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नामवर सिंह - विरोध उसी का होता है जिसमें तेज होता है (जीवन क्या जिया : 4ब )

जुल॰ 21, 2016

विरोध उसी का होता है जिसमें तेज होता है (नामवर सिंह - जीवन क्या जिया : 4ब )

Jeevan kya Jiya - 4b

Namvar Singh

जीवन क्या जिया! 

(आत्मकथा नामवर सिंह बक़लम ख़ुद का अंश)


उधर द्विवेदी जी के विरुद्ध भी कम विषाक्त वातावरण नहीं था। विरोध के बीच हर मिनट, हर क्षण का दंश था। जैसे बिच्छुओं की पिटारी में कोई बैठा दिया गया हो, द्विवेदी जी बैठे हुए थे। अपना दुख वह किससे कहें। पड़ोस से कह नहीं सकते थे, घर में कह नहीं सकते थे। आखिरकार मुझी से कहते, हालांकि मैं छोटा था। वह कहते, ”मैंने बहुत बड़ा पाप किया जो शांति निकेतन छोड़ कर यहां आ गया। क्यों आ गया मैं यहां?“ लेकिन उन्हीं दिनों मैंने पंडित जी से यह चौपायी सुनी थी जिसे कहा तो रावण ने है लेकिन है तुलसी कीः
निज भुजबल मैं बयरु बढ़ावा।
देहउं उतरु जो रिपु चढ़ि आवा।।

मैंने अपने भुजबल से लड़ाई ली है और रिपु चढ़ आयेंगे तो जवाब दूंगा। पंडित जी ने कहा, ”जी तो करता है, यहां से चला जाऊं लेकिन अब दैन्यं न पलायनम्। मैं मैदान छोड़ कर नहीं जाऊंगा।“ एक दिन मैंने उनसे पूछा, ”आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र और आपमें कौन सा सैद्धांतिक विरोध है? वह क्यों आपके विरुद्ध हैं? क्या इसलिए कि वह रीतिकाल को मानने वाले हैं और आप कबीर को?“ पंडित जी बोले, ”नहीं नामवर जी, यदि सैद्धांतिक विरोध होता तो कोई बात नहीं थी। यह सब तो होता रहता है और मैं उसका अभ्यस्त भी हूं। लेकिन यह नितांत व्यक्तिगत है और व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण ही यह युद्ध है और ऐसा युद्ध जीवन में मैंने लड़ा नहीं है। पहली बार लड़ना पड़ रहा है।

इसी तरह एक दिन पं. चंद्रबली पांडे की बात हो रही थी कि वह आते हुए दिखे। पंडित जी बोले, ”कुपित ब्रह्मचर्य आ रहा है।“ मैंने पूछा, ”कुपित ब्रह्मचर्य क्या होता है?“ पंडित जी ने कहा, ”जो रात में अपने से लड़ता है और दिन में दूसरों से।“ फिर कहने लगे, ”दोष इनका नहीं है। इनको लोगों ने भड़काया है। यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शिष्य रह चुके हैं। इन्हें समझाया गया कि हजारी प्रसाद द्विवेदी शुक्ल जी के विरोधी हैं और शुक्ल जी की तमाम मर्यादाओं को नष्ट करने वाले हैं।

दक्षिणपंथी विचारधारा के जो लोग हिन्दी में होते हैं, उनकी पहुंच दूर दूर तक होती है।

मेरे ऊपर आक्रमण काफी तीखा हो गया था तो एक शाम पंडित जी से कहा, ”मेरे ऊपर जो प्रहार हो रहा है, वह दरअसल आपके ऊपर लोग चोट करना चाहते हैं मेरे माध्यम से।“ वह बोले, ”नहीं नामवर जी, उलटा भी हो सकता है। मेरे कारण लोग तुम्हें दंड दे रहे हैं।“ थोड़ा रुक कर कहने लगे, ”एक चीज याद रखो, विरोध उसी का होता है जिसमें तेज होता है। विरोध से ही शक्ति नापी जाती है। जब छोटी सी चिन्गारी दिखायी पड़ती है तो लोग घी नहीं पानी डालते हैं।“ पंडित जी की इस बात ने मुझे बल दिया और आगे जूझने के लिए रास्ता दिखाया।

