अचला बंसल की कहानियों में एक अनाम फिलॉसफी तैरती रहती है, जो पाठक के अंतर्मन को भिगोकर उसकी संजीदगी को संवारती चलती है। ‘समय से परे’ ऐसी ही कहानी है, जो पढ़ लेने के बाद देर तक भीतर कहीं टिक-टिक करती रहती है। समय रहते इसे पढ़ लीजिए और अचला जी को उनके अस्सीवें जन्मदिन (28 जून 2026) की हार्दिक शुभकामनाएँ भी दे दीजिए। ~ भरत तिवारी (सं.)
उसने अपने सामने पसरे समय के विविध रूपों पर निगाह डाली। कौन यक़ीन करेगा कि उसे इसलिए देर हो गई क्योंकि घड़ी की दुकान में सही वक़्त न था।
— समय से परे
समय को हम अक्सर घड़ी की सुइयों में तलाशते हैं, जबकि उसका वास्तविक निवास हमारी स्मृतियों, रिश्तों और अनुभवों में होता है। अचला बंसल की कहानी ‘समय से परे’ इसी सच को बेहद संवेदनशील ढंग से सामने लाती है।
कहानी
अचला बंसल
सूनी कलाई के एहसास ने शिल्पा को जून की उमस भरी गर्म दोपहर में ट्रैफ़िक लाइट के स्टॉप निर्देश को नज़रअंदाज़ कर, एक्सलरेटर दबा, आगे बढ़ने को मजबूर कर दिया। जल्दी करे तो शायद लंच के लिए शटर गिरने से पहले, उस दुकान पर पहुँच जाए, जहाँ उसने अपनी ऊँघती हुई घड़ी, फिर से हरक़त में लाने के लिए दे रखी थी।
तभी उसने घबराकर देखा, पसीने से तरबतर चेहरा पोंछता, एक झल्लाया पुलिसवाला जिन्न की तरह नमूदार हो, उसे रुकने का इशारा कर रहा है। इमोशनल ब्लैकमेल की उसकी तमाम कोशिशें - मसलन, भूखे बच्चे बस स्टॉप पर उसका इन्तज़ार कर रहे हैं, अस्पताल में बीमार रिश्तेदार है- हाँ, उसने बेशर्मी से झूठ बोले थे- उसे चालान करने से नहीं रोक पाईं। बौखलानेवाली गर्मी और डैशबोर्ड पर पड़े काग़ज़ से याद आती अपनी मूर्खता के तनाव को झेलते, उसने सुस्त भाव से गाड़ी आगे बढ़ाई।
'लेकिन तुम ऐसी मूर्खता कर कैसे सकीं, वह भी बेमतलब ?' पति का कई बार पहले सुना जुमला कानों में बजा।
अगर वह ट्रॉफी लेकर घर पहुँची तो उलाहने की नौबत नहीं आएगी। यानी हर हाल घड़ी हासिल करनी होगी, उसने एक्सलरेटर पर दबाव बढ़ा दिया। एक चमचमाती हॉन्डा और एक ढीठ फलवाले के बीच, जो एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार न था, अपनी नन्ही गाड़ी अटाते, उसने विजयी भाव से देखा, दुकान खुली थी।
'ये अब भी पीछे चल रही है,' बिगड़ी घड़ी का मुआयना करने के बाद शिल्पा ने तेज़ आवाज़ में शिकायत की। 'हर कोई अपना वक़्त ख़ुद तय करता है,' काउंटर पर खड़े बूढ़े ने जवाब दिया। उसके कुतर्क ने उसे और बौखला दिया। समय, उसने सोचा, एक शाश्वत तत्त्व है, मृत्यु की तरह अकाट्य और अटल। सूरज की अल्हड़ अदाओं से बेपरवाह, अकम्प अचूकता के साथ दिन को रात और रात को दिन में मिलाता, वह निष्ठुरता से टिकटिक करता रहता है।
