नीलोत्पल की कवितायेँ | Poems : Neelotpal


सूखी बूंदों के जीवाश्म


फिर से मैं अपने को भरता हूं.....

कोई तैयारी नहीं थी
फिर भी मृत्युएं ढंकी थी
जीवन की अश्लीलता को छिपाएं

उत्साह फूलों और समुद्रों में ही नहीं था
सूखी बूंदों के जीवाश्म भी
सदियों बाद जन्म लेते थे
जैसे स्मृतियों की किताब, अक्षुण्ण
खुलती थी बर्फ की परतें हटाती

ऋतुओं का आवागमन
मुक्त था प्रेम की उपमाओं से
ऋतु और प्रेम भिन्न किस्म के अवसाद थे
जो त्वचा के गहरे रंगों की तरह चढ़ता था
कब्र और कलाओं पर

सारी ढलनाएं वासनाओं में लिप्त थी
पहाड़, संगीत, कविताएं, घाटियां थी
जहां से आवाजें लौटती
रंग और आभा लिए

हर विमुक्त चीज़ मुझे घेर लेती
लेकिन पत्तों की तरह मैं ही गिरता
जीवन के हर नीरव उत्सव पर


निरंतरता


सारे ठोस पत्थर टूट गए....

जो मिट्टी मुझे अपने साथ सुलाना चाहती थी
बह गई  रक्त प्रवाह में
खाली रंगों से बोझा ढोना
थकान नहीं देता

मैं ही था वह जो आकर चला गया
बैठे-बैठे मैंने अपनी ही प्रतीक्षा की
सूर्य की गति महत्वहीन बनी रही
आखिरकार मैंने कुछ नहीं सोचा
रेलगाड़ी की तरह अनजान स्टेशनों पर
रख आया टूटे नक्षत्रों की कौंध

संभलने, संभालने का माद्दा
एक इंसान में नहीं आता ताउम्र
एक बार मिट्टी, एक बार राख
एक बार जय, एक बार पराजय

आखिरकार कुछ भी तो नहीं होता
निर्धारण करने से
फल तब भी सड़ते हैं, इच्छाएं मरती हैं
आलोचनाएं फक्क खड़ी रहती है

जीवन अभ्यास से नहीं
उसके टूटने से चलता है


मेरी कोशिशें द्वंद हैं


यह बात मैं आज तक समझ न सका
मैं क्या चाहता हूं ?
क्यों अपनी इच्छाओं के दमन पर हंसता हूं ?

मुझसे छूट जाते हैं झूठे आश्वासनों में
दबे बैठे वे चेहरे
जिन्हें अभी घर से निकलना है
और लौटना है देर रात
अपने जबड़ों में गर्दन फंसाए

मैं हर चोट पर याद करता हूं
नदी में बहाए अस्थियों और ठंडे फूलों की
उन आवाज़ों की
जो हर कहीं मौजूद हैं अपनी उदासी और दुख के साथ

मैं नहीं चाहता
इच्छाएं और सपने मर जाएं

मैं जि़ंदा रहना चाहता हूं
वैसे ही जैसे मरने के बारे में
सोचता हूं

मैं अपनी अदना हैसियत से
सामना करता हूं उन चुनौतियों का
जिनका जि़क्र भी
कम करता है मेरी वास्तविकता को

अगर मैं मुक्त नहीं हूं ख़ुद से तो
यह एक खेल है
और मैं लगातार हारता हूं जीते उपमानों से

तब भी मेरा यक़ीन मूर्तियों के लिए नहीं है जिन्हें छला जाता है यह एक किस्म का अत्याचार है

मैं लांघनाओं, वर्जनाओं से बाहर हूं

मैं एक पिघलता शब्द
चुपचाप इस पृथ्वी पर
हूं मौजूद अपने यथार्थ और काल्पनिक भेेष में


मैं नहीं चाहता


मैं नहीं चाहता मेरे शब्द 
इस दुनिया पर बोझ की तरह हों

मैं आने और जाने के बीच
चलने और रुकने के मध्य
थमा हुआ हूं

मुझे घिसा जाए तो
संभव है बोल पड़ूं

लेकिन ऐसा है नहीं कहीं
सब चाहने और न चाहने के बीच
रुका हुआ है !!


चौंकना ... 


शब्द, धूल और धुंए से
मैं चौंकता नहीं
मैं सवाल करता हूं ख़ुद से

मेरा दिमाग यातनाघर है
जहां ढेरों चीजें दफ़न हैं
मैले आंसू पुकार भरी चीखें,
चाय लेते दुर्घटनाओं, हत्याओं की खबरें
अस्तबलों की उठती गंध
रंगों में खोती तस्वीरें

लेकिन मैं रचा हुआ हूं
मेरी कोशिशे द्वंद  हैं

यह जीवन उतना सहज नहीं
जितना कि अपने लिए ही लड़ना

अब मैं वास्तविक स्थिति में हूं
मैं शुभकामनाएं रखता हूं
कि जीवन में उन चीज़ों की ज़रूरते न हो
जो बतौर इंसान छिनती है मुझसे
मेरी भाषा,
मेरे द्वंद्व,
मेरी पहचान

मैं किन्हीं इच्छाओं सपनों के टूटने से
नहीं चौंकता 

मैं उनके नहीं होने से चौंकता हूं



भोपाल: बड़ी झील पर

_ _ _ _ _ _ _ 1


यह आग्रह मेरे नहीं
मैं तो चुपचाप बैठा
झील की परछाईयों के साथ

लहरें टकराती हैं जे़हन से
मैं कुछ बोझ उतारकर रख देता हूं

मैं वह नहीं चाहता
जिसके लिए मैं यहां हूं

इस समय मैं अपरिचित हूं ख़ुद से

मैं हमेशा से चाहता था
आंखों की ज़द से बाहर जाना

जैसे कोहरे में ढंकी पहाडि़यां, पेड़, मकानात और उनमें से आती हुई चिडि़याओं की आवाजे

जैसे गुम होती परछाईयां
और वे आंखे जिनमें हम शहद की तरह
लेकर आते रहे
अपने से दूर जाती हुई आंखों के लिए
छुटता हुआ भरोसा

यह सब मुझे किताब में रखी पंक्तियों की तरहं बदल कर रख देता है

यह आग्रह मेरा नहीं कि
छुआ या पढ़ा जाउं

मैं यहां किनारों पर खडे गीले पेड़ों से
गिरता हूं खामोश इस झील में


_ _ _ _ _ _ _ 2


झील शहर की सूखी त्वचा पर
बहती है शांत

टिड्डियों के दल मंडराते हैं
सतह और किनारों के ऊपर

पानी चलता है
हमारी साइकिलों, सडकों
और सांसों के दरम्यि़ान

चलते हुए हम भूले नहीं होते हैं
झील हमारी याददाश्त पर
मीठा स्वर है पहाड़ों के बज़ने का

हम नींद से उतरकर
देखते हैं अपने बेबस चेहरे
काश हम देख पाते अपना विस्थापन

हमनें शब्द और पानी नहीं
खोए हैं अपने दिनों के छोटे-छोटे यंत्र
जो बज़ते है गहरी रातों में,
हमारी निराशा भरी रातों में

लहरें धीमी गति से उठाती है
हमारी नींद को
सारा शहर इस बात से आश्वस्त है कि
पानी चट्टानों पर से
बराबर निकल रहा है
और उसकी धार निचली बस्तियों की
खामोश आंखों में से फूट रही है

नीलोत्पल
173/1, अलखधाम नगर
उज्जैन, 456 010, मध्यप्रदेश
मो.: 0-98267-32121

जन्म: 23 जून, 1975, रतलाम, मध्यप्रदेश. शिक्षा: विज्ञान स्नातक, उज्जैन. पहला कविता संकलन ‘अनाज पकने का समय‘ भारतीय ज्ञानपीठ से वर्ष 2009 में प्रकाशित. वर्ष 2009 में विनय दुबे स्मृति सम्मान


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