किसके साथ हैं, बलात्कारी के या साध्वियों के — रवीश कुमार | #RamRahimSingh


पढ़ना है तो एक साँस में पढ़ें वरना नहीं 

सरकार बेटियाँ नहीं बचाती हैं

— रवीश कुमार

Shyam Jaju, Manoj Tiwari, Ram Rahim and Kailash Vijayvargiya
Shyam Jaju, Manoj Tiwari, Ram Rahim and Kailash Vijayvargiya 


निर्भया के लिए रायसीना हिल्स को जंतर मंतर में बदल देने वाली हिन्दुस्तान की बची हुई बेटियाँ नोट करें कि दो साध्वी ने कैसे ये लड़ाई लड़ी होगी, जिसकी जेल यात्रा को प्रधानमंत्री के काफ़िले की शान बख़्शी गई। दोनों साध्वी किस हिम्मत से लड़ीं ?

क्या आप जानती हैं कि जब वे अंबाला स्थित सीबीआई कोर्ट में गवाही देने जाती थीं तो कितनी भीड़ घेर लेती थी? हालत यह हो जाती थी कि अंबाला पुलिस लाइन के भीतर एस पी के आफिस में अस्थायी अदालत लगती थी। चारों तरफ भीड़ का आतंक होता था। जिसके साथ सरकार, उसकी दास पुलिस और नया भारत बनाने वाले नेताओं का समूह होता था, उनके बीच ये दो औरतें कैसे अपना सफ़र पूरा करती होंगी ? क्या उनके साथ सुरक्षा का काफिला आपने देखा? वो एक गनमैन के साथ चुपचाप जाती थी और पंद्रह साल तक यहीं करती रहीं। बाद में सीबीआई की कोर्ट पंचकुला चली गई।

दो में से एक सिरसा की रहने वाली हैं, वो ढाई सौ किमी का सफ़र तय करते पंचकुला जाती थीं और सिरसा के डेरे से निकल कर गुरमीत सिंह सिरसा ज़िला कोर्ट आकर वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये गवाही देता था। तब भी आधी से अधिक गवाहियों में पेश नहीं हुआ। साध्वी का ससुराल डेरा का भक्त है। जब पता चला कि बहू ने गवाही दी तो घर से निकाल दिया। इनके भाई रंजीत पर बाबा को शक हुआ कि उसी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जिस पर कोर्ट ने संज्ञान ले लिया। रंजीत की हत्या हो गई। गुरमीत पर रंजीत की हत्या का आरोप है। इस गुमनाम खत को महान पत्रकार राम चंद्र छत्रपति ने दैनिक पूरा सच में छाप दिया। उनकी हत्या हो गई। राजेंद्र सच्चर, आर एस चीमा, अश्विनी बख़्शी और लेखराज जैसे महान वकीलों ने बिना पैसे के केस लड़ा। सीबीआई के डीएसपी सतीश डागर ने साध्वियों का मनोबल बढ़ाया और हर दबाव का सामना करते हुए जाँच पूरी की। शुक्रवार रात साढ़े आठ बजे छत्रपति के बेटे अँशुल छत्रपति से बात हुई। फैसला आने तक उनके पास एक गनमैन की सुरक्षा थी। बाद में मीडिया के कहने पर चार पाँच पुलिसकर्मी भेजे गए। अँशुल ने कहा कि एक बार लड़ने का फैसला कर घर से निकले तो हर मोड़ पर अच्छे लोग मिले। तो आप पूछिये कि आज आपके नेता किसके साथ खड़े हैं? बलात्कारी के साथ या साध्वी के साथ ? आप उनके ट्वीटर हैंडल को रायसीना में बदल दीजिए। सरकार बेटियाँ नहीं बचाती हैं। दोनों साध्वी ने बेटी होने को बचाया है। सत्ता उनकी भ्रूण हत्या नहीं कर सकी। अब इम्तहान हिन्दुस्तान की बची हुई बेटियों का है कि वे किसके साथ हैं, बलात्कारी के या साध्वियों के ?

नोट: सबसे अपील है कि शांति बनाएँ रखें । किसी का मज़ाक न उड़ाएँ । किसी को न भड़काएँ। सब अपने हैं । 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-08-2017) को "कैसा सिलसिला है" (चर्चा अंक 2710) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं

ये पढ़ी हैं आपने?

मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
कहानी 'वो जो भी है, मुझे पसंद है' - स्वाति तिवारी | Hindi Kahani by Swati Tiwari
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
ईश्वर करे कोई लेखक न बने - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj's Editorial
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
Book Review: मानस का हंस की आलोचना — विशाख राठी
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा