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गुलज़ार को गुस्सा क्यों आता है? — पंकज शुक्ल | Angry Gulzar @pankajshuklaa

सित॰ 29, 2016


पंकज शुक्ल भारत के एक निहायत पिछड़े गांव मझेरिया कलां, उन्नाव (उ.प्र) में पैदा हुए और दिल्ली, मुंबई से लेकर लंदन, अमेरिका तक रिपोर्टिंग और फिल्म मेकिंग कर आए हैं। महीने भर के किसिम किसिम के बिल भरने के लिए अखबार की नौकरी करते हैं और अपने लिए वक़्त मिलता है तो गाने सुनते हैं, लॉन्ग ड्राइव पर जाते हैं या फिर किताबें पढ़ते और पटकथाएं लिखते हैं। टीवी के लिए तमाम नए और अलहदा किस्म के कार्यक्रम बना चुके पंकज की डॉक्यूमेंट्री "स्वराज मुमकिन है" को हाल ही में फेस्टिवल ऑफ ग्लोब, सैन फ्रैंसिस्सको में पुरस्कृत किया गया।  




गुलज़ार बीते शनिवार मुंबई के इस्कॉन सभागार में देश के फिल्म और टेलीविजन निर्देशकों की संस्था इफ्टडा की “मीट द डायरेक्टर- मास्टर क्लास” के अतिथि थे। उनसे ये बातचीत अमर उजाला के एसोसिएट एडीटर और इफ्टडा के सदस्य पंकज शुक्ल ने वहीं की जिसे पढ़ने के बाद भरपूर अहसास हुआ कि सब पढ़ें, विचारें और बच्चों के प्रति हमारे जिस रवैया को गुलज़ार ने उजागर किया है उसे 'सुधारें'।

पंकज भाई का शुक्रिया, उनसे संपर्क pankajshuklaa@gmail.com पर किया जा सकता है।


गुलज़ार को गुस्सा क्यों आता है?

पंकज शुक्ल

बच्चों के लिए ढेर सारे चुलबुले गाने लिखने वाले गीतकार, पटकथा लेखक और निर्देशक गुलज़ार देश में बच्चों को लेकर बने हालात से बहुत नाराज़ हैं। उनका साफ कहना है कि बच्चों के लिए सिवाय जुमले कहने के हमने कुछ नहीं किया। बच्चों के लिए फिल्में बनाने वाली सरकारी संस्था चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी को उन्होंने सिर्फ नए फिल्ममेकर्स के लिए हाथ साफ करने वाली संस्था करार दिया और कहा कि बच्चों के लिए नया साहित्य गढ़ने में हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी शून्य तक गिर चुकी है। 




“बाल फिल्मों में प्रोड्यूसर्स को मुनाफा नहीं दिखता”

बच्चों के लिए फिल्में न बनने की वजह के बारे में “अमर उजाला” के सवाल पर गुलज़ार ने पहले तो बहुत ही सीधा सा सपाट जवाब दिया कि इन फिल्मों में फिल्म निर्माताओं को मुनाफ़ा नज़र नहीं आता, इसीलिए वे बच्चों की फिल्में नहीं बनाते। लेकिन, जब उन्हें लगा कि जवाब थम गया है तो उन्होंने इसके जमाव में अपने गुस्से का पत्थर फेंका। वह बोले, बच्चों के लिए हम कहते बहुत हैं। उन्हें हम अपनी आने वाली नस्लें कहते हैं। हमारा भविष्य, देश का भविष्य कहते हैं। लेकिन क्या हमने कभी इसे महसूस भी किया या कि कभी ऐसा कुछ किया भी है। सिवाय जुमले कहने के हमने कुछ नहीं किया।



बच्चों के लिए हमारा रवैया घिनौना

देश में बच्चों को लेकर बन रहे हालात पर गुलज़ार का गुस्सा इसके बाद बढ़ता ही गया। उन्होंने कहा कि हमने बच्चों की दरअसल परवाह ही नहीं की है। हमने बच्चों के साथ बहुत बहुत बुरा बर्ताव किया है। हम उनका सम्मान भी नहीं करते। हम उन्हें प्यार करते हैं? हम अपने बच्चों को प्यार करते हैं और शायद सिर्फ अपने ही बच्चों को प्यार करते हैं, यहां तक कि पड़ोसियों के बच्चों को भी हम प्यार नहीं करते। हमारा मूल रवैया ही बच्चों के लिए गंदा और घिनौना हो चुका है। तीन साल, चार साल, पांच साल के बच्चों के साथ स्कूल बसों में बलात्कार हो रहे हैं, उनके शरीर के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या एक देश के तौर पर हम बच्चों को लेकर अपने सरोकारों पर गर्व कर सकते हैं? होना तो ये चाहिए कि कोई बच्चा अगर सड़क पार कर रहा हो तो सड़क पर ट्रैफिक अपने आप रुक जाना चाहिए।

हिंदी में बाल साहित्य का स्कोर ज़ीरो

गुलज़ार ने कहा कि हमारे समाज के मूल में कहीं कुछ गड़बड़ी आ गई है। हम बच्चों को प्यार ही नहीं करते हैं। हम सिर्फ उनके भीतर इसकी आशा जगाते हैं। बच्चों को लेकर हमारे सराकोर मरते जा रहे हैं। मराठी, मलयालम और मराठी के अलावा किसी दूसरी भाषा में बच्चों के लिए नया साहित्य नहीं लिखा जा रहा है। राष्ट्रभाषा हिंदी तो शून्य पर पहुंच चुकी है और कई अन्य मुख्य भाषाओं में ये रिकॉर्ड ज़ीरो के भी नीचे जा चुका है।

चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी ने कुछ नहीं किया

वापस मुख्य सवाल यानी देश में बच्चों की फिल्मों की तरफ ध्यान न होने की तरफ लौटते हुए उन्होंने बच्चों की फिल्में बनाने के लिए बनी सरकारी संस्था चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया की जमकर खिंचाई की। उन्होंने कहा कि इस सोसाइटी के पास तीन सौ से ऊपर फिल्में ऐसी पड़ी हैं जिन्हें किसी ने देखा तक नहीं और न ही ये रिलीज़ हो सकी हैं। इसके लिए सोसाइटी ने कुछ नहीं किया। बस बच्चों की फिल्में बनाने के नाम पर हर साल कुछ नए फिल्म मेकर हाथ साफ करने पहुंच जाते हैं।



गुलज़ार का नया प्रयोग!

गुलज़ार जल्द ही कविताओं की दिशा में एक नया प्रयोग अपने चाहने वालों के बीच लेकर आने वाले हैं। वह इन दिनों हिंदी से इतर भाषाओं के कवियों और शायरों की कलम से निकले शब्दों से होकर गुजर रहे हैं। उनकी कोशिश देश की तमाम भाषाओं और बोलियों में इन दिनों लिखी जा रही कविताओं से अपने प्रशंसकों और हिंदी प्रेमियों को अवगत कराना है। इस प्रयोग को उन्होंने “ए पोएम ए डे” नाम दिया है यानी कि हर रोज़ एक कविता। गुलज़ार की ये अनूदित कविताएं जल्द ही एक संकलन के तौर पर बाज़ार में आने वाली हैं। वह कहते हैं, मैं 28 का था तो लेखक ही बनना चाहता था पर फिल्मों में आ गया। अब 82 का हो गया हूं तो वापस वही करना चाहता हूं और कर रहा हूं जो मैं शुरू में करना चाहता था।
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