वह टेढ़ा इसीलिए हो गया है बिट्टो क्योंकि वह धर्म को किसी अनजाने खतरे से बचाने चला है
— सरकफंदा
बाज़दफ़ा कोई फ़िल्म, सीरियल आपकी बोली बदल देता है; वंदना राग का उपन्यास 'सरकफंदा' आपकी सोच (और भाषा भी) बदल सकता है। भारत जिस दौर से गुज़र रहा है, उसे दर्ज किया जाना ज़रूरी था। अब यह ज़रूरी है कि यह उपन्यास अधिकतम लोगों द्वारा पढ़ा जाए, ताकि शायद सनद आए... शुक्रिया। ~ भरत तिवारी (सं0)
चाइल्ड इज़ द फ़ादर ऑफ़ मैन : वंदना राग के उपन्यास "सरकफंदा" का अंश (प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन)
पिता हमेशा उत्साह और गर्व से अपने युवा समय के असामान्य होने की बातें करते थे। लगता था जैसे एक समयचक्र में गोल गोल घूम रहे हों। बिट्टो जब उनसे पूछती - “वैसे असामान्य होता क्या है? क्या हम आज भी असामान्य जीवन नहीं जी रहे हैं? सामान्य और असामान्य की परिभाषा आखिर तय कौन करता है ?तो पिता की आवाज़ में रहस्य भर जाता। वे मन ही मन कहते-
हमारे असामान्य से इस तरह के असामान्य की तुलना बेकार है बिट्टो। यह समय बनावटी है!”
अब बिट्टो क्या खाक समझती? हर बार उनके तर्कों अनुसार उनका समय श्रेष्ठ और यह बीतता समय बेबुनियाद, भुरभुरा, धसकने, भसकने के लिए तैयार होता।
“हवा में अफीम घुल गई है!”
पिता माँ को कहते और माँ झन्ना कर ज़ोर-ज़ोर से बरतन पटकने लगती। पिता कभी माँ की हरकतों पर हँसते तो कभी चिढ़ कर कहते –“अगर ठीक से गांधी को समझतीं तो इतना आवेश नहीं होता। यह तेजमिज़ाज लोगों की दिक्कत होती है वे किसी की सुनते नहीं और भड़क जाते है।“
फिर वे दीवार पर टंगी नेहरू की तस्वीर पर ऐसे प्रतिकार की नज़रों से देखते कि बिट्टो को लगता स्कूल के सक्सेना मास्टरसाब उसे सज़ा देने के लिए कोने में भेज रहे हों- “दीवाल की ओर मुँह खड़ा कर पूरे पीरीयड खड़ी रहो। गजब अनुशासन तोड़ती हो लड़की! जब कहा बात नहीं करनी है तो भी सिर्फ बातें करती हो तुम!”
और बाइओलॉजी के खान सर ने जब अपनी फेवरिट लड़कियों को बात करने पर सज़ा न देकर बिट्टो को अपने हाथ में पकड़ा डंडा उठाकर दिखाने लगे थे तो बिट्टो ने बिना चीखे चिल्लाए बेहद बर्फीली टोन में कहा था, - “आप मुझे मार नहीं सकते सर ? हाथ नहीं उठा सकते मेरे ऊपर । ”
तो वे जाने क्यों डर कर थमक गए थे और डंडा पीछे छिपाते हुए बोले थे, -“क्यों ? क्यों नहीं मार सकते ? क्या खुदा हैं आप सुप्रिया जी ?”
बिट्टो ने ढीठ की तरह आँखों में आँखें डाल कहा था, - “ खुदा का तो पता नहीं लेकिन मुझे मार नहीं सकते आप। मैं अन्याय नहीं सहूँगी, प्रिन्सपल के पास जाऊँगी। जिनकी गलती थी आपने उन्हे हँसते हुए छोड़ दिया और मुझे ...? सर मैं नहीं, गलत आप कर रहे हैं।“
उस वक्त पिता सामने न होते हुए भी बुदबुदा रहे थे कान में, बुली कभी मत होना बिट्टो, किसी से भी दबना गलत है। सविनय अवज्ञा करना। अन्याय नहीं सहना!
बाद में अमित अग्रवाल ने बताया था, - “ सू सर डर गए थे यार। जब तू क्लास से पैर पटकती हुई बाहर गयी तो वे हमें भेज रहे थे तेरे पीछे। देखो तो भाई, कहीं प्रिन्सपल के पास सचमुच तो नहीं चली गयी वो? बड़ी ढीठ लड़की है!