पूरी दुनिया में भ्रमण करता इनसान एक से एक सजावटी और महँगी घड़ियाँ ले सकता है; अपने टाइम पीस को बार-बार सेट करने का सन्तोष हासिल कर सकता है। लेकिन बड़े से बड़ा शेखीबाज जानता है कि समय पर उसका क़तई नियंत्रण नहीं है। अपनी घड़ी की सुइयाँ आगे-पीछे करना, इस पर निर्भर है कि वह दुनिया के किस हिस्से में है। पर वह जहाँ भी हो, समय चलता अपनी पूर्वनिश्चित धुरी पर ही है, सूरज के उगने-छिपने की तरह।
उसे ज्ञान दे रहे अज्ञ इनसान को एक नज़र देख, उसने सँभालकर बात कही कि शायद उसकी बुझी आँखों में समझदारी की कौंध जगा सके। 'घड़ी को तो एक सही समय बतलाना होता है न ? वह सिर्फ़ अलार्म है, जो आदमी अपनी मर्जी से सेट कर सकता है।' वह पूरी तरह बेअसर रहा। उसकी सन्त मुद्रा से हताश, उसने चारों तरफ लगी घड़ियों पर नज़र दौड़ाई ज्यादातर रुकी हुई थीं। जो चल रही थीं, एक-दूसरे से मेल नहीं खा रही थीं। सही समय क्या है, सोचते हुए उसे लगा, वह चारों तरफ पसरे समयहीनता के जाल में खोती जा रही थी।
शिल्पा अपने मायावी उत्पीड़क की तरफ मुड़ी ताकि उसका ध्यान उस असंगति की तरफ खींचे, जो उसकी निगाह में उसकी नाकामी का सबूत थी पर उसके स्थिर, वीतरागी चेहरे पर निगाह डालते ही उसके शब्द जम गए। लगा, उसके पास समय ही समय है; कुछ पलों का इधर-उधर होना कोई मायने नहीं रखता।
क्या वह उतना मतिमूढ़ था जितना दिखता था या खुद उससे ज्यादा दुनियादार, जो ऐसी तपती दुपहर में उसकी दुकान तक धड़धड़ाती चली आई थी, जब आवारा कुत्ता भी लावा उगलती सड़कों से दूर रहना पसन्द करता है? जो बेशकीमती मिनट उसने बचाए थे, ढीठ घड़ी का उन्हें दर्ज करने से इनकार, उसके बेमानीपन और पैसे के नुकसान के एहसास को बढ़ा रहा था।
'ये बस तीन मिनट पीछे है,' बूढ़ा ऐसी भुतहा आवाज़ में कुनमुनाया कि उसकी रीढ़ सिहर गई।
'पापा, आप अब जाएँ, मैं सँभाल लूँगा,' एक चुस्त जवान लड़के ने दुकान के पीछे से निकलकर कहा, 'बतलाइए, समस्या क्या है?' उसकी करारी, कारोबारी आवाज़ से आश्वस्त शिल्पा ने उसे अपनी परेशानी की वजह बताई।
'आप बैठिए मैडम, मैं इसे चेक करता हूँ।' उसकी बात से उसे राहत मिली।
साइड टेबल पर पड़े इकलौते, साफ़-सुथरे ढंग से मुड़े अखबार को उठाकर वह दुनिया के उन तल्ख़ मसलों में मशगूल हो गई। उनके सामने सही वक़्त बतलाने में एक घड़ी की नाकामी पर उसकी नाराजगी, उतनी ही बेतुकी और बेमानी थी, जितनी देश के कुछ हिस्सों पर मूसलाधार बारिश की इन्द्रदेव की मेहरबानी और दूसरों पर, प्यासे इनसान को इस आस में तरसाना कि शायद गुस्सैल आसमान आग उगलना छोड़, उसकी दुर्दशा पर दो आँसू बहा दे। अगर वह बीते दिनों की होनी-अनहोनी के तमाम बेतुके ब्योरे दिमाग़ में रखकर घर से निकलती तो