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रवीन्द्र कालिया: बेचैन रूह का मुसाफिर (आलोक जैन -1) Ravindra Kalia

नव॰ 11, 2015

बेचैन रूह का मुसाफिर - 1

रवीन्द्र कालिया

संस्मरण 

 वरिष्ठ कथाकार रवीन्द्र कालिया अपने संस्मरण के लिए भी कम प्रसिद्ध नहीं हैं । उनकी अप्रतिम कृति ‘गालिब छुटी शराब’ का पाठक समुदाय पर अमिट असर है । एक लम्बे अंतराल के बाद उनका ताजा संस्मरण ।
(अखिलेश, तद्भव 31)



Bechain Rooh Ka Musafir, Sansmaran Alok Jain - Ravindra Kalia

रवीन्द्र कालिया जी की लेखन शैली की ... बड़ाई के लिए शब्द नहीं मिलते - क्या कहूं - जब उनके लिखे को पढ़ता हूँ. संस्मरण लिखने की अद्भुत कला है उनके पास... आलोक जैन जी से उनका (और ममताजी का) मोहात्मक रिश्ता रहा है - मुझे याद है किस तरह आलोक जी ने मुझ से एक कार्यक्रम में कहा - "मेरी और ममता की तस्वीर खींचो" ... मैंने उस यादगार तस्वीर में रवीन्द्र जी को भी (उनके मना करने पर भी) शामिल कर लिया - अच्छा किया. आलोकजी का देहांत कालियाजी के लिए बहुत दुखद रहा... साहित्य के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने वाले आलोक जी की शांति-सभा में साहित्य जगत से उससुबह  सिर्फ ममता जी और रवीन्द्र जी ही नज़र आये थे... यही रीत है ?  आलोकजी के देहांत के बाद रवीन्द्र जी कई महीनों तक उनपर संस्मरण लिखते रहे, जब भी पूछता तो कहते 'लिख रहा हूँ यार' - और क्या ही अद्भुत लिखा है - 
अखिलेश जी को आभार -  'तद्भव' में प्रकाशित 'बेचैन रूह का मुसाफिर' - तीन कड़ियों में से पहली आप सब के लिए ...
भरत तिवारी 

बेचैन रूह का मुसाफिर - 1

कोई उनसे परिचित हो या न हो, उनके बारे में किस्सों से जरूर दो चार हो जाता था । ये किस्से रुई के फाहों की तरह हवा में उड़ते रहते थे । लोग रस लेकर सुनते थे और उनमें थोड़ा और नमक मिर्च लगा कर वातावरण में पुन: छोड़ देते थे । ये आवारा किस्से मुझ तक भी पहुंचे, इससे कहीं पहले जब मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई । मिलने पर लगा कि तमाम किस्से किसी मनचले किस्सागो ने फैलाये हैं । ये किस्से उस परिवार से ताल्लुक रखते थे, जो अपने समय में औद्योगिक जगत का सबसे चमकीला सितारा था । अपने समय के शीर्ष धनाढ्य परिवारों में से एक । उन दिनों अम्बानी, अदानी आदि का उदय नहीं हुआ था । परिवार का विभाजन हुआ तो इनके हिस्से सत्रह सौ करोड़ की परिसम्पत्तियां आयीं, जिनमें एशिया या देश की सबसे बड़ी सीमेण्ट फैक्टरी तो थी ही इसके अलावा कागज, जूट आदि के कल कारखाने भी थे, राजस्थान, बिहार और बंगाल तक जिनका विस्तार था । उन्हें मां का इतना लाड़ प्यार मिला कि उनकी बड़ी से बड़ी खता भी नजरअंदाज कर दी जाती । उनकी उदारता, सदाशयता, करुणा, भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति और कला के प्रति अनुराग के साथ साथ अहमन्यता और अहंकार को भी लोगबाग भूलते नहीं । कोई नहीं जानता कि ये स्थापनाएं कहां तक दुरुस्त थीं, मगर इतना तय है कि परिवार की साख को पचास साठ वर्ष बाद आज भी महसूस किया जा सकता है । फिलहाल वातावरण में खुश्क पत्तों की तरह उड़ते ऐसे किस्सों को जान लेना गैरजरूरी न होगा ।

