मैत्रेयी पुष्पा - सेक्स प्रेम की मृत्यु है | Interview Maitreyi Pushpa


नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ आपके लिए हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा का साक्षात्कार. हाल में ही दिनेश कुमार से हुई उनकी यह बातचीत 'कथाक्रम' में प्रकाशित हुई है, इसे उपलब्ध कराने के लिए शैलेन्द जी का आभार. मित्रो शब्दांकन पर प्रकशित साक्षात्कार में कुछ बातें और भी जुड़ी हैं जिन्हें मैंने कोष्ठक [ ] में लिखा है ये वो बातें हैं जो आज सुबह मैत्रेयीजी से हुई मेरी बातचीत का अंग हैं.

आप सबको 2016 की ढेर सारी शुभकामनाएं, आपका साहित्य प्रेम और बढ़े...

भरत तिवारी
1 जनवरी 2016

मैत्रेयी पुष्पा - सेक्स प्रेम की मृत्यु है #शब्दांकन

सुविधा और सम्पन्नता का साहित्य नहीं होता। वह दरबारी साहित्य होता है

- मैत्रेयी पुष्पा

जिन किताबों का बहुत ज्यादा विज्ञापन किया जाता है उन किताबों को मैं पढ़ती ही नहीं हूँ


आप हिन्दी अकादमी दिल्ली की पहली महिला उपाध्यक्ष बनी हैं। एक स्त्री का किसी साहित्यिक संस्था का प्रमुख बनना एक बड़ी परिघटना है। आप इसे कैसे देखती हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: उपाध्यक्ष के लिए मेरे नाम की सूचना जारी होते ही बधाइयों का तांता लग गया। इसी क्रम में एक फोन अमेरिका का आया। फोन करने वाले ने बताया कि वे एक डॉक्टर है और आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए है। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि आप बहुत बड़ी साहित्यकार हैं इसलिए आपको उपाध्यक्ष बनाया गया। मैंने उनसे कहा कि साहित्यकार तो मैं पहले से थी लेकिन ‘आप’ नहीं थे। यह मैं राजनीति की बात नहीं कर रही हूं। मैं भावना की बात कर रही हूं। दिल्ली सरकार ने मेरे साहित्यिक काम और साहस का सम्मान किया है। इस तरह की ‘जेनुइनिटी’ पहले से निभाई गई होती तो न जाने कितनी महिलाओं को साहित्यिक संस्थाओं में जगह मिल गई होती। कितनी विडम्बना है कि रचनात्मक उत्कृष्टता के बावजूद देश और राज्य दोनों स्तर की साहित्यिक संस्थाओं से महिलाएं बाहर हैं। अच्छा होगा कि अगर दूसरी पार्टियां भी नारेबाजी से ऊपर उठकर महिलाओं के बारे में सोचें।



पिछले कुछ सालों से हिन्दी अकादमी की गतिविधियां बहुत सीमित हो गई हैं। इसकी सक्रियता गोष्ठियों तक सिमट गई है। अकादमी के कायाकल्प को लेकर कोई योजना है? 

मैत्रेयी पुष्पा: गोष्ठियां कराना कोई बड़ी बात नहीं है। दिल्ली जैसे शहर में यह बहुत होती हैं। कई बार लेखक अपने से ही तो कई बार प्रकाशक भी गोष्ठियां कराते रहते हैं। ये अधिकांश गोष्ठियां सिर्फ निंदा या प्रशंसा के लिए होती हैं जिनका कोई महत्व नहीं होता। मैं तो चाहूंगी कि साहित्यिक गतिविधियों का ऐसा समायोजन हो, जहां कोई सार्थक लेखन करने वाला अपने आपको अपमानित उपेक्षित महसूस न करे। हताश होकर लौट न जाए। अकादमी ईमानदार लोगों के पक्ष में माहौल बनाने का काम करेगी। अकादमी की पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ में बहुत सुधार की गुंजाइश है। वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में उसे एक हस्तक्षेपकारी पत्रिका बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर मैं कहना यह चाहती हूं कि अकादमी के कामकाज में व्याप्त अनियमितता और भ्रष्टाचार पर रोक लगे। इससे बेहतर साहित्यिक माहौल बनेगा। ‘जेनुइन’ लोग सामने आएंगे और अकादमी का कायाकल्प अपने आप शुरू हो जाएगा।

