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खुशियों की होम डिलिवरी २- ममता कालिया (लम्बी कहानी भाग - 2) | Hindi Kahani by Mamta Kalia (Part 2)

अक्तू॰ 25, 2014

Mamta Kalia's Hindi Kahani "Khushiyon ki Home Delivery" Part - II 

"खुशियों की होम डिलिवरी" भाग - 2 : ममता कालिया  


अगले शो पर रुचि और भी ध्यान से तैयार होती। कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय उसमें एक अतिरिक्त ऊर्जा आ जाती। यूनिट के लोग भी विस्मित हो जाते, ‘‘रुचि मैम आजकल बहुत स्मार्ट लग रही हैं!’’
सर्वेश भी अपने अंदर स्फूर्ति पाता और अगले दिन का अपना आलेख एक नए कोण से लिखता। उनकी मुलाकातें यदा-कदा होतीं। दोनों की शामें घिरी रहतीं।
एक रविवार वे सुबह की फ़िल्म के लिए इरॉस में मिले। यह एक फ्रांसीसी फ़िल्म थी, जिसमें समलैंगिकता को प्राकृतिक, सुंदर और सही ठहराया गया था। आधी फ़िल्म होते-न-होते रुचि उठ खड़ी हुई। उसने कहा, ‘‘मैं एक नॉर्मल इंसान हूँ। मैं यह फ़िल्म क्यों देखूँ?’’ 
‘‘मैं भी नॉर्मल हूँ, मैं भी क्यों देखूँ?’’ सर्वेश भी सहमति से उठ गया।
उस दिन कैफे कॉफी डे में उनके जीवन के कई पन्ने खुले;
—कि तीन साल पहले सर्वेश नारंग अपनी पहली पत्नी से मुक्त हो चुका है। उसकी पत्नी अमृतसर में टेलीफोन एक्सचेंज में काम करती है। उनका सत्रह साल का एक बेटा है ‘अंश’, जो अपनी माँ के संग रहता है।
—कि सर्वेश की माँ, बेटे की फ़िक्र में होशियारपुर का अपना लंबा-चौड़ा घर-द्वार छोड़ कर यहाँ उसके तीन कमरों के फ्लैट में आ गई है।
—उसके जीवन में काम ही सर्वोपरि है। इसमें वह दिन-रात, इतवार-सोमवार कुछ नहीं देखता।
रुचि ने भी अपने जीवन के कुछ पन्ने पलटे;
—कि रुचि का पहला विवाह बिना उसकी सहमति के उसके दादा-दादी ने पुण्य कमाने की हसरत और जल्दी में तब कर दिया, जब वह एम.ए. कर रही थी।
—कि उसका पति बददिमाग़ और बदचलन था।
—कि एक रोज़ रुचि ने पति का घर छोड़ दिया।
—बड़ी बाधाओं में उसने अपनी शिक्षा पूरी की।
—कोई अच्छी नौकरी न मिलने पर, कई साल भटकने के बाद उसे टीवी चैनल पर पहला शो करने का प्रस्ताव मिला। वैसे उसके पास गृहविज्ञान या आतिथ्य कला की कोई डिग्री नहीं है। माता-पिता के घर खाना बनाते-खिलाते उसे इतनी रसोईकला आ गई। प्रस्तुतीकरण का कौशल उसने विदेशी चैनलों पर कुकरी-शो देखकर सीखा।
उस दिन कैफे कॉफी डे में उन्हें बैठे हुए सुबह से शाम हो गई। एक-एक कर वहाँ के समस्त व्यंजन उन्होंने बारी-बारी से खा डाले और ठंडे गर्म सभी पेय पदार्थ पी लिए। जब उन्होंने एक-दूसरे से विदा ली, उन्हें लगा कि उनका वक्त अच्छा गुज़रा।
अगली मुलाकातों में भी दोनों अपने सर्वोत्तम कपड़े और कला कौशल धारण किए हुए मिले। यह दो मँजे हुए खिलाडिय़ों का क्रिकेट मैच था, जो हर बार ड्रॉ हो जाता। दोनों अपने क्षेत्र की नामी हस्तियाँ थीं। कैफे में कभी रुचि की कोई प्रशंसिका आगे बढ़कर उसका अभिवादन करते हुए पूछती, ‘‘अगले हफ्ते आप क्या सिखानेवाली हैं मैम?’’
