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कहां है हिंदी का बेस्ट सेलर? - मनीषा पांडेय

जन॰ 13, 2015

कहां है हिंदी का बेस्ट सेलर?

मनीषा पांडेय


नए साल का कैलेंडर दीवार पर टंग चुका है. एक और साल गुजर चुका है. अब बचा है तो सिर्फ पिछले साल का लेखा-जोखा, सफलताओं-असफलताओं का हिसाब-किताब, पुराने सबक और नई उम्मीदें. एक साल में जो कुछ हुआ, सबकी पड़ताल की जा रही है. राजनेताओं से लेकर अभिनेताओं तक. लेकिन पड़ताल की इस फेहरिस्त में हिंदी किताबों और पाठकों की दुनिया कहां है? वही हिंदी, जो 2011 की जनगणना के मुताबिक 42 करोड़ से ज्यादा लोगों की मातृभाषा है. वही हिंदी, जिसमें हर साल 10,000 से ज्यादा नई किताबें छपती हैं. यानी रोज औसतन 27 किताबें. पर इन किताबों के पाठक कहां हैं? हिंदी का बेस्ट सेलर कौन-सा है? 

हिंदी में बेस्ट सेलर की बहस नया फेनॉमिना है. कौन है बेस्टसेलर? क्या सुरेंद्र मोहन पाठक, जिनके एक नॉवेल की इस साल 25,000 से ज्यादा प्रतियां बिकी हैं या फिर वे किताबें, जिन पर बहस, विवाद, समीक्षाएं और चिंतन होता रहा, लेकिन जिनकी बिक्री संख्या पूरे साल बमुश्किल 700-1,000 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई.

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यूं तो मनीषा के परिचय में काफी चीजें कही जा सकती हैं। वो पेशे से पत्रकार हैं, राइटर हैं, ब्‍लॉगर हैं, फेसबुक पर स्त्रियों की उभरती हुई सशक्‍त आवाज हैं, लेकिन इन सबसे ज्‍यादा और सबसे पहले वह एक आजाद, बेखौफ सपने देखने वाली स्‍त्री हैं। रोजी-रोटी के लिए पत्रकारिता करती हैं, लेकिन बाकी वक्‍त खूब किताबें पढ़ती हैं, घूमती हैं, फोटोग्राफी करती हैं और जीती हैं। उनकी जिंदगी एक सिंगल और इंडीपेंडेंट औरत का सफर है, जिसने इलाहाबाद, मुंबई और दिल्‍ली समेत देश के कई शहरों की खाक छानी है। मनीषा पूरी दुनिया की सैर करना चाहती हैं। मनीषा का परिचय इन दो शब्‍दों के गिर्द घूमता है - आजाद घुमक्‍कड़ी और बेखौफ लेखन।

पॉपुलर बनाम क्लासिक की बहस हिंदी की मुख्यधारा में कभी बड़े सवाल के रूप में नहीं रही. लेकिन पिछला साल इसी बहस के नाम रहा. शुरुआत हुई प्रेम भारद्वाज के संपादन में निकलने वाली पत्रिका पाखी में छपे कवि कुमार विश्वास के इंटरव्यू से. कहानीकार प्रियंवद समेत कई लेखकों को यह बात नागवार गुजरी. विरोध के स्वर काफी मुखर रहे. भारद्वाज बताते हैं कि इस इंटरव्यू को छापने के लिए उन्हें काफी विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके पक्ष में उनके अपने तर्क हैं. वे कहते हैं, ''आप इस सच को कैसे नकार सकते हैं कि कुमार विश्वास लोकप्रिय हैं. मुख्यधारा लोकप्रियता को अछूत की तरह मानती है और उससे परहेज करती है. यह नहीं होना चाहिए.” हिंदी के इस शुद्घतावाद पर खुद कुमार विश्वास कहते हैं, ''हिंदी का यही शुद्घतावाद उसके जनमानस से कट जाने का कारण है. हिंदी की ज्ञानपीठ और अकादमी लॉबी से मैं पूछना चाहता हूं कि आपका साहित्य इतना ही उम्दा है तो यह बिकता क्यों नहीं. नीलेश मिश्र को क्यों एक करोड़ लोग सुन रहे हैं और आपको नहीं?”

युवा लेखकों का एक उभरता वर्ग भी विश्वास के पक्ष में लामबंद है. लेखक प्रभात रंजन की राय में तो ''पाखी में विश्वास का साक्षात्कार छपना स्वागतयोग्य घटना है. समय आ गया है कि हिंदी के विकास में पॉपुलर के महत्व को समझ जाए.”

अपने रेडियो शो 'यादों का इडियट बॉक्स’ से खासे चर्चित हुए लेखक-गीतकार नीलेश मिश्र के साथ मिलकर वाणी प्रकाशन ने इस साल नाइन बुक्स नाम से एक प्रिंट सीरीज शुरू की, जिसकी पहली किताब बस इतनी सी थी ये कहानी अभी दिसंबर में प्रकाशित हुई है. महीने भर में ही इस किताब की 3,000 से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. पिछले सितंबर में राजपाल प्रकाशन से आई देवदत्त पटनायक की किताब शिव के सात रहस्य  की तीन महीने में 2,500 प्रतियां बिकी हैं. अंतिका प्रकाशन से आई डॉ. विनय कुमार की किताब एक मनोचिकित्सक के नोट्स  2014 में 3,000 प्रतियों का आंकड़ा पार कर चुकी है. तो क्या अब भी यह कहना सही होगा कि हिंदी में पाठक नहीं हैं?

एक ओर हिंदी किताबों के न बिकने का पुराना रोना है, दूसरी ओर ऐसी भी किताबें हैं, जिन्हें लोग ढूंढकर और मांगकर पढ़ रहे हैं. हिंदी इलाके के पाठकों के बीच पिछले दिनों सबसे ज्यादा चर्चित किताबों में से एक थी अनिल कुमार यादव का यात्रा वृत्तांत ये भी कोई देस है महाराज. 2014 में इस किताब की 1,600 प्रतियांबिकीं और कुल मिलाकर अब तक 5,500 प्रतियां बिक चुकी हैं. हालांकि 42 करोड़ लोगों की भाषा में किसी किताब की साढ़े पांच हजार प्रतियां बिकना कोई जादुई आंकड़ा नहीं है, लेकिन जिस भाषा में 500 प्रतियों के संस्करण छपते हों और हजार प्रतियां भी सरकारी खरीद की मदद के बगैर न बिक पाती हों, वहां यह संख्या भी कम सुखद नहीं.

इन तमाम आंकड़ों के बीच क्लासिक बनाम पॉपुलर वाली बहस अपनी जगह कायम है. क्या किसी समाज के जिंदा और विचारशील होने की निशानी यह है कि उसकी दुनिया में साहित्य और किताबों की कितनी जगह है? क्या जो बिक रहा है, वही उम्दा है? जो नहीं बिक रहा, वह क्यों नहीं बिक रहा है? क्या गंभीर साहित्य पॉपुलर और बड़ी संख्या में बिकने वाला नहीं हो सकता. राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम कहते हैं, ''अंग्रेजी में पॉपुलर और क्लासिक के बीच की विभाजन रेखा बहुत साफ और तय है. विक्रम सेठ जानते हैं कि वे कभी चेतन भगत जितना नहीं बिक सकते. लेकिन उनके अपने पाठक हैं. अंग्रेजी की क्लासिक धारा चेतन भगत वाली पॉपुलर धारा को नकारती नहीं. दोनों अपना काम करते हुए रह सकते हैं.” जबकि हिंदी में इसके ठीक उलट शुद्घतावादी रवैया है. 

कवि अशोक चक्रधर कहते हैं, ''मुझे तो हिंदी वालों ने इसीलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि मैं मंच से कविताएं पढऩे लगा था. हरिवंश राय बच्चन के साथ भी हिंदी के शास्त्रीय विमर्शकारों ने ऐसे ही अछूतों जैसा व्यवहार किया. 'वे तो जन से कट गए हैं’. सचाई ये है कि जन से कटे हुए वे लोग हैं, जो अपने कमरों में बैठकर लिख रहे हैं और रो रहे हैं कि उनकी किताबें नहीं बिकतीं.” चक्रधर के सामने किताबों के न बिकने की कोई समस्या ही नहीं. वे साफ कहते हैं,  ''मेरी किताबें तो खूब बिकती हैं और मुझे रॉयल्टी भी मिलती है.” पॉपुलर लेखक वेद प्रकाश शर्मा की सुनिए, ''मेरी किताब छपने से पहले ही 50,000 प्रतियों तक की बुकिंग हो जाती  थी.” इस साल हार्पर कॉलिंस से आए पॉपुलर लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास कोलाबा कॉन्सपिरेसी की छपने से पहले ही 15,000 प्रतियों की बुकिंग हो गई थी. शिव त्रयी से प्रसिद्घ हुए लेखक अमीश त्रिपाठी की अगली किताब के लिए वेस्टलैंड बुक्स ने 5 करोड़ रु. का अनुबंध किया है. यह किताब हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ आएगी.