[इसी गुंजाइश को लेकर हमने अकादमी के जरिये दिल्ली के विश्वविद्यालयों में पड़ते हुए हिंदी के छात्रों के बीच ‘भाषा दर्पण’ नाम से कवितायेँ लिखने की प्रतियोगिता करायीं। हजारों-हज़ार छात्रों ने भाग लिया और हमारी उस धारणा को गलत सिद्ध किया कि आज का छात्रवर्ग हिंदी और साहित्य में रुचि नहीं लेता है। जो चुनी गयी वे कवितायेँ किसी भी उत्कृष्ट कविता के सामने रखी जा सकती हैं. प्रतियोगिता में प्रथम आने वाली छात्रा मंजू को ११,००० का पुरस्कार दिया गया है और लालकिले के कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने का आमन्त्रण दिया गया है

मैं उस महिला के पक्ष में नहीं हो सकती जो अनाप-शनाप बातें करे और जिसे एक पुरुष के लिए दूसरे पुरुष का प्रमाणपत्र चाहिए

आपके साहित्यिक लेखन और साहस के महत्व को एक राजनीतिक पार्टी ने तो समझा पर साहित्यिक संस्थाओं ने आपको प्रायः नजरअंदाज किया। अच्छी रचनाओं के बावजूद आपको कोई बड़ा साहित्यिक पुरस्कार नहीं मिला।

मैत्रेयी पुष्पा: साहित्य में मैं जब आई थी तो मुझे पता नहीं था कि जो मैं लिखूंगी या जो लिखा जाता है उस पर पुरस्कार भी मिलता है। मैं तो पात्रों के रूप में उन स्त्रियों को लेकर आयी थी जो निष्कवच, वंचित और साधनविहीन होने के कारण तमाम तरह के अत्याचार सहती रहती थीं। मैं और कुछ कर नहीं सकती थी पर उनकी आवाज को शब्द दे सकती थी? मैंने उन्हें शब्द के साथ साहस और शक्ति दी। कुछ लोगो ने ‘इदन्नमम्’, ‘चाक’, ‘अल्मा कबूतरी’ जैसे उपन्यासों को स्त्री की स्वाधीनता के लिए साहसपूर्ण कदम के रूप में देखा। जब पुरस्कारों की बात आती है तो मुझे ताज्जुब हुआ कि साहित्य अकादमी के लिए उन रचनाओं की लाइन में मेरी वे स्त्रियां भी हैं जिन्होंने यहां तक सफर किया था। वे हर साल लाइन में रहीं पर जब नतीजे आए तो मुझे पता चला कि उन्हें हर बार ढकेल दिया गया। मैं अपने लिए प्रोत्साहन नहीं चाहती थी किंतु मेरे मन में उन वंचित और संघर्षशील स्त्रियों के लिए प्रोत्साहन की भावना जरूर थी इसलिए मुझे ठेस लगी। मुझे महसूस हुआ कि एक बड़ा कोना उपेक्षा का भी होता है जहां टिककर खड़े रहना साहित्य सृजन के संकल्प को और दृढ़ करता है।



हिन्दी की स्त्री रचनाकारों में ‘एक्टिविज्म’ का तत्व बहुत न्यून है। आपने लेखन के साथ-साथ एक्टिविज्म को भी बराबर महत्व दिया है। एक रचनाकार के लिए आंदोलन धर्मिता को कितना जरूरी मानती हैं।

मैत्रेयी पुष्पा: मेरा अपना मानना है कि बिना ‘एक्टिविस्ट’ हुए लेखन या तो रीतिकालीन होगा या एकदम एकेडमिक होगा या आदर्शवादी हो जाएगा। मनुष्य के वास्तविक जीवन का चित्रण बिना ‘एक्टिविज्म’ के संभव नहीं है। सामान्य मनुष्य के दुख और संकट ही साहित्य के स्त्रोत होते हैं। सुविधा और सम्पन्नता का साहित्य नहीं होता। वह दरबारी साहित्य होता है। वास्तविक साहित्य तो दुखदर्द का ही होता है। संवेदना के साथ वेदना क्यों जुड़ा है? समसुख क्यों नहीं होता? इसलिए मैं कहती हूं कि साहित्य का स्त्रोत तो वृहतर मनुष्य का दुख-दर्द ही है। बिना एक्टिविस्ट हुए आम आदमी के दुखदर्द को कैसे महसूस किया जा सकता है? निजी दुख/बीमारी अलग चीज़ है पर जीवन जीने की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने स्वयं उस जीवन को देखा या भोगा है।