पिता, कान में, ज़ेहन में। इरिटेटिंग हद तक,
हमारे पास कोई सुनवैया नहीं था भाई, हम किस से शिकायत करते? हमारा मूल मंत्र गांधी ने कान में फूँक दिया था, सो हम बैठ गए सत्याग्रह पर और अंग्रेजों ने हमपर जम कर लाठियाँ बरसाईं! फिर भी हम डटे रहे, घायल,चोटिल लेकिन बुलंद, सविनय अवज्ञा ! सविनय अवज्ञा!****
पिता भविष्य द्रष्टा नहीं थे।
वे बस अपने अर्जित अनुभवों के आधार पर मानते थे कि लोगों से गलतियाँ हो जाया करती हैं। जिन्हें हम अच्छा कहते हैं वे लोग भी जीवन के किसी निर्णायक मोड़ पर भटक जाते हैं और मनुष्य विरोधी फैसले ले लेते हैं। हमारा दायित्व है हम उनका हृदय परिवर्तन करने का प्रयास करें। इस नाते पिता,-नमस्ते अंकल जी, चरण स्पर्श आंटी जी, (तुम्हारे उभार सुंदर हैं बेबी जी) के लिए भी बहुत संवेदनशील रवैया रखते हैं।
“थोड़ा भटक गया है बिचारा जैसे वो भटक गया था, (पिता अपने ज़माने के किसी न मालूम शख्स को बहुत टीस से याद करते। बहुत बाद में जिसके बारे में मालूम भी हुआ मुझे) ...धर्म अफीम होती है न बेटे।“ वे बार-बार मेरी स्कूल की सिविक्स की किताब में लिखे मार्क्स के कथन को उद्धृत करते हैं, - “वह टेढ़ा इसीलिए हो गया है बिट्टो क्योंकि वह धर्म को किसी अनजाने खतरे से बचाने चला है,“ (अच्छा ? वही खतरा न जो स्कूल व्हाट्सअप ग्रुप से अमित अग्रवाल द्वारा निष्काषित विधर्मियों से लगता था सबको?) मैं जानती हूँ, फिर भी बोल नहीं पाती।
लेकिन - वो कौन था जिसकी वजह से पिता सभी भटके हुए लोगों के प्रति संवेदनशील हो जाते थे? क्या लगता था उनका?
हट्ट ! तो क्या पीढ़ी दर पीढ़ी लोग यूँही कन्फ्यूज़्ड सी विरासत लिए पैदा होते रहते हैं? और उसी कन्फ्यूज़्ड विरासत को ढोते रहते हैं आजीवन?लाइब्रेरियन मेरे इस सवालिया मूड को भांप, कई किताबें अपने को खुजलाने के अभिनय में शेल्फ से नीचे गिरा देता है।
पिता कस के बिगड़ते हैं इसपर, - “सुप्रिया.....देखो इसे। कुछ ट्रेन करो इसे, माई एक्सपेरीमेंट्स विद ट्रुथ, बाई गांधी गिरा दिया इसने ।“
“वह बिल्ला है!” मैं अपना सर्टिफिकेटी नाम पिता के मुंह से सुन चीखती हूँ, पूरे बिगड़ैल तेवर के साथ! पिता के साथ इतनी दूरियों के बावजूद एक और अघोषित दूरी महसूस होती है। मतलब ये इतना गुस्सा हो गए कि मुझे बिट्टो के बजाय सुप्रिया कहने लगे? यह बात मुझे सुहाती नहीं है। सुलगा देती है।
फक एव्रीबॉडी !“इंसानों को तो आप माफ कर देते हैं और मेरे प्यारे बिल्ले से आपको चिढ़ मचती है? कमाल की बात है ये! मुझे तो उलट लगता है जैसे यह घर, यह सोसाइटी महान बूढ़े लोगों द्वारा बनाया गया एक जंगल है ! जहां रियल कपटी खूंखार बिल्ले जवान हो रहे हैं। जो हमेशा हमें डिस्टर्ब करते हैं। उनका क्या? उनको कुछ कहते हैं क्या कभी आप? उनसे दबे रहते हैं बस!” मेरा यह तंज़ गलत था, मैंने यह बोलते ही जान लिया था। आखिर पिता में बुढ़ापे समेत लाख कमज़ोरियाँ थीं, पर वे डरपोक कत्तई नहीं थे। फिर भी मैं आज उनपर तंज़ कर रही थी। उनपर शोहदों से दबने का इलज़ाम लगा रही थी!
पिता सुनकर भी मेरी यह बात नहीं समझते या समझ कर भी अनदेखा करना चाहते हैं।
ओह! फक यू... फक यू!मैं हवा में चीखों को धीरे-धीरे रोंपती हूँ मानो अपने में शापों से सजा प्रतिशोध का एक पेड़ उगा रही हूँ और उम्मीद कर रही हूँ कि शापों की सर्पीली लतायेँ उन सभी के गले से लिपट जाएँ जो पिता और माँ की नीयत पहचान कर भी उन्हें ठगते रहे हैं। लेकिन फिर अचानक से मैं चौंक कर थम जाती हूँ.
अपने बूढ़े पिता और अपनी बूढ़ी माँ पर मुझे यह ममता कैसे आने लगी?कोई एकदम से कुछ क्लीशै बकता है, कान में मानो अनोखा रहस्य बाँट रहा हो - स्कूल की कुसुम लता मैम थी शायद, कुसुमलता मैम, अंग्रेज़ी वाली - चाइल्ड इस द फादर ऑफ मैन – लर्न दिस। अन्डर्स्टैन्ड दिस।
रियली?
हट्ट!
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यह पाठ वंदना राग के उपन्यास ‘सरकफंदा’, राजकमल प्रकाशन से साभार प्रकाशित अंश है।
लेखिका: वंदना राग | प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

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