लेखक पंकज दुबे और पेंगुइन बुक्स ने भी 2013 में इसी तर्ज पर एक प्रयोग किया. उनकी किताब लूजर कहीं का हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ छपी और काफी चर्चित रही. सिर्फ हिंदी संस्करण ही अब तक 4,000 से ज्यादा बिक चुका है. पंकज कहते हैं, ''यह धारणा गलत है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं. पाठक ढूंढ रहे हैं, लेकिन किताबें उन तक पहुंच नहीं रहीं.” अनिल यादव भी किताबों के भविष्य को बहुत उम्मीद से देखते हुए कहते हैं, ''हिंदी में पाठक बढ़ रहे हैं और उन्हें अच्छी किताबों की तलाश है. एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हिंदी समाज की खरीद क्षमता भी बढ़ी है.”

अगर पाठक बढ़ रहे हैं और किताब खरीदने की क्षमता भी तो फिर किताबें क्यों नहीं बिक रहीं? इतनी कि लेखक सिर्फ लेखन को अपनी आजीविका का साधन बना ले. पंकज की राय में,  ''ऐसा मुमकिन है. लेकिन इसके लिए हिंदी को त्याग, गरीबी और दयनीयता वाली अपनी पुरानी छवि से बाहर आना होगा, जिसे इतना महिमामंडित किया जाता है.” उनके मुताबिक, हिंदी साहित्य की सुई अतीत में कहीं अटक गई है. दुनिया तेजी से बदल रही है और डिजिटल हो रही है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में हमें 'पुष्प गुच्छ डॉट कॉम’ वाली पुरानी भाषा और मुहावरों से बाहर आना होगा.

प्रकाशक वाणी प्रकाशन की डायरेक्टर अदिति माहेश्वरी का अपना तर्क है, ''हम पुरानी चीजों को नकार नहीं रहे. लेकिन यह तो सोचना होगा कि नई पीढ़ी की पाठकीय आकांक्षाओं को कैसे संबोधित किया जाए. उनकी भाषा क्या है? वे क्या पढऩा चाहते हैं? हमने इसी पाठक समूह के लिए नाइन बुक्स की शुरुआत की है.” सोशल मीडिया के दौर में इस नए उभरते पाठक वर्ग को दरकिनार नहीं किया जा सकता. शायद यही कारण है कि हिंदी का सबसे बड़ा प्रकाशन समूह राजकमल भी इसमें हाथ आजमाने जा रहा है. निरुपम कहते हैं, ''विश्व पुस्तक मेले में हम एक नई प्रिंट सीरीज लेकर आ रहे हैं, जिसके तहत हम पॉपुलर अभिरुचि की किताबें प्रकाशित करेंगे.”

हार्पर कॉलिंस की एडिटर मीनाक्षी ठाकुर हिंदी किताबों को मिल रही प्रतिक्रिया से बहुत संतुष्ट नहीं हैं. वे कहती हैं, ''हमने हिंदी किताबें यह सोचकर छापी थीं कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी के पाठक ज्यादा होंगे. हिंदी में अंग्रेजी से भी ज्यादा किताबें बिकेंगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.” मीनाक्षी के मुताबिक, हिंदी में सबसे बड़ी समस्या डिस्ट्रिब्यूशन की है. हिंदी पाठकों को भी यह नहीं मालूम होता कि उनके शहर में ये किताबें मिलेंगी कहां.

मीनाक्षी कहती हैं, ''हार्पर से पिछले साल आया रवि बुले का उपन्यास दलाल की बीवी 1,500 कॉपी बिका है. गर्व करने के लिए हमारे पास भी एक ही नाम है- सुरेंद्र मोहन पाठक.”

मीनाक्षी डिस्ट्रिब्यूशन की जिस समस्या की बात कर रही हैं, वह हिंदी के सभी प्रकाशकों की समस्या नहीं है. डायमंड बुक्स के मालिक नरेंद्र वर्मा कहते हैं, ''हमारी किताबें रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर उपलब्ध हैं और खूब बिकती भी हैं.” राजपाल प्रकाशन के मार्केङ्क्षटग डायरेक्टर प्रणव जौहरी कहते हैं, ''हिंदी में खूब किताबें बिकती हैं. किताबों का न बिकना उन्हीं की समस्या है, जो सिर्फ सरकारी खरीद पर निर्भर हैं.” राजपाल से दो माह पहले छपकर आई अब्दुल कलाम की किताब आपका भविष्य आपके हाथ में  की अब तक 3,600 प्रतियां बिक चुकी हैं. प्रणव के मुताबिक, रस्किन बॉन्ड को हिंदी में भी खूब पढ़ा जा रहा है. इस साल मार्च में हिंदी में प्रकाशित उनकी किताब रूम ऑन द रूफ  की 2,600 प्रतियां  बिक चुकी हैं. प्रणव कहते हैं, ''हिंदी किताबों की बिक्री का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है. किताबों की ऑनलाइन बिक्री ने इस बाजार को और विस्तार दिया है. पिछले साल के मुकाबले इस साल हमारी ऑनलाइन किताबों की बिक्री दोगुनी हुई है.”