राजनीतिक सत्ता से रचनाकारों के संबंध को लेकर हमेशा बहस होती रही है। साहित्यकार और राजनीति के रिश्ते को आप कैसे देखती हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: वैसे जानबूझकर नहीं स्वतःस्फूर्त ही सही मैंने जो लिखा है उसमें राजनीति ही आयी है। आज आदिवासी का जीवन कैसा हो, किसान का जीवन कैसा हो, पूंजीपति का जीवन कैसा हो यह सबकुछ राजनीति ही तय कर रही है। हमारा सारा समय राजनीति की धुरी पर घूम रहा है। साहित्य भी तो इन्हीं मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, स्त्रियां, दलितों आदि से ही संबंधित होता है। इनसे अलग कहां होता है। इस तरह साहित्य राजनीति से अपने आप जुड़ जाता है। रही बात साहित्यकार की तो वह देखता है कि इन वंचित तबकों की लड़ाई कौन पार्टी लड़ रही है और वह उसका साथ देता है। जब मैं छोटी थी तो यह नारा खूब चलता था-मांग रहा है हिन्दुस्तान/रोटी कपड़ा और मकान। आजादी के सड़सठ साल बाद क्या आज भी यही स्थिति नहीं है? नारे तो सब लगाते हैं लेकिन स्थितियां नहीं बदलती हैं। जो भी ईमानदारी से काम करे मैं उसके पक्ष में खड़ी हूं। यह तो सबको दिखता ही है कि कौन वंचितों का साथ दे रहा है और कौन उद्योगपतियों के पक्ष में है?



हाल ही में कुमार विश्वास से संबंधित एक महिला का जो विवाद सामने आया उसमें आपने उस महिला का पक्ष न लेकर कुमार विश्वास का पक्ष लिया। इसे लेकर कई लोगों ने आप पर स्त्री विरोधी होने का आरोप तक लगा दिया। इस पर आपका क्या कहना है?

मैत्रेयी पुष्पा: कुमार विश्वास ने सार्वजनिक रूप से उस महिला के साथ किसी तरह के संबंध का खंडन किया है। कितनी विचित्र बात है कि वह महिला चाहती है कि कुमार उसके पति के पास आकर सफाई दें। प्रश्न यह है कि जो पति अपनी पत्नी की बात नहीं मान रहा है वह कुमार विश्वास की बात कैसे मान लेगा? मैं उस महिला के पक्ष में नहीं हो सकती जो अनाप-शनाप बातें करे और जिसे एक पुरुष के लिए दूसरे पुरुष का प्रमाणपत्र चाहिए। उसे तो अपने पति पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करना चाहिए। मेरा स्त्री-विमर्श इसकी इजाज़त नहीं देता।

क्या स्त्री का एजेंडा यही है कि जिसके खिलाफ वह लड़ रही है उसी (पुरुष) जैसी बन जाए

आप जनवादी लेखक संघ से जुड़ी हैं। क्या आपको लगता है कि लेखक संगठन साहित्य में कोई सार्थक या हस्तक्षेपकारी भूमिका निभा पा रहे हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: ये लोग सोचते और बोलते तो बहुत हैं पर काम नाम का ही दिखाई देता है। दरअसल समस्या यह है कि इनका खजाने पर वर्चस्व नहीं है। ये किसी को कुछ दे नहीं सकते हैं इसलिए लोग इनसे जुड़ते नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि इनके पास अपने देश के आम आदमी किसानों मजदूरों से जुड़ने की भाषा नहीं है। भारतीय स्तर पर देशी सिद्धान्त नहीं है। स्त्री-पुरुष को आर्थिक ढांचे में नहीं समझा जा सकता है। स्त्री मुक्ति का प्रश्न सिर्फ आर्थिक आत्म निर्भरता से जुड़ा हुआ नहीं है। वर्गीय सोच से भारतीय समाज का विश्लेषण संभव नहीं है। इन्हें भी इस बात को समझना चाहिए। तभी वे समाज की नई शक्तियों-महिलाओं दलितों को अपने आप से जोड़ सकते हैं और एक सार्थक भूमिका निभा सकते हैं।



हिन्दी की कुछ लेखिकाओं के लिए स्त्री मुक्ति का सवाल यौन स्वतंत्रता का सवाल बनकर रह गया है। उनका मूल तर्क होता है कि पुरुष ऐसा करता है तो हम क्यों नहीं? इस संबंध में आपका क्या मानना है?