जिस वक्त रुचि अपनी फैन से बात करती, सर्वेश अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाता।
अगर कभी गेटवे के पास घूमते हुए कोई पत्रकार सर्वेश से बात करने लगता तो रुचि ज़रा आगे बढ़कर समुद्र में खड़े, ठहरे जलयानों पर गौर करने लगती।
यह सच है कि उन्होंने अपनी उम्र एक-दूसरे को सही-सही बताई थी। ग़लतबयानी के कई ख़तरे थे। फिर रुचि पिछले तीन साल से उनतालीस के पायदान पर ठिठकी खड़ी थी। वह खुद अपने छद्म से बाहर आना चाहती थी।
सर्वेश ने बताया, वह 50 प्लस का है। उसने नहीं सोचा था कि इस उम्र पर आकर उसे कोई इतना अच्छा लगने लगेगा कि उससे मिलने वह मुंबई के एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँच जाएगा।
रुचि ने बताया, वह 40 की है, न प्लस न माइनस। उसने तय किया था अब कभी शादी के विषय में सोचेगी भी नहीं। एक बार का काटा, दो बार सोचता है उस गली जाऊँ न जाऊँ! विवाह और पति,  इन दो शब्दों से उसे आज भी झुरझुरी हो जाती थी। उसने यह नहीं बताया कि पहली शादी से उसे एक बेटा भी है गगन, जो आज भी उसके जी का जंजाल बना हुआ है। वह उसके साथ नहीं रहता लेकिन उसका भावात्मक और आर्थिक शोषण करने से बाज़ नहीं आता। पिता-पुत्र कहने को साथ रहते हैं, लेकिन आलम यह है कि हफ्ते में चार दिन पिता लापता रहता है तो तीन दिन पुत्र। रुचि के पति प्रभाकर शर्मा ने दूसरी शादी नहीं की। उसके लिए पहली शादी का भी सीमित महत्त्व था। उसके जीवन में शादी का मतलब शरीर था, जो वह कहीं भी जाकर प्राप्त कर लेता।
गगन बचपन से ही उद्दंड था। किसी का कहना न मानना, उलटे जवाब देना, दोस्तों से मारपीट करना और झूठ बोलना उसने पाँच साल की उम्र में ही शुरू कर दिए थे। एक ही कक्षा में वह दो साल पढ़कर किसी तरह पास होता। जब रुचि उसे काबू में करने की कोशिश करती, प्रभाकर उसे डाँट देता, ‘‘इसकी जान लेना चाहती हो!’’ धीरे-धीरे यह नौबत आ गई कि गगन पूरी तरह से ‘पापाज़ बॉय’ बन गया। माँ की हर सीख उसे बुरी लगती।
हालात से तंग आकर रुचि ने एक दिन अपना घर छोड़ दिया। तब उसके माता-पिता जीवित थे। उन्होंने समझाया, ‘‘बेटे को यहीं ले आ।’’ लेकिन रुचि नहीं मानी। उसने कहा, ‘‘प्रभाकर का दिया हुआ कुछ भी मुझे मंज़ूर नहीं, बच्चा भी नहीं। समझ लो कि मेरी शादी कभी हुई ही नहीं।’’
कुछ वर्ष तनाव और तनातनी में गुज़रे। प्रभाकर के बड़े भाई दिनकर ने आकर समझाने की कोशिश की, ‘‘प्रभाकर दिल का अच्छा है, ज़ुबान का तेज़ है। तुम धीरे-धीरे रासे पा लोगी तो वह बदल जाएगा।’’ भाई साहब को रुचि क्या ब्योरे बताती कि जब प्रभाकर को प्रचंड क्रोध चढ़ता है तो वह झाड़ू, चाकू, डंडे, किसी भी चीज़ से उस पर प्रहार करता है; कि पड़ोस की कितनी लड़कियों से छेड़खानी के ज़ुर्म में वह पिट चुका है। कुकर्म वह करता, शर्मिन्दगी रुचि को झेलनी पड़ती।
आगे की कहानी रुचि ने अपने संकल्प और हौसले से लिखी। जोगेश्वरी की तंग गलियों से चलकर वह ‘क’ चैनल और ‘म’ चैनल की सितारा शेफ़ बन गई। उसने लगातार अपने हुनर को निखारा। अख़बारों ने सिर्फ उसके कारण अपने पृष्ठों पर व्यंजन कॉलम देना शुरू किया। अख़बारों में व्यंजनों के साथ उसकी रंगीन मोहक तसवीर छपती, गोया एक नहीं दो-दो व्यंजनों की होम डिलिवरी हो रही है। इन सब बातों से रुचि का अहम् तुष्ट होता। निजी चोटें कुछ कम टीसतीं। गगन के दिए आर्थिक धचकों से बचने के लिए उसने कुछ अन्य बैंकों में अपना खाता खोल लिया था। लेकिन गगन ऐसे मौलिक बहाने टिकाता कि उसे रुपये भेजने ही पड़ते। कभी फोन पर कहता कि उसकी स्कूटी से कॉलोनी का एक बच्चा घायल हो गया है। उसके माँ-बाप इलाज के लिए बीस हज़ार रुपये माँग रहे हैं। कभी वह घबराया हुआ फोन करता कि पापा को दिल का दौरा पड़ा है, उनकी बायपास सर्जरी के लिए दो लाख रुपये तुरंत भेजो।
जितनी राशि वह माँगता, रुचि उसकी आधी-पौनी ही भेजती, पर उसकी तबीयत तिनतिना उठती। उसे लगता, बेटा उसे सिर्फ ए.टी.एम. समझता है। रुचि के जीवन में कामयाबी अपनी जगह थी और कशमकश अपनी जगह। उसने ऐसा कौशल विकसित कर लिया था कि एक को दूसरे की पकड़ में न आने देती। उसकी सहेलियाँ भी उसकी कामयाबी से विस्मित और चमत्कृत थीं।
उसकी सखी जिज्ञासा सिंह जिसे वह जिग्ज़ कहती, रुचि को गुदगुदाती, ‘‘कितनी लकी हो तुम! उम्र का कोई असर तुम्हारे काम पर नहीं पड़ता। मेरे पेशे में तो तीस की होते ही बाहर का दरवाज़ा देखना पड़ता है।’’ जिज्ञासा मॉडल थी और अब तक 45 लाइव शो कर चुकी थी। कई बार कैलेंडर, टेबल डायरी, कॉफी टेबल बुक आदि के मुखपृष्ठों पर उसकी छवि आ चुकी थी। लेकिन जैसे ही फैशनजगत में ख़बर उड़ी कि वह 30 प्लस की हो चुकी है, उसे फोटो सत्र के प्रस्ताव आने कम हो गए। लाइव शो का तो सवाल ही ख़त्म था। आजकल वह दो अन्य भूतपूर्व मॉडलों के साथ मिलकर एक फैशन प्रशिक्षण संस्थान खोलने की दिशा में प्रयासरत थी।
इसी तरह दामिनी पिल्लइ का कहना था, ‘‘हम लाख दो साल में एक साल आगे बढ़ें, उम्र अपना काम शुरू कर देती है। हर नर्तकी सितारा देवी नहीं होती, जो सत्तर साल की उम्र में सत्रह घंटे बिना थके-रुके नाचती चली जाए। कितने ही ऐसे स्टेप्स हैं जिन्हें करने के लिए कमर मुड़ती ही नहीं।’’
दामिनी को भी रुचि से रश्क होता, ‘‘सबसे भाग्यवान तुम हो, अख़बार तुम्हारी पाँच-साल पहले की तसवीर के साथ तुम्हारा कॉलम छापता है। भगवान ने तुम्हें हल्का बदन और ऐसा उम्रचोर चेहरा दिया है कि कई साल तुम टीवी पर चमकती रहोगी।’’
रुचि को इसका अहसास था कि अंतत: उसे करछुल छोड़ क़लम का सहारा लेना पड़ेगा। वह लाइव शो से दूर हो जाने पर भी अख़बारों और पत्रिकाओं में व्यंजन आलेखों से जीवित रहेगी। हुनर के इलाके में गायक, संगीतकार और लेखक सबसे लंबी पारी खेलते हैं। जहाँ क्रिकेट के मैदान में चालीस साल बहुत पकी उम्र समझी जाती है, फैशन की दुनिया में चालीस का होना ज़ुर्म के बराबर है, वहाँ व्यंजन-विशेषज्ञ का चालीस वर्षीया होना कोई हादसा नहीं हकीक़त है। उसे अनुभव की हाँडी में तपा हुआ एक्सपर्ट माना जाता है। उसे व्यंजन-प्रतियोगिताओं में निर्णायक बनाया जाता है। उसके हवाले से कोई मामूली मसाला व्यवसायी मसाला सम्राट बन सकता है, गृह विज्ञान प्रशिक्षण संस्थानों में उसके योगदान पर विशेष व्याख्यान रखे जाते हैं, गरज़ यह कि उसके नाम का डंका पिटता रहता है।
एक दिन जिज्ञासा और दामिनी, बिना ख़बर किए, सुबह-सुबह उसके घर आ धमकीं। यह इतवार था, फुर्सत और आलस की गुंजाइश से भरा हुआ दिन। रुचि अभी अलसाई हुई बिस्तर में पड़ी थी। दोनों सखियाँ उसके ऊपर लद गईं, ‘‘नौ बजे तक तुम किसके सपनों में खोई हुई हो। उठो, बढिय़ा-सा नाश्ता बनाओ, बड़ी भूख लगी है।’’
रुचि ने एक मोटी-सी फाइल और मोबाइल उनकी तरफ़ सरकाया और कहा, ‘‘यह मेरी किचन है। इसमें ताज से लेकर रेडिसन तक सबके मेन्यू और नंबर हैं। जो चाहो मँगा लो!’’
‘‘क्यों अपने कैरियर का कबाड़ा कर रही हो। ये सब तो हम रोज़ खाती हैं। अगर हम किसी को बताएँगे कि रुचि की रसोई में खाने के नाम पर केवल होटलों के फोन नंबर हैं तो तुम्हारी क्या इज़्ज़त रहेगी? इल्लै।’’
‘‘भाषण बंद करो! कॉर्नफ्लेक्स खाने हैं?’’