यहां मैं एक दिलचस्प संयोग की ओर इशारा करना चाहता हूं कि पंडित जी का जन्म 1907 में हुआ था और मेरा 1927 में। हम दोनों के बीच मुक्तिबोध थे, जिनका जन्म 1917 में हुआ था। मुझे ज्योतिष में कभी भी यकीन नहीं रहा लेकिन विचित्र है कि सागर विश्वविद्यालय से जब मैं निकाला गया तो उसी समय द्विवेदी जी को भी बी.एच.यू. से निकाला गया था।

सागर में पढ़ाते हुए कुछ दिन बीते होंगे कि एक घटना घटी। भोपाल में प्रगतिशील लेखक संघ का विशेष सम्मेलन बुलाया गया। मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई सभी उसमें शामिल हुए। द्विवेदी जी और नंद दुलारे वाजपेयी जी को भी आमंत्रित किया गया था। एक को अध्यक्षता करनी थी, दूसरे को उद्घाटन। द्विवेदी जी नहीं आये तो आयोजकों ने अध्यक्षता का दायित्व मुझे सौंप दिया। वाजपेयी जी को यह बात बहुत ही नागवार लगी। उनके ही विभाग का एक लेक्चरर, रीडर भी नहीं, अध्यक्षता करे और उसमें उनकी बातों का खंडन भी करे, यह गुस्ताखी! उद्घाटन सत्र के बाद अगले दिन प्रातःकाल गोष्ठी हुई जिसमें वाजपेयी जी अध्यक्षता कर रहे थे। मुक्तिबोध ने पर्चा पढ़ा। वह पर्चा उनकी ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’ में है। मुक्तिबोध के बाद श्रीकांत वर्मा को बोलना था। श्रीकांत तो किसी को छोड़ने वाले आदमी नहीं। मैंने निश्चय किया कि जो कुछ हुआ, वही बहुत है। मैं नहीं बोलूंगा। लेकिन वाजपेयी जी ने हठ पकड़ लिया। कहा, ”अध्यक्ष के नाते मैं आदेश देता हूं कि आपको बोलना है। अब आप खुल कर सामने आ जाइये।“ मैं बोला। तमतमाया चेहरा लिए वाजपेयी जी दोपहर को ही लौट गये। मगर वह अपने चेलों को छोड़ गये थे, रिर्पोटिंग के लिए।



मैं सागर पहुंचा तो मालूम हुआ कि फैसला हो चुका है। उन दिनों कहानीकार विजय चौहान और मैं एक ही घर में रहते थे। उन्होंने बताया कि सब गड़बड़ हो गया है। मुझे कन्फर्म होना था और कन्फर्मेशन के लिए विभागाध्यक्ष की रिपोर्ट जाती है। वाजपेयी जी ने रिपोर्ट में लिख दिया था कि कन्फर्म न किया जाय। वाजपेयी जी विभागाध्यक्ष होने के साथ साथ एक्जीक्यूटिव कौंसिल के मेम्बर भी थे। वहां उनका बहुमत भी था। प्रशासन ने मुझे मीटिंग के पहले बुलाया और कहा कि एक ही उपाय है अब कि मेरे पक्ष में आचार्य द्विवेदी की लिखित गारंटी मीटिंग के पहले पहुंच जाये मेरे बारे में। इसके लिए मैं उन्हें तार दे दूं। मैंने तार दे दिया। लेकिन सागर जैसे छोटे शहर में शायद यह सम्भव था, लोगों ने वह तार ही रुकवा दिया। जब सब कुछ खत्म हो गया तो पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र जी, जो अब नहीं हैं इस दुनिया में, ने मुझे बुलाया और कहा, ”बहुत दुख है मुझे। खैर, पास में ही दमोह है, वहां हमारे वि.वि. से सम्बद्ध एक डिग्री कालेज में प्रिन्सिपल की जगह खाली है, तुमको मैं वहां नियुक्त कर सकता हूं। यहां से बेहतर तनख्वाह है।“ मैंने कहा, ”नहीं पंडित जी, अब नौकरी नहीं करनी है। यहां मैं ऐसे ही आ गया था। इन्होंने हटा दिया, वर्ना साल दो साल बाद मैं खुद सागर से चला जाता। काशी छोड़ सागर क्या रहना।