मैत्रेयी पुष्पा: यौन संबंधों में पुरुष ऐसा करता है तो हम क्यों नहीं- इस पर मेरा कहना है कि हम मनुष्यगत अधिकार या नागरिकता का अधिकार तो वैसा ही चाहते हैं जैसे पुरुष को मिला हुआ है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम पुरुषों की नकल या अनुकरण करना शुरू कर दें। अगर हम नकल ही कर रहे हैं तो फिर नया क्या करेंगे। क्या स्त्री का एजेंडा यही है कि जिसके खिलाफ वह लड़ रही है उसी जैसी बन जाए। यौन संबंध तो परिस्थिति विशेष की बात है। जब ये बन जाते हैं इससे मैं इनकार नहीं करती। किंतु एक बड़ा प्रश्न यह है कि केवल हम इसी की आजादी लेने आए हैं क्या? राजेन्द्र यादव कहते कि देह मुक्ति स्त्री की सबसे बड़ी मुक्ति है। मैं उनकी बात को पूरी तरह नहीं मानती थी। शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां हैं। हम तो अंधे बहरे और लंगड़े थे। हमारे ये अंग मालिकों के हुक्म पर काम करने को विवश थे। स्त्री के लिए तो इन सभी की मुक्ति आवश्यक है। स्त्री की गुलामी व्यापक है इसलिए उसकी आजादी का संघर्ष भी व्यापक होना चाहिए।



आपकी रचनाओं में भी यौन प्रसंगों का चित्रण हुआ है। आप पर यह आरोप लग रहा है कि स्वयं तो आपने यौन प्रसंगों का चित्रण किया किंतु जब नई लेखिकाएं वैसा कर रही हैं तो आप उनका विरोध कर रही हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: जो ऐसा सोचते हैं उन्होंने मेरी रचनाओं को ध्यान से नहीं पढ़ा है। उन्होंने उन प्रसंगों को भी मौज-मस्ती का प्रसंग मानकर पढ़ा है जैसा कि आजकल की रचनाओं में होता है जबकि वे घटनाएं जानलेवा स्थितियों में घटित हुई हैं और उन्हें जिंदगी के किसी भी तरह बचा लेने की कोशिश के रूप में देखना चाहिए। महादेवी जी ने कहीं लिखा है कि युद्ध में जब सिपाही मर रहा है तो उसे नर्स की योग्यता से क्या मतलब होगा? उसे तो नर्स का स्पर्श और संवेदना चाहिए। मैंने न तब यौन सुख के लिए लिखा था न अब मानती हूं। मेरे प्रसंग और चित्रण पुरुषों की होड़ में नहीं है। समस्या यौन प्रसंगों के चित्रण से नहीं बल्कि चित्रण की दृष्टि से है।
[जिसे योनि-प्रसंग कहा गया है वह जीवन से जुड़ा हुआ तो है लेकिन लिखते समय बगैर मकसद इन प्रसंगों का आना उचित नहीं है मेरी नायिकाओं के मकसद अश्लील हरगिज नहीं थे। हमें ही सावधान रहना होगा कि साहित्य, साहित्य ही रहे पॉर्न न हो जाए।]