‘‘एक किताब लिख कर ए क्लास लेखक बनना बहुत मुश्किल है । इस गरिमा को पाने के लिए रचनाकार को लगातार रियाज करना पड़ता है, एक उच्चकोटि के गायक की तरह ।’’ - आलोक जैन


सुनने में आया कि साठ के दशक में वह बम्बई (अब मुम्बई) की अपने समय की सबसे प्रसिद्ध सिने तारिका के प्रेम में पड़ गये । उनके स्वभाव को देखते हुए कुछ लोग उन्हें चरमपंथी (यानी एक्सट्रीमिस्ट) भी कहते हैं । प्यार हो या नफरत वे तमाम सीमाएं लांघ सकते थे । ऐसे शख्स का किसी अभिनेत्री से प्रेम हो जाये तो इस प्रेमप्रसंग का हश्र क्या होगा ? जाहिर है, कुछ ऐसा होगा जो अभी तक न हुआ होगा और न शायद निकट भविष्य में होगा । हिमाचल या कश्मीर की वादियों में जहां कहीं उक्त अभिनेत्री की शूटिंग होती, एक चार्टर्ड विमान पहुंचता और गुलाब की पंखुड़ियां बिखरा कर लौट आता । अपने समय का यह सबसे प्रचंड प्रेमप्रसंग माना जाता है । इसका अंजाम क्या हुआ, कोई नहीं जानता––– न नायक ने आत्महत्या की न नायिका ने । दोनों गार्हस्थ्य की शरण में चले गये । उस तारिका का प्रसंग आने पर वह बोले— वह तो मेरी बहन की तरह थी । इस पर इन पंक्तियों के लेखक का चुप हो जाना ही उचित था ।

उनका क्रोध भी जगजाहिर था । वह आग की लपट की तरह कभी भी तनबदन को राख कर सकता था । क्रोध में वह आपको जला कर राख कर सकते थे । किसी से क्रुद्ध होते तो कहते— मैं उसे भस्म कर दूंगा । कई बार लगता था कि वह किसी को क्षमा नहीं कर सकते थे, जबकि हर वर्ष पर्यूषण के अवसर पर नियमित रूप से सार्वजनिक तौर पर मित्र अमित्र सब को एस–एम–एस के जरिए संदेश प्रेषित करते— ‘पर्यूषण पर्व के पावन अवसर पर जाने अनजाने हुई किसी भी भूल या गलती के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ ।’ होली, दीवाली, वसंत, कहने का अभिप्राय यह है कि वह शुभकामनाएं प्रेषित करना नहीं भूलते थे । अपने कारपोरेट दफ्तर में एक अधिकारी से बात करते हुए उसके कपड़ों पर नजर गयी तो पाया— शर्ट के कालर पर मैल की तह जम रही थी, शर्ट का रंग भी बदरंग हो चुका था । अधिकारी उनका प्रिय कर्मचारी था । जी–एम– को बुलवा भेजा और ताकीद की कि ‘इन्हें दो तीन सेट नये औपचारिक ड्रेस और जूते दिलवा दें । मैं हर कर्मचारी को स्पिक एंड स्पैन देखना चाहता हूँ ।’ अगले रोज जब उक्त कर्मचारी धन्यवाद ज्ञापन करने आया तो उसे देख इतना प्रसन्न हो गये कि बतौर उपहार एक साथ तीन इन्क्रीमेण्ट्स दे दिये ।



वास्तव में वह क्रुद्ध होते तो अति क्रुद्ध, उदार होते तो अति उदार, इतने उदार कि उनके बारे में कहा बताया जाता था कि जाड़े में वे ट्रक भर कम्बल बंटवा देते थे । भिखारियों पर विगलित हो जाते तो सिक्के न नोट, नोटों की गड्डियां तक बंटवा देते । दूसरी ओर अहंकार का दौरा पड़ता तो विवेक को ताक पर रख देते । जानकार लोग बताते हैं कि इसी अहंकार और अव्यवहारिकता के कारण वह अर्श से फर्श पर आते चले गये । एक घटना का बार बार उल्लेख सुनने को मिलता था— अपने उद्योग समूह के केन्द्रीय कार्यालय में बैठे थे, खबर मिली कि उनसे भेंट करने प्रदेश के मुख्यमंत्री आ रहे हैं । मुख्यमंत्री पधार चुके थे, मगर वह अपना काम निपटाते रहे । थोड़ी देर बाद संदेश भेजा कि भीतर लिवा लाइये । अपनी मेज पर ही मुख्यमंत्री से मिले, मैनेजर सोफे की तरफ इशारा करता रह गया मगर वह टस से मस न हुए । अभिवादन के बाद मुख्यमंत्री से पूछा— ‘‘कैसे आना हुआ ?’’ मुख्यमंत्री भीतर तक आहत हो गये थे, विनम्रता से उत्तर दिया— ‘‘आपके दर्शन करने चला आया ।’’ संक्षिप्त औपचारिक भेंट के बाद मुख्यमंत्री लौट गये ।