वक़्त की चूकों की भयावहता से इस क़दर त्रस्त होती कि वक़्त नाम की धोखेबाज़ रौ में सुधार लाने का जोश खो चुकी होती। शिल्पा ने अखबार से सिर उठाकर कुछ उम्मीद से देखा, क्योंकि काउंटरके पीछे से आवाजों की भिनभिन आ रहे थी। बूढ़ा नाराज लग रहा था और बेटा उसे समझा रहा था। उन्हें देखते उसे रंगे हाथों पकड़ने पर लड़का दन से बोला, 'कल आइएगा, आज हम दुकान जल्दी बन्द कर रहे हैं।'
लड़के की औचक बरखास्तगी से हैरान, वह कुर्सी पर चिपकी बैठी रही।
'बन्द कर रहे हैं? किसने कहा, बन्द कर रहे हैं?' उसका बाप चीखा।
'प्लीज पॉप,' बेटे ने मनुहार की।
'मुझे पॉप-पॉप कहना बन्द करो। तुम जानते हो, मुझे इस नाम से नफ़रत है।' उसने अपनी बाँह से उसका हाथ झटक दिया, 'तुम क्यों चाहते हो कि मैं दिन-दोपहर दुकान बन्द कर दूँ? तुम्हें पता है न, शनिवार इतवार को मेरे पास कितने ग्राहक आते हैं? नहीं पता क्या, विवेकानन्द ?' उसने चिड़चिड़ाकर पूछा।
'भगवान के लिए, मुझे वि-वे-का-नं-द मत कहिए,' लड़का फुफकारा।
'तो क्या कहूँ, विकी ? जैसे तुम्हारी कुन्दज़ेहन बीवी कहती है ?' उसने खिल्ली उड़ाते हुए कहा, फिर ऐलानिया स्वर में जोड़ा, 'तुम्हारे दादा ने तुम्हारा नाम विवेकानन्द रखा था, और मेरे मरते दम तक तुम विवेकानन्द रहोगे!'
लड़के की आँखें गुस्से से दहक उठीं।
शिल्पा जल्दी से उठ खड़ी हुई, इससे पहले कि बाप-बेटे का झगड़ा और फूहड़ हो, वह बाहर निकल जाना चाहती थी।
'हमें देर हो रही है विकी,' दरवाज़े पर एक तुतलाती-सी जनाना आवाज़ की पुकार ने उसके क़दम रोक दिए।
'आ रहा हूँ,' पिता की तरफ चोर निगाहों से देखते हुए लड़के ने जवाब दिया। निजी ज़रूरत ने उसका गुस्सा उड़ा दिया होगा क्योंकि अब उसने मनुहार करते हुए कहा, 'प्लीज पॉप, पापा, आपको पता है, हम अनुज को अकेला नहीं छोड़ सकते।'
'उस बन्दर का ध्यान रखने के लिए मैं अपनी दुकान बंद नहीं कर सकता,' उसने दो टूक जवाब दिया।
'वो आपका पोता है—आपका इकलौता पोता और आप उसे बन्दर कह रहे हैं,' बेटे ने शिकायती लहजे में कहा।
'पता है, पता है, पर मेरा काम पहले है,' कहते हुए उसका चेहरा सख्त हो गया, ठुड्डी तन गई।
'आपको इस खस्ताहाल दुकान में पूरा दिन गुजारकर क्या मिल रहा है?' उसने तिरस्कार से कहा। फिर घड़ी पर नज़र डाल, बदहवास हो, अपना सुर बदल फुसलाती आवाज में बोला, 'हमें और पैसा नहीं चाहिए। मैं चाहता हूँ, आप आराम करें। इस बुढ़ापे में इतना बोझ न लें।'
'मुझे बूढ़ा तब कहना, जब मैं तुम्हारे फ़ितने को सँभालने लायक न रहूँ,' उसने तीखे स्वर में कहा लेकिन उसका चेहरा मुलायम पड़ गया। बेटे ने तुरन्त उसका मर्म समझ, बाप की नम आँखों के सामने जादू की छड़ी घुमाई, 'कल मैं ख़ुद आपकी मदद करूँगा, वादा रहा। कल हम ज्यादा काम करेंगे और आज की भरपाई कर लेंगे।'