कुछ समय पहले ‘जनसत्ता’ में आपने एक लेख लिखा था। उस लेख में आपने नई पीढ़ी की लेखिकाओं की साहित्येत्तर गतिविधियों की चर्चा करते हुए उनकी रचनात्मक उत्कृष्टता पर सवाल उठाया था। उस लेख को पढ़कर लगा कि आप यह मानने को तैयार नहीं है कि स्त्री रचनाकारों की यह नई पीढ़ी कुछ बेहतर रच रही है। आप ऐसा कैसे कह सकती हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: अब मैं इस प्रश्न के जवाब में तुमसे प्रश्न करती हूं। क्या तुम इनकी कोई ऐसी रचना बता सकते हो जिसने ‘कलिकथा वाया बाइपास’ की तरह अपनी कोई छाप छोड़ी? ‘कठगुलाब’ जैसा कोई उपन्यास आया है क्या? क्या बड़े कैनवास की रचना का अभाव तुम्हें नहीं दिखता? अगर तुम सहमत नहीं हो तो किसी रचना का नाम बताओ। मैं यह नहीं कह रही हूं कि पूरा रचनात्मक परिदृश्य सूखा पड़ा है। रचनाएं लिखी जा रही हैं। पर मेरा सवाल यह है कि ऐसी कोई रचना क्यों नहीं आ रही है जो अपने समय की घटना बन जाए? अगर हमारे समय से आगे की स्त्रियां ऐसा कुछ नहीं रच पा रही है तो मैं कैसे कहूं कि यह समय रचनात्मक उत्कृष्टता का है। अभी तो वही दोहराया जा रहा है। जो कृष्णा सोबती मित्रों मरजानी में कर आयी हैं। साहित्य में दोहराव रचनाकार का सबसे बड़ा अवगुण है। भले ही हम उसे नए फार्म में कहें पर बात तो वहीं कह रहे हैं।
[नयी पीढ़ी अगर मेरी बात माने तो मैं कहना चाहूंगी कि अपनी दृष्टि का विस्तार करे और सांस्कृतिक सामाजिक और राजनैतिक परिपेक्ष्य को गहराई में देखते हुए अपनी रचनाशीलता को विकसित करे। इसके लिए उन्हें पुराना साहित्य ज़रूर पढ़ना पड़ेगा क्योंकि राजेन्द्र यादव कहते थे - जो पढ़ेगा नहीं वो लिखेगा कैसे? राजेंद्रजी ने मुझे एक उपन्यास लिखने के लिए बीसियों उपन्यास जिनमें भारतीय और विदेशी दोनों शामिल थे, पढ़वाये। क्योंकि इन्हें पढ़के हमारी लेखन शैली विकसित होती है इसलिए मेरा यह सन्देश नए रचनाकारों को है कि हो सके तो मेरी इन बातों पर ध्यान दें]

साहित्य में दोहराव रचनाकार का सबसे बड़ा अवगुण है। 


क्यों मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘शिगाफ’ की चर्चा नहीं हुई । राजेन्द्र यादव ने भी उसकी खूब तारीफ की थी।

मैत्रेयी पुष्पा: राजेन्द्र जी ने ज्योति कुमारी की भी तारीफ की थी। इससे ही सब कुछ निर्धारित नहीं होता कि कोई क्या कहता है। असल बात यह है कि पाठक क्या कहते है? क्या वहां के निवासी (कश्मीर) उस रचना में अपनी छवि देख पाते हैं? क्या यह रचना वहां के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को प्रामाणिकता के साथ सामने ला पाती है? अगर ऐसा नहीं है तो उसमें गहराई की कमी तो है। राजेन्द्र जी की माने तो उन्होंने ‘चाक’ को हिन्दी के दस क्लासिक उपन्यासों में माना था। यह उनका दृष्टिकोण था। उससे मैं खुश तो हो जाऊं पर मान भी लूं यह जरूरी तो नहीं। मेरे सामने ‘मैला आंचल’ और प्रेम के मामले में ‘न हन्यते’ एक आदर्श के रूप में हमेशा रहे हैं। मैं तो आज भी इनकी ऊँचाइयों तक पहुंचना चाहती हूं।



हिन्दी में स्त्री रचनाकारों की इतनी संख्या पहले कभी नहीं थी। संख्या की दृष्टि से उन्होंने पुरुषों की बराबरी कर ली है। यह कैसे मान लिया जाए कि लेखिकाएं कुछ भी नहीं लिख रही हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: मैं यह नहीं कहती कि ये लिख नहीं रही हैं पर क्या लिख रही हैं और कैसा लिख रही है, प्रश्न इसका है। इसमें कोई शक नहीं कि समय बदला है। समय के साथ हमने कई भ्रम भी पाले हैं। जिन किताबों को लिखकर हम पाठकों के हवाले छोड़ देते थे आज हम निजी ‘प्रोडक्ट’ की तरह सुरक्षा के घेरे में लोगों को दिखाते फिरते हैं। अब प्रचार-प्रसार के द्वारा ही कृति को पाठकों के समक्ष लाया जा रहा है। ऐसे में हमारी प्राथमिकता प्रचार प्रसार ही हो जाता है। जैसे विज्ञापन की बदौलत खराब से खराब सामान तौलिया टूथ पेस्ट आदि बिक जाते हैं, वैसा ही मामला किताबों का हो गया है। अब किताबें गुणवत्ता से नहीं विज्ञापन के सहारे महत्वपूर्ण या कमजोर साबित हो रही हैं। मुझे लगता है कि एक भ्रम का वातावरण निर्मित हो गया है। किताबें विज्ञापन नहीं होती। वे जिन्दगी होती हैं। विज्ञापनी संस्कृति के कारण किताबों का हश्र आज की फिल्मों की तरह हो गया है जिसकी जीवन लीला आठ दस दिनों में समाप्त हो जाती है।

[जो किताबें महत्वपूर्ण होती हैं वह अपना असर बिना विज्ञापन के भी ज़रूर कायम करती हैं , देर ज़रूर लगती है इसलिए तो कहते हैं – साहित्य तुरत-फुरत का मसला नहीं होता उसे तो सदियों की यात्रा करनी होती है। जिन किताबों का बहुत ज्यादा विज्ञापन किया जाता है उन किताबों को मैं पढ़ती ही नहीं हूँ।]



अगर आपकी बात सही है कि इस पीढ़ी के पास कोई बड़ी रचना नहीं है और इनकी विज्ञापन पर निर्भरता अधिक है तो फिर चित्रा मुद्गल ने इस मसले पर आपका विरोध क्यों किया?

मैत्रेयी पुष्पा: मुझे चित्रा मुद्गल से न तो कोई दिक्कत है और न ही मेरा उनसे कोई विरोध है। मुझे उनकी रचनाशीलता से भी कोई शिकायत नहीं है। ऐसा लगता है कि वे मुझे अपना प्रतिस्पर्धी समझती हैं पर, ऐसा है बिल्कुल नहीं। उनके सरोकार दूसरे हैं मेरे दूसरे। उनकी शैली के आस-पास मेरी शैली भी नहीं है। वैसे, यह प्रश्न उनसे ही पूछा जाता तो अधिक अच्छा होता। शायद उन्होंने मेरा इसलिए विरोध किया कि लेख में मैंने उस नाच का जिक्र किया था जिसमें बड़ी से छोटी लेखिकाएं नाच रही थीं और सारे लेखक देख रहे थे। गाना भी बहुत आपत्तिजनक था। ऊपर से प्रकाशक का यह कमेंट था- ‘मैंने चित्रा मुद्गल से लेकर सोनाली सिंह तक को नचा दिया।’ यह कोई गरिमापूर्ण टिप्पणी नहीं थी। चित्राजी ने लिखा कि मैत्रेयी नाच का क्यों विरोध कर रही हैं? मेरा उत्तर यह है कि मैंने किसी प्रकाशक के मुंह से ऐसी अभद्र बात नहीं सुनी। ऐसी बातें सुनने की शायद मुझे आदत नहीं।



आपने कई बार कहा है कि प्रेम और विवाह दोनों साथ-साथ चल सकते है। भारतीय सामाजिक संरचना में तो यह संभव नहीं दिखता कि एक स्त्री विवाह के बाद किसी दूसरे पुरुष से अपना प्रेम संबंध भी बरकरार रखे।

मैत्रेयी पुष्पा: मैं यह कहती भी हूं और मानती भी हूं। असल समस्या हमारी प्रेम की अवधारणा में है। देखो, विवाह जो होता है वह प्रेम नहीं हैं। विवाह में हमें सेक्स की सामाजिक अनुमति मिलती है। प्रेम में नहीं मिलती है। अगर हम सेक्स करते हैं तो नाजायज ही माना जाता है। मेरे ख्याल से प्रेम में सेक्स की जरूरत ही नहीं होती। विग्रह में पति से उस तरह का प्रेम नहीं होता जैसा प्रेमी से होता है। प्रेमी को पति बनाना ही नहीं चाहिए। प्रेम में हम पति थोड़े खोजते हैं? प्रेम और विवाह में विरोध या अड़चन वहां होती है जब हम प्रेम को सेक्स से जोड़ देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि प्रेम अंततः सेक्स में ही ‘कन्वर्ट’ होता है या पूर्णता प्राप्त करता है। मैं कहती हूं सेक्स के प्रवेश के साथ ही प्रेम खत्म होता है। ‘द एंड...’। प्रेम की चरम परिणति सेक्स नहीं है। सेक्स प्रेम की मृत्यु है। शरीर ढ़लने के साथ सेक्स खत्म हो जाता है प्रेम नहीं। प्रेम शाश्वत है, सेक्स दैहिक जरूरत है। आखिर ऐसा क्यों देखने में आता है कि प्रेम तो दस साल चलता है लेकिन जैसे ही वह प्रेम विवाह में बदलता है तो तीन साल में ही टूटने की नौबत आ जाती है। सेक्स कहीं मजबूरी के लिए होता है कहीं रिश्ते के लिए होता है लेकिन प्रेम सिर्फ प्रेम के लिए होता है। अक्सर होता है कि स्त्रियां प्रेम कहीं और करती है और उनकी शादी कहीं और हो जाती है। तो फिर स्त्रियां उस प्रेम को ताउम्र क्यों याद रखती है? पति से तो सेक्स ही रहा है जबकि उस प्रेम में तो सेक्स नहीं है। मैं शहरों में देखती हूं कि जैसे कपड़े बदलते हैं वैसे ही प्रेमी बदलते हैं। अगर तुम इसे प्रेम कहते हो तो प्रेम की तुम्हारी अवधारणा में समस्या है। मैं इसे प्रेम नहीं कहती। मेरे लिए प्रेम ऐसी निजी संपति है जिसका बंटवारा नहीं किया जा सकता है। अब मेरी परिभाषा से कितने सहमत होंगे, नहीं जानती। यह काफी उलझा हुआ सवाल है जिसे समझना बहुत मुश्किल है।