वह ट्रेड यूनियनिज्म का दौर था । सब उद्योगों में असंतोष की चिंगारी सुलग रही थी । उनका औद्योगिक समूह भी इसकी चपेट में आ गया । बातचीत के जरिए समस्याओं को सुलझाया जा सकता था, मगर इन्होंने अचानक तालेबंदी की घोषणा कर दी । मुख्यमंत्री पहले से आहत बैठे थे— समूचे उद्योग समूह पर रिसीवर बैठ गया । काले दिनों की शुरुआत हो गयी । एक एक कर उद्योग बीमार होते चले गये । वातावरण में ऐसी ही कुछ कहानियां तैरती रहती हैं ।

सुनने में तो यहां तक आया कि संजय गांधी जेल में थे तो भोजन इनके यहां से ही जाता था । यही नहीं, एक दिन ऐसे ही किसी मित्र को दो चार लाख रुपए की फौरी जरूरत पड़ी तो चाणक्यपुरी का अपना देश विदेश के बेशकीमती पत्थरों से सुसज्जित निर्माणाधीन बंगला अपने ही जान पहचान के बैंक के नाम गिरवी रख दिया । इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जब तक वह रकम अदा करते, उससे पहले ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो गया । दो चार लाख रुपए उनके लिए एक मामूली रकम थी, मगर मामला कुछ ऐसा उलझा कि उलझता चला गया । सैकड़ों करोड़ की वह सम्पत्ति आज भी बैंक के कब्जे में है । स्कॉच की चुस्कियां लेते हुए यह बात बंगले के एक पड़ोसी और उनके रिश्तेदार ने उनका उपहास उड़ाने की मुद्रा में बतायी थी । वास्तव में दीवानगी और बेखुदी के आलम में भी उनके चेतन और अवचेतन में हर वक्त व्यवसाय और उद्योग धंधे नहीं भारतीय ज्ञानपीठ का सपना हमेशा टिमटिमाता रहता था । वह कथा लेखकों, कवियों और समीक्षकों से हमेशा संवादरत रहते थे । किसी को भी किसी भी समय फोन कर सकते थे । उनकी करोड़ों की सम्पत्तियां मुकदमेबाजी में फंसी हुई थीं । मुकदमों के सिलसिले में उन्हें बार बार कोलकाता जाना पड़ता । दिन भर कोर्ट कचेहरी करते, वकीलों से लम्बी लम्बी मीटिंग्स चलतीं । फुरसत पाते ही वह ज्ञानपीठ अभियान में जुट जाते । अचानक एक दिन कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद के परिसर में प्रकट हो गये । मेरी उनसे पहली मुलाकात भाषा परिषद में ही हुई थी । मुझे यह जान कर बहुत अच्छा लगा कि वह ‘वागर्थ’ के बहुत प्रशंसक थे । मेरे सम्पादन में अभी कुछ ही अंक प्रकाशित हुए थे । मुझे लगा, उन्हें अतिशयोक्ति में बात करना ज्यादा प्रिय है । पुस्तक चर्चा उन्हें बहुत प्रिय थी । वे विभिन्न पत्रिकाओं के बारे में अपनी राय व्यक्त करते रहे । मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि उन्हें हिन्दी की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पत्रिका के बारे में अच्छी जानकारी थी । पत्रिकाओं के बारे में ही नहीं, पुस्तकों के बारे में भी । लंच का समय हो रहा था । ममता उन दिनों भारतीय भाषा परिषद के निदेशक के पद पर थी और मैं ‘वागर्थ’ का सम्पादन करता था । ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री परमानंद चूड़ीवाल जी की इच्छा थी कि हम दोनों परिषद से जुड़ें । फ्लैट का दरवाजा परिषद कार्यालय के गलियारे में ही खुलता था । दोपहर के भोजन के समय ममता घर चली आती थीं । दोपहर के भोजन की मैं तो प्रतीक्षा करता ही था, बगल में मैक्फरसन पार्क के दो एक कौव्वे भी बड़ी बेसब्री से डाइनिंग टेबल के पास खुलने वाली खिड़की से कांव कांव करते हुए ममता को पुकारते । वे वही रोटी खाते जो हम थाली से उठा कर देते । बासी रोटी की तरफ ताकते भी न थे । भोजन के समय खिड़की की सलाखों पर तैनात रहते । उस रोज घर में मेरे साथ वह भी थे । ममता को देखते ही उन्होंने पूछा— ‘‘यह ममता जी हैं ?’’ मेरे हामी भरने पर वह उठे और अभिवादन करते हुए ममता से बोले— ‘‘मैं आलोक प्रकाश जैन ।’’