'हाँ, जैसे तुम गुजरा वक़्त वापस ला सकते हो।' बूढ़े ने जवाब दिया।
लड़के का चेहरा मुरझा गया। उसके पिता के होंठ हिले, उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट तरंगित हो गई। हाथ से जाने का इशारा करते हुए उसने कहा, 'इससे पहले कि मेरा मन बदल जाए, जहाँ जाना है, जाओ। '
लड़का लपककर बीवी के पीछे दौड़ा जो तब तक गाड़ी में बैठ चुकी थी और हॉर्न दे रही थी। अपने शोर से उनकी विदाई की सूचना देती गाड़ी निकल गई। बाप और उसने लगभग एक साथ राहत की साँस ली।
'मैं कल आती हूँ,' दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए उसने कमज़ोर लहजे में कहा।
'नहीं, नहीं, आपने इतना इन्तज़ार किया है, घड़ी आप को आज ही ले जानी चाहिए, वह उसे देख आजिज़ी से मुस्कुराया, 'मैं इसे अभी चेक कर देता हूँ।' उसकी नानुकुर को अनसुना कर वह भीतर चला गया।
तब तक उसका सब्र जवाब देने लगा था। वह बस इतना चाहती थी कि किसी तरह वहाँ से निकल, घर के सुकूनदेह अपनेपन में दुबक सके। प्री-बोर्ड्स की प्रीपरेटरी क्लासेज की चक्की में पिसता उसका बेटा जल्द घर लौट आएगा- परेशान और भूखा पर खाने को तैयार नहीं, जब तक उसका पसन्दीदा मीठा सामने न आ जाए। मीठे के शौक़ की वजह से उसका बुरी तरह थका दिमाग़ भी डिजेर्ट को नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता था।
उसने अपने सामने पसरे समय के विविध रूपों पर निगाह डाली। कौन यक़ीन करेगा कि उसे इसलिए देर हो गई क्योंकि घड़ी की दुकान में सही वक़्त न था। बेटे का मायूस चेहरा आँखों के सामने न होता, उसकी ख़ामोश शिकायती निगाहें सीना न मसोस रही होतीं, तो वह इस विडम्बना पर हँस सकती थी।
वह बेचैनी से पहलू बदलती रही। अपने-आप में खोया बूढ़ा जैसे उसकी उपस्थिति भूल चुका था। उसका बेटा ठीक कह रहा था। उसे वाकई संन्यास ले लेना चाहिए, रिटायर हो जाना चाहिए, हमेशा के लिए, उसने तल्खी से सोचा। फिर भी बूढ़े की खाली दुकान को भगवान भरोसे छोड़, जहाँ कोई भी भीतर घुस, चुपके से कुछ घड़ियाँ जेब में डाल निकल सकता था, छोड़ जाने के लिए वह तैयार न हो सकी। किसी अपराधी को शह देने के ख़याल से उसके होंठ भिंच गए और वह इन्तज़ार करती बैठी रही।
पीछे का दरवाजा तेजी से खुला, और हाथ में स्कूल का बैग पकड़े एक छोटे बच्चे को साथ लिये डगमग करता बूढ़ा अन्दर आया।
'अब यहाँ कोने में बैठो और सोमवार का पाठ याद करो। मुझे थोड़ा समय लगेगा, फिर हम घर चलकर चोर सिपाही खेलेंगे, ठीक ?' उसने बच्चे को आँख मारी।
'ठीक,' बच्चे ने भी आँख मारी, और उसकी आँखें साज़िश में हिस्सेदारी से चमक उठीं।
'और याद रखना...'