आपने कहा कि प्रेम में सेक्स नहीं होता या प्रेम का सेक्स से कोई संबंध नहीं है। आप मुझे बताइये कि आपके उपन्यास ‘चाक’ में सारंग और श्रीधर के बीच क्या है? वहां प्रेम से सेक्स कैसे आ गया?

मैत्रेयी पुष्पा: सारंग और श्रीधर के बीच प्रेम है। सेक्स होता तो चार दिन बाद ही चालू हो जाता और चलता ही रहता। मैं यह नहीं कहती कि सेक्स नहीं हुआ, पर वह सिर्फ एक बार घटित हुआ जब श्रीधर का जीवन खतरे में था। पुरुष भी जानते हैं और स्त्रियां भी जानती हैं कि सेक्स कमजोर पड़े आदमी में ऐसा आत्मविश्वास पैदा कर देता है कि वह जिजीविषा से भर उठता है। जैसे कि मैंने पूर्व में महादेवी जी का उदाहरण दिया है। सारंग और श्रीधर के बीच जो सेक्स घटित हुआ वह किसी मौज-मनोरंजन के लिए नहीं हुआ। ऐसे ही कलावती चाची और कैलाशी सिंह के बीच सेक्स एक ट्रीटमेंट के रूप में हुआ। सेक्स ने उस नपुंसक आदमी में ऐसा आत्मविश्वास भर दिया कि वह उतना बड़ा पराक्रम कर बैठा। इतनी तो समझ होनी ही चाहिए। सेक्स कब और कैसे घटित होता है।



‘चाक’ में आपने दिखाया है कि सारंग और श्रीधर के प्रेम संबंध को लेकर उसके ससुर गजाधर सिंह की सहमति है। गांव का एक जाट ससुर ऐसा कैसे हो सकता है? वह तो ऐसी बहु की हत्या कर दे। यह बड़ा विचित्र है कि आपने दिखाया है कि वह अपने बेटे रंजीत का साथ न देकर सारंग का साथ देता है।

मैत्रेयी पुष्पा: मैंने सहमति नहीं क्षमाशीलता दिखाई है। इसका कारण यह है कि सारंग के ससुर गजाधर सिंह समझ चुके हैं कि स्त्री के प्रेम संबंध को नाजायज संबंध मानकर उसे यह सजा नहीं देनी चाहिए कि उसका वजूद ही खत्म हो जाए। गजाधर सिंह अपनी पत्नी पर शक करके उसे ऐसी क्रूर सजा दे चुके थे जिससे कि उसकी मौत हो गई। वे रंजीत से कहते भी हैं कि तू ऐसा न कर। मैंने तेरी मां को खो दिया। उस समय मैं संभल जाता तो तेरी मां बच जाती। सारंग के प्रति क्षमाशीलता का भाव उनके खुद की जीवनानुभव की उपज है। वे यह भी कहते हैं कि रंजीत हम जाट हैं। हमारा धर्म दुश्मनों से लड़ना है औरतों की लहंगों की रखवाली करना नहीं। ऐसा नहीं है कि गजाधर सिंह कोई अस्वाभाविक चरित्र हैं।



आपकी लगभग सभी रचनाओं में स्त्री की ताकत का मूल स्रोत प्रेम है। किंतु आपके नवीनतम उपन्यास ‘फरिश्ते निकले’ में प्रेम बेला बहु की मुक्ति का नहीं बल्कि उनके दुख और उत्पीड़न का कारण बन जाता है क्योंकि प्रेम में उन्हें धोखा मिलता है। क्या प्रेम के प्रति आपका विश्वास डिगा है?