‘‘नमस्कार आलोकजी!’’ ममता ने उनसे पूछा— ‘‘आप ने भोजन किया ?’’

ममता भी गायबाना तौर पर उनसे भली भांति परिचित थी ।



‘‘नहीं अभी जाकर करूंगा ।’’

‘‘आप हमारे साथ ही भोजन करें ।’’

अप्रत्याशित रूप से वह तैयार हो गये । दफ्तर से घर में प्रवेश करते ही माहौल बदल जाता था । एक तरफ हरा भरा मैक्फरसन पार्क था, दूसरी तरफ सामने थिएटर रोड, जो थोड़ी दूर पर स्थित पार्क स्ट्रीट के समानांतर चलती थी । फ्लैट में ढेर सारी खिड़कियां थीं । दिन भर फर्र फर्र हवा बहती थी । सुबह शाम पक्षियों की चहचहाहट सुनायी देती ।

आलोकजी ने विराजमान होते ही जेब से एक सूची निकाली और बोले—यह हमारे नये सेट की पुस्तकों और लेखकों के नाम हैं । आप इन्हें कैसे रेट करेंगे । ए़,ए,बी़,बी अथवा सी़ अथवा सी । सूची थमा कर वह व्यग्रता से मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे थे । लेखकों की रेटिंग तो सूची पढ़ कर हो सकती है । पुस्तकें मैंने पढ़ी नहीं थीं ।

‘‘आलोकजी बगैर पुस्तक पढ़े, पुस्तक की रेटिंग करना पुस्तक के साथ न्याय न होगा ।’’

मैंने कहा ।



‘‘नेचुरली ।’’ वह बोले— ‘‘लेखकों से तो आप परिचित होंगे ही, उनकी रेटिंग कैसे करेंगे ?’’

मैं इस जंजाल से निकलता चाहता था, वह लगातार शिकंजा कसते जा रहे थे ।

‘‘आइये पहले भोजन कर लें ।’’ मैंने कहा ।

‘‘आइये आइये ।’’ वह उठ गये । चुपचाप भोजन करते रहे । मैं समझ रहा था भोजन से निपटते ही वह दोबारा उसी विषय पर आ जायेंगे । इससे पहले कि वह कुछ कहते, मैंने अत्यंत मासूमियत से एक प्रश्न उन्हें पेश कर दिया— ‘‘अमुक लेखक की अमुक रचना के बारे में आप क्या सोचते हैं ? ’’

‘‘ए क्लास राइटर बी क्लास बुक ।’’

‘‘क्या बढ़िया मूल्यांकन है आलोकजी ।’’ ममता बोली— ‘‘अमुक लेखक की अमुक पुस्तक पर आपकी क्या राय है ?’’