ऑनलाइन सेल के दम पर हिंदी में एक नए उभर रहे प्रकाशक हिंद युग्म के शैलेश भारतवासी ने भी हिंदी को कुछ बेहतरीन किताबें दी हैं. 2014 में हिंद युग्म से छपी किताब दिव्य प्रकाश की मसाला चाय  की 2,000 प्रतियां बिकी हैं और अनु सिंह चौधरी का कहानी संग्रह नीला स्कार्फ  की 1,800 प्रतियां. शैलेश कहते हैं, ''पांच-दस हजार कॉपियों के बारे में तो अभी हम सोच भी नहीं रहे. हमने अपने लिए एक पैमाना बनाया है. जो किताबें 2,000 से ज्यादा बिकती हैं हैं, उन्हें हम बेस्ट सेलर की लिस्ट में डालते हैं.” हिंद युग्म की किताबें अधिकांशत: फ्लिपकार्ट, अमेजॉन और इनफीबीम डॉट कॉम जैसी वेबसाइट्स के जरिए ही बिक रही हैं. शैलेश कहते हैं कि हमारे प्रकाशन को खड़ा रखने में ऑनलाइन सेल की बड़ी भूमिका है. अंतिका प्रकाशन के गौरीनाथ का भी मानना है कि ''मोबाइल और इंटरनेट के युग में ऑनलाइन बिक्री के महत्व को नकारा नहीं जा सकता.”

कुल मिलाकर आंकड़े तो कह रहे हैं कि हिंदी में किताबें बिक रही हैं. लेकिन एक सवाल फिर भी मुंह बाए खड़ा है. मनोविश्लेषक सुधीर कक्कड़ पूछते हैं, ''जो बिक रहा है, वह क्या सचमुच अपने समय को रेखांकित कर रहा है? जीवन के विद्रूप, संघर्ष, चुनौतियों और अंधेरे को पढऩे में किसी की रुचि है या नई पीढ़ी के सपनों और उनकी चिंताओं का भूगोल सेक्स, एंबिशन और महानगरों की चमकदार दुनिया तक ही सीमित है?” जवाब शायद कहीं बीच में है. जैसा कि पंकज दुबे कहते हैं, ''हिंदी के युवा पाठक को हनी सिंह की भाषा में जीवन दर्शन दीजिए. रामचंद्र शुक्ल की भाषा में बात करेंगे तो वह सुनेगा ही नहीं.” अनिल यादव के मुताबिक, हिंदी का बहुत बड़ा संकट यह भी है कि किताबों के नाम पर यहां हर साल बहुत सारा कूड़ा छप रहा है. उस लेखन में जीवन के वृहत्तर सवालों का हल ढूंढने की कोई कोशिश और बेचैनी नहीं है.

हालांकि हिंदी में पिछले दिनों आई कई किताबें ऐसी कोशिश करती दिखती हैं क्योंकि इन किताबों का लेखक पारंपरिक स्कूलों से आया हुआ नहीं है. वह न हिंदी का प्रोफेसर है, न पत्रकार और न ही हिंदी अधिकारी. इंजीनियरिंग और आइआइटी जैसे क्षेत्रों से जुड़े लोग हिंदी लेखन की ओर मुड़ रहे हैं. फिल्मकार दिबाकर बनर्जी कहते हैं, ''जिस तेजी के साथ सिनेमा में क्लास और मास के बीच की विभाजन रेखा कम हुई है, वैसा साहित्य में होता नहीं दिख रहा. यहां पीढिय़ों के बीच संघर्ष ज्यादा तीखा है. पुरानी पीढ़ी को नए लेखकों का साहित्य पल्प लगता है और नए लेखक भी काफी हद तक अपने समय की राजनैतिक सचाई से कटे हुए हैं.” दिबाकर कहते हैं, ''अगर आप वह पीढ़ी हैं, जो ग्लोबलाइजेशन के फायदे गिना रही है तो आपकी किताब आज भले बहुत चर्चित हो, लेकिन वह इतिहास में कहीं दर्ज नहीं होगी.”          


- इंडिया टुडे से साभार 

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