मैत्रेयी पुष्पा: देखो, प्रेम तो प्रेम ही रहेगा और वह हमेशा ताकत ही देता रहेगा। मैंने इस उपन्यास के माध्यम से यह दिखाना चाहा है कि राजनीति और बाजार ने जितना समाज को बदला है उतना ही प्रेम को भी यानी, राजनीति और बाजार ने उस प्रेम को बदल दिया जिस पर मेरी आस्था रही है। आज प्रेम का स्वरूप बदल गया है। वह पूरी तरह भौतिकवादी हो गया है। प्रेम स्त्री की ताकत का मूल स्रोत है। आज वह मूल स्रोत सूख रहा है। वहां उसे छल मिल रहा है। आखिर बेला बहु ने तो अपनी तरफ से तो भरत सिंह से प्रेम ही किया था। लेकिन वह छली गयी। बाजार और राजनीति ने प्रेम को इतना बदल दिया अब वह भी स्त्री के प्रतिकूल हो गया है।



आपकी एक किताब है ‘तबदील निगाहें’। इसमें आपने हिन्दी की महत्वपूर्ण रचनाओं का विश्लेषण करते हुए यह आरोप लगाया है कि स्त्री पात्रों को रचनाकारों ने पुरुष दृष्टि से ही रचा है। वहां स्त्री दृष्टि का घनघोर अभाव है। यह सवाल तो स्त्री रचनाकारों की स्त्री पात्रों पर भी उठाया जा सकता है। आपने उनपर क्यों नहीं लिखा?

मैत्रेयी पुष्पा: स्त्री रचनाकारों पर यह बात पूरी तरह लागू नहीं होती। मैंने तो पुरुषों पर आरोप लगाया कि उन्होंने स्त्रियों के बारे में स्वयं ही अनुमान लगा लिया। उन्हें बोलने ही नहीं दिया। स्त्रियों की रचनाओं में स्त्रियां बोलतीं तो बहुत है पर कर्म कुछ नहीं करती हैं। हमारी लेखिकाओं में काफी बौद्धिकता है, भाषा विन्यास भी जबर्दस्त है पर मूल प्रश्न तो यह है कि आपकी नायिका तोड़ती-फोड़ती कितना है और बदलती कितना है। वे चलती तो है झंडा उठाकर पर फिर झंडा फेंककर लौट आती है। मन्नू भंडारी की कहानी है- ‘यही सच है’। मेरा सवाल है कि यही सच क्यों है? पहला सच क्यों नहीं है? आपका प्रेम तो उसी से था। स्थानापन्न पाकर अपने प्रेम को तिलांजलि क्यों दी? यहां मुझे शिकायत होती है। ऐसी कई-कई शिकायतें हैं दूसरी लेखिकाओं की रचनाओं से भी। हिम्मत हुई तो मैं उनपर भी लिखूंगी।



आप राजेन्द्र यादव पर एक किताब लिख रही हैं। क्या है उसमें?

मैत्रेयी पुष्पा: मैंने ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में उनपर बहुत कुछ लिखा है। बहुत बातें जो रह गई हैं, उसे दर्ज कर रही हूं। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ लिखने का बाद भी बहुत चीजें हुई हैं। जिस राजेन्द्र यादव की हर बात पर मैंने हां में सिर हिलाया उन्हीं की दलीलों और आग्रहों का पुरजोर विरोध भी किया। विरोध क्यों किया? जब माना तो हर बात माना क्यों? अंतिम समय आते-आते फिर एक साथ जुड़े क्यों? इन सब बातों पर लिख रही हूं। मैंने उनके लिए जो किया है उसका जिक्र मैं नहीं करुंगी क्योंकि उन्होंने भी मेरे लिए किया है। वे आज नहीं है, मैं यहां तक हूं। मैं उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में क्या दे सकती हूं सिवाय किताब के। उन्होंने मुझे किताब लिखना ही सिखाया है। मेरी तरफ से तो यह किताब एक महीने में पूरी हो जाएगी। प्रकाशक कितना देर लगाएंगे कह नहीं सकती।

[किताब अब पूरी हो गयी है और ‘राजकमल प्रकाशन’ से छप कर आएगी] 




सुना है इसमें कुछ कड़वी बातें भी आने वाली हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: राजेन्द्रजी तो ऐसी बातों से खुश होंगे। इसे तो वे अच्छी श्रद्धांजलि मानेंगे। सीधी-सीधी बातों से तो वे नाराज हो जाते। बाकी तो पढ़ने पर ही पता चलेगा कि क्या है और कैसा है? 

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