'मुझे मालूम है, अपने ऐडवेंचर के बारे में कुछ नहीं बतलाना है, यह हमारा राज है, ठीक ?' उसने पहेली के अन्दाज़ में कोडवर्ड दुहराया। अचानक एक महिला की उपस्थिति का एहसास हुआ तो दादा की तरफ़ पछताकर देखा।
'आपकी घड़ी तैयार नहीं है,' उसकी तरफ रुख करते हुए उसने रूखे स्वर में कहा। 'मैं भीतर बच्चे को एक बार देखने गया और इस आलसी ने सोचा, वह एक झपकी ले सकता है,' वह बड़बड़ाया।
उसने इन्तज़ार किया कि वह कुछ और कहेगा। हालाँकि उसकी देरी की वजह जायज़ और समझ में आने लायक़ थी फिर भी अगर वह खेद प्रकट करता या मुस्कुराता तो उसकी तनी नसों को कुछ राहत मिलती। लेकिन उसका चेहरा सपाट बना रहा, कोई पछतावा नहीं दिखा। बेशक़ वह एक ढीठ शख्स था, उसने रुखाई से सोचा। उसे उसके बजाय उसके बेटे से हमदर्दी हो आई, जिसे उसकी सनक को हरदम झेलना पड़ता था।
'क्या आपको लगता है, बच्चा थोड़ी देर यहाँ रहा तो उसका कोई नुकसान हो जाएगा ?' अचानक उसने भेदती नज़रों से उसे घूरकर पूछा। असहज महसूस करती वह इधर-उधर देखने लगी, समझ में नहीं आया, क्या कहे उसकी भरोसा करती आँखों ने उसकी जुबान सी दी। उसने उसे विवश भाव से देखा; काश वह उसे, जो आख़िर एक अजनबी थी, वहाँ से जाने दे। वह उसकी ज़िन्दगी के जंजाल के बारे में राय कैसे दे सकती है ? देगी तो अनजाने ही सही, या तो उसकी मुसीबत बढ़ाएगी या उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ नाइंसाफ़ी करेगी। लेकिन उसका प्रश्नकर्ता उसकी चुप्पी का मतलब नहीं समझ पाया और उसे अन्य जानकारियाँ देता रहा।
'इसके माँ-बाप को लगता है कि इसके लिए यह सही जगह नहीं है,' वह खिल्ली उड़ाते हुए हँसा। 'पर दीवाली की रातें वे जुआ खेलते हुए, इसे बगल में बैठाए रहते हैं—इसे अपना शुभंकर मानते हैं। यह उनके लिए कार्ड उठाता है, छोड़े हुए कार्ड और पैसों से खेलता है और वे खुशी-खुशी करने देते हैं। शनिवार की रात कहते हैं, कल इसे स्कूल नहीं जाना है और दीवाली को, आखिर दीवाली साल में एक बार आती है। ये उनकी बच्चे को रातभर घुमाने की लँगड़ी कैफ़ियत हैं।' वह हॉफ रहा था; पता नहीं तेज-तेज बोलने से, साँस न ले पाने से या बेकाबू होते जज़्बात की वजह से। वह वहाँ से निकल भागने को तरस रही थी फिर भी उसकी तकलीफ़ से, जो रिसते घाव की तरह सामने पसरी थी, अनछुई न रह सकी।
'एक दिन, जब ये मेरे साथ बैठा मुझे एक घड़ी की मरम्मत करते ध्यान से देख रहा था, इसके एक दोस्त की माँ आई और 'बेचारे' बच्चे की ख़राब परवरिश पर च्च-च्च करने लगी, जबकि उसकी 'बेचारी' माँ ऑफिस में खट रही थी। जब मेरे बेटे ने सुना तो बच्चे को दुकान में घुसने से मना कर दिया। बेवकूफ ! मैं इसे सिखाता कि काम करने में अपने हाथ भी लगाए, अपने भूले-भटके माँ-बाप की तरह सिर्फ़ दिमाग़ नहीं।' जितने अप्रत्याशित ढंग से उसने अपना एकालाप शुरू किया था, उतनी ही क्षिप्रता से उसे बन्द कर दिया और मायूस ख़ामोशी में डूब गया।
शिल्पा बाहर निकली तो बूढ़े की उदासी उस पर भी छाई हुई थी। अगले दिन उसका वहाँ जाने का इरादा नहीं था, लेकिन एक सवाल उसे कुरेद रहा था, क्या अगले दिन बेटा दुकान में उसकी मदद करने का वादा निभाएगा? उसने वहाँ जाने का फ़ैसला कर लिया, अपने को समझाकर कि उसके लिए उसके पास जायज़ वजह थी। विकी नाम के अक्खड़ लड़के ने उसे अगले दिन आने को कहा था न ?