‘‘बी क्लास राइटर ए क्लास बुक ।’’ वह बोले ।

‘‘क्या सटीक मूल्यांकन है ।’’ मैंने कहा और पूछा— ‘‘आपकी दृष्टि में लेखक नहीं कृति महत्वपूर्ण है ।’’

‘‘यह मैंने नहीं कहा ।’’ उन्होंने तुरंत प्रतिवाद किया— ‘‘एक किताब लिख कर ए क्लास लेखक बनना बहुत मुश्किल है । इस गरिमा को पाने के लिए रचनाकार को लगातार रियाज करना पड़ता है, एक उच्चकोटि के गायक की तरह ।’’

बात दूसरी दिशा की ओर मुड़ गयी । वह विस्तार से बताने लगे कि कैसे उनके घर में रचनाकारों का बहुत जमावड़ा रहता था । अम्मा श्रीमती रमा जैन उनका बहुत आदर सत्कार करती थीं । — दिनकर, पंत, भगवतशरण उपाध्याय, अज्ञेय, भारती आदि अनेक रचनाकारों से अम्मा बहुत स्नेह करती थीं ।



श्रीमती रमा जैन से सन् पैंसठ में कथा समारोह में मुझे भी मिलने का अवसर मिला था, सत्र के बाद उन्होंने मुझे बुलवाया था । उस समारोह में जैनेन्द्र जी वरिष्ठतम रचनाकार थे और मैं कनिष्ठतम । मेरी उम्र मुश्किल से छब्बीस सत्ताइस वर्ष होगी । मैंने आलोकजी को बताया कि मुझसे मिलते ही रमा जी ने कहा था— ‘‘मैं चाहती हूँ, तुम धर्मयुग में बम्बई चले जाओ ।’’ मेरे यह बताने पर कि मैं धर्मयुग से ही आया हूँ तो वह देर तक हंसती रहीं । उन्होंने भारती जी को फोन कर के इस घटना का जिक्र किया था, बम्बई पहुंचने पर भारती जी ने आह्लादित स्वर में बताया था । बातों का रुख अम्मा की तरफ मुड़ गया । मुझे लगा, आलोकजी अम्मा से अत्यंत भावनात्मक रूप से जुड़े थे । लेखन और लेखकों के प्रति अनुराग के संस्कार उन्हें अम्मा से ही मिले होंगे । ममता चुपके से उठ कर दफ्तर की दहलीज लांघ गयी और मैं आलोकजी से बतियाता रहा । मेरे लिए दफ्तर का बंधन था नहीं । मैं कभी कभार ही अपने कक्ष में जाता था । मेरा दफ्तर तो मेरा फोन ही था । आलोकजी कभी घड़ी की तरफ देखते और कभी उस कागज को, जिसमें पुस्तकों के नाम लिखे थे । उन्होंने उस कागज को तहा कर जेब में रखा और फिर निकाल कर कुर्सी पर रख दिया । अपने बाद के वर्षों में मैंने देखा कि वह अपनी जेब में कोई कागज नहीं रखते थे । पर्स, रुपया पैसा, कागज का पुर्जा कुछ नहीं । अगर हाथ में कुछ कागज होते तो वह कहीं न कहीं छोड़ जाते । उनकी जेबें खाली रहती थीं, जो कुछ भी होता वह तपन के पास होता । कागज तो कागज उनके रुपये पैसे भी वही संभालता था । हिसाब किताब भी । उन्होंने जेब से फोन निकाला और एक आंख बंद कर बहुत नजदीक से फोन मिलाया और उठ कर चल दिये । विदा लेना तो दूर उन्होंने पीछे मुड़ कर भी न देखा । यह उनकी अदा थी ।

इसके बाद वह यदाकदा परिषद आने लगे । मुझे दफ्तर में न पाते तो घर चले आते । अगर मैं मिल जाता तो पूछते— ‘‘आप व्यस्त तो नहीं है ?’’

बैठते ही कहते— ‘‘नीचे पुस्तक केन्द्र से ज्ञानपीठ का सूचीपत्र मंगवाइये ।’’


नीचे पुस्तक केन्द्र था । उन्हें मालूम था कि वहां सब प्रकाशकों के सूचीपत्र उपलब्ध रहते हैं । सूचीपत्र पाते ही वह वही राग छेड़ देते— ‘‘बतायें इस पुस्तक और इसके लेखक की क्या रेटिंग करेंगे ?’’