‘‘छि:’’ जिज्ञासा ने मुँह बंद किया, ‘‘मैं तो बीमारी में भी कभी कॉर्नफ्लेक्स नहीं खाती। भूखा मरना मंज़ूर है पर कॉर्नफ्लेक्स एकदम नहीं।’’
दामिनी ने कहा, ‘‘इसे सोने दो! इसकी रसोई में ढूँढ़ते हैं। अगर सूजी होगी तो मैं उपमा बनाती हूँ।’’
दोनों लड़कियाँ रसोई में चली गईं। रुचि अभी उठने का मन बना रही थी कि फोन पर फ्लैश हुआ संदेश, ‘‘पंद्रह मिनट में सीसीडी पहुँचो।’’
रुचि का सारा आलस उडऩछू हो गया। यह सर्वेश नारंग था। और इसका यह संदेश रविवार को पुरस्कार बना रहा था। रुचि ने तुरंत बिस्तर छोड़ा, तैयार हुई और सहेलियों को आवाज़ लगाई, कहाँ परेशान हो रही हो! चलो सीसीडी चलते हैं। कैफे कॉफी डे के लिए यह इन सबका कोडवर्ड था।
जिज्ञासा और दामिनी को भी त्राण मिला। रुचि की रसोई में मसालों के सीलबंद डिब्बे, रिफाइंड तेल और डिब्बाबंद आहार के सिवा और कोई खाद्य सामग्री नहीं थी। फ्रिज़ में बस पानी, दूध, जूस, डबलरोटी और मक्खन रखा था। बर्फ की टे्र देखकर लगता था, महीनों से फ्रिज़ साफ़ नहीं किया गया है।
‘‘लानत है, इतनी मशहूर शेफ़ रुचि शर्मा के फ्रिज़ और किचन की यह हालत!’’ जिज्ञासा ने कहा।
रुचि ने उसकी पीठ पर थप्पड़ जमाया, ‘‘घर में मैं कुकरी-शो नहीं चलाती, समझी!’’
दामिनी ने कहा, ‘‘हाँ, कैमरे का फोकस हो तो तुम किचन में जाओ! वरना सीसीडी ही आसरा है।’’
‘‘बेवकूफ़ लड़कियो, क्या तुम्हें नहीं मालूम, हिंदुस्तानी औरत की गुलामी की नींव रसोईघर में ही पड़ती है!’’
‘‘कुनबे भर का खाना बनाने पर पड़ती है। सिर्फ अपना या दोस्तों का बनाने पर नहीं।’’
‘‘जो भी हो, इस गुलामी का चस्का बड़ी जल्द पड़ जाता है।’’
सीसीडी आज सुस्त था। रविवार का लद्धड़पन वेटरों की चाल-ढाल में झलक रहा था। केवल छह मेज़ें घिरी हुई थीं। लड़कियों ने चीज़ बर्गर और पिज़्ज़ा मँगवाया।
सीसीडी का मैनेजर अभिवादन करने उनकी मेज़ तक आया, उसने रुचि की ओर विशेष ध्यान दिया, ‘‘मैम आप कैसी हैं? हम आपके लायक़ नाश्ता बनाने की पूरी कोशिश करेंगे, पर आप खुद हमारे शेफ़ से बात कर लें तो अच्छा हो।’’ रुचि ने उठने में कोई रुचि नहीं ली, बस मुस्कुरा दी। सब उसे पहचान रहे थे। सीसीडी में उसका कार्यक्रम सब देखते थे।
उनकी मेज़ पर नाश्ता खास अंदाज़ में पेश हुआ। हर प्लेट में पहले सुर्ख गुलाब का फूल लाया गया। जब फूल उन्होंने उठा लिया, तब प्लेटों में फल सजाए गए।
जिज्ञासा और दामिनी प्रसन्न और विस्मित थीं। उन्होंने कहा, ‘‘अब से हर इतवार तुम्हारे साथ ही यहाँ आया करेंगे।’’
तभी मुख्य दरवाज़ा खुला और सर्वेश नारंग अंदर दाख़िल हुआ। रुचि को देख उसका चेहरा खिल गया, लेकिन तभी उसकी नज़र अन्य दोनों लड़कियों पर पड़ी और वह सँभल गया। थोड़ा आगे जाकर वह एक अलग मेज़ पर बैठ गया। रुचि ने उसे इशारा किया। वह निर्विकार अपनी जगह पर जमा रहा।
सहेलियों से इजाज़त लेकर रुचि उसकी मेज़ तक आई, ‘‘मेरी दोस्त आई हुई हैं, चलिए आपको मिलवाऊँ।’’ सर्वेश ने कहा, ‘‘क्यों मेरा इतवार बरबाद करने पर आमादा हो?’’
