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राष्ट्रवाद बनाम देशप्रेम ~ शशि थरूर | Nationalism vs Patriotism in Hindi ~ Shashi Tharoor



राष्ट्रवाद और देशभक्ति में अंतर को समझना जरूरी

~ शशि थरूर

कौन राष्ट्रभक्त है और कौन राष्ट्रवादी? 
‘पैट्रिऑटिज्म’ और ‘नेशनलिज्म’ के बीच अंतर को कई भाषाओं में संस्कृत के जरिए स्पष्ट किया गया है। नेशनलिज्म है राष्ट्रवाद यानी राज्य व्यवस्था के प्रति समर्पण, जबकि पैट्रिऑटिज्म है देशभक्ति यानी जन्मभूमि से प्रेम। एक देशभक्त देश को किसी अन्य जगह से बड़ा नहीं बताता है, बस उससे प्रेम करता है।

देशभक्ति को किसी व्यक्ति के अस्तित्व, उसके गर्व से जोड़ सकता हैं, जो किसी अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन में राष्ट्रगान बजने पर, स्वतंत्रता दिवस मनाने पर, देश को सुरक्षित रखने सेना के समर्पण की सराहना आदि पर महसूस होता है। राष्ट्रवाद की तुलना में देशभक्ति बहुत कम विचारधारा से चलती है। वह दूसरों की सफलताएं स्वीकारती है और इसमें वह विनाशकारी समर्पण नहीं होता, जो राष्ट्रवाद में होता है। एक देशभक्त देश को मां जैसा ही प्रेम करता है क्योंकि देश उसका है और वह देश का। 

हमें पर्फेक्ट होने का अधिकार प्राप्त है
जैसा कि लेखक बद्री रैना ने अपने एक लेख में कहा था कि देशभक्ति दूसरों के प्रेम का भी मोल करने देती है, जो उन्हें अपने देशों से हैं और वास्तविकताओं को छिपाए बिना खामियों को भी खोजने देती है। राष्ट्रवाद में इसकी गुंजाइश नहीं है। यह हमसे कहता है कि सभी से कहो कि हम बाकी लोगों, संस्कृतियों, देशों से आगे हैं क्योंकि हमारा कोई दिव्य मूल है या हमें पर्फेक्ट होने का अधिकार प्राप्त है। देशभक्ति विविधता की बड़ी वास्तविकता स्वीकारती है, राष्ट्रवाद विविधता को मिटाने का प्रयास करता है। इतिहास में देशभक्ति ने राष्ट्रीय विचारों की रक्षा में भावुक व्यवहार को प्रेरित किया है, इसलिए कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद समझ लेते हैं। लेकिन जहां एक देशभक्त देश के लिए मरने तैयार होता है, वहीं राष्ट्रवादी अपनी राज्य व्यवस्था के लिए मारने को तैयार हो जाता है।

कई विद्वानों ने राष्ट्रवाद के पांच प्रमुख तत्व माने हैं: राष्ट्रीय एकता (यहां तक कि एकरूपता) की इच्छा, सिर्फ राष्ट्र से निष्ठा, राष्ट्रीय विशिष्टता की आकांक्षा, तथा राष्ट्रों में सम्मान व प्रतिष्ठा की खोज। यह आखिरी तत्व समस्या है क्योंकि सम्मान व प्रतिष्ठा की खोज आसानी से प्रभुत्व की इच्छा बन जाती है। जब एक राष्ट्र की गरिमा के लिए दूसरों की हार जरूरी हो जाए, तो राष्ट्रवाद अंधभक्ति और सह-अस्तित्व को नकारने की प्रवृत्ति में बदल सकता है।

अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच अंतर को 1945 के अपने मशहूर निबंध में प्रभावी ढंग से व्यक्त किया: ‘देशभक्ति’ यानी एक विशेष स्थान और जीवन के एक विशेष तरीके के प्रति समर्पण है, जिसे कोई भी सबसे अच्छा मानता है लेकिन उसे अन्य लोगों पर जबरदस्ती थोपना नहीं चाहता। दूसरी ओर, राष्ट्रवाद को सत्ता की इच्छा से अलग नहीं किया जा सकता। 

द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग
हर राष्ट्रवादी ज्यादा सत्ता और ज्यादा प्रतिष्ठा चाहता है। अपनी किताब ‘द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग’ में मैंने तर्क दिया है कि भारत में नागरिक राष्ट्रवाद है, जिसकी जड़ें संविधान और इसकी स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं में है। भारतीय राष्ट्रवाद को उसकी राजनीतिक वैधता जातीयता, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि से नहीं, बल्कि नागरिकों की सहमति व लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी सक्रीय भागीदारी से मिलती है।


हमारे राष्ट्रवाद को किसी एक विचार से ऊपर उठाने के लिए हमें अपने संस्थापक नेताओं द्वारा बनाए गए गणतंत्र में निहित भारत के विचार को संरक्षित करना होगा। जिसमें स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थान और ऐसा संविधानवाद हो जो सभी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करे। एक सच्चा देशभक्त बताएगा कि हमारे लोकतंत्र में आपको हमेशा सहमत होना जरूरी नहीं है। लोगों को बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक, हिन्दू व मुस्लिम, हिंदीभाषी व तमिलभाषी, राष्ट्रवादी व राष्ट्रद्रोही में बांटना दरअसल भारतीय होना नहीं है और यह हमारे समाज की वास्तविक प्रवृत्ति नहीं बताता।

हमारे राष्ट्रवादी नायकों ने बहुलवाद और स्वतंत्रता के आदर्श पर राष्ट्र का निर्माण किया था। आइए हम भारतीय राष्ट्रवाद के ऐसे विचार के लिए लड़ने का संकल्प लें जो विविधता को, मतभेदों को स्वीकारता है और बहुलता को अपनाता है। ऐसा समावेशी राष्ट्रवाद ही हर एक भारतीय, हर धर्म, क्षेत्र या मातृभाषा को, एक गौरवान्वित देशभक्त होने की स्वतंत्रता देगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
साभार 'अमर उजाला'
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