर थोड़ा नाराज़ होकर मैंने ट्वीट किया, “पत्रकार का रूप धरे एक अनैतिक प्रदर्शनकार द्वारा प्रसारित विकृतियों, तोड़मरोड़ बनायीं बातों और सरासर झूठों का गड़बड़झाला’ “a farrago of distortions, misrepresentations and outright lies broadcast by an unprincipled showman masquerading as a journalist”. किसी कारणवश इस ट्वीट ने न सिर्फ कोई तार छेड़ दिया बल्कि साथ ही इन्टरनेट पर उत्सुक जिज्ञासा की एक सर्वशक्तिमान लहर उठा दी। कुछ ही घंटों में ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश ने हैरानी से अपने सर्च इंजिनों में farrago शब्द का अर्थ तलाशने वालों की संख्या में अभूतपूर्व, दस लाख से अधिक का उछाल देखा। मेरी कुख्याति स्थापित हो चुकी थी, अब मैं भारत का शब्दशास्त्री था! 

उसके बाद व्यंग्य-चित्रों का एक छोटा सफ़र शुरू हुआ। सिर्फ इन्टरनेट पर अपना रचनात्मक रस बहाने वालों के बहुमुखी कीबोर्ड धड़ल्ले से मीम्ज़ उगलने लगे। देसी बुद्धिमानों ने दीवाली की शुभकामनाओं और भेलपूरी के विवरण का शब्दातिरेक अनुवाद किया और उसे मेरे मत्थे जड़ दिया। एक चतुर मिम्ज़-निर्माता ने मेरी ट्वीट को टिनटिन कॉमिक्स के कैप्टेन हेडेक के मुँह से कहा दिखा दिया, उनकी परिचित लाइन “करोंड़ों कश्मशाते काले कछुए” (“billions of blue blistering barnacles”) को हटाते हुए, जिसे पढ़कर स्तब्ध हुए टिनटिन कहते हैं, “मैंने आपसे कहा था कैप्टेन कि आप शशि थरूर भाईसाब से दूर रहिएगा।” तत्कालीन गृहमंत्री, राजनाथ सिंह और मेरी मुलाक़ात की तस्वीर में उनके सर के ऊपर एक संवाद बुलबुले को यह कहते हुए लगा दिया गया, “और मेरे पास तो एक शब्दकोश तक नहीं है!” इनमें अधिकतर फार्मूलाबद्ध थे, लेकिन अच्छे थे, सबसे अच्छा शायद वह एक दुखी मीम था जो कहता है, “मैं सोचता था कि मैं गरीब हूँ। अब शशि थरूर से मिलने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं अल्पधनम् हूँ” “I used to think I was poor। Now I’ve met Shashi Tharoor and I realise I’m impecunious. ”

जब आप व्यंग्य-चित्रों की ऐसी ज्वार-लहर ,में घिर गए हों तो आपके पास सिर्फ दो रास्ते होते हैं - या तो अड़कर रूठ जाइये और रूढ़िबद्ध जोकरी धारणा में ख़ुद को शामिल किये जाने वाली हर कोशिश को नकारते रहिये, या फिर व्यंग्य-चित्रों को गले लगाते हुए उन्हें अपने फायदे में बदल दीजिये। मैंने दूसरा रास्ता चुना। इसलिए मैं यहाँ हूँ। 

हाँ, शब्द मेरे लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। मेरे जीवन पर मेरे पिता, चंद्रन थरूर, का बहुत प्रभाव था। मालाबार में ग्रामीण और छोटे शहर वाली शिक्षा के बाद, 1948 में वह यूके चले गए और दोबारा शुरुआत से अंग्रेजी सीखी। वह मेरे शिक्षक, मार्गदर्शक, शोध सलाहकार, जीवन के मूल्यों को प्रदान करने वाले, मेरे विश्वास, मेरी ऊर्जा और आत्म-विश्वास के स्रोत थे। जीवन और सीखने के प्रति मेरा उत्साही नज़रिया, काम के प्रति मेरी नीति और शब्दों से मेरा प्यार यह सब मुझे उनसे ही मिला है। 

मेरे पिता शब्द-खेल - स्क्रैबल से लेकर बोगल तक और अख़बार के विभिन्न चित्राक्षर खेलों के आदी थे। वह मेरी बहन और मेरे लिए नए नए खेल रचते थे, यह देखते थे कि नौ-या-दस अक्षरों वाले शब्द से हम चार अक्षरों वाले कितने शब्द बना पाते हैं। एक और खेल जिसे हम कार में लम्बी यात्रा के समय खेलते थे, उसमें किसी एक यात्री को पांच अक्षरों वाला कोई शब्द सोचना होता था, और बाकी यात्रियों को उस शब्द तक पहुँचने के लिए बीस मौके मिलते थे - अंदाज़ा लगाते हुए और यह पता करते हुए कि उनके बताये शब्द के पांच में से कितने अक्षर सही निकले। शब्दों और भाषा के प्रति इस अगाध प्रेम का मेरे पिता ने जिन आविष्कारपूर्ण तरीकों से अभ्यास किया, वह अनिवार्यतः उनकी बड़ी संतान अर्थात मुझमें पहुँच गया। 

लेकिन ऐसा सिर्फ शब्दों के होने भर के लिए नहीं था। मेरे पिता ने मुझमें यह धारणा स्थापित की कि शब्द ही विचारों को आकार देते हैं और सोच को दर्शाते हैं। जितने अधिक शब्द आप जानेंगे उतनी ही आसानी से आप सटीक रूप से अपने विचारों को व्यक्त कर पाएंगे। इसलिए अक्सर आकर्षण का एक ज़रिया और संवाद के लिए अनिवार्य - शब्दों पर यह स्तम्भ। मिलते हैं आपसे हर हफ्ते यहाँ। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद: भरत एस तिवारी
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