तब तक जिज्ञासा और दामिनी वहीं आ गईं। रुचि ने उनका परिचय सर्वेश से कराया। सर्वेश ने गहरी बेधक नज़र उनपर डालकर ‘‘हेलो’’ के आगे एक भी शब्द नहीं कहा।
असमंजस और मौन का एक अंतराल आया। जिज्ञासा रुचि से मुखातिब हुई, ‘‘थैंक्यू फॉर द लवली ब्रेकफास्ट। मैं जाऊँगी अब।’’
दामिनी ने कहा, ‘‘मेरी तो आज डे्रस रिहर्सल है कल के शो की। मुझे जाना ही पड़ेगा।’’ रुचि ने झूठे को भी सहेलियों को रुकने के लिए नहीं कहा, यह बात दोनों को अखरी।
उनके जाने के बाद माहौल अलग क़िस्म का हुआ। उन दोनों ने अपनी मेज़ बदली। इतवार को उनका बैठने का एक खास कोना था। वेटर जानता था, वे क्या लेते हैं। वह हॉट कॉफी विद आइसक्रीम ले आया। रुचि को आइसक्रीम पसंद थी। उसने कहा, ‘‘जल्दी से खाओ, नहीं तो पिघल जाएगी।’’
सर्वेश की दिलचस्पी कॉफी में थी। वह कॉफी सिप करने लगा।
‘‘तुम्हारी सबसे पक्की दोस्त कौन है रुचि?’’ सर्वेश ने पूछा। तुरंत जवाब देने की बजाय रुचि सोचने लगी। जिग्ज़, दम्मी, कारी कोई नहीं। पक्की सहेली वह होती है, जिसके नाम का फ्रेंडशिप बैंड पहना जाए, जिसे रात-बिरात कभी भी जगाया जाए, जिसे अपने पेट की कच्ची-पक्की बताई जाए। किसको कहे वह अपनी दाँत काटी दोस्त। उसके मुँह से निकला, ‘‘सबसे पक्के तो आजकल तुम्हीं हो।’’
‘‘आजकल मतलब, परसों कोई और था क्या?’’
‘‘नहीं, इधर कई बरसों से मेरा कोई दोस्त नहीं है।’’
‘‘क्या तुम अपने एक्स से मिलती हो?’’
‘‘बिलकुल नहीं। क्या तुम अपनी एक्स से मिलते हो?’’
‘‘मैं कैसे मिल सकता हूँ। वह अमृतसर में रहती है, मैं यहाँ मुंबई में हूँ।’’
‘‘तुम्हारी ‘एक्स’ टेलीफोन एक्सचेंज में है यानी उसके हाथ की सभी लाइनें खुली हैं।’’
‘‘पर मैंने अपनी सभी लाइनें बंद कर रखी हैं। तुम्हारे सिवा मेरा मोबाइल नंबर किसी के पास नहीं होगा!’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है! तुम मीडिया में हो, वहाँ संवाद के बिना काम कैसे चल सकता है?’’
‘‘कामकाज के लिए हमारे अलग नंबर होते हैं।’’
‘‘अपने बेटे के साथ तो बातचीत होती होगी?’’ रुचि ने सावधानी से प्रसंग फिर उठाया।
‘‘हाँ, नहीं, इधर नौ-दस महीनों से नहीं हुई। गार्गी ने अंश के दिमाग़ की इतनी धुलाई कर डाली है कि वह मुझे दानव मानता है।’’
‘‘बोलचाल एकदम बंद है?’’ रुचि ने पूछा।
‘‘सालगिरह पर ग्रीटिंग कार्ड के लेनदेन को क्या कहोगी?’’