वह, विकी, वहीं था। उसने अपनी बात रखी, उसे मानना पड़ा। लेकिन उसका बाप कहीं दिखाई नहीं दिया।
'मेरे पिता ने इसे आपको देने को कहा है,' उसके सामने घड़ी रखते हुए उसने बेरुखी से कहा।
उसने मायूसी अनुभव करते हुए घड़ी उठा ली। वह अब भी वक़्त से पीछे चल रही थी, देखकर उसने राहत महसूस की। अब वह दुकान से जाना स्थगित कर सकती थी। क्यों भला ? उसकी आँखों ने उस बूढ़े की शरणगाह का मुआयना किया, ताकि कुछ सुराग मिल सके कि वह कहाँ है जब उसका बेटा उसकी ग़ैरमौजूदगी से उदासीन है तो आखिर एक अजनबी को परवाह क्यों हो, उसने असमंजस से सोचा। पर क्या वह वाक़ई अजनबी थी? क्या उस शख्स ने उसे एक पर्यवेक्षक और राजदार की भूमिका में नहीं ढाल दिया था, जिसकी दुकान और अपनी ज़िन्दगी से ग़ैरमौजूदगी, उसे परेशान कर रही थी — वह इत्तिफ़ाक था या उसकी नियति? अपनी तकलीफ़ों की पोटली उसे सौंप कर वह यों जा नहीं सकता, आराम करने या अपने पोते के साथ खेलने... उसकी उम्र में अनन्त सम्भावनाएँ थीं। उसने तय किया कि उसे जानने का हक है—किसी और वजह से नहीं तो चैन हासिल करने के लिए।
उसके बेटे की सोची-समझी चुप्पी से चिढ़कर शिल्पा फट पड़ी, 'घड़ी अब भी सही समय नहीं बतला रही। कहाँ हैं आपके पिता ?'
एक लेजर का मुआयना कर रहे बेटे ने सिर उठाया। आगंतुक को ढिठाई से देखा और ऐंठकर कहा, 'जब मैं यहाँ हूँ तो उनकी क्या जरूरत है? उनके सारे ग्राहकों को आधे दिन में निबटा दूँगा।'
'मैं उनका इन्तज़ार करूँगी,' शिल्पा ने सख्त लहजे में कहा।
'जैसा आप चाहें,' उसने कन्धे झटक दिए, मैं जल्द ही दुकान बन्द करके चला जाऊँगा।'
पीछे का दरवाजा चरमराता हुआ खुला। बूढ़ा एक लाठी की मदद से लगाता हुआ भीतर आया। 'विवेकानन्द,' उसकी कर्कश आवाज सुनकर लड़के का चेहरा लाल हो गया।
'तुम्हें इस दरवाज़े में तेल डालना चाहिए। इसकी चूलें सूख गई हैं।'
'क्या हुआ आपको ?' उसके लँगड़ाने से घबराकर शिल्पा ने पूछा।
'बस एड़ी में मोच आ गई,' कुछ तकलीफ़ के साथ काउंटर की तरफ बढ़ते हुए वह हँसा।
'आई कैसे? क्यों नहीं बतलाते ?' बेटे ने कटाक्ष किया, 'एक डाकू को पकड़ने में, आप यकीन कर सकती हैं। जब मैंने पूछा तो इन्होंने यही कहा।'
शिल्पा ने मुस्कुराहट छुपाने की कोशिश की।
'और वह सच क्यों नहीं हो सकता ?' पिता ने झुंझलाकर कहा, 'मैं पहले भी कर चुका हूँ, नहीं क्या? मैंने उसकी बाँह मरोड़कर काँख से निकाल दी थी, जब मेरा कम्बल उठाकर भागने की कोशिश कर रहा था,' वह हँस पड़ा।
"च्च! वह एक छोटा चोर था, ' बेटा खिल्ली उड़ाते हुए हँसा, 'और वह बीस साल पहले हुआ था। अब बात अलग है।'
'क्या अलग है?' बात चुभी तो बाप ने गुस्से से पूछा।
'पापा, आप जानते हैं कि अब आप पहले जैसे फुर्तीले नहीं रहे। फिर हम ग्यारह बजे तक लौट आए थे और हमें सब सही-सलामत मिला था। जब हम आए तो चौकीदार ठीक हमारे घर के सामने खड़ा था और ईमान की कसम खाकर कह रहा था कि कोई ....'
