फिल्म रिव्यू : 'पिंक' अमिताभ बच्चन - पुराना वृद्ध वकील - सशक्त अभिनय #Pink @SrBachchan


फिल्म रिव्यू : 'पिंक' अमिताभ बच्चन -  पुराना वृद्ध वकील - शशक्त अभिनय

लड़कियों को लेकर कितना बदला समाज?

रवींद्र त्रिपाठी


सन् 2012 के दिंसबर में दिल्ली में `निर्भया- हादसा’ हुआ था। उसके बाद औरतों को लेकर कानून बदला। लेकिन क्या समाज की सोच बदली? क्या लड़कियों के बारे में दोहरे मानदंड बदले? कहना कठिन है और फिल्म `पिंक’ देखने के बाद तो यही लगता है कि शायद नहीं बदली। इसे दूसरी तरह से यों भी कह सकते हैं कि औरतों को लेकर पुरानी सोच नहीं बदली यही दिखाने के लिए `पिंक’ फिल्म बनी है।




बहरहाल, तफसील मे जाने के पहले इतना बता दिया जाए कि तीन लडकियां हैं- मीनल अरोड़ा (तापसी पन्नू), फलक (कीर्ति कुल्हारी) और एंड्रिया ( एंड्रिया)। तीनों कामकाजी हैं और दक्षिण दिल्ली में एक फ्लैट लेकर रहती हैं। अपने अपने घरों से अलगा। एक रात तीनों दिल्ली से सटे सूरजकुंड में एक पार्टी में जाती हैं और वहीं एक हादसा हो जाता है। मीनल राजवीर (अगद बेदी) के एक नौजवान को बोतल मार देती है क्योंकि वह उसके साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश कर रहा था। फिर शुरू होता है पुलिस में शिकायत और अदालती दांवपेचों का दौर। तीनों लडकियों के पक्ष में कौन आता है? सिर्फ एक पुराना वृद्ध वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन)। अदालती बहसों में विपक्षी वकील (पियूष मिश्रा) की तरफ से वही आरोप लगाए जाते हैं जो आम तौर पर परिवार से अलग रहने वाली लड़कियों पर लगाए जाते हैं। उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं और ये साबित करने की कोशिश की जाती है कि वे बदचलन हैं और इसीलिए उनपर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए औऱ सजा दी जाए। पुलिस भी लड़िकयों के खिलाफ है। भले एसएचओ महिला है । क्या दीपक सहगल नाम का वृद्ध वकील, जिसकी अपनी पारिवारिक दिक्कते हैं, तीनों लड़कियों को इंसाफ दिला पाएगा? फिल्म समाज की चेतना को झकझोरने का काम करती है।

`पिंक’ कुछ कुछ `दामिनी’ की याद दिलाती है। लेकिन कुछ कुछ ही। इसका मुख्य जोर महानगरों मे काम कर रही लड़कियों की सामाजिक हालत को दिखाना है। और इसका मुख्य आकर्षण अदालती ड्रामा ही है। पर निर्देशकीय कौशल इस बात में है कि आखिरी हिस्से में ही पता चलता है कि आखिर पार्टी के बाद हुआ क्या था। मध्यांतर के पहले उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर लड़कियों का झगड़ा किस बात पर हुआ था। अदालत में और उसके बाहर भी कई तरह के सवाल उभरते हैं। जैसे ये कि लडकियों के पहनावे, उनका हंस हंस के बातें करना, शराब पीना आदि क्या ये संकेत देते है कि वे सहज रूप से `उपलब्ध’ हैं। क्या लड़कियों और लड़कों के लिए अलग अलग सामाजिक नियम हैं? आखिर पुरुष ये क्यों नहीं समझते कि हर औरत को `ना’ कहने का अधिकार है और उस `ना’ का सम्मान किया जाना चाहिए। चाहे वह सेक्स वर्कर हो, पत्नी हो या सामान्य कामकाजी महिला हो।



`पिंक’ इस बात को भी रेखांकित करती हैं कि कैसे उत्तर पूर्व की लड़कियों को भारत के दूसरे हिस्से में सांस्कृतिक रूप से थोड़ा अलग समझा जाता है।

अमिताभ बच्चन शुरू में बेहद धीमी आवाज में बोलते हैं। एक थके हुए बूढ़े की तरह। धीरे धीरे फिल्म में उनकी आवाज का वही पुराना रूप उभरता है। पीयूष मिश्रा ने भी एक ऐसे वकील के किरदार को जीवंत कर दिया है जो अपने सवालों से जिरह के दौरान औऱतों के चरित्र पर कई सवाल उछालता है। किरदार निगेटिव है और पीयूष ने अपने अभिनय से उसे और स्याह कर दिया है। लेकिन अभिनय में सबसे ज्यादा अंक तापसी पन्नु को ही मिलेंगे जो सहमी, डरी और साहसी - इन जज्बों की मिली जुली रूप है। फिल्म के निर्देशक तो वैसे अनिरुद्ध राय चौधरी हैं और वे बांग्ला फिल्मों के चर्चित निर्देशक हैं। लेकिन शूजित सरकार इसके क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं और उनकी छाप भी फिल्म पर है।

और हां, फिल्म देखने के दौरान आपके मन में सवाल उठे कि हरियाणा यानी सूरजकुंड (हरियाणा) में हुए अपराध का मुकदमा दिल्ली की अदालत में क्यों चल रहा है तो उसे दबा दीजिएगा क्योंकि ऐसी बेतुकी बातें हिंदी फिल्मों में अक्सर होती रहती हैं।
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