कुछ दिनों की टालमटोल के बाद मैं निष्पक्ष राय देने लगा । वह सहमत न होते तो जिरह करते । सन् पैंसठ के कोलकाता के विराट कथा समारोह में चार पीढ़ियों के कथाकारों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें जैनेन्द्र कुमार, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, इलाचंद्र जोशी, उपेन्द्रनाथ अश्क, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, अमृतलाल नागर, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, अमरकांत, मार्कंडेय, शेखर जोशी, श्रीकांत वर्मा, शानी, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, ममता, शैलेश मटियानी आदि तमाम पीढ़ियों के रचनाकार आमंत्रित थे । परिषद के अपने कार्यकाल के दौरान मैं चाहता था कि 2006 में वैसा ही एक आयोजन कोलकाता में पुन: किया जाये । प्रथम कथा समारोह में साहू परिवार की सक्रिय भूमिका थी । श्रीमती रमा जैन तो लगभग प्रत्येक सत्र में मौजूद रहीं । मैंने आलोकजी से इस योजना की चर्चा की । वह बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि वह इस आयोजन में अवश्य शामिल होंगे, चाहे उन दिनों कहीं भी हों । वह दिल्ली से भी एस.एम. एस. करके पूछते रहते थे कि कथा समारोह की योजना कहां तक पहुंची । मैंने परिषद के अध्यक्ष परमांनद चूड़ीवालजी से इसकी चर्चा की । उन्होंने तुरंत स्वीकृति प्रदान कर दी । परिषद के अपने अंतर्विरोध भी थे । कुछ न्यासियों को परिषद के संचालन में अध्यक्ष की सक्रियता पसंद न थी । वे केवल शोभा के लिए अध्यक्ष की उपस्थिति चाहते थे । बहरहाल ऐसी परिस्थितियां तमाम संस्थाओं में उत्पन्न होती रहती हैं । चूड़ीवालजी की प्रथम कथा समारोह में भी सार्थक भूमिका थी । यह समारोह भारतीय संस्कृति परिषद द्वारा आयोजित किया गया था । उसमें वरिष्ठ लेखकों के लिए हवाई यात्रा की व्यवस्था की गयी थी । चूड़ीवालजी ने भरसक प्रयास किये कि कथा समारोह के लिए परिषद द्वारा अधिक से अधिक बजट पास कराया जा सके । परंतु उन्हें बहुत सफलता नहीं मिली । क्षतिपूर्ति के लिए सह संयोजन के लिए साहित्य अकादमी से सम्पर्क साधे गये । चूड़ीवालजी ने ही इस आयोजन का नामकरण किया उर्दू हिन्दी कथा कुम्भ । गोपीचंद नारंग उन दिनों साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे । उनके सौजन्य से साहित्य अकादमी भी सहयोग के लिए तैयार हो गयी । अंतत: आधिकारिक घोषणा कर दी गयी कि 10, 11, 12 मार्च 2006 को कोलकाता में कथा कुंभ का आयोजन होगा और सर्वश्री कृष्णा सोबती, कमलेश्वर, ज्ञानरंजन, गिरिराज किशोर, असगर बजाहत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोड़ा, गोविन्द मिश्र, हिमांशु जोशी, अखिलेश, विभूति नारायण राय, मिथिलेश्वर, शैलेन्द्र सागर, गोपाल राय, मधुरेश, श्रीभगवान सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, शमोएल अहमद, भारत भारद्वाज, जयनंदन, कृष्ण मोहन, नीलाक्षी सिंह, पकंज मित्र, प्रभात रंजन, अल्पना मिश्र, शशि भूषण द्विवेदी, महुआ माजी, मो. आरिफ, साधना अग्रवाल, मनोज कुमार पांडेय, राकेश मिश्र आदि को निमंत्रित किया गया । मैं, ममता और कुणाल परिषद में ही थे । समस्त स्थानीय कथाकारों को भी निमंत्रण भेजा गया । आलोकजी 10, 11, 12 मार्च तक प्रत्येक सत्र में मौजूद रहे । वह ध्यानपूर्वक चर्चाएं सुनते रहे । सुबह से शाम तक परिषद में रहते । सबके साथ भोजन करते । एक दिन उन्होंने समस्त युवा लेखकों को एक आला रेस्तरां में रात्रिभोज भी कराया । नये से नये लेखकों से वह निरंतर संवादरत रहे । दिल्ली लौटने से पूर्व वह तमाम युवा कथाकारों के साहित्यिक अभिभावक की भूमिका में आ गये । खबर मिली कि दिल्ली पहुंच कर वह घंटों नये रचनाकारों से फोन पर बतियाते । कई नये नवेले लेखक उनके फोन सुन सुन कर यह भ्रम पाल लेते कि आलोक जैन तो उसके मित्र हैं । अक्सर देखा गया कि किसी समारोह अथवा गोष्ठी में कोई लेखक अत्यंत अनौपचारिक होने की चेष्टा करता तो वह वहीं उसे बुरी तरह डांट देते और हर मिलने जुलने वाले मित्र से शिकायत करते कि अमुक कवि या कथाकार अत्यंत बदतमीज है ।