'ईमान, मेरा ठेंगा। पूछो, उसने कभी किसी चोर का पीछा किया है, पकड़ने की बात तो दूर है, ' उसने गुस्से से कहा।
'जैसे आप उम्र भर डाकुओं का पीछा करते रहे हैं, ' बेटा बुदबुदाया।
'नहीं किया है क्या ?' बाप को मुँह दबाकर हँसते देख बेटे ने उसे घूरा।
'मेरा चश्मा लाए विवेकानन्द ?' उसने मधुर आवाज़ में शान्त चेहरे के साथ पूछा।
विवेकानन्द अपने पिता की आवाज़ का छेड़खानी भरा स्नेह नहीं सुन पाया, केवल अपने अप्रिय नाम की प्रतिशोधी आवृत्ति सुनी। मुझे विवेक कहिए, उसने कई बार आग्रह किया था पर लेकिन पिता समझौते से इनकार करके, अपनी ढिठाई का आनन्द लेता रहा था।
'नहीं लाया, ' लड़के ने अपने अतीत की युवा नाराज़गी को शब्द देते हुए गुस्से से कहा, 'समय नहीं था।'
'घड़ी अब भी तीन मिनट पीछे है,' शिल्पा ने बाधा दी। इस दखल से, या महिला की मौजूदगी से, या दोनों से झल्लाए लड़के ने घड़ी अपनी तरफ़ मोड़ी और एक तीखी नज़र उस पर डालकर झल्लाया, 'आप अपने भोंदू छोकरे को निकाल क्यों नहीं देते, जो घड़ी की छोटी-सी चूक तक ठीक नहीं कर सकता।'
'बस तीन मिनट पीछे है,' बूढ़ा बुदबुदाया, 'लोग अपना समय ख़ुद तय करते हैं... काम करने के लिए... या न करने के लिए।' उसकी आवाज़ तैरती हुई दूर जा पहुँची धी, सुदूर अतीत में गुम होती, जी भरकर जी गई ज़िन्दगी के पलों में ...
निःशब्द, शिल्पा अपने दूरदर्शी उपदेशक को देखती रही।
"आप इसे छोड़कर जाना चाहती हैं या लेकर ?' बेटे की तीखी आवाज, खामोशी को तार-तार करती, चाबुक की तरह उन पर गिरी।
'लेकर।' शिल्पा ने दृढ़ता से कहा; अपने फ़ैसले पर वह खुद हैरान थी।
सत्तर से ज्यादा वर्षों में जमा गहन ज्ञान के साथ बूढ़ा मुस्कुराया। वह भी मुस्कुरा दी पर उतनी विज्ञता से नहीं।
लेखिका परिचय
अचला बंसल हिंदी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में लेखन करने वाली प्रतिष्ठित भारतीय कथाकार हैं। उनकी कहानियाँ देश-विदेश की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। अंग्रेज़ी में उनके कई कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें Once A Year It Is March and Other Stories तथा Ace Upon King उल्लेखनीय हैं। हिंदी में उनका चर्चित कहानी-संग्रह ‘बहरहाल धन्यवाद’ प्रकाशित है। ‘बिसात : तीन बहनें, तीन आख्यान’ में उन्होंने अपनी बहनों, सुप्रसिद्ध लेखिकाओं मृदुला गर्ग और मंजुल भगत के साथ लेखन किया है। उनकी रचनाएँ मानवीय संबंधों, समय, स्मृति और मध्यवर्गीय जीवन की जटिलताओं को संवेदनशीलता और सूक्ष्म दृष्टि के साथ अभिव्यक्त करती हैं।
अचला बंसल की अन्य चर्चित कहानियाँ
- वैनिला आइसक्रीम और चॉकलेट सॉस — जीवन, अकेलेपन और आत्मस्वीकृति की मार्मिक कहानी।
- झाल वाली मछली — अंग्रेज़ी से प्रियदर्शन द्वारा अनूदित अचला बंसल की बहुचर्चित कहानी।
- चौथा कौन? — शब्दांकन पर प्रकाशित अचला बंसल की चर्चित हिंदी कहानी।
अचला बंसल की पुस्तकें
यदि आपको ‘समय से परे’ पसंद आई हो, तो अचला बंसल की इन पुस्तकों को भी अपनी लाइब्रेरी का हिस्सा बनाइए—
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बहरहाल धन्यवाद
हिंदी कहानियों का चर्चित संग्रह। राजकमल प्रकाशन
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बिसात : तीन बहनें, तीन आख्यान
मृदुला गर्ग, मंजुल भगत और अचला बंसल की विशिष्ट कृति। राजकमल प्रकाशन
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