रुचि शर्मा के मन में बड़े तीखेपन से चुभ गया कि उसका तो अपने बेटे गगन से ग्रीटिंग कार्ड का भी आदान-प्रदान नहीं है। जब पिता पुत्र को आर्थिक कष्ट होता है, तब उसके आगे चले आते हैं। ऐसे मौकों पर वह चिल्लाना चाहती, ‘‘चले जाओ, भाड़ में जाओ तुम लोग, मैंने क्या तुम्हारा जीवनभर का ठेका ले रखा है!’’ लेकिन अपनी बदनामी के डर से वह चुप लगा लेती। वह नहीं चाहती उसे लेकर भूली-बिसरी दास्तानें सामने आएँ। उसकी छवि एक समझदार, परिवार प्रेमी, प्रफुल्ल चित्त गृहणी की है। निर्देशक के अनुसार उसकी छवि ही इनके कार्यक्रम की यू.एस.पी है, जिसके बल पर उन्हें देश के शीर्ष औद्योगिक घराने विज्ञापन देते हैं।
इतवार की इस निठल्ली दोपहर रुचि का मन हुआ सर्वेश से वह उसके परिवार के विषय में और बातें करे, लेकिन सर्वेश ने जैसे मुँह पर सात लीवर का ताला जड़ लिया था।
रुचि उठकर चलने को तत्पर हुई। सर्वेश ने उसकी हथेली दबाकर रोका, ‘‘अभी नहीं।’’
उन्होंने फिर से कॉफी पी। सर्वेश ने बेहिसाब सिगरेटें पी। उसने धुएँ के बादल में से जैसे कहा, ‘‘मुझे अतीत से, अतीतजीवियों से चिढ़ है। मैं आज में जीनेवाला इंसान हूँ। रुचि तुम मुझे पसंद हो, क्योंकि तुम मेरा वर्तमान हो। अतीत एक मरा हुआ बोझ है।’’
‘‘इस बोझ को फेंक क्यों नहीं देते?’’
‘‘मुझसे कह रही हो, क्या यह मुमकिन है! क्या तुमने अपना अतीत फेंक दिया है उतार कर या वह आज भी लदा हुआ है तुम्हारी पीठ पर?’’
‘‘कोई राह तो निकालनी होगी?’’
‘‘बिलकुल ठीक। आज इतवार की दोपहर हम अपना कीमती समय ख़राब कर रहे हैं। ऐसे मौके बार-बार नहीं आया करते। अच्छा तो यह हो, मेरे नहीं तो तुम्हारे कमरे में चलकर इसका सदुपयोग करें।’’
रुचि सन्न रह गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि सर्वेश इतने सपाट, चपटे और भावहीन शब्दों में उसके पास आने की पेशकश करेगा।
उसने मान की स्थिति में कहा, ‘‘मेरा कमरा हर किसी का प्रवेश बर्दाश्त नहीं करता! वहाँ सिर्फ मेरे शो से जुड़े यूनिट के लोग या मेरी दोस्त आ सकती हैं।’’
‘‘यूनिट के लोग तुम्हारे सगे हैं, मैं नहीं!’’
‘‘ग़लत मत बोलो। उनसे मेरा कामकाज का रिश्ता है।’’
‘‘मुझे आम से खास बनने के लिए क्या करना होगा। क्या मैं टाइयों का सेहरा पहनकर तुम्हारे दरवाज़े पर खट-खट करूँ?’’
‘‘नहीं, तुम्हें थोड़ा सेंसिटिव होना पड़ेगा। अकेले रहते-रहते तुम्हारे जज़बातों पर काफी ज़ंग चढ़ गई है।’’
‘‘तुम क्या दुकेली रहती हो!’’
‘‘नहीं पर लड़कियाँ कुदरती तौर पर कोमल होती हैं।’’
‘‘बैठी रहो अपनी कोमलता लेकर! मेरे पास इतना वक्त नहीं है!’’ सर्वेश उठ खड़ा हुआ। रुचि भी बाहर आकर अपनी कार की तरफ़ बढ़ गई। उसने सोचा, चलते वक्त सर्वेश उससे बाय कहकर या हाथ हिलाकर विदा लेगा। सर्वेश दूसरी दिशा में निकल गया।




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