मोरपंख पहनने से कोई कृष्ण नहीं बनता — देवदत्त पटनायक #ShabdankanTalk @devduttmyth - #Shabdankan
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मोरपंख पहनने से कोई कृष्ण नहीं बनता — देवदत्त पटनायक #ShabdankanTalk @devduttmyth

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हिंदी में देवदत्त पटनायक...सबतक पहुंचाना बहुत जरूरी है

पुराण शास्त्र का मतलब वह नहीं है जो हमें 19वीं सदी की अंग्रेज राजशाही और उनके शिक्षातंत्र के सहारे समझाया गया है। यही कारण है कि आम हिंदी भाषी नहीं जानते  कि पुराण शास्त्र दर्शन है और माइथोलॉजी का अर्थ पुराण शास्त्र है। हमें भारतीय अर्थों में भारतीय तरीके से धर्म और मिथ्या के मायने गढ़ने की जरूरत है।

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मैं पिछले 20 सालों से यही करने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मुझे शब्दांकनटॉक में अमित मिश्रा के साथ बातचीत में काफी मजा आया, क्योंकि वह बहुत ही मूल सवाल जैसेः सच क्या है, झूठ क्या है, मिथ्या क्या है, धर्म क्या है... पूछ रहे थे। इनके बारे में अंग्रेजी में फिलॉसफी के स्टूडेंट्स इपिस्टिमॉलजी* और ऑन्टॉलजी* में पढ़ते हैं लेकिन इसके मायने सबतक पहुंचाना बहुत जरूरी है। हमारी यह बातचीत उस लिहाज से काफी सार्थक रही है।

धन्यवाद

देवदत्त पटनायक


(*Epistemology ज्ञानमीमांसा | *Ontology तात्त्विकी)

#शब्दांकनटॉक 1

देवदत्त पटनायक (‘devdutt pattanaik’) लिखने पर गूगल ‘Devdutt Pattanaik Books in Hindi’ स्वयं दिखाता है यानि “हिंदी में देवदत्त पटनायक की किताबें” तलाशने वालों की संख्या बड़ी है। हिंदुस्तान का यह युवा लेखक अपने पौराणिकज्ञान को अंग्रेजी लेखन और आख्यानों के माध्यम  से आज लाखों   लोगों तक पहुंचा रहा है। इनकी पॉपुलैरिटी का कुछ अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि मुझे इनकी किताब को पढ़ने का आदेश, इनकी फैन, ज्योत्स्निका, मेरी बेटी, जो उस समय कक्षा आठ में थी, से मिला था, तब-ही मैंने इन्हें पहली दफ़ा जाना। '

‘शब्दांकन’ हिंदी की पहुँच को बढ़ाने के लिए ही है। देवदत्त पटनायक से हुई #शब्दांकनटॉक १ इसी दिशा में बढ़ाया गया क़दम है, अमित की पत्रकारिता उनके वृहत-खोजी-दृष्टि-मूल-सवाल हैं और यही कारण है कि अमित मिश्रा के लिए गए इंटरव्यू सबसे अलहदा और रोचक होते हैं।  रिकॉर्डिंग, एडिटिंग, डायरेक्शन आदि मेरी स्वयं की है। रूपा पब्लिकेशन का धन्यवाद , उन्होंने अपने दिल्ली ऑफिस को रिकॉर्डिंग के लिए उपलब्ध किया। अब यह प्रयास आपको क्या दे पाया और #शब्दांकनटॉक 1 के बाद 2,3,4... कैसे होती है, यह आप-ही बता सकते हैं।

सस्नेह

भरत तिवारी 






(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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