आलोकजी भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी थे । इस न्यास की स्थापना उनके माता पिता ने की थी, वह मन ही मन ज्ञानपीठ को अपनी बपौती मानते थे, मगर ज्ञानपीठ एक न्यास द्वारा संचालित होता था, जिसका अपना संविधान था, न्यासियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे न्यास के दैनंदिन कार्य में हस्तक्षेप न करें और न कार्यालयी कार्य में हस्तक्षेप करें । अगर कोई आपत्ति हो तो प्रबंधक न्यासी से बात करें अथवा न्यास की बैठक में रखें । मगर आलोकजी को इन नियमों की क्या परवाह ? ‘वागर्थ’ से इतने प्रसन्न थे कि वागर्थ को ज्ञानपीठ का छह अंकों का विज्ञापन जारी कर दिया । दिल्ली पहुंच कर आर्ट वर्क भी भिजवा दिया । लम्बे समय तक उन विज्ञापनों का भुगतान नहीं आया तो परिषद के लेखा विभाग से ज्ञानपीठ को स्मरणपत्र जाने लगे । यही नहीं, युवा पुरस्कारों की राशि के साथ साथ उन्होंने पांच पांच हजार के ज्ञानपीठ प्रकाशन देने की घोषणा भी कर दी । प्रबंधन को इसकी खबर न थी । वैसे भी न्यास उनकी घोषणाओं के प्रति उदासीन रहता था । मगर आलोकजी जो चाहते, वह करवा ही लेते चाहे उन्हें इसके लिए कितनी भी माथापच्ची क्यों न करनी पड़े । अगर सीधी अंगुली से घी न निकलता तो वह अपना रौद्र रूप धारण कर लेते । वह आपे से बाहर हो जाते और अपनी छतविस्फोटक हुक्मराना आवाज में चिल्लाते कि उनका सामना करना मुश्किल हो जाता । वह दरवाजा खोलते और बिना किसी की तरफ देखे खरामा खरामा चुपचाप सीढ़ियां उतर जाते । उनका पीर बावर्ची भिश्ती खर सेक्रेटरी खजांची टाइपिस्ट सेवक तपन उनके पीछे पीछे चल देता । पूरी दुनिया में वही एक शख्स था जो उनकी नब्ज समझता था । तपन से पहले उसके पिता भी आलोकजी के सहायक थे । वह भी उनके क्रोध का शिकार होते हांेगे, मगर आलोकजी न केवल तपन बल्कि उसके बाल बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को ध्यान में रखते थे । उसे अधिक से अधिक राहत देने की कोशिश करते । उनकी जान को इतने बवाल थे कि सुबह उनके पास पचीस लाख रुपए आते और सूरज अस्त होने पर तपन उन्हें खबर देता कि खाता खाली हो चुका है । कई बार लगता कि वह एक राजा हैं और कई बार लगता वह राजा नहीं फकीर हैं, औलिया हैं । वह विरुद्धों का सामंजस्य थे । कभी दयावान लगते और कभी निर्मम । कभी नायक कभी खलनायक ।

