पन्नों से उतरती चांदनी : नीरजा पांडेय के उपन्यास की समीक्षा - शरद कुमार पाण्डेय "शशांक" | Review Neerja Pandey Novel

केवल कैन्डिल मार्च से किसी के दर्द को नहीं दूर किया जा सकता 

शरद कुमार पाण्डेय "शशांक"  

उप संपादक, राष्ट्रीय स्वरूप दैनिक समाचार पत्र। कविता संग्रह प्रकाशित। संपर्क 209/20, नालबंदी टोला, लखनऊ मो. 9452465562 ईमेल: spandey864@gmail.com


Review Neerja Pandey Novel



नीरजा पांडेय का उपन्यास "पन्नों से उतरती चांदनी" अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए है  -- जहां उसके अंदर समाई है हर नारी के मन की अकुलाहट तो वहीं उसने समाज को झकझोरा है कि आज के समय में हमें अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाना ही होगा। केवल कैन्डिल मार्च से किसी के दर्द को नहीं दूर किया जा सकता, बल्कि आवश्यकता है कठोर से कठोर कानून बनाने की, ऐसा कानून जिसको सोचकर ही गुनाह करने वाला गुनाह करने के पहले ही कांप जाए, नारी उत्पीड़न की न जाने कितनी घटनाएं हम सभी प्रतिदिन अखबार में पढ़ते हैं जो हमको सोचने के लिए विवश करती हैं और फिर उन्हें भुला कर हम अपने दैनिक कार्य में व्यस्त हो जाते हैं, दिन पर दिन वर्ष पर वर्ष बीतते जाते हैं, न हमारी सोच बदलती है न समाज का ढंग बदलता है। वह घर की प्यारी तुतलाती बिटिया, वह कलाई में राखी बांधती बहना, हर दुख सुख में साथ देने वाली पत्नी के ऊपर कब और क्यों गलत निग़ाहें उठने लगीं? टे्न में, बस में, शिक्षा के मंदिर में, और कार्यस्थलों पर उसे परेशान किया जाता है। आखिर क्यों?

महिलाओं के लिए सरकार की ओर से इतने कानून बने हैं फिर भी कितनी लड़कियां उसका इस्तेमाल करने की हिम्मत जुटा पाती हैं, जो हिम्मत दिखाती हैं उसका क्या परिणाम होता है किसी से छुपा नहीं है। 

कब कसेगा शिकंजा उन शोहदों पर, जिन्हें न परिवार की चिंता है न देश और समाज की। यह मुट्ठी भर लोग पूरे समाज के पुरुषों को बदनाम कर रहे हैं, कब समझ आएगा कि मर्दानगी लूटने में नहीं होती, छेड़छाड़ करने में नहीं होती बल्कि मर्दानगी रक्षा करने में होती है, बचाने में होती है। 

यह उपन्यास हमें आगाह करता है कि अभी भी समय है हम हर दिल के दर्द को अपने दिल पर महसूस करें और फिर उसके विरोध में एक जंग शुरु कर दें, चाहे वो घटना दिल्ली की हो, या कोलकाता की। अनेक मर्म भेदी संवेदनाओं का संदर्भ लिए यह उपन्यास हमें सोचने के लिए प्रश्न देता है और साथ ही राहत के उस धरातल पर ले जाता है, जहां हम सुकून की लम्बी सांस ले सकते हैं। 

मानसी एक संवेदनशील स्टूडेंट है जो समाज में लड़कियों के साथ हुई हर घटना पर बहुत चिंतित होती है और साथ ही एक उपन्यास पढ़ती है, जिसकी कहानी उसके मन को खुश कर देती है जैसा वह चाहती है वैसी लड़की के जीवन की कहानी है। इस तरह मानसी और उसके द्वारा पढ़े जाने वाले उपन्यास की नायिका सुमिता के बीच पूरी कहानी घूमती रहती है, उपन्यास पढ़ने के बाद अगर पाठकों की मनःस्थिति भी मानसी की तरह हो जाती है, सभी घटनाएं पाठकों को व्याकुल करती हैं, तो इस उपन्यास का लेखन सार्थक हो जायेगा। कुछ महिलाएं भी कानून की आड़ में पुरुषों को मानसिक और आर्थिक टार्चर करती हैं, पुरुषों के हित में भी एक संस्था बनी है उसको भी उपन्यास में उठाया गया है। 

साथ ही आज की सबसे बड़ी समस्या बुजुर्गों की उपेक्षा पर भी उपन्यास में प्रसंग आया है, यह सच है कि मां-बाप अपना दर्द सार्वजनिक नहीं करना चाहते और बच्चों द्वारा दिये दर्द को सहते रहते हैं। इस तरह समाज की समस्याओं पर सुंदर भाषा शैली में प्रकाश डालता यह उपन्यास हर एक के पढ़ने लायक है। पढ़ें... 


उपन्यास
नीरजा पांडेय
लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

चित्तकोबरा क्या है? पढ़िए मृदुला गर्ग के उपन्यास का अंश - कुछ क्षण अँधेरा और पल सकता है | Chitkobra Upanyas - Mridula Garg
नासिरा शर्मा के उपन्यास 'शाल्मली’ के बहाने स्त्री विमर्श पर चर्चा —  रोहिणी अग्रवाल
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने — कहानी — मधु कंकरिया | Hindi Story on Stranded Pakistanis by Madhu Kankaria
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
गोल्डन जुबिली कहानी - रवीन्द्र कालिया: नौ साल छोटी पत्नी
जो मैं मुसलमान होती... बरखा दत्त    #ifIWereAMuslim