जोधपुर वि.वि. में मैं सन् 1970 के अक्तूबर में गया था और 1974 के सितम्बर अंत तक मैं वहां रहा। बाधाएं वहां भी मेरे पीछे थीं। वहां मिले एक शर्मा। अब भी हैं दिल्ली में। मुझे लेकर उनका कष्ट था कि बाहर का यह आदमी यहां कैसे आ गया, वह भी कम्युनिस्ट। वह यह भी सोचते थे कि मैं वहां न जाता तो वह विभागाध्यक्ष हो जाते। जबकि उनका कोई चांस नहीं था। उनसे ऊपर डा. गुप्ता थे जो रीडर हेड थे। फिर भी वह प्रयत्नरत थे। वह आनंदमार्गी जनसंघी थे। उनके सूत्र दूर दूर तक फैले हुए थे, दिल्ली तक। दक्षिणपंथी विचारधारा के जो लोग हिन्दी में होते हैं, उनकी पहुंच दूर दूर तक होती है। शर्मा जी भी ऐसे ही थे। बहुत से लोगों को मिठाइयां पहुंचाया करते थे, फल लेकर जाया करते थे। वह हिन्दी के ठेठ अध्यापक थे। उनको लोगों ने भी कोंचा, उकसाया। उन्होंने हाईकोर्ट में रिट कर दिया। लेकिन रिट में कोई दम नहीं था। यूनिवर्सिटी ने जवाब दे दिया था और उस केस की सुनवाई भी नहीं हुई कभी अब देखा कि रिट से तो यह जाने वाला नहीं तो फिर ‘आधा गांव’ का मुद्दा भड़का दिया। दरअसल मैंने वहां का पूरा कोर्स बदल दिया था। आमूलचूल। बहुतों को कठिनाई हो रही थी कि पढ़ाएंगे कैसे। मैंने किताबें भी नयी तैयार करायीं।

वी.वी. जान ने कहा कि प्राइवेट पब्लिशर्स से बहुत रुपया खाते हैं हिन्दी वाले। आप किताबें तैयार कराइये, वि.वि. खुद छापेगा। उस समय हायर सेकेण्ड्री पास करके विद्यार्थी सीधे यूनिवर्सिटी आते थे। बारहवीं को प्री यूनिवर्सिटी कहते थे। इसके बाद तीन साल का बी.ए. और दो साल का एम.ए. होता था। तो हिन्दी की एक दर्जन किताबें अकेले दम मैंने तैयार कीं। और जुलाई से मैंने वह पाठ्यक्रम लागू कर दिया। और यहीं से शुरू हुआ ‘आधा गांव’ का विवाद। आधा गांव को पाठ्यक्रम में चुनने के औचित्य पर समर्थन के लिए मैंने अनेक साहित्यकारों को पत्र लिखे। समर्थन मिला, पर अपर्याप्त।

आधा गांव’ पर दो आरोप थे अश्लील है और साम्प्रदायिक है। रामविलास शर्मा जी की प्रतिक्रिया थी, ”साम्प्रदायिक तो नहीं है पर अश्लील है। वि.वि. में पढ़ाये जाने लायक नहीं है।“ अन्य कई साहित्यकारों को मैंने लिखा था। सबकी पूंछ उठा कर देख लिया था मैंने। अंततः मुझे पाठ्यक्रम से पुस्तक वापस लेनी पड़ी। हिन्दी के अध्यापकों से तो उम्मीद नहीं करता था लेकिन साहित्यकारों और पत्रकारों से मदद की उम्मीद थी। खास तौर पर मैं दिनमान से आशान्वित था लेकिन क्या किया जाय, लोगों के मन में गांठें थीं। और तो और राही के मित्र धर्मयुग के सम्पादक धर्मवीर भारती, जिन्हें मदद करनी चाहिए थी, ने भड़काने का काम किया। धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि जोधपुर में मैं ज्यादा काम नहीं कर पाऊंगा। वैसे भी काम करते हुए चार वर्ष हो गये थे और अब प्रोफेसर जान वी.सी. नहीं थे। इसी बीच जवाहरलाल नेहरू वि.वि. से निमंत्रण मिला। मैंने सोचा नया वि.वि. है जे.एन.यू., एकदम नये सिरे से कुछ करने का मौका रहेगा। यह बेहतर रहेगा, बजाय इसके कि जोधपुर में पढ़ा करके और छोटे छोटे युद्धों से छुटभैयों से लड़ते हुए अपनी शक्ति बरबाद करें।
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