कोलकाता में एक दिन उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वह परिषद के अध्यक्ष परमानंद चूड़ीवाल से मिलना चाहते हैं । किसी भी दिन सायं चार से पांच के बीच वह उपलब्ध हो सकते हैं । समय सुनिश्चित हो गया । चूड़ीवाल जी समय के बहुत पाबंद व्यक्ति थे और आलोकजी भी समय पर पहुंच गये । मैंने दोनों का परिचय करवाया । बातचीत शुरू होती इससे पहले ही आलोकजी के फोन की घंटी बजी । उन्होंने चूड़ीवालजी से इजाजत लेकर बातचीत शुरू की । आलोकजी ने यह कह कर फोन काट दिया कि वह इस समय जरूरी मीटिंग में हैं, फुर्सत मिलते ही बात करेंगे । फोन की घंटी दुबारा बजी । मैं बगल में ही बैठा था, हल्की सी आवाज सुनायी पड़ रही थी, लग रहा था कोई बहुत तैश में बोल रहा था । वह चुपचाप उसकी बात सुनते रहे । उनका चेहरा तनावग्रस्त हो रहा था । उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा— ऐसा नहीं सोचते मेरे बच्चे । थोड़ा धैर्य रखो । दूसरे छोर से आवाज उग्रतर हो रही थी । उन्होंने कहा— मैं इसकी व्यवस्था कर रहा हूँ । शांत हो जा बाबू । मेरे राजकुमार । मैं स्तब्ध था, आलोकजी के स्वभाव में ही नहीं था, किसी को इतना बोलने की इजाजत देना । मालूम नहीं किसका फोन था और उनकी क्या विवशता थी कि वह न तो फोन काट पा रहे थे, न ही डांट पा रहे थे । पहली बार मैं उन्हें रिसीविंग एंड पर देख रहा था । आधे घंटे की मीटिंग तय हुई थी । चूड़ीवालजी बार बार घड़ी देख रहे थे, पांच बजे उन्हें शिक्षायतन पहुंचना था । उन्होंने एक चिट पर लिख कर मुझे बताया कि आलोकजी से किसी और दिन मिलूंगा । कुछ देर बाद वह उठे और नमस्कार करते हुए कमरे से निकल गये । मैं भी उठ कर चल दिया ताकि आलोकजी खुल कर बात कर सकें । मालूम नहीं, उस दिन वह कब तक बात करते रहे, कब तक कमरे में रहे और कब वहां से रुखसत हुए । बाद में दिल्ली पहुंच कर उन्होंने मुझे और चूड़ीवालजी को पत्र लिख कर उस दिन के अवरोध पर खेद प्रकट किया ।

आलोकजी से मेरा परिचय कोलकाता तक सीमित था । जैसाकि पहले जिक्र आ चुका है उनकी बहुत सी सम्पत्ति कोलकाता में मुकदमेबाजी में फंसी थी । एक दिन कुसुम खेमानी ने बताया था कि ये विवाद वर्षों से चल रहे हैं । ये सम्पत्तियां कोलकाता के प्रमुख स्थानों पर थीं । एक सम्पत्ति तो अलीपुर में साहू दम्पती के कई एकड़ में फैले भव्य और विशाल आलीशान बंगले के पीछे थी, सन् पैंसठ के कथा समारोह में सम्मिलित होने वाले कथाकारों को रमा जी ने इसी बंगले के मुक्तांगन में हाई टी पर आमंत्रित किया था । इसी अवसर पर कमलेश्वर को सारिका के सम्पादन का कार्यभार ग्रहण करने का प्रस्ताव मिला था । इसका उल्लेख मैंने कमलेश्वर पर लिखे अपने संस्मरण में भी किया था । इस चाय की दावत का विस्तृत वर्णन था और जिसकी कुछ पंक्तियां कमलेश्वर जी को नागवार गुजरी थीं, उन्होंने पत्र लिख कर उन पंक्तियों का हटाने का आग्रह किया था ।

क्रमशः
बेचैन रूह का मुसाफिर - 2 व बेचैन रूह का मुसाफिर - 3
००००००००००००००००

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रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

कायरता मेरी बिरादरी के कुछ पत्रकारों की — अभिसार @abhisar_sharma

मैं सोचता हूँ के मोदीजी जब 5, 10 या 15 साल बाद देश के प्रधानमंत्री नहीं …

साल दर साल

एक साल से पढ़ी जाती हैं

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

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हिंदी कहानी : उदय प्रकाश — तिरिछ | uday prakash poetry and stories

उदय प्रकाश की कहानी  तिरिछ  तिरिछ में उदय प्रकाश अपने नायक से कहल…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

हिन्दी सिनेमा की भाषा - सुनील मिश्र

आलोचनात्मक ढंग से चर्चा में आयी अनुराग कश्यप की दो भागों में पूरी हुई फिल…

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi Verma Stories list in Hindi BIBIYA

बिबिया —  महादेवी वर्मा की कहानी  mahadevi verma stories list in hind…